लोकपाल बिल को लेकर सरकार की नीयत शुरू से ही सवालों के घेरे में थी और इस पूरे मसले को लटकाने की जुगत में भिड़ी सरकार अब अपने मकसद में काफी हद तक कामयाब होती भी दिखाई दे रही है। जनवरी में तैयार सरकारी विधेयक के दायरे में प्रधानमंत्री भी शामिल थे, लेकिन अब सरकार को लगता है कि अगर लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री को लाया गया तो प्रधानमंत्री का पद बेकार हो जाएगा। भारत स्वाभिमान के जरिए देश भर में काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन खड़ा करने वाले बाबा रामदेव का भी कहना है कि प्रधानमंत्री और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को लोकपाल के दायरे में लाने के मामले में जल्दबाजी करना ठीक नहीं। अब सरकार का यह कहना है कि लोकपाल के अधिकारों को लेकर समाज के किसी भी वर्ग में एक राय नहीं है। यहां तक कि गैर सरकारी संगठनों में भी इस पर मतभेद हैं। कुल मिलाकर राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि अपने फायदे के लिए ये मतभेद जानबूझकर पैदा किए जा रहे हैं। इन विवादों का सहारा लेकर अब सरकार इस पूरे मसले पर राज्यों और राजनीतिक दलों से चर्चा करके इस मामले को एक बार फिर ठंडे बस्ते में डालने के मूड में है। आखिरकार प्रधानमंत्री का पद लोकपाल के दायरे में क्यों नहीं हो सकता? 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में ए राजा के जेल जाने से कुछ दिनों पहले तक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उनका बचाव करते नजर आ रहे थे। कॉमनवेल्थ घोटाले में अब भले ही सुरेश कलमाड़ी को सलाखों के पीछे डाल दिया गया हो, लेकिन इस बड़े खेल आयोजन से पहले तमाम आपत्तियों पर प्रधानमंत्री कार्यालय ने आंखें मूंद रखी थी। देश में आजादी के बाद से अब तक ऐसे एक नहीं, कई वाकये हो चुके हैं, जब प्रधानमंत्री की कुर्सी भी सवालों के घेरे में रही है। क्या लोकतंत्र में सरकार के मुखिया की जांच कोई नहीं कर सकता? क्या प्रधानमंत्री और प्रधानमंत्री कार्यालय में पारदर्शिता की कोई जरूरत नहीं है? लोकपाल बिल की ड्रॉफ्टिंग कमेटी की बैठक में सरकार ने प्रधानमंत्री, उच्च न्यायपालिका और सांसदों के संसद में किए गए कार्यो को लोकपाल के दायरे में लाने का विरोध किया है। सरकार का तर्क है कि यदि प्रधानमंत्री के खिलाफ कोई जांच शुरू हुई तो वह शासन करने और अहम फैसले लेने का हक खो देंगे। सिविल सोसाइटी का यह कहना ठीक है कि बोफोर्स मामले में भी प्रधानमंत्री जांच के दायरे में थे, लेकिन उन्होंने कामकाज बंद नहीं किया था। वैसे भी सात सदस्यों वाली लोकपाल बेंच के पूरे मामले को परखने के बाद ही किसी मामले में जांच के आदेश दिए जाएंगे। इस पूरे मामले में सरकार का यह भी कहना है कि लोकपाल के दायरे में आने की वजह से प्रधानमंत्री का पद महत्वहीन हो जाएगा। देश की जनता यह जानना चाहती है कि क्या भ्रष्टाचार से जुड़े कई अहम मसलों पर प्रधानमंत्री कार्यालय की चुप्पी की वजह से इस पद की अहमियत कम नहीं हुई? लोकतंत्र में शीर्ष पद पर बैठा व्यक्ति अगर भ्रष्टाचार में शामिल है तो क्या उसकी जांच नहीं की जा सकती? अगर ऐसा नहीं है तो क्या प्रधानमंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच भी उनके मातहत कोई एजेंसी करेगी? समाज सुधारक अन्ना हजारे के आंदोलन को देश भर से मिले जनसमर्थन के आगे सरकार ने भले ही घुटने टेक दिए थे और लोकपाल बिल पर सरकार की तरफ से बनी सहमति के बाद जब अन्ना हजारे ने अनशन तोड़ा तो उस वक्त इस पूरे मसले पर सरकार की तरफ से वार्ताकार रहे कपिल सिब्बल को यह लोकतंत्र की जीत नजर आ रही थी, लेकिन कुछ दिन बाद ही सरकार के ये मंत्री लोकपाल संस्था की अहमियत पर सवाल खड़े करते नजर आ रहे थे। केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल का कहना था कि अगर गरीब बच्चों को स्कूल भेजे जाने की कोई व्यवस्था नहीं है या फिर गरीब के पास अस्पताल में दाखिल होने के लिए पैसे नहीं हैं तो इसमें लोकपाल क्या करेगा। मंत्री जी ने यह भी बयान दिया था कि अगर बात पीने के पानी या फिर शौचालय की व्यवस्था की हो तो इसमें लोकपाल के होने या नहीं होने से क्या फर्क पड़ेगा। सरकार को शायद यह समझने कि जरूरत नहीं है कि अगर देश में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा तो गरीब के बच्चे को बेहतर शिक्षा भी मिलेगी और इलाज भी बेहतर होगा। मौजूदा बजट में सरकार ने प्रारंभिक शिक्षा के लिए 21 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया है और शिक्षा के लिए हजारों करोड़ रुपये के प्रावधान पहले भी किए जा चुके हैं, लेकिन आज भी अगर पढ़ाई-लिखाई के स्तर को लेकर अमीर गरीब में भेदभाव बना हुआ है तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? सामाजिक योजनाओं और विकास पर खर्च की जाने वाली धनराशि भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती जा रही है और आम आदमी को इसका पूरा फायदा नहीं मिल रहा है तो क्या इसके लिए सरकारी तंत्र की जड़ों में फैला भ्रष्टाचार नहीं है? सवाल लोकपाल के दायरे में सिर्फ प्रधानमंत्री के पद को लाने का नहीं, बल्कि देश में सुशासन और पारदर्शिता के जरिए भ्रष्टाचार पर लगाम कसने का है ताकि देश का हर पिछड़ा तबका किसी सरकार या राजनीतिक दल के लिए खाली वोट बैंक भर न रह जाए। भ्रष्टाचार को लेकर सरकार की मंशा पर सवाल उठते रहे हैं और इस पूरे मसले पर सरकार के हर कदम उसकी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा नजर आ रहे हैं। अब सरकार का यह भी कहना है कि संसद में किए जाने वाले भ्रष्टाचार की जांच लोकपाल नहीं कर सकेगा। सरकार का कहना है कि हम सांसदों को खुद पर नियंत्रण के लिए प्रेरित कर सकते हैं। अगर वाकई सांसद खुद से प्रेरित हो रहे होते तो हमारे कुछ सांसद संसद में सवाल पूछने के बदले कैमरे के सामने पैसे लेते नहीं दिखाई देते। सांसद निधि का दुरूपयोग या फिर संसद में किसी सांसद का भ्रष्ट व्यवहार लोकपाल के दायरे में क्यों नहीं होना चाहिए? इसमें कोई दो मत नहीं कि देश में आम जनता की सबसे ज्यादा उम्मीदें न्यायपालिका पर टिकी है और पिछले कुछ समय से न्यायपालिका की निष्पक्षता ने आम जनता को कहीं न कहीं राहत भी दी है। सरकार उच्च न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे से बाहर रखना चाहती है। दरअसल, मसला लोकपाल के जरिए प्रधानमंत्री, सांसद या न्यायपालिका की अहमियत को कम करने या फिर उनके कामकाज में अड़चन डालने का नहीं, बल्कि देश की शीर्ष संस्थाओं में पारदर्शिता लाने का है ताकि बड़े से बड़े पद पर बैठा व्यक्ति भी जांच के दायरे में हो। भ्रष्टाचार के मसले पर सरकार के कदम दिखावटी ज्यादा नजर आ रहे हैं। अभी कुछ दिनों पहले योजना आयोग देश की जनता से भ्रष्टाचार से निपटने को लेकर सुझाव मांगता नजर आ रहा था। लोकपाल ही नहीं, सीएजी और सीवीसी जैसी संस्थाओं को भी और ज्यादा प्रभावी बनाने की आवश्यकता है। यह बात ठीक है कि संविधान में कानून बनाने के लिए संसद सर्वोच्च है, लेकिन जब जनता की नुमाइंदगी करने वाले अपनी जिम्मेदारियों को ठीक से नहीं निभा रहे हों तो उन पर लगाम लगाने की जरूरत है। कुल मिलाकर भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार को ठोस कदम उठाने की ज़रूरत है, वरना देश की जनता इन मसलों पर एक बार फिर संप्रग सरकार को सवालों के कठघरे में खड़ा कर देगी। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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Saturday, June 4, 2011
Thursday, March 17, 2011
सियासी रंग में रंगते छात्र संघ
