Showing posts with label पृ. सं. ९. Show all posts
Showing posts with label पृ. सं. ९. Show all posts

Wednesday, June 29, 2011

लोकपाल को लटकाने की नई कवायद


लोकपाल बिल पर सरकार चौतरफा दबाव में आ गई है। अन्ना हजारे ने ताल ठोंक दिया है कि अगर सरकार लोकपाल बिल पर सकारात्मक रुख नहीं अपनाती है तो चाहे गोली खानी पड़े या लाठी, 16 अगस्त से वे अनशन पर जरूर जाएंगे। विपक्षी दल भी सरकार को खूब आड़े हाथों ले रहे हैं। सरकार भले ही अन्ना की धमकी को हवा में उड़ाने की कोशिश कर रही हो, लेकिन सच यह है कि वह अंदर से डरी हुई है। वह नहीं चाहती है कि अन्ना दोबारा अनशन पर जाएं और देश में सरकार के खिलाफ माहौल बनें। इसलिए उसने साफ कर दिया है कि अन्ना को अनशन करने की अनुमति नहीं दी जाएगी, लेकिन अन्ना सरकार के तेवर से खौफ खाने वाले नहीं हैं। ऐसे में सरकार अब सर्वदलीय बैठक बुलाकर अपने ऊपर पड़ रहे दबाव को कम करना चाहती है। अन्ना टीम को साधने के लिए सरकार पहले ही साम, दाम, दंड और भेद की नीति अपना चुकी है। लेकिन नाकामी हाथ लगने के बाद अब वह राजनीतिक दलों के सिरों को जोड़कर अपने बचाव में एक नई पैंतरेबाजी कर रही है। सरकार को आभास हो चला है कि बाबा रामदेव के सत्याग्रह को नृशंसतापूर्वक कुचलने के बाद अगर वह एक बार फिर ऐसा हथकंडा अपनाती है तो देश में जनआक्रोश भड़कते देर नहीं लगेगी। ऐसे में सरकार आत्मघाती कदम उठाने के बजाए विपक्षी दलों को अपने पाले में खड़ा कर नागरिक समाज के नुमाइंदों को हाशिए पर धकेल देना चाहती है, लेकिन सरकार को अपनी इस ओछी मुहिम में शायद ही सफलता मिले। सर्वदलीय बैठक में विपक्षी दल आंख बंदकर सरकार की दलीलों पर हां-हूं करने के बजाए कई तरह के सवाल पूछ सकते हैं, जो सरकार को चुभ सकते हैं। मसलन, जब लोकपाल बिल मसौदा समिति का गठन किया गया, उस वक्त सरकार ने उनसे रायशुमारी करना क्यों नहीं जरूरी समझा? मसौदा समिति में विपक्षी दलों के सदस्यों को भी शामिल क्यों नहीं किया गया? इसके अलावा मसौदा समिति में शामिल सरकारी नुमाइंदों के आचरण-व्यवहार को लेकर भी विपक्षी दल सवाल दाग सकते हैं। मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी रामलीला मैदान में सत्याग्रहियों पर हिंसक कार्रवाई और रामदेव के आंदोलन में उसे और आरएसएस को लपेटे जाने पर भी सवाल उठा सकती है। सर्वदलीय बैठक में और भी ऐसे तमाम सवाल उभर सकते हैं, जिनका जवाब देना सरकार के लिए आसान नहीं होगा। लोकपाल पर सरकार के दोमुंहे आचरण को लेकर विपक्षी दल पहले से ही हमलावर हैं। ऐसे में सरकार की मंशा के मुताबिक वे लोकपाल बिल पर अपने पत्ते खोल देंगे, संभव नहीं लगता है। पिछले दिनों प्रणब मुखर्जी द्वारा लोकपाल पर मांगे गए सुझावों को गैर-कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के अलावा राजनीतिक दलों ने न सिर्फ नकार दिया, बल्कि इस कवायद को संसदीय प्रक्रिया के विपरीत भी


पार्टी पर भारी पड़ती गुटबाजी


