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Sunday, May 15, 2011

मिथक तोड़ने वाला जनादेश


लेखक पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों में जो सबक छिपे हैं उन्हें रेखांकित कर रहे हैं
कुछ भी अप्रत्याशित नहीं घटा। इन चुनावों के नतीजे कमोबेश दीवार पर लिखी इबारत की तरह देश पढ़ रहा था। पांच राज्यों का यह जनादेश चुनावी नतीजों के नजरिये से उठा-पठक वाला, नाटकीय और उत्तेजक नहीं है, लेकिन उत्साहव‌र्द्धक और सभी राजनीतिक दलों के लिए बड़ा सबक है। क्रमश: पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के मतदाताओं ने अपने उत्साह से धधकते सूरज को भी पानी-पानी कर दिया और आजादी के बाद से अब तक के मतदान का रिकार्ड ही तोड़ दिया। नतीजों से भी ये मिथक टूटे कि वामपंथियों का दुर्ग अभेद्य है और तमिलनाडु में भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं। इन दोनों राज्यों के अलावा असम, केरल और पुद्दुचेरी में भी मतप्रतिशत बढ़ा है। सबसे सराहनीय तो यह है कि इस ऐतिहासिक उत्साह के पीछे कोई जातिवादी या सांप्रदायिक उन्माद नहीं था। केवल परिवर्तन की प्रबल भावना प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से काम कर रही थी। निश्चित तौर पर इस रिकार्डतोड़ मतदान के पीछे महिलाओं और पहली बार मतदाता बनी नौजवान पीढ़ी के उत्साह को सलाम करना होगा। जिस तरह तमिलनाडु में भारी मात्रा में अवैध धन की बरामदगी हुई थी उसके बाद नतीजों को लेकर संशय उठे, लेकिन उन सबको जनता ने जिस तरह नकारा है उससे एक अच्छा संदेश पूरे देश में गया है। धीरे-धीरे हमारे चुनाव कम खर्चीले होते जा रहे हैं और उनमें जातिवाद, परिवारवाद और सांप्रदायकितावाद की जगह विकास-विमर्श प्रभावी होता जा रहा है। इससे जनतंत्र की जड़ें जरूर मजबूत होंगी। यह भी एक संयोग है कि चार साल पहले 13 मई को ही उत्तर प्रदेश में मायावती सत्तासीन हुई थीं। लगभग उसी तरह के माहौल में ममता और जयललिता सत्तारूढ़ हो रही हैं। महत्वपूर्ण बात यह नहींकि दोनों राज्यों में सत्तारूढ़ होने वाली दोनों महिलाएं हैं, बल्कि अहम यह है कि ये तीनों ही महिलायें स्वतंत्र रूप से अपने बलबूते राजनीति के इस मुकाम तक पहुंची हैं। इनकी सफलता के पीछे पति, पिता, परिवार या अन्य किसी बाहरी कारक का योगदान नहीं है। पश्चिम बंगाल में तो ममता के लिए जिस तरह की अभद्र भाषा का प्रयोग शीर्ष वाम नेताओं ने किया वह शायद बंगाली भद्रलोक को ही नहीं, बल्कि वहां के सामान्य जन को भी यह नहीं भाया। इन चुनाव नतीजों ने वामदलों की इस तरह की निंदनीय पुरुष प्रभुत्ववादी प्रवृत्ति पर जबर्दस्त प्रहार किया है। अजीब विरोधाभास यह भी है कि इन परिणामों से एक ओर संप्रग सरकार और अधिक सुदृढ़ होकर उभरी है, वहींउसकी परेशानियां भी बढ़ने के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं। चुनाव नतीजों ने तात्कालिक तौर पर घोटालों और भ्रष्टाचार के दलदल में फंसी कांग्रेस और संप्रग को तात्कालिक राहत दी है, लेकिन दीर्घकालिक दृष्टि से इन नतीजों में कांग्रेस के पराभव के संकेत छिपे हैं। इन नतीजों को अगर गौर से देखें तो असम के अलावा कांग्रेस कहींभी अपनी स्वतंत्र हैसियत को मजबूत नहीं कर सकी। असम अपवाद जरूर है, जहां तीसरी बार कांग्रेस ने सत्ता हासिल की है। पिछले चार दशकों की राजनीति पर अगर नजर डालें तो कांग्रेस के राष्ट्रव्यापी स्वरूप में लगातार राज्यवार कमी आ रही है। