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Friday, September 30, 2011

प्रधानमंत्री की जवाबदेही


लेखक मंत्रिमंडल और उसके मुखिया की कार्यशैली को संप्रग सरकार के संकट का कारण बता रहे हैं
केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार का संकट गहराता जा रहा है। संकट 2जी घोटाले और उसकी खुलती नई-नई परतों की वजह से उतना नहीं है, जितना मंत्रिमंडल और उसके मुखिया की कार्यशैली के कारण है। क्या एक गैरराजनीतिक व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाने का प्रयोग विफल हो रहा है? संप्रग-1 के नायक डॉ. मनमोहन सिंह संप्रग-2 के खलनायक जैसे क्यों नजर आने लगे हैं? क्या यह विपक्ष के भ्रामक प्रचार का नतीजा है या मीडिया का इस सरकार से मोहभंग का? क्या कांग्रेस के अंदर ही ऐसे लोग हैं जो इस सरकार और मनमोहन सिंह को कामयाब नहीं होने देना चाहते? क्या मनमोहन सिंह के पहले कार्यकाल में कांग्रेस का दबा हुआ अंदरूनी संघर्ष अब खुलकर सामने आने लगा है? क्या प्रधानमंत्री की सरकार पर और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की पार्टी पर पकड़ ढीली पड़ती जा रही है? ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब हर कोई जानना चाहता है। सवाल दिन ब दिन बढ़ रहे हैं पर जवाब देने वाला कोई नजर नहीं आ रहा। 2जी घोटाले की आंच अब पी चिदंबरम तक पहुंच गई है। सीबीआइ और केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि इस मामले में चिदंबरम की भूमिका की जांच करने की कोई जरूरत नहीं है। चिदंबरम के मामले को सुप्रीम कोर्ट ले जाने वाले सुब्रमण्यम स्वामी का कहना है कि नए तथ्यों की रोशनी में जांच कराने में हर्ज क्या है। नया तथ्य वित्त मंत्रालय का वह नोट है जो प्रधानमंत्री के लिए तैयार किया गया था। इस नोट को तैयार करने में कई मंत्रालय और कैबिनेट सचिव भी शामिल थे। प्रधानमंत्री इस पूरे मामले का तथ्यात्मक ब्यौरा चाहते थे। इस नोट में कहा गया है कि तत्कालीन वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने कोशिश की होती तो घोटाले को रोका जा सकता था। अब यह किसी से छिपा नहीं है कि मनमोहन सरकार के दोनों वरिष्ठ मंत्रियों प्रणब मुखर्जी और चिदंबरम आपस में बातचीत भी नहीं करते। इसलिए इस पूरे मामले को दोनों के आपसी झगड़े का नतीजा बताया जा रहा है। दोनों की सोनिया गांधी के दरबार में पेशी हो चुकी है। अब सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह की मुलाकात के बाद कोई अंतिम फैसला होगा। दोनों की नजर सुप्रीम कोर्ट के रुख पर है। लेकिन प्रधानमंत्री ने मंगलवार को विदेश से लौटते समय हवाई जहाज में मीडिया से कहा कि सरकार में सब ठीक-ठाक है। उन्होंने विपक्ष पर आरोप लगाया कि वह समय से पहले चुनाव के लिए बेचैन है और राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने की कोशिश कर रहा है। प्रमुख विपक्षी दल भाजपा का कहना है कि यह कांग्रेस का अंदरूनी मामला नहीं है जिसे पार्टी के नेता मिल बैठकर सुलझा लेंगे। यह जनता के पैसे का सवाल है। इस नोट के आधार पर विपक्ष चिदंबरम का इस्तीफा मांग रहा है। सवाल इस बात का नहीं है कि चिदंबरम राजा को रोक सकते थे या नहीं। सवाल इस बात का है कि प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के सदस्य अपनी ही सरकार की बनाई नीति से सहमत हैं या नहीं। स्पेक्ट्रम आवंटन के लिए पहले आओ पहले पाओ की नीति को लागू करने में तत्कालीन संचार मंत्री ए राजा ने क्या गड़बड़ की यह एक अलग मामला है। उससे पहले सवाल है कि क्या तत्कालीन वित्तमंत्री चिदंबरम और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस नीति से सहमत थे या हैं। आजाद भारत की यह पहली सरकार है जिसका मुखिया सहित हर सदस्य यह साबित करने में लगा है कि जो कुछ हुआ उसके लिए कम से कम वह जिम्मेदार नहीं है। सरकार के एक अहम नीतिगत फैसले की जिम्मेदारी लेने के लिए कोई तैयार नहीं है। किसी टीम का कप्तान टीम की जीत हार या उसके प्रदर्शन से अपने को कैसे अलग रख सकता है? ऐसी