गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में रामलीला मैदान पर पुलिसिया कार्रवाई को रावणलीला बताते हुए कहा कि कांग्रेस सरकार बाबा के सत्याग्रह से डर गई। लोकतांत्रिक अनशन को कुचलने के लिए कानून की मर्यादाओं का भी ख्याल नहीं रखा गया। घटना के लिए सीधे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को जिम्मेदार बताते हुए कहा कि पीएम को अब अपनी हैसियत और ताकत दिखानी चाहिए। अहमदाबाद में रविवार सुबह एक समारोह में मोदी ने कहा कि रामलीला मैदान पर हुई 5 जून 2011 की घटना ने 25 जून 1975 की याद को ताजा कर दिया है। अगर रामदेव का भ्रष्टाचार विरोधी अभियान में सरकार को कोई दोष नजर आ रहा था तो सरकार को पहले ही उसे रोक देना चाहिए था। केंद्र सरकार के 4 मंत्रियों ने कभी अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा का भी ऐसा स्वागत नहीं किया होगा जैसा दिल्ली एयरपोर्ट पर बाबा रामदेव 2 जून की शाम को किया गया। सरकार की बाबा से लगातार बात चलती रही, लेकिन 4 जून की रात्रि अचानक पुलिस ने बर्बरतापूर्ण हमला कर शांतिपूर्ण तरीके से अनशन कर रहे बाबा, महिलाओं और बच्चों पर जुल्म ढाया। ऐसे देश नहीं चल सकता, कांग्रेस की यह फितरत रही है। मोदी ने कहा कि प्रधानमंत्री को इस देश को विश्वास दिलाना चाहिए कि वे कालाधान वापस लेकर आएंगे। मोदी यह कहकर भी कांग्रेस पर हमला किया कि चूंकि अब तक भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस की साथी पार्टियों पर हमला हुआ इसलिए सरकार चुप रही लेकिन बाबा के आंदोलन से खुद कांग्रेस कठघरे में आ गई थी। इसलिए कांग्रेस ने मध्य रात्रि पुलिस कार्रवाई कर सत्याग्रहियों पर दमनपूर्वक कार्यवाही की। मोदी ने कहा कि इस घटना के लिए सरकार को देश की 121 करोड़ जनता को जवाब देना पड़ेगा। विदेश से कालाधान लाना गुनाह है, भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन गुनाह है तो बाबा रामदेव के खिलाफ जो कार्रवाई की गई यह हमें भी मंजूर है। मोदी ने कहा कि कांग्रेस सरकार ने पहले अनशन को लेकर मीडिया के माध्यम से भ्रम फैलाने की कोशिश की गई जब झूठ से बात नहीं बनी तो बाबा पर पुलिस का हमला करा दिया। कांग्रेस देश की जनता की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश कर रही थी, कांग्रेस की यह फितरत ही रही है लेकिन जब इससे भी बात नहीं बनी तो दमन का रास्ता अपनाया गया। मोदी ने यह घोषणा की रामलीला की घटना से दिल्ली सल्तनत के अंत की शुरुआत हो गई है। महिलाओं व बालकों पर बर्बरता पूर्ण कार्रवाई के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह खुद जिम्मेदार हैं, क्योंकि दिल्ली पुलिस प्रधानमंत्री के अधिकार में आती है ना कि दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के अधीन है। मोदी ने कहा कि रामदेव का अनशन देश को बचाने का था, विदेशों में जमा कालेधन को वापस लाने को था। कांग्रेस के ही कई नेता भी इस बात का समर्थन करते हैं। देश की जनता कालेधन को वापस लाने के लिए उठ खड़े हुई है और अब वह देश के धन को वापस लाकर ही दम लेंगे। सरकार कालाबाजारी हसन अली के गिरफ्तार होने से परेशान है तथा अब खुद कांग्रेस नेताओं की पोल खुलने से डरी हुई है।
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Friday, June 10, 2011
दो घंटे में वीरान हुआ पंडाल
भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशन कर रहे बाबा रामदेव और उनके हजारों समर्थकों को शनिवार-रविवार की रात पुलिस ने जबरन खदेड़ दिया। दो घंटे के आपरेशन के दौरान पुलिस ने सत्याग्रहियों को चारो ओर से घेरने के बाद लाठियां बरसाईं और आंसू गैस के गोलों का जमकर इस्तेमाल किया। कार्रवाई में बाबा के दर्जनों लोग घायल हो गए, जिन्हें विभिन्न अस्पतालों में भर्ती कराया गया है। योगगुरु समर्थकों के विरोध में 23 पुलिस वाले भी चोटिल हुए हैं। आखिरकार पुलिस ने बाबा को गिरफ्त में ले लिया और सुबह उन्हें विशेष विमान से देहरादून पहुंचा दिया। इतना ही नहीं, पुलिस ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने को नई दिल्ली जिले में धारा 144 लगा दी है। सरकार ने शनिवार की शाम वार्ता टूटने के बाद बाबा रामदेव से अनशन वापस लेने की अपील की, बात नहीं बनीं तो योग शिविर के लिए दी गई अनुमति वापस ले ली गई। इसके बाद करीब रात करीब एक बजे रात भारी संख्या में पुलिस और त्वरित कार्रवाई बल (आरएएफ) रामलीला मैदान में पहुंचा और बाबा समर्थकों से मैदान खाली करने को कहा। समर्थकों के प्रतिरोध करने पर पुलिस ने लाठियां बरसाने के साथ ही आंसू गैस के गोले दागने शुरू कर दिए। पुलिस कार्रवाई में पंडाल में स्थित 12 मीटर ऊंचा भव्य मंच तहस-नहस हो गया। आंसू गैस का गोला गिरने से मंच पर आग भी लग गई। पुलिस ने लंबे नाटकीय घटनाक्रम और उतार चढ़ाव के बाद बाबा रामदेव को अपनी हिरासत में ले लिया। दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता राजन भगत ने कहा, रामदेव और आयोजकों को मनाने की सभी कोशिशें बेकार होने पर शिविर के लिए दी गई अनुमति वापस ले ली गई। इसके बाद मैदान को खाली कराने का फैसला किया गया। रात में कार्रवाई इसलिए की क्योंकि दिन में इस इलाके में बहुत भीड़ होती है। उन्होंने कहा, पुलिसकर्मी जब रामदेव को हिरासत में लेने के लिए आगे बढ़े तो उनके अनुयायी बीच में आ गए। उन्होंने पत्थर, गुलदस्ते तथा जो भी उनके हाथ आया, उसी से हमले शुरू कर दिए। स्थिति बिगड़ने से रोकने के लिए पुलिस ने आंसू गैस के आठ गोले दागे, जिससे उनके समर्थक तितर-बितर हो गए। उनके अनुसार, पुलिस तथा बाबा समर्थकों के बीच धक्कामुक्की में चार महिलाओं सहित बाबा रामदेव के 39 समर्थक तथा 23 पुलिसकर्मी घायल हुए और उन्हें प्राथमिक उपचार के बाद अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। हालांकि अस्पताल प्रशासन के अनुसार करीब 100 लोग घायल हुए। लोक नायक अस्पताल के एक चिकित्सा अधिकारी के मुताबिक इनमें से 71 गंभीर रूप से घायल हुए। भगत ने कहा, अज्ञात लोगों के खिलाफ दंगा भड़काने, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने तथा लोक सेवकों के काम में बाधा डालने का मामला दर्ज किया गया है। वहीं, दिल्ली पुलिस के आयुक्त बीके गुप्ता ने कहा, बाबा रामदेव ने शुरू में कहा था कि 5,000 लोग रामलीला मैदान पर पहुंचेंगे, लेकिन यहां 50,000 से अधिक लोग आए। हम इतने बड़े पैमाने पर भीड़ एकत्र करने की अनुमति नहीं दे सकते। उन्होंने यह कहते हुए पुलिस कार्रवाई का बचाव किया कि आंसू गैस के गोले तभी छोड़े गए जब रामदेव के समर्थकों ने पुलिस पर पथराव किया।
Sunday, May 22, 2011
केंद्र की कठपुतलियां
लेखक राज्यपाल की केंद्रीय सत्तादल के प्रति वफादारी को कर्नाटक संवैधानिक संकट की वजह बता रहे हैं….
