सरकार ने सिविल सोसाइटी से टकराव का जो रास्ता चुना है, वह सरकार और देश दोनों के लिए बहुत घातक होगा। दमन की राजनीति से किसी का भला नहीं होगा। एक के बाद एक कई घोटालों के कारण केंद्र सरकार पहले से ही सवालों के घेरे में है। बाबा रामदेव की मुहिम से निपटने के लिए दमन और बदले की कार्रवाई का सहारा लेकर सरकार अपनी साख को ही क्षति पहुंचा रही है। काले धन और भ्रष्टाचार के मामले में कार्रवाई को लेकर सरकार की नीति और नीयत पर सवाल इसलिए उठते हैं, क्योंकि कई मामलों में सरकार ने भ्रष्टाचारियों और दागी अधिकारियों का बचाव किया है। 2जी मामले में पूरी सरकार पहले राजा का बचाव करती रही, बाद में सर्वोच्च न्यायालय की पहल पर राजा को जेल जाना पड़ा। यह वही कपिल सिब्बल हैं, जिन्होंने कहा था कि 2जी स्पेक्ट्रम मामले में कोई घपला और घोटाला नहीं हुआ है। मुख्य सतर्कता आयुक्त पीजे थॉमस की नियुक्ति को जिस तरह से केंद्रीय गृहमंत्री और प्रधानमंत्री कार्यालय सही ठहराने की कोशिश में लगा हुआ था, उससे भी उसकी नीयत का पता चलता है। बाद में अदालत के आदेश पर ही पीजे थॉमस को अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी और तब जाकर प्रधानमंत्री ने अपनी गलती मानी। हसन अली के मामले में भी सरकार ने कार्रवाई तब शुरू की, जब अदालत की फटकार पड़ी। पर अब वह फिर भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ शुरू हुई जंग को सांप्रदायिक तत्वों की साजिश बताकर कुचलना चाहती है। इसलिए उसने अन्ना हजारे के अनशन को भी जंतर-मंतर पर नहीं होने दिया और अब उसे भी सांप्रदायिक सिद्ध करने की कोशिश कर रही है। लेकिन अन्ना हजारे और उनकी टीम लोकपाल बिल के तहत जो मांग कर रही है, उसमें से एक मांग के बारे में खुद गृहमंत्री पी चिदंबरम ने माना था कि प्रधानमंत्री के भ्रष्टाचार के मामलों की जांच का अधिकार लोकपाल का होना चाहिए। उन्होंने लोकपाल विधेयक के सरकारी मसौदे में प्रधानमंत्री को राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे कई मामलों में दी गई छूट को भी ज्यादा बताया था। चिदंबरम अपने ये विचार गृह मंत्रालय की ओर से आधिकारिक तौर पर सरकार के सामने रख चुके हैं। अब वह इससे मुकर रहे हैं। इसलिए आज अगर नागरिक समाज को लोकपाल के लिए आंदोलन और अनशन करना पड़ रहा है तो इसके लिए राजनीतिक दल जिम्मेदार हैं, जो संसद की सर्वोच्चता और पवित्रता की थोथी दुहाई दे रहे हैं। पिछले 42 साल में लोकपाल विधेयक का कानून का रूप न ले पाना यह बताता है कि राजनीतिक दलों ने संसद की शक्तियों को सही तरीके से इस्तेमाल करने के स्थान पर उसका दुरुपयोग किया। खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पहली बार केंद्र की सत्ता संभालते समय लोकपाल विधेयक लाने का वचन दिया था। दरअसल, लोकपाल विधेयक के मामले में बार-बार की वादाखिलाफी का ही परिणाम है कि आम जनता यह महसूस कर रही है कि राजनीतिक दल लोकपाल का निर्माण करना ही नहीं चाहते। यदि अन्ना हजारे और उनके साथियों की मानें तो केंद्र सरकार अब भी एक सक्षम लोकपाल व्यवस्था के निर्माण में अड़ंगे डाल रही है। काला धन और भ्रष्टाचार एक ऐसा मुद्दा है, जो आज भारतीय जनमानस को आंदोलित कर रहा है। अन्ना हजारे और स्वामी रामदेव तो उसकी अभिव्यक्ति के माध्यम बन चुके हैं। उनकी आवाज को दबाया नहीं जा सकता है। सरकार जिस टकराव के रास्ते पर जा रही है, उससे उसकी अधिनायकवाद की प्रवृत्ति का संकेत मिल रहा है। लोकतंत्र