मध्य प्रदेश में उज्जैन के माधव कॉलेज के प्रोफेसर एसएस सब्बरवाल की दर्दनाक मौत के मामले में आखिरी फैसला अभी आया नहीं है कि सूबे में ऐसी ही एक दूसरी वारदात हो गई। खंडवा के कृषि महाविद्यालय में एक प्रोफेसर के साथ हुई अभद्रता और पिटाई से उसके साथी प्रोफेसर सुरेंद्र सिंह ठाकुर को इतना गहरा सदमा पहुंचा कि दिल का दौरा पड़ने से उनकी मौत हो गई। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद कार्यकर्ताओं की बदसलूकी व मारपीट से सूबे में एक और प्रोफेसर की मौत कई सवाल खड़े करता है। खंडवा के भगवतराव कृषि महाविद्यालय में बीते दिनों प्रोफेसर अशोक चौधरी पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और भाजयुमो के कार्यकर्ताओं ने एक छात्रा के साथ कथित तौर पर छेड़छाड़ का इल्जाम लगाते हुए उसके साथ मारपीट की और उनके चेहरे पर कालिख पोत दी। बीच-बचाव की कोशिश में मौके पर मौजूद प्रोफेसर ठाकुर को भी चोटें आईं थीं। खंडवा में प्रोफेसर के साथ हुआ यह शर्मनाक वाकया सारे मुल्क ने अपने टेलीविजन पर देखा। कॉलेज में जब यह हंगामा चल रहा था तो वहां की स्थानीय मीडिया भी मौजूद थी और उन्होंने इस पूरे घटना को अपने कैमरे में कैद कर लिया। शुरुआती ना-नुकुर के बाद हालांकि पुलिस ने अब जाकर इस पूरे मामले की रिपोर्ट दर्ज कर ली है, लेकिन असली अपराधियों को कोई सजा होगी इसकी संभावना बेहद कम है। सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा का सहयोगी संगठन होने के चलते पुलिस प्रशासन इन कार्यकर्ताओं की कारगुजारियों की तरफ से अक्सर अपनी आंखें मूंद लेता है। प्रदेश विधानसभा में जब इस मामले की आवाज गूंजी, तब जाकर यह मामला जागा और कुछ आरोपियों पर मामला दर्ज किया, लेकिन इतना सब कुछ हो जाने के बावजूद असली आरोपी आज भी कानून की गिरफ्त से बाहर हैं। मध्य प्रदेश में विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं का प्रोफेसरों के साथ यह शर्मनाक बर्ताव कोई पहली बार नहीं है, बल्कि सूबे में इस तरह की घटनाएं आएदिन होती रहती हैं। किसी न किसी बहाने एबीवीपी के कार्यकर्ता शिक्षकों को अपमानित और प्रताडि़त करते ही रहते हैं। पुलिस और प्रशासन इन अराजक तत्वों की गैर कानूनी हरकतों पर कोई सकारात्मक कार्रवाई करने की बजाय वह मूकदर्शक बन तमाशा देखती रहती है। जिसका नतीजा यह है कि भाजपा शासनकाल में ऐसी कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिसमें इस संगठन से जुड़े कार्यकर्ताओं ने छोटी सी बात पर किसी शिक्षक पर हमला कर दिया। फिर साल 2006 में हुई प्रोफेसर सब्बरवाल की दर्दनाक मौत को भला कौन भूल सकता है, जब इसी संगठन के कार्यकर्ताओं ने जरा सी बात पर उनके साथ इस तरह से बदसलूकी और मारपीट की कि वह उनकी मौत की वजह बन गई। उस वक्त भी भाजपा सरकार ने पूरे मामले को महज एक हादसा बताकर इससे पल्ला झाड़ने की कोशिश की, लेकिन वह लोकतंत्र के चौथे खंभे मीडिया की सक्रियता ही थी जो सरकार को मजबूरन इस मामले में कार्यवाही करना पड़ी। वरना केस कभी का रफा-दफा हो गया होता। पुलिस कार्यवाही के लिए प्रत्यक्ष सबूत होने के चलते शिवराज सरकार इसे चाहकर भी झुठला नहीं पाई। तब से यह बहुचर्चित केस अदालत में है और फरियादी आज भी इंसाफ की बाट जोह रहे हैं। प्रोफेसर सब्बरवाल की हत्या के मामले में कसूरवारों के खिलाफ कोई वाजिब कार्रवाई करना तो दूर उल्टे सूबे के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान खुद, हत्या के मुख्य आरोपी विमल तोमर की मिजाजपुर्सी के लिए अस्पताल गए थे। मुख्यमंत्री के इस कदम से उस वक्त भी यह सवाल उठा था और आज भी यह सवाल ज्यों का त्यों बरकरार है कि जिस शख्स पर सूबे में कानून बंदोबस्त को बनाए रखने और इंसाफ सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है वह अपने इस बर्ताव से सूबे की अवाम को क्या पैगाम