देश का मुख्य विपक्षी दल होने के नाते भारतीय जनता पार्टी के सियासतदानों के बीच चल रही आपसी खींचतान और एक-दूसरे पर प्रत्यंचा चढ़ाने की निरर्थक कवायद न तो पार्टी के लिए शुभ कही जा सकती है और न ही देश के लिए यह संतोषजनक है। भारतीय जनता पार्टी को इस बात का अहसास होना चाहिए कि देश का जनमानस उसे संप्रग सरकार के विकल्प के तौर पर देख रहा है। कई राज्यों में उसकी स्वयं और गठबंधन की सरकारें भी चल रही हैं। ऊपर से संतोष वाली बात यह है कि इन सरकारों का प्रदर्शन कांग्रेस शासित राज्य सरकारों से बेहतर है। गुजरात की सरकार विकास का मॉडल पेश कर रही है तो बिहार में गठबंधन की सरकार सफलता का इतिहास रच रही है। ऐसे में उसके दो शीर्ष राजनेताओं के बीच कर्नाटक के रेड्डी बंधुओं को मंत्री बनाए जाने को लेकर पैदा हुआ विवाद उसकी साख को धक्का पहुंचाने वाला है। यह एक तथ्य है कि संप्रग सरकार के इशारे पर कर्नाटक राजभवन में आसन जमाए राज्यपाल हंसराज भारद्वाज एक अरसे से येद्दयुरप्पा सरकार को अस्थिर करने में जुटे हुए हैं, लेकिन उनकी चोंच सिर्फ इसलिए नहीं गड़ पा रही है कि येद्दयुरप्पा की सरकार बहुमत में है। यह ज्ञान रखते हुए भी अगर भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष रणनीतिकार रेड्डी बंधुओं की आड़ में कर्नाटक विवाद को हवा देकर एक-दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयास कर रहे हैं तो यह न केवल निंदनीय है, बल्कि देर-सबेर इसका खामियाजा भी उन्हें भुगतना होगा। अक्सर भारतीय जनता पार्टी भ्रष्टाचार के मसले पर संप्रग सरकार को नैतिकता का मंत्रोच्चार सुनाती रहती है। राज्यपाल हंसराज भारद्वाज द्वारा संवैधानिक प्रावधानों के उलंधन किए जाने को मुद्दा बनाकर वह संप्रग सरकार पर हमलावर भी देखी जाती है। बचाव और प्रतिक्रिया में संप्रग सरकार भी कर्नाटक में आए दिन उठने वाले राजनीतिक बवंडर का हवाला देकर उसे घेरने में कोई कोताही नहीं करती है, लेकिन आश्चर्य तब होता है, जब खुद भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेता ही पार्टी द्वारा लिए गए फैसले पर उंगलियां उठाना शुरू कर देते हैं। क्या यह विचित्र नहीं लगता है कि जिन मुद्दों पर कांग्रेस पार्टी भारतीय जनता को घेरने का हरसंभव प्रयास कर रही है, उसका सुअवसर खुद भारतीय जनता पार्टी के नेता ही उपलब्ध करा रहे हैं? पिछले दिनों लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने एक साप्ताहिक पत्रिका को दिए गए इंटरव्यू में कहा था कि कर्नाटक में रेड्डी बंधुओं को मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने का निर्णय उनका नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री येद्दयुरप्पा, राज्य के प्रभारी अरुण जेटली और अन्य नेताओं का था। सुषमा ने इस आरोप को गलत करार दिया कि उनके दबाव में ही रेड्डी बंधुओं को मंत्री बनाया गया था। सच्चाई चाहे जो भी हो, लेकिन सुषमा स्वराज के इस बयान ने भाजपा में वितंडा खड़ा कर दिया, जिसे लेकर उसका असहज होना स्वाभाविक है। आश्चर्य होता है कि ऐसे वक्त में जब पार्टी पांच राज्यों में हुए चुनाव में करारी चोट खाई हो और कर्नाटक में येद्दयुरप्पा सरकार जीवन-मरण से जूझ रही हो, फिर सुषमा स्वराज ने रेड्डी बंधुओं पर बयान