कांग्रेस अजब-गजब संयोगों का पर्याय है। प्रधानमंत्री अर्थशास्त्र के विद्वान हैं लेकिन देश मुद्रास्फीति और महंगाई की गिरफ्त में है। वह ईमानदार कहे जाते हैं लेकिन पूरी सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी हुई है। विधिमंत्री रहे प्रख्यात विधिवेत्ता कर्नाटक के राज्यपाल हंसराज भारद्वाज संविधान प्रमुख होकर भी बहुमत प्राप्त राज्य सरकार की बर्खास्तगी पर आमादा हैं। वह उच्चतम न्यायालय की सदन को ही विश्वासमत का श्रेष्ठ स्थान बताने की स्थापना से असहमत हैं। वह सदन आहूत करने और विश्वासमत लेने के मुख्यमंत्री के अनुरोध को भी टाल चुके हैं। वह जैसे-तैसे कर्नाटक सरकार का वध चाहते हैं। वह महामहिम हैं लेकिन कांग्रेस के सामान्य कार्यकर्ताओं की तरह भाजपा सरकार के खिलाफ हैं। संवैधानिक ढांचा विफल हो जाने की उनकी अपनी व्याख्या है। ताजा सिफारिश विवाद का विषय है। केंद्र उनकी सिफारिश नहीं मानता तो भी वह लज्जित नहीं होते। वह राज्यपाल जैसी संवैधानिक संस्था की साख गिराने वाले महामहिमों की सूची के चमकते नायक हैं। आश्चर्य है कि बावजूद इसके केंद्र उन्हें वापस नहीं बुलाता। राज्यपालों का आचरण संविधान निर्माण के समय से ही विवादों के घेरे में हैं। रोहिणी कुमार चौधरी ने संविधान सभा में राज्यपालों की नियुक्ति प्रक्रिया पर आशंका जताई और कहा कि प्रधानमंत्री के परामर्श से राष्ट्रपति राज्यपाल की नियुक्त करेंगे। प्रधानमंत्री राजनीति में डूबा व्यक्ति होगा। उसके विचार तटस्थ नहीं होंगे। उड़ीसा के विश्वनाथ दास ने भी शंका व्यक्त की-ब्रिटिश साम्राज्यवाद के गवर्नर जो कुछ करते थे, वही अब सत्तारूढ़ दल करेगा। जवाहरलाल नेहरू ने बहस में हस्तक्षेप किया और कहा, इस पद के लिए हम एक पूर्ण तटस्थ व्यक्ति रखेंगे जो प्रांत की सरकार को मान्य हो। अगर ऐसा नहीं हुआ तो वह अपने प्रकार्य अच्छी तरह नहीं कर सकेगा। संविधान सभा केंद्र में सत्तारूढ़ दल के पिट्ठू राज्यपाल नहीं चाहती थी। बावजूद इसके अधिकांश राज्यपालों ने संविधान की मर्यादा भंग की। पहले आम चुनाव में कांग्रेस मद्रास प्रेसीडेंसी में हार गई। टी प्रकाशम ने सरकार गठन का दावा किया। राज्यपाल ने अल्पमत के बावजूद सी राजगोपालाचार्य को शपथ दिलाई, जोड़तोड़ हुई, बहुमत बना। यह सब पंडित नेहरू के समय हुआ। लोकतंत्र जवाबदेही से चलता है। सारी संवैधानिक संस्थाएं जवाबदेह हैं। राज्यपाल की कोई जवाबदेही नहीं। राज्यपाल केंद्रीय सत्तादल के अनुसार ही चलते हैं। राज्य सरकारों की बर्खास्तगी संवेदनशील मसला है। डॉ. अंबेडकर ने संविधान सभा में कहा था कि इस अस्त्र का प्रयोग कम से कम किया जाएगा लेकिन संविधान प्रवर्तन 1950 से अब तक मात्र 61 वर्ष में लगभग 115 दफा राज्य सरकारों की बर्खास्तगी की जा चुकी है। 