देना चाहता है? क्या यह एक जिम्मेदार मुख्यमंत्री की निशानी है? जाहिर है मुल्जिमों की इस मिजाजपुर्सी से उनके हौसले और भी बढ़ जाते हैं। मध्य प्रदेश ही नहीं, भाजपा जहां भी सत्ता में आती है, संघ के आनुषंगिक संगठन निरंकुश हो जाते हैं। वह किसी के भी साथ चाहे जैसा बर्ताव करें मगर उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती। जाहिर है अराजक तत्वों को जब खुली छूट मिलती है और उन्हें कानून का कोई डर नहीं होता तो इस तरह की घटनाएं और भी बढ़ जाती हैं। मध्य प्रदेश में पिछले कुछ सालों से शिक्षकों के साथ अभद्रता और मारपीट की जो घटनाएं सामने आ रही हैं, उसमें दरअसल कहीं न कहीं भाजपा सरकार भी गुनहगार है, क्योंकि जब कोई सरकार अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों से मुंह चुराए तो इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति होना लाजमी है। अपनी इस शर्मनाक करतूत को अंजाम देने के लिए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने जो बहाना बनाया वह यह था कि प्रोफेसर का कॉलेज में पढ़ने वाली एक छात्रा से संबंध है और वह छात्राओं पर अश्लील टिप्पडि़यां करता है। अब सवाल यह उठता है कि विद्यार्थी परिषद यदि प्रोफेसर के आचरण से नाराज थी तो उसने इसकी शिकायत प्राचार्य से करने की बजाय प्रोफेसर को मारने-पीटने और अपमानित करने का रास्ता क्यों चुना? क्या उनके मातृ संगठन आरएसएस ने असहमति या विरोध जताने का उन्हें यही तरीका सिखाया है। यदि शिकायत पर जांच और कार्यवाही नहीं होती तो वे अहिंसक तरीके से आंदोलन, धरना-प्रदर्शन कर सकते थे। वह सूबे के शिक्षा महकमे के आला अफसरों या शिक्षा मंत्री से मिल सकते थे। सत्ता पक्ष से जुड़े विद्यार्थी संगठन होने के चलते कौन उनकी बात पर कार्यवाही नहीं करता? बावजूद इसके उन्होंने खुद ही कानून अपने हाथ में ले लिया और प्रोफेसर को सरेआम मारा-पीटा और जलील किया। सत्ता के मद में वे यह भूल गए कि वे जो कुछ कर रहे हैं वह गलत है व अलोकतांत्रिक है। एक बड़ी सियासी पार्टी के आनुषंगिक संगठन होने के नाते उन्हें लोकतांत्रिक तरीकों पर यकीन होना चाहिए न कि फासीवादी तौर तरीकों पर। जो लोग ज्ञान, शील और एकता की बात करते नहीं थकते, उनका असल बर्ताव इससे ठीक उलट क्यों? संघ की पाठशाला में वे जो कुछ सीख रहे हैं, क्या यह हमारी संस्कृति के अनुरूप है? हिंदुस्तानी संस्कृति में गुरु का दर्जा ईश्वर के बराबर माना गया है, लेकिन उसी गुरु के साथ सूबे में लगातार गलत बर्ताव किया जा रहा है। और खुद को भारतीय संस्कृति का अलमबरदार बताने वाली सरकार चुपचाप तमाशा देख रही है। खंडवा में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और भाजयुमो के कार्यकर्ताओं ने प्रोफेसरों के साथ जो बर्ताव किया उसे बर्बरतापूर्ण कृत्य की श्रेणी में ही रखा जा सकता है। इस कृत्य की जितनी भी भर्त्सना की जाए वह कम है। स्कूल-कॉलेज में छात्र संगठन, छात्रों को राजनीति की सही समझ सिखाने और उनमें नेतृत्व का गुण निखारने के लिए होते हैं न कि उनमें गलत समझ पैदा करने और अपने हित साधने के लिए। मुल्क की कमोबेश सभी बड़ी सियासी पार्टियां वर्षो से छात्र संगठनों का इस्तेमाल अपने हित साधने के लिए करती रही हैं। झूठे बहकावे और थोड़े से प्रलोभन में आकर छात्र आसानी से उनके हाथों की कठपुतली बन जाते हैं। यहां तक कि छात्र यह सब भूल जाते हैं कि वे जो कुछ कर रहे हैं वह सही भी है या गलत। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Monday, March 7, 2011
क्या सीवीसी पर फैसले से सबक लेगी सरकार
