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Wednesday, June 29, 2011

संघीय ढांचे का असम्मान


लेखक केंद्रीय सत्ता पर गैर-कांग्रेसी राज्य सरकारों के साथ भेदभाव करने का आरोप लगा रहे हैं...
तानाशाही और लोकतंत्र साथ-साथ नहीं चलते। लोकतंत्र का मुख्य तत्व है सत्ता का विकेंद्रीकरण। संविधान में केंद्र और राज्यों के बीच सत्ता संचालन का सुस्पष्ट बंटवारा है। बावजूद इसके सोनिया नियंत्रित केंद्र सरकार गैरकांग्रेसी राज्यों के साथ भेदभाव कर रही हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार केंद्र के भेदभाव से खफा हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्र पर गुजरात के साथ शत्रुतापूर्ण व्यवहार का आरोप लगाया है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री येद्दयुरप्पा को कांग्रेसी राज्यपाल के जरिए परेशान किया जा रहा है। राज्यपाल ने कर्नाटक सरकार की बर्खास्तगी की रिपोर्ट भेजी थी। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान प्रदेश को आवंटित कोयले की मात्रा न दिए जाने सहित ढेर सारे केंद्रीय भेदभावों से परेशान हैं। गरीबों को चावल और गेहूं बांटने की योजना के लिए लोकप्रिय छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह बेहद हलकान हैं। केंद्र ने राज्य का खाद्यान्न कोटा घटा दिया है। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड व झारखंड की सरकारें भी केंद्र के रवैये से पीडि़त हैं। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने भी केंद्र सरकार पर भेदभाव के आरोप लगाए हैं। संघीय ढांचे पर प्रश्नचिह्न है। सरकारिया आयोग की सिफारिशें मिमिया रही हैं। संविधान के खोल में असंवैधानिक तानाशाही है। बिहार पिछड़ा राज्य है। केंद्रीय मानक के अनुसार इस समय डेढ़ करोड़ परिवार गरीबी की रेखा के नीचे (बीपीएल) हैं, लेकिन केंद्र 65 लाख बीपीएल का ही खाद्यान्न व किरोसिन दे रहा है। बिहार के पास सिर्फ 150 मेगावाट विद्युत उत्पादन की क्षमता है। बिजली उत्पादन इकाइयों के ढेर सारे प्रस्ताव हैं। इनके लिए कोल लिंकेज की जरूरत है। केंद्र हीलाहवाला कर रहा है। प्रधानमंत्री सड़क योजना की स्वीकृत राशि देने में भी बिहार भेदभाव का शिकार है। कई औद्योगिक घराने एथनॉल उत्पादन की इकाइयां लगाने को तैयार हैं, लेकिन केंद्र की अड़ंगेबाजी है। गुजरात की सरदार सरोवर परियोजना के बारे में नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री को जनवरी 2011 में पत्र भी लिखा था, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। सरकार ने सरदार पटेल की कर्मभूमि कर्मसाद, गांधी की जन्मभूमि पोरबंदर व गांधीनगर में जेएनयूआरएम योजना लागू करने का आग्रह किया था। केंद्र ने गांधीजी की जन्मभूमि वाले प्रस्ताव को ही स्वीकृति दी। सरदार पटेल से जुड़े प्रस्ताव को टरका दिया। केंद्र ने गुजरात का किरोसिन तेल कोटा भी 33 प्रतिशत घटाया है। गुजरात सरकार ने रसोई गैस की पाइपलाइन घरों तक बिछाई है। केंद्र ने पाइपलाइन बिछाने के कार्य को भी गलत बताया है। कांग्रेसी नेतृत्व संविधान और राज्यों द्वारा किए गए विकास का सम्मान नहीं करता। गैरकांग्रेसी सरकारों की लोकप्रियता उसे बर्दाश्त नहीं हैं। नरेंद्र मोदी या नीतीश कुमार की तो कतई नहीं। गुजरात अब अपनी जरूरत से ज्यादा बिजली बना रहा है। मोदी कम बिजली वाले राज्यों को बिजली देने को तैयार हैं, लेकिन केंद्र ग्रिड संयोजन नहीं करता। गुजरात कपास उत्पादक है। निर्यात की सुविधा नहीं। किसानों का नुकसान जारी है। कर्नाटक में रेशम धागे का आयात शुल्क 30 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत करने से