देना इतना जरूरी क्यों समझा? क्या वाकई इस तर्क में दम है कि 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए भाजपा के शीर्ष रणनीतिकार एक-दूसरे को नीचा दिखाकर आगे निकल जाना चाहते हैं? इसी तरह आजकल भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी और पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष गोपीनाथ मुंडे के बीच खटपट की भी खबरें हैं। यहां तक कि मुंडे के पार्टी छोड़ने इरादे भी जाहिर होने लगे थे। यह बात और है कि फिलहाल यह मामला थोड़ा शिथिल पड़ गया है। आज की तारीख में जब देश की संप्रग सरकार अपनी विश्वसनीयता लगातार खोती जा रही है, भाजपा के रणनीतिकारों का आपसी द्वंद्व निराशा पैदा करने वाला है। भाजपा को इस बात पर ध्यान टिकाना चाहिए कि जनता के बीच उसकी लोकप्रियता क्यों घट रही है? यह सही है कि भारतीय जनता पार्टी ने सड़क से लेकर संसद तक संप्रग सरकार की नाकामियों का ढोल पीटने में अन्य राजनीतिक दलों की अपेक्षा अहम भूमिका निभाई है, लेकिन भाजपा के लिए यह त्रासदी ही कही जाएगी कि वह पांच राज्यों के चुनाव में इसका राजनीतिक फायदा उठाने में असमर्थ रही, जबकि चुनाव के दरम्यान भी भ्रष्टाचार और कालेधन का मसला जोरों पर था। आज भाजपा संप्रग सरकार पर हावी होने के बावजूद हल्के में दिख रही है। सिर्फ इसलिए कि उसके महारथी सरकार पर दबाव बनाने के बजाए अपनों को ही चित्त करने में जुटे हुए हैं। यह स्थिति भाजपा के लिए चिंता का विषय है।


कलह के दौर में उमा की वापसी के मायने


आखिरकार संघ की त्योरियां चढ़ने के बाद उमा भारती की भारतीय जनता पार्टी में वापसी हो ही गई। इसमें कोई दो मत नहीं कि जमीन से जुड़ी इस नेता की वापसी से पार्टी को न केवल उत्तर प्रदेश, बल्कि देश की सियासत में भी फायदा हो सकता है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी में पहले से चल रही अंदरूनी कलह के बीच यह कहना मुश्किल है कि उमा भारती अपनी जिम्मेदारियों को किस तरह बखूबी निभा पाएंगी। नितिन गडकरी ने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद यह ऐलान किया था कि पार्टी छोड़कर जा चुके लोगों की वापसी होगी, लेकिन गुटबाजी के चलते उनकी यह घोषणा केवल बयानों में दर्ज होकर रह गई। उमा भारती की वापसी को लेकर पार्टी में पिछले कई सालों से चर्चा होती रही, लेकिन आपसी खींचतान के चलते उनकी वापसी पर अडं़गा लगाने वालों की कमी नहीं रही। मध्य प्रदेश भाजपा से लेकर आरएसएस तक में भी एक दो लोग ऐसे थे, जिन्हें यह लगता था कि अगर उमा भारती की वापसी हो गई तो उनके कई सिपहसालारों को नुकसान हो सकता है। बात चाहे पार्टी अध्यक्ष रहे राजनाथ सिंह की हो या फिर मौजूदा अध्यक्ष नितिन गडकरी की, अनुशासनहीनता और गुटबाजी के पीछे पार्टी का कमजोर नेतृत्व ही जिम्मेदार रहा है। उमा भारती को भले ही दिसंबर 2005 में अनुशासनहीनता के आरोप में पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था, लेकिन अनुशासनहीनता और गुटबाजी के दूसरे कई मामलों पर पार्टी नेतृत्व आंखें मूंदे रहा। जमीन से जुड़े जनाधार वाले नेता हाशिए पर आते गए और