हालत में कैबिनेट के सामूहिक जिम्मेदारी के सिद्धांत का क्या होगा? अगर सरकार के प्रशासनिक या नीतिगत फैसले की जिम्मेदारी और जवाबदेही से प्रधानमंत्री मुक्त हैं तो सरकार में प्रधानमंत्री की भूमिका क्या है? क्या प्रधानमंत्री को उनकी ही सरकार से अलग करके देखा जा सकता है? प्रधानमंत्री और उनके वरिष्ठ सहयोगी अपने इस व्यवहार से एक स्पष्ट संदेश दे रहे हैं कि इस नीतिगत फैसले में कुछ गड़बड़ जरूर है। मनमोहन सिंह सरकार के हर गलत फैसले से अपने को अलग दिखाने में सबसे आगे नजर आते हैं। ऐसे में दूसरे मंत्री भी ऐसा ही करें तो क्या गलत है। चिदंबरम अगर आज संकट में हैं तो उसके लिए प्रणब मुखर्जी से उनकी प्रतिस्पर्धा या प्रधानमंत्री बनने की उनकी महत्वाकांक्षा जिम्मेदार नहीं है। चिदंबरम इसलिए संकट में हैं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर रहे हैं। जब ए राजा स्पेक्ट्रम आवंटन की नीति तय कर रहे थे तो प्रधानमंत्री क्या कर रहे थे। उन्हें देश को बताना पड़ेगा कि वह अपनी ही सरकार की इस नीति से सहमत थे या नहीं। यदि सहमत थे तो उसके बचाव में खड़े क्यों नहीं हो रहे। और यदि उन्हें इस नीति में खामी नजर आ रही थी तो उसे सुधारने के लिए उन्होंने क्या किया। प्रधानमंत्री चिदंबरम का बचाव तो कर रहे हैं पर अपनी सरकार की नीति का नहीं। उन्हें पता है कि चिदंबरम के जाते ही उनका रक्षा कवच ध्वस्त हो जाएगा। चिदंबरम के जाने के बाद प्रधानमंत्री को विपक्ष के हमलों से बचाना कठिन हो जाएगा। सोनिया गांधी के सामने यही कठिनाई है। मनमोहन सिंह को बचाने के लिए चिदंबरम को बचाना उनकी मजबूरी है। कांग्रेस और सोनिया गांधी की मुश्किल यह है कि पैराशूट होने के बावजूद सरकार लगातार गिरती जा रही है। पैराशूट खुले (राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद संभालने को तैयार हों) तभी सरकार सुरक्षित जमीन पर उतर सकती है। वरना सरकार का नीचे जाना तो तय है। सवाल केवल रफ्तार और समय का है। घोटालों का बोझ जितना बढ़ेगा गिरने की रफ्तार उतनी तेज होगी। विपक्ष और मीडिया को कोसने की बजाय प्रधानमंत्री और सोनिया को अपना घर दुरुस्त करने पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि मीडिया और विपक्ष जो कह रहा है देश की जनता उस पर अविश्वास नहीं कर रही। संकट प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के दरवाजे पर आ गया है। घर में आग लगी हो तो पड़ोसी की निंदा में समय गंवाना समझदारी नहीं मानी जाती। विपक्ष को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश करके प्रधानमंत्री इस आग पर काबू नहीं पा सकते। इस समय विपक्ष पर हमला आग पर पानी की बजाय पेट्रोल का काम करेगा जो उनकी सरकार ने पहले ही काफी महंगा कर रखा है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Wednesday, June 15, 2011

नीयत और नेतृत्व पर सवाल


कहावत है कि दूसरा खसम किया बुरा किया और उसे भी छोड़ दिया और बुरा किया। केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार की हालत कुछ ऐसी ही है। उसके रणनीतिकारों को समझ में नहीं आ रहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ बढ़ते जनसमर्थन से कैसे निपटा जाए? मनमोहन सिंह की सरकार कभी अन्ना हजारे के खिलाफ मोर्चा खोलती है तो कभी उनसे बात करती है। बाबा रामदेव जैसे ही कहते हैं कि प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश को लोकपाल के दायरे से बाहर रखा जाए, उसके रणनीतिकारों की बांछें खिल जाती हैं। उन्हें लगता है कि अन्ना और उनकी टीम से लड़ाने के लिए उन्हें पहलवान मिल गया है। सो रामदेव के स्वागत में सरकार बिछी हुई नजर आती है। सरकार ज्यों-ज्यों दवा कर रही है उसका मर्ज बढ़ता जा रहा है। दरअसल सरकार मर्ज को समझे बिना उसके इलाज में लगी है। वह इस मुगालते में है कि अन्ना हजारे और बाबा रामदेव को कठघरे में खड़ा करके लड़ाई जीत सकती है। आम लोगों की नजर में राजनीति और नेता भ्रष्टाचार का पर्याय बन गए हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी राजनेता की बात को लोग गंभीरता से लेने को तैयार नहीं हैं। यही वजह है कि इतने घोटाले सामने आने के बावजूद देश की मुख्य विपक्षी पार्टी कहीं नजर नहीं आ रही थी। कांग्रेस एक बड़ी लकीर खींचने की बजाय अन्ना हजारे और बाबा रामदेव जैसी बड़ी लकीरों को छोटा करने में लगी हुई है। पार्टी में यह कोई नहीं सोच रहा है कि आखिर अन्ना हजारे या बाब रामदेव के साथ इतनी बड़ी संख्या में लोग क्यों जुड़ रहे हैं? कांग्रेस की दिक्कतें कई हैं। पहली दिक्कत तो यह कि जितने भी घपले-घोटाले सामने आए हैं सब उसकी सरकार के हैं। अब उसमें कांग्रेसी शामिल हों या उसके घटक दल। दूसरी समस्या है-भ्रष्टाचार से निपटने में कांग्रेस और उसकी सरकार की निष्कि्रयता। सरकार भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों से निपटने की बजाय उनका बचाव करती हुई नजर आ रही है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने राजनीतिक गुरु से एक कला सीखी है-चुप रहना। उन्हें लगता है कि यह सबसे अच्छी शासनकला है। रामलीला मैदान में पुलिस की बर्बरता पर दो दिन बाद उन्होंने चुप्पी तोड़ी तो कहा कि कोई विकल्प नहीं था। विकल्पहीनता शासनकला और नेतृत्व की नाकामी का परिचायक है। कांग्रेस पार्टी का हाल और बुरा है। पार्टी और सरकार के पीछे की ताकत सोनिया गांधी और राहुल गांधी को अक्सर पता ही नहीं होता कि सरकार ने अन्ना हजारे के साथ या बाबा रामदेव के साथ क्या किया? भट्टा-पारसौल में जाकर राहुल गांधी पूछते हैं कि अगर मायावती कुछ छिपाना नहीं चाहतीं तो वहां धारा 144 क्यों लगी है? पर वह दिल्ली में अपनी सरकार से यही बात नहीं पूछते। पार्टी का एक वरिष्ठ नेता जिसे ठग कहता है उसकेस्वागत में चार केंद्रीय मंत्री हवाई अड्डे क्यों गए? अन्ना हजारे और उनकी टीम की बातें अगर फासीवादी है तो ये लोग सरकारी समिति में क्या कर रहे हैं? भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आम लोगों की नजर में भाजपा की छवि कोई साफ-सुथरी नहीं है। बाबा रामदेव के साथ ही अन्ना हजारे को भी भाजपा-संघ के पाले में धकेलकर कांग्रेस ने उसकी मदद ही की है। देश की मुख्य विपक्षी पार्टी को भी सोचना चाहिए कि देश के ज्वलंत मुद्दों पर बहस अगर संसद की बजाय सड़क पर हो रही है तो यह उसकी नाकामी है। भाजपा की किस्मत से इस समय देश में कोई गैर-कांग्रेसी और गैर-भाजपा राजनीतिक ताकत नहीं है। मुख्य विपक्षी दल के नाते सरकार के खिलाफ बनने वाले माहौल का फायदा उसे ही मिलेगा। उन्हें पता है कि बाबा रामदेव और भाजपा-संघ का एजेंडा एक ही है। फिर भी सरकार ने रामलीला मैदान में जो किया उसके बाद बाबा का समर्थन करना उनकी मजबूरी थी, लेकिन कांग्रेस को अब भी समझ में नहीं आ रहा है कि दमन से जनभावनाओं को दबाया नहीं जा सकता। बाबा रामदेव के खिलाफ मोर्चा खोलने के बाद अब सरकार अन्ना हजारे की टीम से छुटकारा पाना चाहती है। कांग्रेस पार्टी धीरे-धीरे अकेली पड़ती जा रही है। अन्ना के साथ देश का शहरी नागरिक समाज है तो बाबा के साथ गांव-देहात। जनसमर्थन के नजरिए से दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। दोनों के बीच की दूरी काफी हद तक मनमोहन सिंह की सरकार और उनकी पार्टी ने मिटा दी है। ये दोनों साथ चलें या अलग, कांग्रेस की परेशानी कम नहीं होने वाली है। कांग्रेस को इस बात की भी चिंता करना चाहिए कि इस पूरे प्रकरण में उसके सहयोगी दल मौन हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए एक साल से भी कम समय बचा है। ऐसे में समाजवादी पार्टी या बहुजन समाज पार्टी कांग्रेस की मदद के लिए आगे आकर राजनीतिक हाराकिरी तो करेंगे नहीं। यदि द्रमुक ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया तो मनमोहन सिंह के लिए पांच साल का कार्यकाल पूरा कठिन हो जाएगा। मनमोहन सिंह और कांग्रेस के लिए अच्छा यही होगा कि वे अन्ना और बाबा की बजाय भ्रष्टाचार से लड़ते हुए नजर आएं, क्योंकि आम लोगों के मन में सरकार की नीति, नीयत और नेतृत्व, तीनों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)