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Saturday, January 1, 2011

बिखरने के लिए बनता मोर्चा

लेखक क्षेत्रीय दलों के कथित तीसरे-चौथे मोर्चे की राजनीतिक जमीन पर निगाह डाल रहे हैं
प्रादेशिक-राजनीतिक हित और अवसरवाद तीसरे मोर्चे को कभी मुकम्मल शक्ल ही नहीं लेने देते। अलग-अलग मौकों पर तार-तार हो चुकी तीसरे मोर्चे की शक्ल जेपीसी के मुद्दे पर एक बार फिर आकार लेती दिख रही है। सेक्युलर विपक्ष के रूप में तीसरे मोर्चे के इस नए अवतार की उम्र कितनी होगी, यह भविष्य बताएगा, लेकिन एक बात तो तय है कि जब तक केंद्र में सत्ता के बंटवारे का कोई अवसर नहीं आता तब तक इसकी एकता की कोई गारंटी नहीं है। प्राय: सभी क्षेत्रीय दलों की अपनी-अपनी स्थानीय वोटबैंक की मजबूरी और सियासी समीकरण हैं, जो उन्हें स्थायी भाव नहीं लेने देते। दरअसल, क्षेत्रीय दलों की राजनीति का जन्म जिस बुनियाद पर हुआ है उसमें यह लाजिमी भी है। राष्ट्रीय दलों की मनमानी ने ही क्षेत्रीय भावनाओं को प्रस्फुटन का मौका दिया है। 1960 के दशक में स्थानीय क्षत्रपों में उपजे आक्रोश और आजादी के लिए लड़ने या उसे समर्थन देने वाली पीढ़ी के धीरे-धीरे कम होने के साथ ही क्षेत्रीयता की भावना भी अपने पैर जमाती गई। 1970 और फिर 1980-90 के दशकों में इन क्षेत्रीय दलों ने एक मंच पर जाकर कांग्रेस को किनारे करने में थोड़ी सफलता भी पाई। मगर यह नाजुक एकता हर बार अलग-अलग मुद्दों पर दिल्ली में ही दिखाई दी। वक्ती तौर पर ही सही जेपीसी के मामले में फिलहाल वे एक मंच पर नजर आ रहे हैं, लेकिन उससे भी सपा दूर ही है। इसीलिए कहा भी जाता है कि तीसरा मोर्चा बनता ही है बिखरने के लिए! एक नजर तीसरे मोर्चे की ताकतों पर- वाम मोर्चा : 2009 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने लाल दुर्ग के कंगूरे को तोड़कर वाम मोर्चे के लिए खतरे की घंटी पहले ही बजा दी है। रही-सही कसर 2010 में स्थानीय निकाय के चुनाव में ममता-कांग्रेस ने वामदलों का सूपड़ा साफ कर पूरी कर दी। वाम दलों के लिए केरल से भी बुरी खबर है। स्थानीय निकाय के चुनाव में वाम मोर्चा वहां भी खेत रहा है। अभी असली परीक्षा 2011 में पश्चिम बंगाल और केरल के विधानसभा चुनावों में होनी है। पश्चिम बंगाल में ममता की आंधी से 35 साल पुराने वामपंथी शासन के पैर राइटर्स बिल्डिंग से उखड़ते नजर आ रहे हैं। ऐसे में वाम मोर्चे की पहली चुनौती माकपा, भाकपा, फॉरवर्ड ब्लॉक समेत पूरे कुनबे को समेट कर रखने की है। इन्हीं हालात ने केरल और पश्चिम बंगाल के माकपा नेताओं को अपनी ऐतिहासिक अदावत भी भुलाने को मजबूर कर दिया है। इसीलिए, वह गैरकांग्रेस-गैरभाजपा विपक्ष को एकजुट कर अपनी अहमियत गाहे-बगाहे बनाए रखती है। सपा और बसपा : उत्तर प्रदेश में 2012 के विधानसभा चुनाव सपा के लिए सबसे बड़ी अग्नि परीक्षा साबित होंगे। 2004 2009 के लोकसभा चुनाव में यूपी में सबसे बड़ा दल बन कर उभरने के बावजूद सपा केंद्र में अपनी भूमिका तलाशती ही रही है। 