कर्नाटक की क्षति हुई। मध्य प्रदेश की थर्मल इकाइयों को मध्य प्रदेश के ही कोयला ब्लाकों से कोयला नहीं मिलता। केंद्र चाहता है कि वह अन्य राज्यों से कोयला उठाए, घाटा उठाए, सरकारी खर्च बढ़े। मानेसर पावर परियोजना के काम को बंद करने के केंद्रीय आदेश हैं। उत्तराखंड का विशेष औद्योगिक पैकेज काटा गया। बवाल हुआ तो 2010 तक बढ़ाया गया। पर्वतीय क्षेत्र में स्थित इस राज्य के औद्योगीकरण और विकास पर भी केंद्र की वक्रदृष्टि है। केंद्र नक्सली हिंसा के विरुद्ध राज्यों को हर तरह की मदद का दावा भी करता है, लेकिन केंद्र ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह को हैसियत बताने के लिए माओवादी संगठनों से रिश्तों के आरोपी विनायक सेन को योजना आयोग का सलाहकार बनाया है। तमिलनाडु की जयललिता से अभी उम्मीदें हैं, वरना उनके साथ भी यही भेदभाव होना है। सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने भी संघीय ढांचे पर हमला किया है। सांप्रदायिक हिंसा की रोकथाम के नाम पर लाया जा रहा विधेयक राज्य के क्षेत्राधिकार का अतिक्रमण है। गुजरात विधानसभा ने संगठित अपराध नियंत्रण विधेयक दो बार पारित किया। राजस्थान की तत्कालीन भाजपा सरकार ने भी ऐसा ही विधेयक पारित करवाया था, लेकिन दोनों ही राज्यों में राज्यपाल ने अनुमति नहीं दी। कांग्रेस शासित महाराष्ट्र में ऐसा ही कानून (मकोका) लागू है। बिहार विधानसभा द्वारा पारित आधा दर्जन विधेयक राजभवन में हैं। झारखंड सरकार के दंड प्रक्रिया संशोधन, झारखंड विद्युत शुल्क, प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय व वस्तुओं पर प्रवेश कर के अधिनियम राष्ट्रपति के विचारार्थ लंबित हैं। हिमाचल प्रदेश के 3 विधेयक 2009 से व 2 विधेयक 2010 से राजभवन में लंबित हैं। कर्नाटक के राज्यपाल ने तो गोहत्या निरोधक विधेयक भी लटका रखा है। गुजरात में संगठित अपराधों वाले विधेयक के साथ ही पांच अन्य विधेयक राष्ट्रपति के यहां व सात विधेयक राज्यपाल के यहां लंबित हैं। मध्य प्रदेश सरकार के भी छह विधेयक राष्ट्रपति भवन में हैं, इसमें गोरक्षा निषेध व संगठित अपराध रोकने वाले विधेयक शामिल हैं। संविधान निर्माताओं ने बहुत सोच-विचार के बाद संघीय ढांचा बनाया था, लेकिन कांग्रेस संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करके ही सत्ता चलाती है। चौथे आम चुनाव तक केंद्र व राज्यों में टकराव कांग्रेस का अंदरूनी मामला था। फिर गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं। कांग्रेसी केंद्र ने स्वाभाविक ही भेदभाव किया। राज्यपालों का दुरुपयोग हुआ, सरकारों की बर्खास्तगी का खेल चला। योजना आयोग जैसी असंवैधानिक सत्ता ने राज्यों को औकात बताई। कर राजस्व के वितरण पर वित्त आयोग की व्यवस्था है, लेकिन सरकारी भेदभाव जारी है। संप्रग के शासन में सभी संवैधानिक संस्थाओं की शक्ति घटी है। प्रधानमंत्री का प्राधिकार घटा है। महामहिम राज्यपालों को मोहरा बनाया गया। मुख्य सतर्कता आयुक्त की गरिमा कांग्रेस ने ही गिराई है। लोक लेखा समिति में कांग्रेस प्रायोजित हुल्लड़ हुआ। नियंत्रक महालेखाकार (कैग) पर भी टिप्पणियां की गईं। न्यायपालिका को भी हदें बताई गईं। राज्य नाम की संवैधानिक इकाई व मुख्यमंत्री जैसी संस्थाएं भी कांग्रेसी कोप का शिकार हैं। परिणाम सामने है। आम जन संविधान तंत्र और संसदीय जनतंत्र को ही दोषी ठहरा रहे हैं, लेकिन सारा दोष कांग्रेसी राजनीतिक संस्कृति का है। (लेखक उप्र विधानपरिषद के सदस्य हैं)

Saturday, June 4, 2011

संविधानेत्तर वैकल्पिक सरकार


लेखक सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद को संविधानेत्तर सत्ता बता रहे हैं ….