आखिरकार मुख्य सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति अवैध ठहराकर सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक पदों की गरिमा को बरकरार रखने की दिशा में एक ऐतिहासिक फैसला दिया। हैरानी की बात यह है कि देश में भ्रष्टाचार पर निगरानी के लिए बनी संवैधानिक संस्था की अगुवाई की जिम्मेदारी एक दागी शख्स को दे दी जाती है और सरकार अपने फैसले को तमाम तर्को-कुतर्को के जरिए सही ठहराने की कोशिश करती है। इस मामले की सुनवाई के दौरान कई बार सरकार का रवैया चोरी ऊपर से सीनाजोरी वाला दिखा। इस मामले में शर्मिदा होने के बजाय सरकार की ढिठाई उस वक्त इस सबके जवाब में दिखी जब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि अगर सीवीसी का बेहद ईमानदार होना जरूरी है तो यह पैमाना सभी पदों पर लागू होता है और तब न्यायपालिका में भी हर नियुक्ति की जांच होनी चाहिए। इस पूरे मामले में खुद थॉमस साहब भी पीछे नहीं रहे और कुछ दिनों पहले उन्होंने तर्क दिया था कि जब दागी नेता सांसद बने रह सकते हैं तो वह क्यों नहीं? एक तरफ देश में भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाने के लिए यूपीए सरकार हर दिन बयानबाजी करती नजर आती है तो दूसरी तरफ संवैधानिक पदों पर ऐसे लोगों को नियुक्त किया जाता है जो खुद दागदार हैं और जिनकी प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। सर्वोच्च अदालत ने अपने फैसले में साफ कहा है कि मुख्य सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति के लिए बनी उच्चस्तरीय समिति और किसी भी सरकारी संस्था ने सीवीसी जैसी संस्था की ईमानदारी और निष्ठा के मुद्दे को प्राथमिकता नहीं दी। कुल मिलाकर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने केंद्र सरकार को सबक देते हुए उसे सवालों के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सीवीसी की नियुक्ति के मामले में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गृहमंत्री पी. चिंदबरम की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाता है? यह फैसला सरकार को यह सीख देता कि देश से जुड़े अहम फैसलों में विपक्ष की भावना का सम्मान करना किसी भी लोकतंत्र की मजबूती के लिए बेहद जरूरी है। सीवीसी की नियुक्ति के लिए बनी उच्चस्तरीय समिति में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने जब पीजे थॉमस के नाम पर एतराज किया था तो उस वक्त सरकार को उनकी आपत्तियों पर गौर करना चाहिए था। क्या संवैधानिक पदों की गरिमा बरकरार रखना सरकार की जिम्मेदारी नहीं है? लगातार हो रहे घोटालों और भ्रष्टाचार के बढ़ते मामलों को देखते हुए क्या यह आवश्यक नहीं कि सरकार अपनी जिम्मेदारी को अधिक जिम्मेदारी से निभाती और संवैधानिक पदों पर नियुक्तियों के मामले में अधिक सतर्कता बरतती। बजाय इन सबके सरकार के मंत्री संवैधानिक संस्थाओं पर उंगलियां उठाकर उसकी अहमियत को चुनौती देने की कोशिश करते हैं। दूरसंचार घोटाले पर केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल सरकारी खर्च के हिसाब-किताब पर नजर रखने वाली शीर्ष संस्था नियंत्रण एवं महालेखा परीक्षा यानी कैग के कामकाज के तरीके पर सवाल उठाते हुए यह बताने की कोशिश कर रहे थे कि टू जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले में सरकार को उतना नुकसान नहीं हुआ है जितना कैग की रिपोर्ट में बताया गया है। कुछ ऐसा ही बयान कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने भी दिया कि कैग उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी। मोइली का कहना था कि अगर कैग ने समय रहते हस्तक्षेप किया होता तो कई घोटाले नहीं होते। वर्ष 2009 में भारत के तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति से चुनाव आयुक्त नवीन चावला को बर्खास्त करने की सिफारिश की थी जिसे केंद्र सरकार ने खारिज कर दिया था। इस मामले में भाजपा ने चावला के कांग्रेस पार्टी से नजदीकी और पुराने संबंधों का आरोप लगाते हुए उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाए थे। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से सरकार की किरकिरी हुई है और विपक्ष के हाथ एक बड़ा मुद्दा लग गया है, लेकिन यहां सवाल संवैधानिक संस्थाओं की मर्यादा और उसकी गरिमा को बरकरार रखने का है। अदालत का कहना है कि विपक्ष के पास इस तरह की नियुक्ति को लेकर कोई वीटो तो नहीं है, लेकिन यदि विरोध होता है तो सरकार को इसको ध्यान में रखना चाहिए। इस मामले में एक याचिकाकर्ता और पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने प्रधानमंत्री और गृहमंत्री पर भी सवाल खड़े किए हैं, लेकिन देश के कानून मंत्री वीरप्पा मोइली का अभी भी कह रहे हैं इस पूरे मामले में प्रधानमंत्री ने कुछ भी गलत नहीं किया। अभी कुछ दिनों पहले सुप्रीम कोर्ट ने दूरसंचार मंत्री ए. राजा के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की अनुमति देने में विलंब को लेकर भी सरकार की खिंचाई की थी। दूरसंचार घोटाले पर सुनवाई के दौरान भी सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री की चुप्पी पर सवाल उठाए थे। तब अदालत ने सरकार से पूछा था कि क्या कोई जिम्मेदार अधिकारी किसी शिकायत पर इस तरह से चुप रह सकता है? इस मामले में जनता पार्टी के अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी ने दो साल पहले प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर ए. राजा के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज करने की अनुमति मांगी थी, लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस मामले पर चुप्पी साधे रहे। कुल मिलाकर संवैधानिक पदों की नियुक्ति का मामला हो या फिर देश में हो रहे तमाम घोटालों का, सरकार की कथनी और करनी में अंतर साफ दिखाई दे रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस फैसले में केवल थॉमस की नियुक्ति को रद ही नहीं किया, बल्कि सरकार को आने वाले समय में ऐसे अहम पदों पर नियुक्ति को केवल नौकरशाहों तक सीमित नहीं रखे जाने की बात भी कही है। कोर्ट का कहना है कि जब मुख्य सतर्कता आयुक्त की दोबारा नियुक्ति हो तो प्रक्रिया को केवल नौकरशाहों तक सीमित नहीं रखा जाए, बल्कि समाज से अन्य ईमानदार और निष्ठावान व्यक्तियों के नाम पर भी ध्यान दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट की इस बात का स्वागत किया जाना चाहिए और आने वाले समय में ऐसे पदों पर भ्रष्ट नौकरशाहों को रखने की बजाय बेदाग छवि वाले दूसरे लोगों के बारे में भी विचार करना चाहिए, लेकिन यहां सवाल सरकार की नियत का है। भ्रष्टाचार को लेकर आज देश भर में आवाज उठ रही हैं और तमाम संगठन इसको लेकर आए दिन विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। आम जनता और विपक्ष के सामूहिक दबाव की वजह से सरकार भ्रष्टाचार को लेकर कभी लोकपाल बिल तो कभी भ्रष्टाचारियों को नहीं छोड़ा जाएगा जैसे बयान देकर खानापूर्ति करने में जुटी है। लोकपाल जैसी संस्था भी तभी कारगर साबित होगी जब इनमें होने वाली नियुक्तियों में पारदर्शिता और निष्पक्षता का खयाल रखा जाए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो इन संस्थाओं के लिए सरकार फिर किसी थॉमस की तलाश करेगी जो सरकार के इशारों पर नाचता नजर आए। आवश्यकता इस बात की है कि सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले के बाद केंद्र सरकार और सभी राजनीतिक पार्टियां दलगत राजनीति से ऊपर उठकर देश की संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती और उनकी गरिमा को बरकरार रखने के लिए मिलकर ऐसे कदम उठाएं ताकि फिर सीवीसी जैसे अहम पद पर किसी दागी को नियुक्त नहीं किया जा सके। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)
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