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में कांग्रेस के पास राज्य में कोई जनाधार वाला प्रादेशिक नेता ही नहीं है। कांग्रेस की दिल्लीपरस्त राजनीति का यह दुखद पहलू सामने आ रहा है कि अब बड़े राज्यों में कांग्रेस छोटे दलों की पिछलग्गू बनने को मजबूर हो गई है। यहां तक कि केरल में भी अब कांग्रेस को इंडियन मुस्लिम लीग के दबाव में अपनी सीटें कम करनी पड़ रही हैं। केरल में यूडीएफ को हांफते-हांफते मिली जीत केवल चुनावी गणित की पराजय का संकेत नहीं, बल्कि उसके लगातार कम होते इकबाल पर मुहर है। दक्षिण में कांग्रेस के सबसे मजबूत प्रदेश आंध्र प्रदेश के उपचुनावों से आई खबर भी पार्टी के लिए खतरे की घंटी है। दूसरी तरफ, इन चुनाव नतीजों ने ढाई प्रदेशों में दबदबा रखने वाले वाम दलों को उसके राजनीतिक इतिहास के सबसे बुरे दौर में धकेल दिया है। पश्चिम बंगाल और केरल, दोनों राज्यों में वाम दलों को सत्ता से बाहर होना पड़ा है। पश्चिम बंगाल में तो 34 साल बाद पहली बार वाम दल राइटर्स बिल्डिंग से बडे़ बेआबरू होकर निकले। हालांकि, केरल की राजनीति का रसायन हर पांच साल बाद समीकरण बदलता रहता है। केरल में एलडीएफ की पराजय चुनावी गणित की गड़बड़ी की ओर संकेत ही नहीं करती, बल्कि यह वामपंथ के नैतिक पतन का भी द्योतक है। पश्चिम बंगाल में सत्ता से बाहर न होने का अहं और केरल में माकपा का लौह अनुशासन भी इस बार चकनाचूर हुआ है। दोनों ही राज्यों के मुख्यमंत्रियों से माकपा महासचिव प्रकाश करात की रस्साकशी किसी से छिपी नहीं रही। केरल में तो पिछले चुनाव में अच्युतानंदन और विजयन या दूसरे शब्दों में कहें तो सरकार और संगठन का झगड़ा अस्थायी या अपवाद जैसा दिख रहा था, लेकिन वह अब केरल के वामदलों की अनुशासनहीनता का प्रामाणिक प्रतीक बन गया है। आश्चर्य की बात है कि माकपा के राष्ट्रीय नेताओं ने एक बार फिर वीएस अच्युतानंदन को इन चुनावों में दरकिनार कर दिया, जबकि उन्हें यह भली-भांति मालूम था कि अपनी ईमानदार छवि के कारण केवल वीएस ही एलडीएफ की चुनावी नाव को पार करा सकते हैं। यह पराजय एक प्रकार से वामदलों में कांग्रेस जैसी बीमारी होने का संकेत दे रही है। ठीक कांग्रेस की तरह माकपा ने भी यह भ्रम पाल लिया है कि दिल्ली से रिमोट के जरिये ही राज्यों पर अपना नियंत्रण रखा जा सकता है। इन नतीजों, खासतौर से पश्चिम बंगाल और केरल में मुस्लिम मतदाताओं के रुझान से आशा के साथ एक आशंका भी उपजी है। कहीं इससे अल्पसंख्यक आक्रामकता या अलगाववाद को हवा तो नहीं मिलेगी। केरल में मुस्लिम लीग जहां लगातार ताकतवर हो रही