भारत में संविधान की सत्ता है, लेकिन संविधानेत्तर संस्था गढ़ना कांग्रेस के बाएं हाथ का खेल है। सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ऐसी ही संविधानेत्तर सत्ता है। संविधान में ऐसी परिषद का कोई प्रावधान नहीं है। 2004 में गठित इस परिषद को तत्कालीन राजग संयोजक जार्ज फनरंडीस ने संविधानेत्तर वैकल्पिक सरकार कहा था। कुछ टिप्पणीकारों ने इसे संप्रग का योजना आयोग भी बताया था। सोनिया गांधी की सर्वोपरि सत्ता ही इस परिषद के गठन का मुख्य उद्देश्य था, लेकिन कानूनी दृष्टि से यह लाभ का पद था। सो विरोध हुआ। भारी विवाद के चलते उन्होंने परिषद की अध्यक्षता व संसद की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया। उनके लिए परिषद की अध्यक्षता सहित कुछ अन्य पदों को लाभ के पद की परिभाषा से मुक्त किया गया। संप्रग सरकार की दूसरी पारी में मार्च 2010 को उनकी दोबारा ताजपोशी हुई। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने परिषद के पहले कार्यकाल को ऐतिहासिक बताया। प्रधानमंत्री ने सोनिया गांधी को अध्यक्ष मनोनीत किया लेकिन परिषद के कार्य संचालन नियमों के अनुसार वह बाकी सदस्यों की नियुक्ति अध्यक्ष सोनिया गांधी के परामर्श से ही कर पाए। परिषद सचमुच में ऐतिहासिक है। प्रधानमंत्री के प्राधिकार भी सीमित हैं। परिषद विधेयकों के प्रारूप भी बनाती है। भूमि अधिग्रहण कानून व सांप्रदायिक हिंसा से जुड़े विधेयकों को लेकर परिषद की खासी आलोचना हुई है। परिषद ने 1894 में बने भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन का अव्यावहारिक प्रस्ताव किया है। भूमि अधिग्रहण का वर्तमान कानून किसान विरोधी है। यह कंपनी हित को जनहित बताता है। सरकारें जनहित के नाम पर किसानों की भूमि छीन कर औद्योगिक घरानों को दे रही हैं। सारे देश के किसान आंदोलित हैं। उत्तर प्रदेश में आंदोलित किसानों पर नौ बार गोली और दर्जनों बार लाठी चली हैं। महाराष्ट्र के जैतापुर परमाणु संयंत्र के विरुद्ध किसानों का आंदोलन है। हरियाणा और राजस्थान के किसान भी भूमि अधिग्रहण को लेकर आंदोलित हैं। औद्योगिक घरानों और किसानों के बीच टकराव है, लेकिन सरकार और कानून औद्योगिक घरानों के पक्ष में हैं। परिषद ने भूमि अधिग्रहण के लिए किसानों को पंजीकृत कीमत-सर्किल रेट का छह गुना देने की सिफारिश की है। सर्किल रेट बाजार मूल्य नहीं होता। कृषि भूमि की कीमत बाजार रेट से भी नीची तय करने का अधिकार इस परिषद को किसने दिया? परिषद द्वारा प्रस्तावित सांप्रदायिक हिंसा रोकथाम विधेयक निंदा का विषय बना है। विधेयक का पूरा प्रारूप सांप्रदायिक और अलगाववादी है। इसके अनुसार किसी समूह के विरुद्ध किया गया अपराध सांप्रदायिक हिंसा है। यहां अल्पसंख्यक समुदाय समूह है। लेकिन बहुसंख्यक हिंदू समूह की परिभाषा में नहीं आते। इस विधेयक में सांप्रदायिक हिंसा के लिए हिंदुओं को ही दोषी मान लिया गया है। माना गया है कि अल्पसंख्यकों की ओर से कभी सांप्रदायिक हिंसा नहीं होती। यहां गोधरा ट्रेन कांड सहित अनेक घटनाओं की अनदेखी की गई है। प्रारूप में राष्ट्रीय एकता को खंडित करने वाली वोट बैंक राजनीति है। प्रारूप में न्याय और क्षतिपूर्ति के लिए सात सदस्यीय प्राधिकरण के गठन का सुझाव है। प्राधिकरण के सात में से चार सदस्य अल्पसंख्यक समूह के होंगे। यहां देश के बहुसंख्यक समुदाय को वैसे ही प्रथम दृष्टया अभियुक्त मान लिया गया है, जैसे अंग्रेजी शासकों ने अनुसूचित जातियों