2007 में विधानसभा चुनाव हारने के बाद से सपा के लिए 2010 में भी अच्छी खबरें नहीं आईं। बसपा व कांग्रेस ने मुलायम सिंह के गढ़ में उनके वोट बैंक में सेंध लगा दी है। बसपा के सत्तासीन होने के बावजूद सत्ता विरोधी माहौल का भी सपा लाभ नहीं ले पा रही है। शायद यही वजह है कि मुलायम सिंह ने लोकसभा चुनाव के बाद कल्याण सिंह और बाद में कल्याण को सपा में लाने वाले अमर सिंह से भी रिश्ते तोड़ लिए। अब मुलायम अपने बिछड़े साथियों की घर वापसी के लिए हर कसरत में जुटे हैं। आजम खां ठाठ-बाट के साथ सपा में लौटे भी हैं। सपा की पूरी कसरत यादव-मुस्लिम जनाधार को फिर से एकजुट करने की है। अयोध्या में राम मंदिर के पक्ष में हाईकोर्ट का फैसला आने पर मुलायम की प्रतिक्रिया भी मुस्लिम वोटबैंक के मद्देनजर ही थी। राज्य और केंद्र, दोनों ही स्तरों पर किसी भी सूरत में बसपा का हाथ कांग्रेस से न मिल सके, मुलायम की पहली प्राथमिकता यह है। शायद यही वजह है कि केंद्र में एक-आध मुद्दों को छोड़कर सपा किसी सरकार विरोधी मुहिम में शामिल नहीं होती। बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों ने बसपा को थोड़ा चिंतित किया है, लेकिन उत्तर प्रदेश में कमजोर सपा, कांग्रेस और भाजपा उसके लिए कोई चुनौती नहीं खड़ा कर पा रही हैं। बिहार में कांग्रेस की करारी हार ने जहां एक तरफ बसपा को खुश होने का कारण दिया है, वहीं सचेत भी किया है कि केवल वोट बंैक नहीं प्रदेश में विकास भी एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है। मायावती को यह मालूम है कि केवल लखनऊ में ही विकास दिखने से काम नहीं चलने वाला। राजद और लोजपा : बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश व भाजपा की आंधी ने राजद और लोजपा का सूपड़ा ही साफ कर दिया है। राजद की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी दोनों विधानसभा क्षेत्रों में बुरी तरह हारी हैं तो इधर लोजपा नेता रामविलास पासवान भी अपने भाई की हार से बेचैन हैं। जनाधार की जमीन खिसकने के चलते अब राजद लोजपा के भीतर आंतरिक कलह और दोषारोपण चरम पर है। फिलहाल उनके पास 2014 के लोकसभा अथवा 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के पहले करने को कुछ नहीं है। लिहाजा, संभावित तीसरे मोर्चे में ही अपनी अहमियत तलाशने की कोशिश कर रहे हैं। अन्नाद्रमुक : तमिलनाडु में डीएमके के 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले ने अन्नाद्रमुक को राज्य में खाद और पानी खुद ही दे दिया है। 2011 के विधानसभा चुनाव को जयललिता राज्य में खोई सत्ता पाने के एक अवसर के तौर पर देख रही हैं। राज्य में भ्रष्टाचार के प्रतीक बन गए ए. राजा ही नहीं खुद करुणानिधि के परिवार के बीच चल रही विरासत की जंग ने भी जयललिता की संभावनाओं को बल दिया है। तमिलनाडु का चुनावी रसायन भी कुछ ऐसा रहा है कि द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच सत्ता का हस्तांतरण होता रहा है। इसी तथ्य के मद्देनजर जयललिता तब तक ही तीसरे मोर्चे के दलों के साथ खड़ी हैं, जब तक कि कांग्रेस उनकी तरफ हाथ नहीं बढ़ा देती। तेदेपा : आंध्र में वाईएसआर की विरासत के लिए चल रही कांग्रेस की जंग ने प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू के लिए राह थोड़ी आसान की है। किसानों के हित के लिए आमरण अनशन पर बैठकर चंद्रबाबू ने वामदलों, जगन और तेलंगाना नेताओं की सहानुभूति भी अपने साथ जोड़ ली है। उन्हें लग रहा है कि किसान आंदोलन, तेलंगाना मूवमेंट और उनकी अपनी राजनीतिक जमीन एकजुट हो जाए तो वह कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभर सकते हैं। यह राह इतनी आसान नहीं है, क्योंकि वाईएसआर की विरासत पाने के लिए जगन के तेवर सातवें आसमान पर हैं। वह राज्य में कांग्रेस लिए एक खतरा तो बन गए हैं लेकिन चंद्रबाबू और जगन की महत्वाकांक्षाएं दोनों को साथ नहीं मिलने देंगी। इनके अलावा अन्य छोटे क्षेत्रीय दल अपनी सुविधा और अपने सियासी स्वार्थो के मद्देनजर केंद्र और राज्य में अपना सहयोगी चुनते रहते हैं। (लेखक दैनिक जागरण के राजनीतिक संपादक हैं)