है, वहीं कांग्रेस के भीतर भी अल्पसंख्यक धड़े का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। वैसे भी केरल संभवत: अकेला राज्य होगा जहां हर सार्वजनिक संस्था को जाति व धर्म के आधार पर शत-प्रतिशत बांट दिया जाता है। असम में भी कम चिंताजनक स्थिति नहीं है। असम यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट हाशिये से चलकर अब मुख्य विपक्षी दल बन गया है। इतना ही नहीं ताकतवर क्षेत्रीय दल असम गण परिषद का दायरा सिमटता जा रहा है। वहीं ममता बनर्जी का भी अल्पसंख्यक प्रेम किसी से छिपा नहीं है। बात करें तमिलनाडु की तो कांग्रेस यहां गठबंधन की हार के बावजूद राहत की सांस ले सकती है। जयललिता की प्रचंड जीत के बाद अब द्रमुक पूरी तरह से कांग्रेस पर आश्रित हो गई है। दिल्ली से चेन्नई में डेरा डाले सभी राजनीतिक विश्लेषक यह मान रहे थे कि तमिलनाडु में परिवारवाद या भ्रष्टाचार सिर्फ शहरी इलाकों का ही मुद्दा है, लेकिन जनता ने उन्हें गलत साबित कर दिया। (लेखक दैनिक जागरण के राजनीतिक संपादक हैं)


Tuesday, March 15, 2011

लाल दुर्ग की दरकती दीवारें


पश्चिम बंगाल और केरल में वामपंथी वर्चस्व समाप्त होने के संकेतों का विश्लेषण कर रहे हैं  लेखक 
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले ही वामपंथी दलों में दिख रही हड़बड़ाहट इस बात का साफ संकेत है कि 35 साल पुराना किला ढहने के कगार पर है। पहले 2009 के लोकसभा चुनाव और फिर 2010 में स्थानीय निकाय के चुनावी नतीजे लगातार वामपंथी जमीन खिसकने की मुनादी पीट रहे हैं। शायद सत्ता विरोधी लहरों के इन संकेतों को समझते हुए ही पश्चिम बंगाल में वामपंथियों ने अपने 9 मंत्रियों समेत 149 विधायकों को दोबारा टिकट नहीं दिया है। वामपंथियों के दूसरे गढ़ केरल से भी उनके लिए लगातार डराने वाली खबरें आ रही हैं। साढ़े तीन दशक तक राइटर्स बिल्डिंग पर लाल परचम लहरा रहा था जो कि दुनिया के जनतांत्रिक इतिहास में एक असाधारण घटना मानी जा सकती है। इस लिहाज से अगर वाम मोर्चा पराजित हुआ तो यह असाधारण राजनीतिक घटना ही होगी। वास्तव में अगर वाम मोर्चा हारता है तो उसके लिए यह सब कुछ खत्म होने जैसा नहीं, बल्कि पार्टी के वजूद पर जम चुकी एकरसता की केंचुल उतार फेंकने का मौका होगा। शायद ईमानदारी से आत्ममंथन करने का अवसर उसे विपक्षी खेमे में ही बैठकर मिल सकेगा। साढ़े तीन दशक तक सत्ता में रहने के कारण उसमें स्वाभाविक तौर पर अगर मा‌र्क्सवादी शब्दावली में कहें तो पेटी बुर्जुआ यानी लुंपन वर्ग घुस गया है। सत्ता के साथ जुड़ने वाला यह तत्व भी विपक्ष में जाने पर अपने आप ही छंटने की कोशिश करेगा। साथ ही लगातार सत्ता में रहने का दंभ और विचारधारा में लगी जंग धोने का भी संभवत: वामपंथियों को माकूल वक्त मिले। सबसे दिलचस्प यह देखना होगा कि ममता बनर्जी अगर सत्ता में आईं तो मां, माटी और मानुष नारे की अतिवादी सच्चाई भी जमीन पर किस तरह आती है। ममता ने वाममोर्चे को बेदखल करने के लिए उनके ही पैदा किए हुए