1970 में उत्तर प्रदेश विधानसभा का अधिवेशन प्रस्तावित था, लेकिन राज्यपाल ने बहुमत के लिए सदन की प्रतीक्षा नहीं की और चरण सिंह सरकार बर्खास्त हो गई। हरियाणा के राज्यपाल तपासे ने बहुमत दल के नेता देवीलाल को विधायकों की परेड के लिए 24 मई, 1982 की तारीख दी और इसी बीच भजनलाल को मुख्यमंत्री की शपथ भी दिला दी गई। आंध्र के राज्यपाल रामलाल ने बहुमत के बावजूद एनटी रामाराव सरकार का वध (1984) किया। रामाराव सारे विधायकों सहित राष्ट्रपति भवन पहुंचे। विधायकों को राष्ट्रपति भवन ले जाने की परंपरा शुरू हुई। राज्यपाल संविधान की संरक्षक संस्था है लेकिन तमाम राज्यपालों ने संविधान को भी शर्मसार किया है। गुजरात के राज्यपाल कृष्णपाल ने शंकर सिंह बाघेला के पक्ष में भाजपा सरकार की बर्खास्तगी की। अयोध्या हादसे के दिन बहुमत प्राप्त मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने त्यागपत्र दिया। लेकिन राज्यपाल ने उत्तर प्रदेश सरकार की बर्खास्तगी ही की। केंद्र ने अयोध्या कांड के बहाने तीन अन्य भाजपाई राज्य सरकारें भी बर्खास्त करवाईं। राज्यपाल रोमेश भंडारी ने उत्तर प्रदेश में नया रिकॉर्ड बनाया। कल्याण सिंह ने 21 अक्टूबर, 1997 को बहुमत सिद्ध किया। बावजूद इसके महामहिम ने कल्याण सिंह को हटाकर जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री बनाया। न्यायालय के निर्देश पर विधानसभा का विशेष सत्र 26 फरवरी, 1998 को हुआ। कल्याण सिंह जीत गए। बिहार सरकार की बर्खास्तगी पर न्यायालय का आदेश जगजाहिर है। कांग्रेस ने प्रतिबद्ध राज्यपाल की परंपरा चलाई। 1977 की जनता पार्टी सरकार भी उसी रास्ते चली। उसने नौ विधानसभाएं भंग कीं। 1980 में केंद्र की कांग्रेसी सरकार ने भी नौ विधानसभाएं बर्खास्त कीं। मूलभूत प्रश्न यह है कि क्या राज्यपाल केंद्र में सत्तारूढ़ दल के ही एजेंट हैं। 1970 के राज्यपाल सम्मेलन में आचार संहिता पर सहमति बनी। राष्ट्रपति ने जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल की अध्यक्षता में राज्यपालों की पांच सदस्यीय समिति बनाई। समिति ने तय किया, बहुमत का प्रश्न विधानसभा ही तय करेगी, मुख्यमंत्री अधिवेशन न बुलाए तो बहुमत समाप्त माना जाएगा। वैकल्पिक सरकार की संभावनाओं के खत्म होने पर सदन भंग ही रास्ता है। गठबंधन सरकारों में किसी घटक के अलग हो जाने पर भी सरकार पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। मुख्यमंत्री से विधानसभा बुलाकर बहुमत सिद्ध करने को कहा जाना चाहिए। फिर सरकारिया आयोग (1983) ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि राज्य का शासन जब संविधान के उपबंधों के अनुसार नहीं चल रहा है तब तथ्यों सहित राज्य सरकार को पहले चेतावनी दी जानी चाहिए और सरकार के उत्तर पर गंभीरतापूर्वक विचार करके ही कोई कार्रवाई की जानी चाहिए। सन् 1997 के राज्यपाल सम्मेलन में भी आचरण संबंधी सात सूत्रीय दिशानिर्देश तय हुए। राजग सरकार के संविधान समीक्षा आयोग ने भी कई मूल्यवान सिफारिशें की थीं लेकिन प्रतिबद्ध राज्यपाल अपने काम पर हैं। कर्नाटक के राज्यपाल ने केंद्र के ईमानदार प्रतिनिधि के रूप में काम नहीं किया। उन्होंने राज्य सरकार के विरुद्ध दो बार केंद्र को रिपोर्ट दी। केंद्र ने पहली रिपोर्ट खारिज की, दूसरी पर असमंजस है। बुनियादी सवाल यह है कि बार-बार केंद्र को गुमराह करने और केंद्र व राज्य दोनों को ही