विश्वास घटाने वाला वर्ष

समय अविभाज्य सत्ता है। यह अच्छा या बुरा नहीं होता, लेकिन वर्ष 2010 पर बड़े अभियोग हैं कि यह घोटालों और घोटालेबाजों का वर्ष रहा। पहले आइपीएल में ललित मोदी और शशि थरूर की विदाई हुई, हंगामा हुआ। शोर थमा कि जनता की गाढ़ी कमाई का राजकोषीय कामनवेल्थ भ्रष्टाचार में लुट गया। भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम हो गया। आदर्श घोटाले ने अनेक वर्गों को समेट लिया। फिर टू जी स्पेक्ट्रम की सर्चलाइट प्रधानमंत्री कार्यालय तक जा पहुंची। विद्वान प्रधानमंत्री भी जिम्मेदारी से कतराते रहे। समूचा राजनीतिक तंत्र भ्रष्टाचार के आरोपों में आया। राष्ट्रजीवन के लिए एक वर्ष का समय बहुत मूल्यवान नहीं होता, लेकिन सत्ता का एक वर्ष संपूर्ण कार्यकाल का पांचवां हिस्सा होता है। राजनीति वैसे भी अल्पकालिक खेल होती है। राजनीतिक तंत्र बीते एक साल के भीतर ही पतन की ढेर सारी सीढि़यां नीचे उतर गया। नीरा राडिया और वरिष्ठ राजनेताओं व उद्योगपतियों के बीच हुई बातचीत के खुलासों ने देश की छवि को बट्टा लगाया। मंत्रियों की नियुक्ति में भी उद्योग जगत के प्रभाव का पता पहली दफा लगा। एक वरिष्ठ औद्योगिक समूह ने सुप्रीम कोर्ट में निजता के अधिकार के उल्लंघन का दावा ठोंका। उद्योग जगत की नाराजगी से सहमे प्रधानमंत्री को सफाई देनी पड़ी कि राष्ट्रीय आवश्यकता के अनुरूप ही फोन टेप हुए। वर्ष 2010 सत्ता के गैर जिम्मेदार चरित्र का आईना है। नक्सली पूरे वर्ष सुरक्षाबलों और निर्दोषों का वध करते रहे। केंद्र कोई ठोस कार्ययोजना नहीं बना पाया। कांग्रेस के एक राष्ट्रीय महामंत्री ही गृहमंत्री की कार्ययोजना के विरोधी रहे। पुणे की जर्मन बेकरी व वाराणसी के बम विस्फोटों ने पूरे देश को दहलाया। नक्सली हिंसा और आतंकवाद की हरेक घटना पर केंद्र ने राज्यों को दोषी ठहराया। राज्यों ने केंद्र पर दोष मढ़ा। झारखंड की राजनीति ने सामान्य नैतिक नियम तोड़े, तेलगांना विवाद पूरे साल गरम रहा। गुर्जर आरक्षण आंदोलन ने फिर से हमलावर रुख अपनाया। औद्योगिक घरानों को कृषि योग्य जमीन देने की यूपी सरकार की कार्रवाई से किसान आगरा-मथुरा में आंदोलन भड़का, किसानों पर गोली भी चली। राज्य में 300 से ज्यादा ब्लाक प्रमुख सीटों पर सत्तादल ने बाहुबल-पुलिसबल के इस्तेमाल से चुनावी नामांकन रोका। यूपी सरकार ने भी केंद्र की ही तरह भ्रष्टाचार को संस्थागत बनाया। बेशक 2010 ने विपक्ष को ढेर सारे मुद्दे दिए, भ्रष्टाचार, कुशासन, गरीबी, भुखमरी, महंगाई, किसान हताशा, कश्मीर और राष्ट्रीय एकता जैसे मुद्दों पर विपक्ष व्यापक जनसंघर्ष कर सकता था, लेकिन विपक्ष ने इक्का-दुक्का आंदोलन छोड़ निपट संसदीय मार्ग ही अपनाया। संसद में गतिरोध रहा, सरकार जवाबदेही से बची। कांग्रेस के लिए यह वर्ष बहुत बुरा रहा। घोटालों ने इसे किसी लायक नहीं छोड़ा। भोपाल गैस कांड फिर से उछला, मुख्य अभियुक्त को सरकारी सुरक्षा में भगाने की पोल खुली। शत्रु संपत्ति कानून को लेकर कांग्रेस का सांप्रदायिक चेहरा बेनकाब हुआ। विकिलीक्स खुलासे में भी अमेरिकी विदेश मंत्री द्वारा