के विरुद्ध क्रिमिनल ट्राइब एक्ट बनाया था। तब कई जातियों को जन्मत: क्रिमिनल ट्राइब (आपराधिक समूह) के रूप में अभिज्ञात किया गया था। प्रारूप में संपूर्ण बहुसंख्यक समुदाय को सांप्रदायिक हिंसा का अभ्यस्त मान लिया गया है। विधेयक कानून का मसौदा होते हैं। भारत के हरेक संसद सदस्य/विधानमंडल के सदस्य को विधेयक प्रस्तुत करने का अधिकार है, लेकिन व्यावहारिक रूप में सरकारें ही विधेयक लाती हैं। वे विधेयक लाने के उद्देश्य और कारण बताती हैं। सदन में सभी प्रावधानों पर बहस होती है। विश्व के सभी जनतांत्रिक देशों में विधि निर्माण का काम संसद/विधायिका ही करती है। आखिरकार राष्ट्रीय सलाहकार परिषद को विधेयक तैयार करने का संविधानेत्तर अधिकार किसने दिया? अन्ना हजारे के अनशन के समय जनलोकपाल विधेयक को लेकर नागरिक समाज के अधिकारों का मजाक उड़ाया गया था। मूलभूत प्रश्न यह है कि राष्ट्रीय सलाहकार परिषद नागरिक समाज से ज्यादा अधिकार संपन्न क्यों और कैसे हैं? हजारे और उनके समर्थकों को सरकारी उद्घोषणा द्वारा विधेयक का प्रारूप तैयार करने वाली समिति में शामिल किया गया है। लेकिन परिषद को विधेयकों का प्रारूप तैयार करने का अधिकार देने की कोई सरकारी उद्घोषणा नहीं हुई। आखिरकार राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की वैधानिकता क्या है? संविधान या कानून में इसकी कोई व्यवस्था नहीं है। बावजूद इसके परिषद प्रधानमंत्री और उनकी कैबिनेट से भी बड़ी परासंवैधानिक सत्ता है। बेशक परिषद के खाद्य सुरक्षा संबंधी मसौदे को सरकार लागू नहीं कर पाई लेकिन परिषद के अध्यक्ष के रूप में एक संदेश देने की कोशिश की गई कि सोनियाजी खाद्य सुरक्षा चाहती हैं। प्रधानमंत्री ही ढीले हैं। परिषद ने प्रधानमंत्री का प्राधिकार घटाया है। परिषद प्रधानमंत्री और उनकी मंत्रिपरिषद से बड़ी परासंवैधानिक संस्था है। प्रधानमंत्री और सभी मंत्रिगण अपने कृत्यों के लिए संसद में जवाबदेह हैं, लेकिन परिषद किसी भी संवैधानिक निकाय के प्रति जवाबदेह नहीं है। बेशक परिषद एक परामर्शदात्री संस्था है, लेकिन वह स्वयं देश के किसी भी राजनीतिक/गैरराजनीतिक संगठन से संवाद नहीं करती। खाद्य सुरक्षा विधेयक पर परामर्श देने के पहले उसने सरकार का दृष्टिकोण जानने का कोई प्रयास नहीं किया। भूमि अधिग्रहण कानून के बारे में भी उसने किसी किसान संगठन से संवाद नहीं किया। सांप्रदायिक हिंसा कानून के मसौदे पर उसने बहुसंख्यक समुदाय के किसी संगठन या प्रतिनिधि से कोई बातचीत नहीं की। बावजूद इसके वह सबसे बड़े राष्ट्रीय सलाहकार की भूमिका में है। परिषद का खर्च प्रधानमंत्री कार्यालय के बजट आवंटन से जुड़ा हुआ है। अध्यक्ष के रूप में सोनिया गांधी कैबिनेट मंत्री के ओहदे से सम्मानित हैं। परिषद के कार्य संचालन के लिए संसद का कोई कानून नहीं है, लेकिन परिषद विधेयकों का प्रारूप बनाने जैसे संविधानेत्तर काम करती है। सोनिया गांधी बेशक कांग्रेस से बड़ी हैं, लेकिन संविधान से बड़ी नहीं हैं। कांग्रेस उन्हें उत्तराधिकार में प्राप्त पार्टी और प्रापर्टी है। वह राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, पुत्र राहुल राष्ट्रीय महामंत्री हैं। कोई भी संविधानेत्तर व्यवस्था ज्यादा दिन तक नहीं चल सकती। (लेखक उप्र विधानपरिषद के सदस्य हैं)

Sunday, May 22, 2011

केंद्र की कठपुतलियां


लेखक राज्यपाल की केंद्रीय सत्तादल के प्रति वफादारी को कर्नाटक संवैधानिक संकट की वजह बता रहे हैं….