विषम परिस्थितियों में झोंकने वाले राज्यपाल के प्रति केंद्र के मन में खास तरह की ममता क्यों है? क्या केंद्र ने ही उन्हें कर्नाटक सरकार को अस्थिर करने या उसका वध करने की सुपारी दी है? अनेक राज्यपालों के आचरण से संविधान की गरिमा को चोट पहुंची है। राज्यपालों की नियुक्ति व आचरण पर ठोस कार्रवाई की जरूरत है। इस पद पर राजनेताओं की नियुक्ति बंद होनी चाहिए। निवर्तमान राज्यपाल को बाद में किसी लाभ के पद पर नियुक्त न किए जाने का प्रावधान भी जरूरी है। संवैधानिक चीरहरण का धारावाहिक आचरण बर्दाश्त के बाहर है। (लेखक उप्र विधानपरिषद के सदस्य हैं )
Saturday, January 1, 2011
बिखरने के लिए बनता मोर्चा
लेखक क्षेत्रीय दलों के कथित तीसरे-चौथे मोर्चे की राजनीतिक जमीन पर निगाह डाल रहे हैं
प्रादेशिक-राजनीतिक हित और अवसरवाद तीसरे मोर्चे को कभी मुकम्मल शक्ल ही नहीं लेने देते। अलग-अलग मौकों पर तार-तार हो चुकी तीसरे मोर्चे की शक्ल जेपीसी के मुद्दे पर एक बार फिर आकार लेती दिख रही है। सेक्युलर विपक्ष के रूप में तीसरे मोर्चे के इस नए अवतार की उम्र कितनी होगी, यह भविष्य बताएगा, लेकिन एक बात तो तय है कि जब तक केंद्र में सत्ता के बंटवारे का कोई अवसर नहीं आता तब तक इसकी एकता की कोई गारंटी नहीं है। प्राय: सभी क्षेत्रीय दलों की अपनी-अपनी स्थानीय वोटबैंक की मजबूरी और सियासी समीकरण हैं, जो उन्हें स्थायी भाव नहीं लेने देते। दरअसल, क्षेत्रीय दलों की राजनीति का जन्म जिस बुनियाद पर हुआ है उसमें यह लाजिमी भी है। राष्ट्रीय दलों की मनमानी ने ही क्षेत्रीय भावनाओं को प्रस्फुटन का मौका दिया है। 1960 के दशक में स्थानीय क्षत्रपों में उपजे आक्रोश और आजादी के लिए लड़ने या उसे समर्थन देने वाली पीढ़ी के धीरे-धीरे कम होने के साथ ही क्षेत्रीयता की भावना भी अपने पैर जमाती गई। 1970 और फिर 1980-90 के दशकों में इन क्षेत्रीय दलों ने एक मंच पर जाकर कांग्रेस को किनारे करने में थोड़ी सफलता भी पाई। मगर यह नाजुक एकता हर बार अलग-अलग मुद्दों पर दिल्ली में ही दिखाई दी। वक्ती तौर पर ही सही जेपीसी के मामले में फिलहाल वे एक मंच पर नजर आ रहे हैं, लेकिन उससे भी सपा दूर ही है। इसीलिए कहा भी जाता है कि तीसरा मोर्चा बनता ही है बिखरने के लिए! एक नजर तीसरे मोर्चे की ताकतों पर- वाम मोर्चा : 2009 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने लाल दुर्ग के कंगूरे को तोड़कर वाम मोर्चे के लिए खतरे की घंटी पहले ही बजा दी है। रही-सही कसर 2010 में स्थानीय निकाय के चुनाव में ममता-कांग्रेस ने वामदलों का सूपड़ा साफ कर पूरी कर दी। वाम दलों के लिए केरल से भी बुरी खबर है। स्थानीय निकाय के चुनाव में वाम मोर्चा वहां भी खेत रहा है। अभी असली परीक्षा 2011 में पश्चिम बंगाल और केरल के विधानसभा चुनावों में होनी है। पश्चिम बंगाल में ममता की आंधी से 35 साल पुराने वामपंथी शासन के पैर राइटर्स बिल्डिंग से उखड़ते नजर आ रहे हैं। ऐसे में वाम मोर्चे की पहली चुनौती माकपा, भाकपा, फॉरवर्ड ब्लॉक समेत पूरे कुनबे को समेट कर रखने की है। इन्हीं हालात ने केरल और पश्चिम बंगाल के माकपा नेताओं को अपनी ऐतिहासिक अदावत भी भुलाने को मजबूर कर दिया है। इसीलिए, वह गैरकांग्रेस-गैरभाजपा विपक्ष को एकजुट कर अपनी अहमियत गाहे-बगाहे बनाए रखती है। सपा और बसपा : उत्तर प्रदेश में 2012 के विधानसभा चुनाव सपा के लिए सबसे बड़ी अग्नि परीक्षा साबित होंगे। 