में जनता ने यदि आप को चुनकर भेजा है और आप सत्ता में हैं तो लोगों के लिए रोटी-पानी का इंतजाम कीजिए। भ्रष्टाचारियों और कालेधन के खातेदारों को जेल भेजिए। यदि लोगों की बात लोकतांत्रिक तरीके से नहीं सुनी जाती है और दमन के सहारे दबाने की कोशिश की जाएगी तो समाज में ऐसी अव्यवस्था और अराजकता फैल सकती है, जिसका इलाज किसी के पास नहीं होगा। आतंकवादी और नक्सली हिंसा के दौर से गुजर रहे इस देश के लिए यह जरूरी है कि सरकार जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों और आन्दोलन का दमन न करके उनकी बात को सुने। भ्रष्टाचारियों एवं काले धन के खातेदारों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई करे, जिससे जनता का सरकार पर विश्वास और भरोसा बढ़े। पर जब भी विदेश में जमा काले धन पर चर्चा होती है तो सरकार कानूनी पेचीदगियां और अपनी असमर्थता की बात करने लगती है। इससे यही संदेश जाता है कि सरकार अपराधियों को बचा रही है।
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Wednesday, June 29, 2011
लोकपाल को लटकाने की नई कवायद
लोकपाल बिल पर सरकार चौतरफा दबाव में आ गई है। अन्ना हजारे ने ताल ठोंक दिया है कि अगर सरकार लोकपाल बिल पर सकारात्मक रुख नहीं अपनाती है तो चाहे गोली खानी पड़े या लाठी, 16 अगस्त से वे अनशन पर जरूर जाएंगे। विपक्षी दल भी सरकार को खूब आड़े हाथों ले रहे हैं। सरकार भले ही अन्ना की धमकी को हवा में उड़ाने की कोशिश कर रही हो, लेकिन सच यह है कि वह अंदर से डरी हुई है। वह नहीं चाहती है कि अन्ना दोबारा अनशन पर जाएं और देश में सरकार के खिलाफ माहौल बनें। इसलिए उसने साफ कर दिया है कि अन्ना को अनशन करने की अनुमति नहीं दी जाएगी, लेकिन अन्ना सरकार के तेवर से खौफ खाने वाले नहीं हैं। ऐसे में सरकार अब सर्वदलीय बैठक बुलाकर अपने ऊपर पड़ रहे दबाव को कम करना चाहती है। अन्ना टीम को साधने के लिए सरकार पहले ही साम, दाम, दंड और भेद की नीति अपना चुकी है। लेकिन नाकामी हाथ लगने के बाद अब वह राजनीतिक दलों के सिरों को जोड़कर अपने बचाव में एक नई पैंतरेबाजी कर रही है। सरकार को आभास हो चला है कि बाबा रामदेव के सत्याग्रह को नृशंसतापूर्वक कुचलने के बाद अगर वह एक बार फिर ऐसा हथकंडा अपनाती है तो देश में जनआक्रोश भड़कते देर नहीं लगेगी। ऐसे में सरकार आत्मघाती कदम उठाने के बजाए विपक्षी दलों को अपने पाले में खड़ा कर नागरिक समाज के नुमाइंदों को हाशिए पर धकेल देना चाहती है, लेकिन सरकार को अपनी इस ओछी मुहिम में शायद ही सफलता मिले। सर्वदलीय बैठक में विपक्षी दल आंख बंदकर सरकार की दलीलों पर हां-हूं करने के बजाए कई तरह के सवाल पूछ सकते हैं, जो सरकार को चुभ सकते हैं। मसलन, जब लोकपाल बिल मसौदा समिति का गठन किया गया, उस वक्त सरकार ने उनसे रायशुमारी करना क्यों नहीं जरूरी समझा? मसौदा समिति में विपक्षी दलों के सदस्यों को भी शामिल क्यों नहीं किया गया? इसके अलावा मसौदा समिति में शामिल सरकारी नुमाइंदों के आचरण-व्यवहार को लेकर भी विपक्षी दल सवाल दाग सकते हैं। मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी रामलीला मैदान में सत्याग्रहियों पर हिंसक कार्रवाई और रामदेव के आंदोलन में उसे और आरएसएस को लपेटे जाने पर भी सवाल उठा सकती है। सर्वदलीय बैठक में और भी ऐसे तमाम सवाल उभर सकते हैं, जिनका जवाब देना सरकार के लिए आसान नहीं होगा। लोकपाल पर सरकार के दोमुंहे आचरण को लेकर विपक्षी दल पहले से ही हमलावर हैं। ऐसे में सरकार की मंशा के मुताबिक वे लोकपाल बिल पर अपने पत्ते खोल देंगे, संभव नहीं लगता है। पिछले दिनों प्रणब मुखर्जी द्वारा लोकपाल पर मांगे गए सुझावों को गैर-कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के अलावा राजनीतिक दलों ने न सिर्फ नकार दिया, बल्कि इस कवायद को संसदीय प्रक्रिया के विपरीत भी