भस्मासुरों यानी माओवादियों से हाथ मिलाया है। अभी इसका विरोधाभास बहुत खुलकर नहीं दिख रहा है। जाहिर तौर पर सत्ता में आने के बाद यह वर्ग ममता से अपने समर्थन की पूरी कीमत वसूलेगा। ऐसे में ममता के सत्तारोहण में आशाओं के साथ आशंकाएं भी कम नहीं हैं। नक्सलवाद कोई मामूली कीमत लेकर सत्ता छोड़ने वाली विचारधारा नहीं है। उसके पूरे एजेंडे की भयावहता से अभी पूरी तरह लोग परिचित नहीं हैं। इसे कोई भी जनतांत्रिक व्यवस्था सौैदेबाजी करके शांत नहीं कर सकती। जिस पुलिस संत्रास विरोधी समिति ने डंके की चोट पर ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस जैसी ट्रेनों को विस्फोटों से उड़ा दिया था, ममता उसी रेल विभाग की मंत्री भी हैं। इसके बावजूद तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष इन अतिवादियों का नाम तक लेने का साहस नहीं दिखा सकीं। यदि वामपंथियों का किला ढहता है तो वह यह सोचने के लिए विवश होंगे कि साढ़े तीन दशक तक शासन में रहने के बाद भी बंगाल को कोई ठोस नतीजे क्यों नहीं दे पाए? वाम मोर्चे के बड़े नेता भी अपनी उपलब्धियों में ले देकर आपरेशन बर्गा यानी भूमि सुधार आंदोलन ही गिनाते रहे हैं। भूमि सुधार भी बड़े किसानों से छोटे किसानों और भूमिहीनों से मजदूरों तक नहीं पहुंचा। सुधार के इसी खोखलेपन की वजह से ही माकपा का ग्रामीण गढ़ नक्सलियों की घुसपैठ से भरभरा चुका है। माकपाई महिमामंडन से हटकर देखें तो वास्तव में वामपंथी शासन भी भद्रलोक का ही शासन है। जिनमें सिर्फ दिखावे के लिए कांग्रेस की जगह वामपंथी शब्दावली गढ़ ली गई। बंगाल में आदिवासियों, भूमिहीनों, सीमांत किसानों और यहां तक कि गोरखाओं और मुस्लिमों को भी कांग्रेस अथवा वामपंथी शासन में कोई फर्क नहीं दिखता। पश्चिम बंगाल के बड़े नेताओं में इन वंचित वर्गो का शायद ही कोई नुमाइंदा हो। वामपंथी शासन भी केवल इन वर्गो के हितों का ढोंग ही करता रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में वामपंथी शासन की इसी असफलता के साथ ही उनकी औद्योगीकरण की नीति भी असफल दिख रही है। ब्रितानी हुकूमत के दौरान बंगाल में औद्योगिक ढांचा बनने से पहले ही उसे तोड़ना शुरू कर दिया था। वाम मोर्चे ने शायद उसी प्रक्रिया को पूरा किया है। शिक्षा और सरकारी सेवा में बढ़त की वजह से बंगाल का यह दुर्भाग्य दब सा गया था, लेकिन अब यह सतह पर है। वाम शासन की ट्रेड यूनियन और चोलबे न की उनकी नीति का ही नतीजा है कि पश्चिम बंगाल विकास की दौड़ में देश के दूसरे राज्यों की तुलना में फिसड्डी रह गया है। बुद्धदेव बाबू ने बुझते दीये की आखिरी लौ की तरह कृत्रिम तेजी दिखाई तो अपने ही गढ़ में आग लगा बैठे। सिंगुर और नंदीग्राम में औद्योगिक ढांचा खड़ा करने की हताश कोशिश में वह अपनी ही पार्टी की विचारधारा और नीति से भटक गए। औद्योगीकरण के नाम पर जिस तरह अनावश्यक रूप से बड़ी संख्या में लोगों को जमीन से बेदखल किया गया और उपजाऊ व शहरों के पास की महंगी जमीन औद्योगिक घरानों को देने की कोशिश की गई