2004 व 2009 के लोकसभा चुनाव में यूपी में सबसे बड़ा दल बन कर उभरने के बावजूद सपा केंद्र में अपनी भूमिका तलाशती ही रही है। 2007 में विधानसभा चुनाव हारने के बाद से सपा के लिए 2010 में भी अच्छी खबरें नहीं आईं। बसपा व कांग्रेस ने मुलायम सिंह के गढ़ में उनके वोट बैंक में सेंध लगा दी है। बसपा के सत्तासीन होने के बावजूद सत्ता विरोधी माहौल का भी सपा लाभ नहीं ले पा रही है। शायद यही वजह है कि मुलायम सिंह ने लोकसभा चुनाव के बाद कल्याण सिंह और बाद में कल्याण को सपा में लाने वाले अमर सिंह से भी रिश्ते तोड़ लिए। अब मुलायम अपने बिछड़े साथियों की घर वापसी के लिए हर कसरत में जुटे हैं। आजम खां ठाठ-बाट के साथ सपा में लौटे भी हैं। सपा की पूरी कसरत यादव-मुस्लिम जनाधार को फिर से एकजुट करने की है। अयोध्या में राम मंदिर के पक्ष में हाईकोर्ट का फैसला आने पर मुलायम की प्रतिक्रिया भी मुस्लिम वोटबैंक के मद्देनजर ही थी। राज्य और केंद्र, दोनों ही स्तरों पर किसी भी सूरत में बसपा का हाथ कांग्रेस से न मिल सके, मुलायम की पहली प्राथमिकता यह है। शायद यही वजह है कि केंद्र में एक-आध मुद्दों को छोड़कर सपा किसी सरकार विरोधी मुहिम में शामिल नहीं होती। बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों ने बसपा को थोड़ा चिंतित किया है, लेकिन उत्तर प्रदेश में कमजोर सपा, कांग्रेस और भाजपा उसके लिए कोई चुनौती नहीं खड़ा कर पा रही हैं। बिहार में कांग्रेस की करारी हार ने जहां एक तरफ बसपा को खुश होने का कारण दिया है, वहीं सचेत भी किया है कि केवल वोट बंैक नहीं प्रदेश में विकास भी एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है। मायावती को यह मालूम है कि केवल लखनऊ में ही विकास दिखने से काम नहीं चलने वाला। राजद और लोजपा : बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश व भाजपा की आंधी ने राजद और लोजपा का सूपड़ा ही साफ कर दिया है। राजद की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी दोनों विधानसभा क्षेत्रों में बुरी तरह हारी हैं तो इधर लोजपा नेता रामविलास पासवान भी अपने भाई की हार से बेचैन हैं। जनाधार की जमीन खिसकने के चलते अब राजद लोजपा के भीतर आंतरिक कलह और दोषारोपण चरम पर है। फिलहाल उनके पास 2014 के लोकसभा अथवा 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के पहले करने को कुछ नहीं है। लिहाजा, संभावित तीसरे मोर्चे में ही अपनी अहमियत तलाशने की कोशिश कर रहे हैं। अन्नाद्रमुक : तमिलनाडु में डीएमके के 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले ने अन्नाद्रमुक को राज्य में खाद और पानी खुद ही दे दिया है। 