इतिहास का काला पन्ना
लेखक आपातकाल को कांग्रेस के लोकतंत्र विरोधी दृष्टिकोण के प्रमाण के रूप में याद कर रहे हैं…
देश के अंदर और बाहर हर कोई यह भलीभांति जानता है कि केंद्र सरकार के भीतर जो कुछ चलता है उसे एक संविधानेतर शक्ति केंद्र द्वारा नियंत्रित किया जाता है। यह भी कोई रहस्य नहीं है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी 2004 के लोकसभा चुनाव में संप्रग की जीत के बाद सीधे-साधे मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाने के पश्चात सुपर संवैधानिक सत्ता बन गई थीं। सरकार पर पकड़ बनाए रखने के लिए वह नियमित तौर पर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करती हैं। चूंकि कांग्रेस में इस प्रकार की संविधानेतर शक्तियों की परंपरा सी रही है, इसलिए कांग्रेस को इसमें किसी सिद्धांत, संविधान के उल्लंघन जैसी कोई बात नजर नहीं आती। नेहरू-गांधी परिवार कांग्रेस के कामकाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पार्टी इस धारणा पर चल रही है कि इस परिवार के सदस्य को सरकारी कामकाज में दखल देने के लिए किसी औपचारिक पद की आवश्यकता नहीं है। आम धारणा के विपरीत, यह प्रक्रिया नेहरू के दिनों में ही शुरू हो गई थी। उनकी बेटी इंदिरा गांधी ने राजनीति में दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी थी और 1950 के दशक के आखिरी वर्षो में नेहरू ने उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष भी बना दिया। इस परिवार के सदस्यों का आक्रामक रूप से संविधानेतर गतिविधियों में दखल 1970 के दशक के मध्य में देखने को मिला। तब युवक कांग्रेस के अध्यक्ष संजय गांधी ने केंद्रीय मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों को आदेश देने शुरू कर दिए थे। शासन की यह पद्धति आपातकाल के दौरान तमाम हदें पार कर गईं। अपनी मां प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा प्रेरित संजय गांधी ने संघीय स्तर पर और राज्यों में समानांतर सत्ता केंद्र स्थापित कर लिया था। केंद्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, आइएएस व आइपीएस अधिकारियों के पर कतर दिए गए थे और पूरे भारत में भय का शासन कायम कर दिया गया था। इंदिरा गांधी संजय गांधी के कारनामों से इस कदर अभिभूत थीं कि उन्होंने अपने प्रचंड बहुमत के बल पर 1971-76 के लोकसभा के कार्यकाल को एक साल का विस्तार दे दिया था। यह भयावह दौर तब खत्म हुआ जब लोगों ने चुनाव में कांग्रेस को उखाड़ फेंका। इंदिरा गांधी ने यह चुनाव इन खुफिया रिपोर्टो के बाद कराया था कि जनता उनका समर्थन करेगी। यह कांग्रेस के शासन का इतिहास है, किंतु बहुत से कांग्रेसी दिखावा करते हैं कि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं या फिर यह लोगों की स्मृति से लोप हो गया है, किंतु वे लोग जिनका लोकतंत्र में अटल विश्वास है, फिर से ऐसा नहीं होने देना चाहते। आतंक के दिनों को भूलना मुसीबतों को फिर से न्योता देने के समान है। इसलिए लोकतंत्र की खातिर आपातकाल की वर्षगांठ 25 जून पर इसके स्याह दिनों को याद