वह अब माकपाइयों के लिए स्थायी सिरदर्द बन गई है। वाम मोर्चा फिलहाल अपने राजनीतिक इतिहास में विचारधारा, नीतियों और नीयत पर सबसे करारे हमले झेल रहा है। ऐसे में काडर आधारित इस संगठन को इन हमलों से उसकी एकजुटता और आपसी भरोसा ही बचा सकता था, लेकिन हो बिल्कुल उल्टा रहा है। राष्ट्रीय स्तर से लेकर बंगाल और केरल में दोनों ही जगह पार्टियों को नेतृत्व और संगठन की समस्या से भी दो-चार होना पड़ रहा है। बंगाल में ज्योति बाबू के चमत्कारिक व्यक्तित्व के आगे माकपा की ये सांगठनिक कमी छिप गई थी। केरल में तो स्थिति बेहद शर्मनाक है। यहां मुख्यमंत्री अच्युतानंदन ने केवल प्रादेशिक संगठन को ही नहीं, राष्ट्रीय नेतृत्व को भी बुरी तरह अपमानित किया है। यह कितनी राजनीतिक असहज स्थिति है कि जिस व्यक्ति को विधानसभा के टिकट लायक नहीं समझा गया, पोलित ब्यूरो से निकाला गया, वह व्यक्ति उसी पार्टी से मुख्यमंत्री बना बैठा है। पश्चिम बंगाल और केरल में असफलता के लिए प्रादेशिक नेतृत्व तो जिम्मेदार है ही, सबसे बड़ी असफलता केंद्रीय नेतृत्व की है। माकपा महासचिव प्रकाश करात के किताबी क्रांतिकारी नेतृत्व ने इस काडर आधारित पार्टी की जमीन को बंजर ही बनाया है। वैसे भी बंगाल में वामपंथियों के सत्ता में बने रहने का सबसे बड़ा कारण यह कि वे दिल्ली में कांग्रेस को समर्थन देकर राज्य में उससे परोक्ष समर्थन हासिल कर लेते थे। कांग्रेस आलाकमान केंद्र के इस लाभ के लिए प्रादेशिक इकाई को दांव पर लगाता रहा है। शायद इसीलिए ममता बनर्जी कुछ साल पहले तक प्रदेश कांग्रेस संगठन को तरबूज कहा करती थीं। तरबूज यानी जो ऊपर से हरा है, लेकिन अंदर से लाल है। करात ने अरसे से चली आ रहे इस तरबूजी गठजोड़ को उग्र अमेरिका विरोध के कारण केंद्र से समर्थन वापस लेकर तोड़ दिया। ममता और कांग्रेस का यह गठबंधन उसी फैसले का नतीजा है। अब चुनावी नतीजों पर इस फैसले का क्या असर होगा, यह वक्त बताएगा। (लेखक दैनिक जागरण के राजनीतिक संपादक हैं)

Saturday, January 1, 2011

बिखरने के लिए बनता मोर्चा

लेखक क्षेत्रीय दलों के कथित तीसरे-चौथे मोर्चे की राजनीतिक जमीन पर निगाह डाल रहे हैं
प्रादेशिक-राजनीतिक हित और अवसरवाद तीसरे मोर्चे को कभी मुकम्मल शक्ल ही नहीं लेने देते। अलग-अलग मौकों पर तार-तार हो चुकी तीसरे मोर्चे की शक्ल जेपीसी के मुद्दे पर एक बार फिर आकार लेती दिख रही है। सेक्युलर विपक्ष के रूप में तीसरे मोर्चे के इस नए अवतार की उम्र कितनी होगी, यह भविष्य बताएगा, लेकिन एक बात तो तय है कि जब तक केंद्र में सत्ता के बंटवारे का कोई अवसर नहीं आता तब तक इसकी एकता की कोई गारंटी नहीं है। प्राय: सभी क्षेत्रीय दलों की अपनी-अपनी स्थानीय वोटबैंक की मजबूरी और सियासी समीकरण हैं, जो उन्हें स्थायी भाव नहीं लेने देते। दरअसल, क्षेत्रीय दलों की राजनीति का जन्म जिस बुनियाद पर हुआ है उसमें यह लाजिमी भी है। राष्ट्रीय दलों की मनमानी ने ही क्षेत्रीय भावनाओं को प्रस्फुटन का मौका दिया है। 