कांग्रेस अजब-गजब संयोगों का पर्याय है। प्रधानमंत्री अर्थशास्त्र के विद्वान हैं लेकिन देश मुद्रास्फीति और महंगाई की गिरफ्त में है। वह ईमानदार कहे जाते हैं लेकिन पूरी सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी हुई है। विधिमंत्री रहे प्रख्यात विधिवेत्ता कर्नाटक के राज्यपाल हंसराज भारद्वाज संविधान प्रमुख होकर भी बहुमत प्राप्त राज्य सरकार की बर्खास्तगी पर आमादा हैं। वह उच्चतम न्यायालय की सदन को ही विश्वासमत का श्रेष्ठ स्थान बताने की स्थापना से असहमत हैं। वह सदन आहूत करने और विश्वासमत लेने के मुख्यमंत्री के अनुरोध को भी टाल चुके हैं। वह जैसे-तैसे कर्नाटक सरकार का वध चाहते हैं। वह महामहिम हैं लेकिन कांग्रेस के सामान्य कार्यकर्ताओं की तरह भाजपा सरकार के खिलाफ हैं। संवैधानिक ढांचा विफल हो जाने की उनकी अपनी व्याख्या है। ताजा सिफारिश विवाद का विषय है। केंद्र उनकी सिफारिश नहीं मानता तो भी वह लज्जित नहीं होते। वह राज्यपाल जैसी संवैधानिक संस्था की साख गिराने वाले महामहिमों की सूची के चमकते नायक हैं। आश्चर्य है कि बावजूद इसके केंद्र उन्हें वापस नहीं बुलाता। राज्यपालों का आचरण संविधान निर्माण के समय से ही विवादों के घेरे में हैं। रोहिणी कुमार चौधरी ने संविधान सभा में राज्यपालों की नियुक्ति प्रक्रिया पर आशंका जताई और कहा कि प्रधानमंत्री के परामर्श से राष्ट्रपति राज्यपाल की नियुक्त करेंगे। प्रधानमंत्री राजनीति में डूबा व्यक्ति होगा। उसके विचार तटस्थ नहीं होंगे। उड़ीसा के विश्वनाथ दास ने भी शंका व्यक्त की-ब्रिटिश साम्राज्यवाद के गवर्नर जो कुछ करते थे, वही अब सत्तारूढ़ दल करेगा। जवाहरलाल नेहरू ने बहस में हस्तक्षेप किया और कहा, इस पद के लिए हम एक पूर्ण तटस्थ व्यक्ति रखेंगे जो प्रांत की सरकार को मान्य हो। अगर ऐसा नहीं हुआ तो वह अपने प्रकार्य अच्छी तरह नहीं कर सकेगा। संविधान सभा केंद्र में सत्तारूढ़ दल के पिट्ठू राज्यपाल नहीं चाहती थी। बावजूद इसके अधिकांश राज्यपालों ने संविधान की मर्यादा भंग की। पहले आम चुनाव में कांग्रेस मद्रास प्रेसीडेंसी में हार गई। टी प्रकाशम ने सरकार गठन का दावा किया। राज्यपाल ने अल्पमत के बावजूद सी राजगोपालाचार्य को शपथ दिलाई, जोड़तोड़ हुई, बहुमत बना। यह सब पंडित नेहरू के समय हुआ। लोकतंत्र जवाबदेही से चलता है। सारी संवैधानिक संस्थाएं जवाबदेह हैं। राज्यपाल की कोई जवाबदेही नहीं। राज्यपाल केंद्रीय सत्तादल के अनुसार ही चलते हैं। राज्य सरकारों की बर्खास्तगी संवेदनशील मसला है। डॉ. अंबेडकर ने संविधान सभा में कहा था कि इस अस्त्र का प्रयोग कम से कम किया जाएगा लेकिन संविधान प्रवर्तन 1950 से अब तक मात्र 61 वर्ष में लगभग 115 दफा राज्य सरकारों की बर्खास्तगी की जा चुकी है। 1970 में उत्तर प्रदेश विधानसभा का अधिवेशन प्रस्तावित था, लेकिन राज्यपाल ने बहुमत के लिए सदन की प्रतीक्षा नहीं की और चरण सिंह सरकार बर्खास्त हो गई। हरियाणा के राज्यपाल तपासे ने बहुमत दल के नेता देवीलाल को विधायकों की परेड के लिए 24 मई, 1982 की तारीख दी और इसी बीच भजनलाल को मुख्यमंत्री की शपथ भी दिला दी गई। आंध्र के राज्यपाल रामलाल ने बहुमत के बावजूद एनटी रामाराव सरकार का वध (1984) किया। रामाराव सारे विधायकों सहित राष्ट्रपति भवन पहुंचे। विधायकों को राष्ट्रपति भवन ले जाने की परंपरा शुरू हुई। राज्यपाल संविधान की संरक्षक संस्था है लेकिन तमाम राज्यपालों ने संविधान को भी शर्मसार किया है। गुजरात