टेलीविजन चैनलों पर बौद्धिक उछल-कूद के खेल में माहिर कई नेता अपनी ही पार्टी के लोगों के बीच शह और मात का खेल खेलते रहे। इन नेताओं का न तो किसी प्रदेश की राजनीति में पार्टी के बेहतर प्रदर्शन से लेना-देना रहा और न ही केंद्रीय राजनीति में ही ये लोग कोई कमाल दिखा सके। लेकिन 11 अशोक रोड पर ऐसे ही चेहरे चमकते दिखाई दिए। आंतरिक लोकतंत्र का दंभ भरने वाली भारतीय जनता पार्टी ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को मुखौटा कहने पर केएन गोविंदाचार्य को पार्टी से निष्कासित कर दिया था तो दूसरी तरफ झारखंड में भ्रष्टाचार का मसला उठाने वाले बाबूलाल मरांडी की बात को पार्टी ने अनसुना कर दिया था। पूर्व सांसद यदुनाथ पांडे को झारखंड में पार्टी का राज्य अध्यक्ष नियुक्त करने के फैसले पर बाबूलाल मरांडी ने खुलकर अपनी नाराजगी जताई थी। मरांडी का कहना था कि इस फैसले में पार्टी ने उनसे और प्रदेश के कई नेताओं से कोई सलाह-मशविरा नहीं किया। आखिरकार मरांडी ने बीजेपी से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई। पार्टी के वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह ने अपनी किताब में मोहम्मद अली जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष नेता बताया तो अगस्त 2009 में शिमला में हो रही भाजपा की चिंतन बैठक में जसवंत सिंह को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। उस वक्त राजनाथ सिंह भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष थे। जसवंत सिंह को निकाले जाने का ऐलान करते वक्त राजनाथ सिंह के हाव-भाव कुछ इस तरह के थे, जैसे कोई शख्स अगर अपने ताकतवर पड़ोसी से नहीं लड़ सके तो अपने बच्चे का कान उमेठकर ही सारा गुस्सा निकाल दे। यह बात अलग है कि 25 जून 2010 को जसवंत सिंह की फिर से पार्टी में वापसी हो गई। दरअसल, बात उमा भारती, बाबूलाल मरांडी, कल्याण सिंह, गोविंदाचार्य या फिर जसवंत सिंह को निकाले जाने या फिर उनके पार्टी छोड़कर जाने की नहीं, बल्कि किसी एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल के आंतरिक लोकतंत्र और अनुशासन की है। उमा भारती ने पार्टी पर ऑफ द रिकॉर्ड प्रेस ब्रीफिंग करने का आरोप लगाया था, लेकिन आज तो ऑन रिकॉर्ड बातचीत में पार्टी के लोग एक दूसरे पर खुलकर निशाना साधने में लगे हैं। अभी कुछ दिनों पहले पार्टी की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज ने एक पत्रिका को दिए इंटरव्यू में इस बात से इनकार किया कि रेड्डी बंधुओं को कर्नाटक कैबिनट में जगह दिलाने में उन्होंने कोई भूमिका निभाई थी। इतना ही नहीं, सुषमा का यह भी कहना था कि जब रेड्डी बंधु मंत्री बने थे, उस वक्त अरुण जेटली कर्नाटक भाजपा के प्रभारी थे, जबकि वेंकैया नायडू और अनंत कुमार राज्य में वरिष्ठ नेता थे। सुषमा स्वराज ने अपने साक्षात्कार में कहा कि इन लोगों के बीच आपस में क्या बातचीत हुई, इससे मेरा कोई लेना-देना नहीं हैं। रेड्डी बंधुओं की सुषमा स्वराज से नजदीकी उस वक्त सामने आई थी, जब उन्होंने 1999 में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ बेल्लारी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था। हालांकि इस पूरे मसले पर भारतीय जनता पार्टी ने सफाई देते हुए कहा कि पार्टी में किसी तरह का कोई मनमुटाव नहीं है। अपनी चिंतन बैठकों में भारतीय जनता पार्टी चिंतन कम और चिंता ज्यादा करती नजर आती है। दरअसल, आज पार्टी पूरी तरह बिखरी दिखाई दे रही है और पार्टी के बड़े नेता कई खेमे में पहले से ही बंटे हुए हैं। चिंतन बैठकों में अक्सर अनुशासन को अहमियत देने की बात कही गई, लेकिन दरअसल पार्टी में अनुशासन का सबक देने वाले खुद कितने अनुशासनशील हैं? क्या पार्टी के बड़े नेता खुद एक दूसरे की टांग खींचते नजर नहीं आते? हुगली वाले मामले में उमा भारती को मुख्यमंत्री पद से हटाने का फैसला जब सार्वजनिक नहीं किया गया था, उस वक्त पार्टी की ही एक बड़ी महिला नेता ने मीडिया के कुछ लोगों से बड़े ही भद्दे अंदाज में इसका ऐलान कर दिया था कि इसकी तो छुट्टी हो गई। सवाल भारतीय जनता पार्टी या उसके नेताओं के बीच आपसी मनमुटाव या रस्साकशी का नहीं, बल्कि एक लोकतांत्रिक देश में किसी राष्ट्रीय राजनीतिक दल की सकारात्मक भूमिका का है। इसमें कोई दो मत नहीं कि आज ज्यादातर राजनीतिक पार्टियां अपने दल को आम जनता से जोड़कर देखने के बजाय कॉरपोरेट स्टाइल में कामकाज करती दिखाई दे रही है। कांग्रेस पार्टी इस कॉरपोरेट स्टाइल का सबसे बड़ा उदाहरण है और यही वजह है कि आज राज्यों में कांग्रेस पूरी तरह हाशिए पर आती जा रही है, लेकिन इन सबके बावजूद दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं का कहना रहा है कि चुनाव प्रबंधन से जीते जाते हैं। यह बात ठीक है कि आज कुछ राज्यों में भाजपा सरकारें अच्छा काम कर रही है, लेकिन अगर बात पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की हो तो उसके कामकाज का तरीका अब भी सवालों के घेरे में है। कांग्रेस की तरह यहां भी कुछ नेता पार्टी को कॉरपोरेट शैली में चलाने की कोशिश में जनाधार वाले नेताओं को दरकिनार करने में जुटे हैं। आज देश में एक सशक्त विपक्ष की जरूरत है, लेकिन आंतरिक गुटबाजी से जूझ रही भारतीय जनता पार्टी यह दायित्व बखूबी नहीं निभा पा रही है। कॉमनवेल्थ खेल से लेकर 2जी स्पेक्ट्रम समेत कई घोटालों से घिरी कांग्रेस की अगुवाई वाली संप्रग सरकार के खिलाफ देशभर में जनाक्रोश साफ दिखाई दे रहा है, लेकिन इन मुद्दों पर सरकार को घेरने में एक मजबूत विपक्ष के तौर पर भारतीय जनता पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व नाकाम रहा है। भ्रष्टाचार, काले धन या लोकपाल के मसले को लेकर अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के अनशन को भले ही भारतीय जनता पार्टी का समर्थन रहा हो, लेकिन पार्टी खुद अपनी तरफ से सरकार के खिलाफ कोई जनांदोलन नहीं खड़ा कर सकी। उमा भारती की वापसी भारतीय जनता पार्टी के लिए तभी कारगर सिद्ध होगी, जब भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी और अनुशासनहीनता पर पूरी तरह लगाम कसने में कामयाब होंगे। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)