1960 के दशक में स्थानीय क्षत्रपों में उपजे आक्रोश और आजादी के लिए लड़ने या उसे समर्थन देने वाली पीढ़ी के धीरे-धीरे कम होने के साथ ही क्षेत्रीयता की भावना भी अपने पैर जमाती गई। 1970 और फिर 1980-90 के दशकों में इन क्षेत्रीय दलों ने एक मंच पर जाकर कांग्रेस को किनारे करने में थोड़ी सफलता भी पाई। मगर यह नाजुक एकता हर बार अलग-अलग मुद्दों पर दिल्ली में ही दिखाई दी। वक्ती तौर पर ही सही जेपीसी के मामले में फिलहाल वे एक मंच पर नजर आ रहे हैं, लेकिन उससे भी सपा दूर ही है। इसीलिए कहा भी जाता है कि तीसरा मोर्चा बनता ही है बिखरने के लिए! एक नजर तीसरे मोर्चे की ताकतों पर- वाम मोर्चा : 2009 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने लाल दुर्ग के कंगूरे को तोड़कर वाम मोर्चे के लिए खतरे की घंटी पहले ही बजा दी है। रही-सही कसर 2010 में स्थानीय निकाय के चुनाव में ममता-कांग्रेस ने वामदलों का सूपड़ा साफ कर पूरी कर दी। वाम दलों के लिए केरल से भी बुरी खबर है। स्थानीय निकाय के चुनाव में वाम मोर्चा वहां भी खेत रहा है। अभी असली परीक्षा 2011 में पश्चिम बंगाल और केरल के विधानसभा चुनावों में होनी है। पश्चिम बंगाल में ममता की आंधी से 35 साल पुराने वामपंथी शासन के पैर राइटर्स बिल्डिंग से उखड़ते नजर आ रहे हैं। ऐसे में वाम मोर्चे की पहली चुनौती माकपा, भाकपा, फॉरवर्ड ब्लॉक समेत पूरे कुनबे को समेट कर रखने की है। इन्हीं हालात ने केरल और पश्चिम बंगाल के माकपा नेताओं को अपनी ऐतिहासिक अदावत भी भुलाने को मजबूर कर दिया है। इसीलिए, वह गैरकांग्रेस-गैरभाजपा विपक्ष को एकजुट कर अपनी अहमियत गाहे-बगाहे बनाए रखती है। सपा और बसपा : उत्तर प्रदेश में 2012 के विधानसभा चुनाव सपा के लिए सबसे बड़ी अग्नि परीक्षा साबित होंगे। 2004 2009 के लोकसभा चुनाव में यूपी में सबसे बड़ा दल बन कर उभरने के बावजूद सपा केंद्र में अपनी भूमिका तलाशती ही रही है। 2007 में विधानसभा चुनाव हारने के बाद से सपा के लिए 2010 में भी अच्छी खबरें नहीं आईं। बसपा व कांग्रेस ने मुलायम सिंह के गढ़ में उनके वोट बैंक में सेंध लगा दी है। बसपा के सत्तासीन होने के बावजूद सत्ता विरोधी माहौल का भी सपा लाभ नहीं ले पा रही है। शायद यही वजह है कि मुलायम सिंह ने लोकसभा चुनाव के बाद कल्याण सिंह और बाद में कल्याण को सपा में लाने वाले अमर सिंह से भी रिश्ते तोड़ लिए। अब मुलायम अपने बिछड़े साथियों की घर वापसी के लिए हर कसरत में जुटे हैं। आजम खां ठाठ-बाट के साथ सपा में लौटे भी हैं। सपा की पूरी कसरत यादव-मुस्लिम जनाधार को फिर से एकजुट करने की है। अयोध्या में राम मंदिर के पक्ष में हाईकोर्ट का फैसला आने पर मुलायम की प्रतिक्रिया भी मुस्लिम वोटबैंक के मद्देनजर ही थी। राज्य और केंद्र, दोनों ही स्तरों पर किसी भी सूरत में बसपा का हाथ कांग्रेस से न मिल सके, मुलायम की पहली प्राथमिकता यह है। शायद यही वजह है कि केंद्र में एक-आध मुद्दों को छोड़कर सपा किसी सरकार विरोधी मुहिम में शामिल नहीं