के राज्यपाल कृष्णपाल ने शंकर सिंह बाघेला के पक्ष में भाजपा सरकार की बर्खास्तगी की। अयोध्या हादसे के दिन बहुमत प्राप्त मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने त्यागपत्र दिया। लेकिन राज्यपाल ने उत्तर प्रदेश सरकार की बर्खास्तगी ही की। केंद्र ने अयोध्या कांड के बहाने तीन अन्य भाजपाई राज्य सरकारें भी बर्खास्त करवाईं। राज्यपाल रोमेश भंडारी ने उत्तर प्रदेश में नया रिकॉर्ड बनाया। कल्याण सिंह ने 21 अक्टूबर, 1997 को बहुमत सिद्ध किया। बावजूद इसके महामहिम ने कल्याण सिंह को हटाकर जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री बनाया। न्यायालय के निर्देश पर विधानसभा का विशेष सत्र 26 फरवरी, 1998 को हुआ। कल्याण सिंह जीत गए। बिहार सरकार की बर्खास्तगी पर न्यायालय का आदेश जगजाहिर है। कांग्रेस ने प्रतिबद्ध राज्यपाल की परंपरा चलाई। 1977 की जनता पार्टी सरकार भी उसी रास्ते चली। उसने नौ विधानसभाएं भंग कीं। 1980 में केंद्र की कांग्रेसी सरकार ने भी नौ विधानसभाएं बर्खास्त कीं। मूलभूत प्रश्न यह है कि क्या राज्यपाल केंद्र में सत्तारूढ़ दल के ही एजेंट हैं। 1970 के राज्यपाल सम्मेलन में आचार संहिता पर सहमति बनी। राष्ट्रपति ने जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल की अध्यक्षता में राज्यपालों की पांच सदस्यीय समिति बनाई। समिति ने तय किया, बहुमत का प्रश्न विधानसभा ही तय करेगी, मुख्यमंत्री अधिवेशन न बुलाए तो बहुमत समाप्त माना जाएगा। वैकल्पिक सरकार की संभावनाओं के खत्म होने पर सदन भंग ही रास्ता है। गठबंधन सरकारों में किसी घटक के अलग हो जाने पर भी सरकार पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। मुख्यमंत्री से विधानसभा बुलाकर बहुमत सिद्ध करने को कहा जाना चाहिए। फिर सरकारिया आयोग (1983) ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि राज्य का शासन जब संविधान के उपबंधों के अनुसार नहीं चल रहा है तब तथ्यों सहित राज्य सरकार को पहले चेतावनी दी जानी चाहिए और सरकार के उत्तर पर गंभीरतापूर्वक विचार करके ही कोई कार्रवाई की जानी चाहिए। सन् 1997 के राज्यपाल सम्मेलन में भी आचरण संबंधी सात सूत्रीय दिशानिर्देश तय हुए। राजग सरकार के संविधान समीक्षा आयोग ने भी कई मूल्यवान सिफारिशें की थीं लेकिन प्रतिबद्ध राज्यपाल अपने काम पर हैं। कर्नाटक के राज्यपाल ने केंद्र के ईमानदार प्रतिनिधि के रूप में काम नहीं किया। उन्होंने राज्य सरकार के विरुद्ध दो बार केंद्र को रिपोर्ट दी। केंद्र ने पहली रिपोर्ट खारिज की, दूसरी पर असमंजस है। बुनियादी सवाल यह है कि बार-बार केंद्र को गुमराह करने और केंद्र व राज्य दोनों को ही विषम परिस्थितियों में झोंकने वाले राज्यपाल के प्रति केंद्र के मन में खास तरह की ममता क्यों है? क्या केंद्र ने ही उन्हें कर्नाटक सरकार को अस्थिर करने या उसका वध करने की सुपारी दी है? अनेक राज्यपालों के आचरण से संविधान की गरिमा को चोट पहुंची है। राज्यपालों की नियुक्ति व आचरण पर ठोस कार्रवाई की जरूरत है। इस पद पर राजनेताओं की नियुक्ति बंद होनी चाहिए। निवर्तमान राज्यपाल को बाद में किसी लाभ के पद पर नियुक्त न किए जाने का प्रावधान भी जरूरी है। संवैधानिक चीरहरण का धारावाहिक आचरण बर्दाश्त के बाहर है। (लेखक उप्र विधानपरिषद के सदस्य हैं )

Sunday, January 30, 2011

नए लोकपाल की तैयारी


लेखक लोकपाल के नए मसौदे को भ्रष्टाचार से ध्यान हटाने का घटिया उपाय बता रहे हैं...