2011 के विधानसभा चुनाव को जयललिता राज्य में खोई सत्ता पाने के एक अवसर के तौर पर देख रही हैं। राज्य में भ्रष्टाचार के प्रतीक बन गए ए. राजा ही नहीं खुद करुणानिधि के परिवार के बीच चल रही विरासत की जंग ने भी जयललिता की संभावनाओं को बल दिया है। तमिलनाडु का चुनावी रसायन भी कुछ ऐसा रहा है कि द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच सत्ता का हस्तांतरण होता रहा है। इसी तथ्य के मद्देनजर जयललिता तब तक ही तीसरे मोर्चे के दलों के साथ खड़ी हैं, जब तक कि कांग्रेस उनकी तरफ हाथ नहीं बढ़ा देती। तेदेपा : आंध्र में वाईएसआर की विरासत के लिए चल रही कांग्रेस की जंग ने प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू के लिए राह थोड़ी आसान की है। किसानों के हित के लिए आमरण अनशन पर बैठकर चंद्रबाबू ने वामदलों, जगन और तेलंगाना नेताओं की सहानुभूति भी अपने साथ जोड़ ली है। उन्हें लग रहा है कि किसान आंदोलन, तेलंगाना मूवमेंट और उनकी अपनी राजनीतिक जमीन एकजुट हो जाए तो वह कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभर सकते हैं। यह राह इतनी आसान नहीं है, क्योंकि वाईएसआर की विरासत पाने के लिए जगन के तेवर सातवें आसमान पर हैं। वह राज्य में कांग्रेस लिए एक खतरा तो बन गए हैं लेकिन चंद्रबाबू और जगन की महत्वाकांक्षाएं दोनों को साथ नहीं मिलने देंगी। इनके अलावा अन्य छोटे क्षेत्रीय दल अपनी सुविधा और अपने सियासी स्वार्थो के मद्देनजर केंद्र और राज्य में अपना सहयोगी चुनते रहते हैं। (लेखक दैनिक जागरण के राजनीतिक संपादक हैं)
ईमानदार प्रत्याशी उतारेंगे 2012 में
आगरा/ हाथरस : गांव चलो अभियान की चौपाल के दूसरे दिन भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह केंद्र सरकार पर जमकर बरसे। टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले पर कांगे्रस को घेरा और भगवा आतंकवाद के मुद्दे पर राहुल गांधी पर निशाना साधा। उन्होंने कहा, टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले में सरकार को संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के सामने पेश होना ही होगा। भगवा आतंकवाद पर राजनाथ ने कहा कि यदि भगवा आतंकवाद है और आरएसएस इसमें शामिल है तो मुझे ये बताएं कि फिर देश भक्त कौन है। राहुल गांधी के इस बयान ने सीधे पाकिस्तान को फायदा पहुंचाया है, जिसकी जांच होना चाहिए। हाथरस में राजनाथ ने लोगों से वादा किया है कि 2012 के विधान सभा चुनाव में वह ईमानदार प्रत्याशी उतारेंगे। भाजपा के चलो गांव की ओर कार्यक्रम के तहत वह गुरुवार को जिले में पहुंचे थे। उन्होंने हाथरस जंक्शन के गांव बघराया में जन पंचायत की। बीते सप्ताह जिले के सिकंदराराऊ में दलित युवक की हत्या कर सिर गायब कर दिए जाने के मामले में कहा कि लानत है ऐसी हुकूमत पर। सीएम को खुद नैतिकता के आधार पर गद्दी छोड़ देनी चाहिए। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस को घेरते हुए कहा कि टूजी स्पेक्ट्रम और कॉमनवेल्थ गेम्स के नाम पर ही ढाई लाख करोड़ से ज्यादा का घोटाला किया गया
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