कांग्रेस पर सांप्रदायिक राजनीति का आरोप लगा। कांग्रेस को बधाई कि वह 125 बरस की हो गई। कांग्रेस महाधिवेशन ने विश्वव्यापी पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद, जानलेवा महंगाई और एक-तिहाई भारत में छाई नक्सली हिंसा पर कोई संकल्प नहीं लिया। गृहमंत्री ने भारतीय संस्कृति के प्रतीक भगवा को आतंकवाद से जोड़ा। एक महासचिव ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लश्करे-तैयबा जैसा बताया, दूसरे ने हिंदू संगठनों को आतंकवादी बताया। देश कांग्रेस से नाराज हुआ। देश आंकड़ों से नहीं चलता। महंगाई आसमान पर पहुंची, केंद्र ने आंकड़े दिए कि घट रही है। प्याज से आंख में आंसू हैं, सरकार मस्त है। हजारों किसानों ने आत्महत्या की, केंद्र विकास दर में उछाल बताता है। पीने को पानी नहीं, गरीब को दवा नहीं, शिक्षा और रोटी नहीं, लेकिन सरकारी आंकड़ों में अर्थव्यवस्था में उछाल है। आवश्यक वस्तु वितरण की प्रणाली इस वर्ष और भी चौपट हो गई, मनरेगा का भ्रष्टाचार सिर पर चढ़ गया। भुखमरी से आजिज सुप्रीम कोर्ट ने गोदामों में सड़ रहे गेहूं को गरीबों में बांटने का निर्देश दिया, लेकिन सरकार नहीं चेती। प्रदूषण, पर्यावरण, नदी जल संरक्षण और भ्रष्टाचार से जुड़े मसलों सहित अनेक मुद्दों पर न्यायपालिका ने भरोसा जगाया, लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट में कुछ सड़ रहा है की टिप्पणी और कतिपय न्यायमूर्तियों पर लगे आरोपों ने निराश किया। श्रीराम जन्मभूमि फैसले का स्वागत सारे देश ने किया। इसी बरस राष्ट्रजीवन में बहुत कुछ शुभ भी घटित हुआ है। बिहार चुनाव ने जागृत जनशक्ति का परिचय दिया है। राष्ट्रवाद बढ़ा है। भारत के प्रति विश्व का आकर्षण भी बढ़ा है। इसी बरस कई राष्ट्रों के राजप्रमुख भारत आए। 2011 से नवसृजन की उम्मीदें हैं। गत को विदाई, आगत का स्वागत। (लेखक उप्र विधान परिषद के सदस्य हैं)

ईमानदार प्रत्याशी उतारेंगे 2012 में

आगरा/ हाथरस : गांव चलो अभियान की चौपाल के दूसरे दिन भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह केंद्र सरकार पर जमकर बरसे। टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले पर कांगे्रस को घेरा और भगवा आतंकवाद के मुद्दे पर राहुल गांधी पर निशाना साधा। उन्होंने कहा, टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले में सरकार को संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के सामने पेश होना ही होगा। भगवा आतंकवाद पर राजनाथ ने कहा कि यदि भगवा आतंकवाद है और आरएसएस इसमें शामिल है तो मुझे ये बताएं कि फिर देश भक्त कौन है। राहुल गांधी के इस बयान ने सीधे पाकिस्तान को फायदा पहुंचाया है, जिसकी जांच होना चाहिए। हाथरस में राजनाथ ने लोगों से वादा किया है कि 2012 के विधान सभा चुनाव में वह ईमानदार प्रत्याशी उतारेंगे। भाजपा के चलो गांव की ओर कार्यक्रम के तहत वह गुरुवार को जिले में पहुंचे थे। उन्होंने हाथरस जंक्शन के गांव बघराया में जन पंचायत की। बीते सप्ताह जिले के सिकंदराराऊ में दलित युवक की हत्या कर सिर गायब कर दिए जाने के मामले में कहा कि लानत है ऐसी हुकूमत पर। सीएम को खुद नैतिकता के आधार पर गद्दी छोड़ देनी चाहिए। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस को घेरते हुए कहा कि टूजी स्पेक्ट्रम और कॉमनवेल्थ गेम्स के नाम पर ही ढाई लाख करोड़ से ज्यादा का घोटाला किया गया