पहरेदार का चोर हो जाना दुर्भाग्यपूर्ण होता है। आखिरकार पहरेदार पर कौन पहरा दे? प्रधानमंत्री देश के सार्वजनिक धन का न्यासी है, मंत्रिपरिषद उसी का विस्तार है। मुख्य सतर्कता आयुक्त पर अतिरिक्त सतर्कता की जिम्मेदारी है। सरकार को जवाबदेह बनाने की संसदीय शक्ति बड़ी है बावजूद इसके भ्रष्टाचार संस्थागत हो गया। राष्ट्रमंडल खेलों में अरबों का खेल हुआ। 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले से देश भौचक हुआ। आदर्श सोसाइटी भी घोटाला का पर्याय बनी। चावल निर्यात घोटाला, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, एलआईसी हाउसिंग सहित हर तरफ घोटालों की ही बाढ़ है। महंगाई घोटालों के पंख लगाकर ही आसमान पहुंची है। देश घोटालों के दलदल में है। सत्ताधीश छोड़ सब लुट रहे हैं। भ्रष्टाचार ही सत्यम है। आम जन हलकान हैं। यहां हर चीज बिकाऊ है। राजनीति एक विचित्र उद्योग है। थोड़ी पूंजी बड़ा व्यापार, कहीं भी, कभी भी। विधायकी सांसदी के पार्टी टिकट के रेट हैं, मनमाफिक मंत्री बनाने के रेट हैं। सरकार गिराने बचाने, सदन में वोट देने, सदन त्याग करने के पुरुस्कार हैं। केंद्र सरकार तमाम घोटालों के घेरे में है। स्पष्टीकरण काम नहीं आते। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से सरकार की नींद हराम है। जनता में थू-थू हो रही है। सो सरकार एक नए लोकपाल विधेयक की तैयारी कर रही है। विद्वान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कई अंतर्विरोधों के शिकार हैं। वह सरल हृदय गैरराजनीतिक व्यक्ति हैं, लेकिन देश के राजप्रमुख हैं। वह संवैधानिक दृष्टि से संसद के प्रति जवाबदेह हैं, लेकिन वस्तुत: वह सोनिया गांधी के प्रति उत्तरदायी हैं। वह मंत्रिपरिषद के प्रधान हैं, लेकिन मंत्रिगण उनकी बात नहीं सुनते। वह स्वयं ईमानदार हैं, लेकिन सरकारी भ्रष्टाचार पर कोई कार्रवाई नहीं कर सकते। वह अंतरराष्ट्रीय ख्याति के अर्थशास्त्री हैं, लेकिन महंगाई जैसी आर्थिक समस्या के सामने ही उन्होंने हथियार डाले हैं। भ्रष्टाचार ने सरकार की छवि को बट्टा लगाया है। लोकपाल विधेयक का मंसूबा सरकार की छवि को दुरुस्त करने का नया शिगूफा है। सरकार भ्रष्टाचार से लड़ते हुए दिखाई पड़ना चाहती है। सरकारी मसौदे में लोकपाल की कोई खास भूमिका नहीं है। प्रस्तावित लोकपाल अपनी ओर से कोई जांच शुरू नहीं कर सकेगा। वह सीधे शिकायतें भी नहीं लेगा। पीडि़त व्यक्ति लोकसभाध्यक्ष के पास शिकायत भेजेगा। वह लोकसभाध्यक्ष द्वारा अग्रसारित शिकायतों का संज्ञान लेगा। इसके लिए लोकसभाध्यक्ष को एक शिकायती प्रकोष्ठ बनाना होगा। शिकायतों का प्रारंभिक परीक्षण करना होगा। लोकपाल की रिपोर्ट लोकसभाध्यक्ष के पास जाएगी। मंत्री की शिकायत पर फैसला प्रधानमंत्री करेंगे। यानी नया लोकपाल मसौदा भ्रष्टाचार की चर्चा की दिशा को बदलने वाला भोथरा हथियार है। लोकपाल का आधार स्कैंडनिवियाई देशों की ओम्बड्समैन नामक संस्था है। सबसे पहले स्वीडन ने यह संस्था बनाई थी। इसकी नियुक्ति संसद करती है, वह संसद को अपनी रिपोर्ट देता है। यह संस्था नार्वे (1963) फिनलैंड (1909) और डेनमार्क में भी है। न्यूजीलैंड ने 1962 और ब्रिटेन ने 1966 में यही प्रणाली अपनाई। लोकपाल विधेयक का मनमोहन-प्रस्ताव पहला नहीं है। जनता सरकार के विधेयक 1977, राष्ट्रीय मोर्चा सरकार के विधेयक 1989, देवेगौड़ा सरकार के विधेयक 1996 और अटल सरकार के विधेयक 1998 में