होती। बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों ने बसपा को थोड़ा चिंतित किया है, लेकिन उत्तर प्रदेश में कमजोर सपा, कांग्रेस और भाजपा उसके लिए कोई चुनौती नहीं खड़ा कर पा रही हैं। बिहार में कांग्रेस की करारी हार ने जहां एक तरफ बसपा को खुश होने का कारण दिया है, वहीं सचेत भी किया है कि केवल वोट बंैक नहीं प्रदेश में विकास भी एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है। मायावती को यह मालूम है कि केवल लखनऊ में ही विकास दिखने से काम नहीं चलने वाला। राजद और लोजपा : बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश व भाजपा की आंधी ने राजद और लोजपा का सूपड़ा ही साफ कर दिया है। राजद की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी दोनों विधानसभा क्षेत्रों में बुरी तरह हारी हैं तो इधर लोजपा नेता रामविलास पासवान भी अपने भाई की हार से बेचैन हैं। जनाधार की जमीन खिसकने के चलते अब राजद लोजपा के भीतर आंतरिक कलह और दोषारोपण चरम पर है। फिलहाल उनके पास 2014 के लोकसभा अथवा 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के पहले करने को कुछ नहीं है। लिहाजा, संभावित तीसरे मोर्चे में ही अपनी अहमियत तलाशने की कोशिश कर रहे हैं। अन्नाद्रमुक : तमिलनाडु में डीएमके के 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले ने अन्नाद्रमुक को राज्य में खाद और पानी खुद ही दे दिया है। 2011 के विधानसभा चुनाव को जयललिता राज्य में खोई सत्ता पाने के एक अवसर के तौर पर देख रही हैं। राज्य में भ्रष्टाचार के प्रतीक बन गए ए. राजा ही नहीं खुद करुणानिधि के परिवार के बीच चल रही विरासत की जंग ने भी जयललिता की संभावनाओं को बल दिया है। तमिलनाडु का चुनावी रसायन भी कुछ ऐसा रहा है कि द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच सत्ता का हस्तांतरण होता रहा है। इसी तथ्य के मद्देनजर जयललिता तब तक ही तीसरे मोर्चे के दलों के साथ खड़ी हैं, जब तक कि कांग्रेस उनकी तरफ हाथ नहीं बढ़ा देती। तेदेपा : आंध्र में वाईएसआर की विरासत के लिए चल रही कांग्रेस की जंग ने प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू के लिए राह थोड़ी आसान की है। किसानों के हित के लिए आमरण अनशन पर बैठकर चंद्रबाबू ने वामदलों, जगन और तेलंगाना नेताओं की सहानुभूति भी अपने साथ जोड़ ली है। उन्हें लग रहा है कि किसान आंदोलन, तेलंगाना मूवमेंट और उनकी अपनी राजनीतिक जमीन एकजुट हो जाए तो वह कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभर सकते हैं। यह राह इतनी आसान नहीं है, क्योंकि वाईएसआर की विरासत पाने के लिए जगन के तेवर सातवें आसमान पर हैं। वह राज्य में कांग्रेस लिए एक खतरा तो बन गए हैं लेकिन चंद्रबाबू और जगन की महत्वाकांक्षाएं दोनों को साथ नहीं मिलने देंगी। इनके अलावा अन्य छोटे क्षेत्रीय दल अपनी सुविधा और अपने सियासी स्वार्थो के मद्देनजर केंद्र और राज्य में अपना सहयोगी चुनते रहते हैं। (लेखक दैनिक जागरण के राजनीतिक संपादक हैं)