करना जरूरी है। इसी आलोक में कुछ संगठनों व व्यक्तियों पर समानांतर सत्ता खड़ी करने संबंधी केंद्रीय मंत्रियों के आरोपों की भर्त्सना करनी जरूरी हो जाता है। उदाहरण के लिए, भ्रष्टाचार की समस्या का समाधान करने की अनिच्छुक सरकार प्रधानमंत्री और सांसदों को लोकपाल के दायरे में लाने से पैर खींच रही है। यह ऐसा मसला है जो नागरिकों के बड़े तबके को परेशान कर रहा है। नेहरू के दिनों से ही कांग्रेस भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के कदम उठाने से हिचकिचाती रही है। उदाहरण के लिए आजादी के बाद से ही कांग्रेस पार्टी के वफादार सदस्यों को ही राज्यपाल के रूप में नियुक्त करती रही है। इसी प्रकार उसने हमेशा प्रयास किया है कि चुनाव आयुक्त ऐसा व्यक्ति न बन जाए जो स्वतंत्र रूप से फैसले कर सकता हो। आपातकाल के दौरान कांग्रेस खुलेआम स्वतंत्र मीडिया और न्यायपालिका के खिलाफ अभियान चलाती रही है। संविधान में 42वें संशोधन पर संसद में हुई बहस से ही साफ हो जाता है कि कांग्रेस न्यायपालिका, मीडिया और स्वतंत्र विचारों वाले नौकरशाहों के किस कदर खिलाफ है। सीएम स्टीफेन जैसे लोगों ने खुलेआम समर्पित न्यायपालिका की वकालत की थी। यह समर्पण संविधान के प्रति न होकर कांग्रेस के प्रति अभीष्ट था। इसके बाद भी हालात में कोई परिवर्तन नहीं आया। हमेशा यह प्रयास किया जाता रहा है कि पार्टी के समर्थक या फिर दागदार छवि वाले व्यक्ति संवैधानिक पदों पर तैनात कर दिए जाएं। इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है चुनाव आयुक्त के रूप में नवीन चावला की तैनाती, जिन्हें शाह जांच आयोग किसी भी सार्वजनिक पद के अयोग्य ठहरा चुका है। इसका दूसरा उदाहरण है कांग्रेस द्वारा मानकों की धज्जियां उड़ाते हुए भ्रष्टाचार के एक आरोपी को केंद्रीय सतर्कता आयुक्त (सीवीसी) के तौर पर तैनात करना। इस परिप्रेक्ष्य में कपिल सिब्बल और पी. चिदंबरम जैसे कुछ केंद्रीय मंत्रियों के प्रवचन सुनना अजीब लगता है, जो 1980 के दशक में मीडिया विरोधी बिल लाने के कर्णधार थे। कुछ दिन पहले उन्होंने संयुक्त रूप से मीडिया को संबोधित करते हुए मजबूत लोकपाल बिल लाने की पक्षधर सिविल सोसाइटी के सदस्यों पर हमला किया कि बाहरी लोगों द्वारा लिए गए फैसलों के आधार पर सरकार चलाना सही नहीं है। मजबूत लोकपाल के खिलाफ एक अन्य दलील यह थी कि सरकार के समानांतर एक और ढांचा खड़ा नहीं किया जा सकता। इन मंत्रियों ने हैरानी जताते हुए कहा कि सरकार अपनी शक्तियों को कम करने का काम कैसे कर सकती है? किंतु क्या मनमोहन सिंह सरकार पिछले सात वर्षो से यही नहीं कर रही है? क्या उसने अपनी शक्तियां संवैधानेतर सत्ता सोनिया गांधी के हाथों में नहीं सौंप दीं? पी. चिदंबरम की दलील तो इससे भी अधिक हास्यास्पद थी कि देश में संविधान है, जिसके मूल ढांचे में बदलाव नहीं किया जा सकता। कांग्रेस के दर्जनों सांसदों व नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रतिपादित संविधान के मूलभूत ढांचे के विचार की संसद के भीतर और बाहर अनेक बार धज्जियां उड़ाई हैं। उन्होंने तो यहां तक कहा है कि उनके पास सुप्रीम कोर्ट के जजों को सबक सिखाने के अपने तरीके हैं। आपातकाल की वर्षगांठ पर हमें उन भयावह संवैधानिक संशोधनों पर भी नजर डालनी चाहिए जो कांग्रेस ने आपातकाल के दौरान किए थे। इनमें प्रधानमंत्री को संविधान से ऊपर स्थापित करना, सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट की शक्तियों