प्रधानमंत्री भी लोकपाल की जांच के दायरे में लाए गए, लेकिन राजीव गांधी सरकार के विधेयक 1985 में प्रधानमंत्री को जांच से बाहर रखा गया था। अटल सरकार के विधेयक में सर्वोच्च न्यायालय के कार्यरत या सेवानिवृत्त न्यायाधीश को ही लोकपाल बनाए जाने की व्यवस्था थी। इस विधेयक में इसी पद पर दोबारा नियुक्ति का निषेध था। साथ में लोकपाल रह चुके व्यक्ति को भविष्य में केंद्र या राज्य सरकार में लाभ के किसी पद पर नियुक्त न किए जाने के भी प्रावधान थे। जैसे राजीव गांधी सरकार द्वारा 1985 में लाए गए विधेयक में लोकपाल द्वारा की गई जांचों को प्रधानमंत्री को भेजे जाने के प्रावधान थे, प्रधानमंत्री से ही कार्रवाई की अपेक्षा थी, ठीक वैसे ही ताजा मसौदे में भी प्रधानमंत्री से ही अपेक्षाएं की गई हैं। मूलभूत प्रश्न यह है कि प्रधानमंत्री ही अपने दायित्व का निर्धारण ठीक से कर रहे होते तो क्या 2-जी घोटाला होता? तो क्या राष्ट्रमंडल खेल घोटाले के चलते भारत की अंतरराष्ट्रीय बदनामी होती? अमेरिकी संस्था ग्लोबल फाइनेंशियल इंटीग्रिटी के अनुसार भारत के 22.5 लाख करोड़ रुपये अवैध रूप से विदेशी बैंकों में जमा हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इसे देश के धन की लूट कहा है। भारत के भीतर भी लगभग इसका आधा काला धन है। राष्ट्रमंडल 2-जी आदि चर्चित घोटालों को जोड़कर भी बात पूरी नही होती। सरकारी तंत्र के हर हिस्से में महालूट है। कई मुख्यमंत्री लूट रहे हैं, अनेक केंद्रीय मंत्री, राज्यों के मंत्री, प्रशासनिक अधिकारी इसी तरह की लूट में शामिल बताए जाते हैं। उत्तर प्रदेश व बिहार के पूर्व मुख्यमंत्रियों पर आय से अधिक संपदा के आरोप रहे हैं। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री भी जांच के लपेटे में हैं। भ्रष्टाचार के प्रति उदारीकरण की नीति ने आम जन को कंगाल बनाया है। रोग काफी पुराना है। आजादी के बाद पं. नेहरू के समय कृष्णमेनन जीप घोटाला हुआ। उड़ीसा के मुख्यमंत्री बीजू पटनायक, जम्मू-कश्मीर के बख्शी गुलाम मोहम्मद, बिहार के कृष्ण बल्लभ सहाय, पंजाब के प्रताप सिंह कैरों, महाराष्ट्र के एआर अंतुले आदि मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार के आरोपी रहे हैं। भ्रष्टाचार की कथा अनंत है। केवल छवि सुधार से ही बात नहीं बनेगी। ठोस कार्रवाई जरूरी है। मनमोहन सिंह सरकार अटल बिहारी सरकार के लोकपाल विधेयक से प्रेरणा क्यों नहीं लेती? वह जनता सरकार द्वारा 1977 में प्रस्तुत लोकपाल विधेयक को आधार क्यों नहीं बनाती? वह एक दर्जन से ज्यादा राज्यों में कार्यरत लोकपाल जैसी संस्था लोकायुक्तों की कार्यपणाली, अच्छाई, कमजोरी के अनुभवों का संज्ञान क्यों नहीं लेती? उत्तर प्रदेश सरकार के लोकायुक्त की जांचों ने मंत्रियों की नींद हराम की है। एक मंत्री हाल में ही हटे हैं। कई विदाई से डरे अपना कामकाज जल्दी-जल्दी निपटा रहे हैं। सवाल यह है कि छोटे-छोटे देशों और भारत के अनेक राज्यों ने ऐसी ही निगरानी संस्था का विकास स्वत:स्फूर्त ढंग से कर लिया है तो केंद्रीय स्तर पर लोकपाल जैसी निगरानी संस्था का अधिनियम अतिशीघ्र क्यों नहीं पारित हो सकता? देश भ्रष्टाचार से तबाह है। संसदीय जनतंत्र में राजनीतिक तंत्र की खास भूमिका होती है। भ्रष्टाचार की राजनीतिक संस्कृति का विकास कांग्रेस ने किया। उसने जैसा बोया था वही फसल आज काट खाने दौड़ रही है। (लेखक उप्र विधान परिषद के सदस्य हैं)