को कम करना और राष्ट्रपति को कार्यकारी आदेश के माध्यम से संविधान संशोधन की शक्ति प्रदान करना शामिल था। इन संशोधनों ने संविधान के मूलभूत सिद्धांतों को ही ध्वस्त कर दिया था। कांग्रेस के रवैये में अभी भी कोई परिवर्तन नहीं आया है, इसलिए अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है। हमें 25 जून को खुद को यह याद दिलाने के लिए इस्तेमाल करना चाहिए कि कांग्रेस अथवा उसके नेतृत्व वाली सरकार क्या-क्या शरारतें करने में समर्थ है? हमें विरोध से घृणा करने वाली कांग्रेस द्वारा आपातकाल के दौरान मारे गए, सताए गए और जेल में ठूंस दिए गए लाखों लोगों का स्मरण करना चाहिए। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)
राजद-लोजपा में बढ़ने लगी दूरियां
बिहार में करीब दो साल तक गठबंधन की राजनीति करने के बाद राष्ट्रीय जनता दल और लोक जनशक्ति पार्टी की दूरियां बढ़ने लगी है। पूर्णिया उपचुनाव में समर्थन के सवाल पर भी दोनों दलों में मतभेद उभरे हैं। राजद माकपा को समर्थन दे रही है, तो लोजपा कांग्रेस को। राजद-लोजपा के गठबंधन में दरार को केन्द्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार की अटकलों से जोड़कर भी देखा जा रहा है। लालू व रामविलास दोनों के ही मंत्रिमंडल में शामिल होने की चर्चा है। कांग्रेस के लिए रामविलास की उपयोगिता तो है। अगले साल उत्तर प्रदेश चुनाव में मायावती के मुकाबले पासवान का इस्तेमाल वह कर सकती है। बिहार के कांग्रेसी भी रामविलास से तालमेल तो चाहते हैं पर लालू प्रसाद से नहीं। दोनों दलों में दूरियां बढ़ने का एक कारण यह भी है। अररिया के फारबिसगंज पुलिस फायरिंग को लेकर भी दोनों दलों एप्रोच में अंतर है। पुलिस फायरिंग का यह इलाका लोजपा विधायक जाकिर हुसेन के प्रभुत्व का है। शायद इसी वजह से फायरिंग की घटना को जिस आक्रामक तरीके से लोजपा ने उठाया वैसा राजद ने नहीं किया। बिहार विधानसभा के 2005 में हुये चुनाव में हार के बाद दोनों दलों ने 2009 का लोकसभा चुनाव मिलकर लड़ा। इसमें गठबंधन को कोई खास सफलता नहीं मिली पर कुछ महीने बाद हुये उपचुनाव में गठबंधन को अच्छी कामयाबी मिली। इससे उत्साहित दोनों दल के नेताओं ने गत नवंबर का विधानसभा चुनाव मिलकर लड़ा। इस विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद दोनों दलों ने चुप्पी साध रखी थी। 3 जून को अररिया में पुलिस फायरिंग ने विपक्ष को सरकार को घेरने का मौका दे दिया। पासवान और नेता प्रतिपक्ष अब्दुल बारी सिद्दीकी 6 जून को साथ साथ घटना स्थल पर गए। पर बाद में राजद का रूख पुलिस फायरिंग पर नर्म पड़ता गया। इस घटना पर लोजपा के तेवर आज भी हमलावर है। वह इसे हरसंभव भुनाने की कोशिश कर रही है। इस बहाने वह अल्पसंख्यकों को एनडीए से दूर करने की कोशिश में लगी है। इसी बीच पूर्णिया विधानसभा के उपचुनाव में समर्थन को लेकर दोनों दलों में मतभेद उभर कर सामने आया। राजद ने माकपा को समर्थन देने की घोषणा कर दी। प्रदेश राजद अध्यक्ष रामचंद्र पूर्वे के मुताबिक कांग्रेस ने उनसे समर्थन मांगा नहीं। माकपा ने समर्थन मांगा तो हमने इसकी घोषणा कर दी। रामविलास पासवान ने कांग्रेस को समर्थन दे दिया। लोजपा का तर्क था कि कांग्रेस प्रत्याशी गत चुनाव में दूसरे स्थान पर थे। लोजपा का कहना है कि जमशेदपुर लोकसभा उपचुनाव में राजद कांग्रेस को बिना मांगे समर्थन दे सकती है तो पूर्णिया में क्यों नहीं।
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