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Saturday, January 7, 2012

यूपी में आपराधिक प्रवृत्ति के 77 उम्मीदवार


जरायम की दुनिया के बाद 77 लोग खादी पहनने की तैयारी में हैं। यूपी में इन उम्मीदवारों ने ताल ठोंक दी है। इनमें विभिन्न पार्टियों के 38 ऐसे उम्मीदवार हैं, जो गंभीर आपराधिक मामलों में आरोपित हैं। यूपी में प्रमुख राजनीतिक पार्टियों ने अभी तक 617 उम्मीदवारों की सूची जारी की है। एडीआर (एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफार्मस) ने सर्वे किया तो यह हकीकत सामने आई। गंभीर आरोप वाले उम्मीदवारों की सूची में भाजपा व कांग्रेस के 13-13 और सपा के 12 उम्मीदवार हैं। एडीआर का दावा है कि इन पर हत्या, हत्या के प्रयास, डकैती, चोरी व अपहरण जैसे संगीन आरोप हैं। भाजपा ने अब तक 220 उम्मीदवारों की सूची जारी की है। इनमें 26 अपराधिक पृष्ठभूमि के हैं। कांग्रेस के 215 उम्मीदवारों की सूची में 26 पर अपराधिक मामले हैं और 13 के खिलाफ गंभीर आरोप लंबित हैं। सपा के 165 उम्मीदवारों में से 24 पर अपराध की छाया है। अपराधियों को टिकट देने के सवाल पर सभी दलों का यही तर्क है कि जब तक अदालत से अपराध सिद्ध न हो जाए, किसी को अपराधी कहना उचित नहीं है। इन पर लंबित हैं सर्वाधिक मामले यूपी में 403 विधायकों में से 143 पर अपराधिक मामले लंबित हैं। यानी 35 फीसदी विधायक अपराधिक प्रवृत्ति के हैं। बीएसपी में सर्वाधिक 17 और सपा के 16 विधायकों पर गंभीर अपराधिक मामले लंबित हैं। इनमें धीरेंद्र प्रताप सिंह पर 29, सुशील कुमार पर 14, राम प्रकाश यादव पर 11, जितेंद्र सिंह उर्फ बबलू पर 12 तथा मुख्तार अंसारी पर 13 मामले लंबित हैं। करोड़पति हैं 127 विधायक एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक मौजूदा समय में 127 विधायक करोड़पति हैं। इनमें सबसे ज्यादा बीएसपी के 51, सपा के 38, बीजेपी के 16 और बाकी अन्य पार्टियों के हैं। सर्वाधिक संपत्ति वाले विधायकों में गोंडा के अजय प्रताप सिंह उर्फ लल्ला भइया, इलाहाबाद के नंद गोपाल गुप्ता उर्फ नंदी, बदायूं में बिसौली के उमलेश यादव, बदायूं में सहसवां के विधायक डीपी यादव, उन्नाव के दीपक कुमार, रामपुर के नवाब काजिम अली खान उर्फ नावेद मियां, मेरठ के लाखीराम नागर, संत रविदास नगर के विजय कुमार, सुल्तानपुर में अमेठी की अमिता सिंह और बागपत से विधायक कौकब हमीद खान अमीर विधायकों की सूची में शामिल हैं।

Saturday, January 8, 2011

अलगाववादियों के मुखिया का कबूलनामा

मीरवाइज मौलवी मोहम्मद फारूक, अब्दुल गनी लोन और जेकेएलएफ के अब्दुल अहद वानी समेत कई अलगाववादी नेताओं को सेना या पुलिस ने नहीं, बल्कि उनके अंदर के लोगों ने ही मरवाया है। हुर्रियत कांफ्रेस के नरमपंथी धड़े के नेता अब्दुल गनी बट्ट के इस बयान ने कश्मीर पर सियासत का खेल खेलने वालों के चेहरे से एक बार फिर नकाब हटा दिया है। पिछले दो दशकों में आतंकवादियों की हिंसा, कट्टरवाद और पाकिस्तान की नीतियों पर सवाल खड़े करने वाले उदारवादी नेताओं को मौत के घाट उतार दिया गया। इन हत्याओं का दोष सेना या पुलिस पर मढ़कर कट्टरपंथी और अलगाववादी ताकतें अपने नापाक इरादों में काफी हद तक कामयाब भी रही हैं। इन अलगाववादी ताकतों ने कभी अवाम की भावनाओं को भड़काकर तो कभी पैसे देकर पत्थरबाजी कराकर कश्मीर में अमन बहाली की हर कोशिशों में रुकावट डालने का काम किया है। सबसे हैरानी की बात यह है कि पीडीपी जैसे तमाम राजनीतिक दल सुलगते कश्मीर पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकते नजर आते हैं और अरुंधति राय जैसे लोग यह कहने की हिमाकत करते हैं कि कश्मीर कभी भारत का अभिन्न अंग नहीं रहा। उमर अब्दुल्ला हों या महबूबा मुफ्ती, ऐसे तमाम लोग हैं जो कभी घाटी की स्वायत्तता तो कभी ज्यादा अधिकारों की बात करके अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करने में जुटे हैं। खुद की नाकामियों की वजह से जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को जब अपनी राजनीतिक जमीन खिसकती दिखाई देती है तो वह जम्मू-कश्मीर के विलय को अपूर्ण बता डालते हैं। केंद्र सरकार की तरफ से नियुक्त किए वार्ताकार बातचीत के लिए कट्टरपंथी ताकतों के घर का दरवाजा खटखटाते हैं और कश्मीर समस्या के समाधान के लिए पाकिस्तान को शामिल किए जाने की बात करते हैं। हुर्रियत कांफ्रेंस के नरमपंथी धड़े के नेता अब्दुल गनी बट्ट के बयान के बाद अब अरुंधति राय जैसे लोग खामोश क्यों हैं? सेना या पुलिस की कार्रवाई पर उंगली उठाने वाले तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ता बट्ट साहब के खुलासे के बाद अब अपने मुंह पर ताले क्यों डाले हुए हैं? पिछले दो दशक में यह पहला मौका है, जब किसी अलगाववादी नेता ने यह माना है कि उनके बड़े नेताओं को सेना या पुलिस ने नहीं, बल्कि उनके अंदर के लोगों ने ही मरवाया है। अब्दुल गनी लोन के साथी रहे बट्ट ने कट्टरपंथी गुट के प्रमुख सैयद अली शाह गिलानी को आत्मनिरीक्षण की सलाह भी दे डाली है। उदारवादी अब्दुल गनी लोन की हत्या 21 मई 2002 को कर दी गई थी। लोन एकमात्र ऐसे नेता थे, जिन्होंने पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में जाकर वहां धार्मिक कट्टरपंथियों की जमकर आलोचना की थी। कुल मिलाकर कश्मीर पर सियासत के इस खेल में पड़ोसी मुल्क अपने नापाक इरादों के जरिए घाटी में अशांति फैला रहा है और हम कोरी बयानबाजी और वार्ताकारों की जमात जुटाकर कश्मीर समस्या का हल निकालने में जुटे हैं। हिंदुस्तान की जनता के मन में यह सवाल बार-बार कौंधता है कि आजादी के इतने बरसों के बाद भी कश्मीर समस्या को सुलझाने के लिए कोई ठोस पहल क्यों नहीं की गई? घाटी के बिगड़ते हालात को काबू में करने के लिए किसी भी केंद्र सरकार या राज्य सरकार ने दमदारी के साथ अब तक कोई कदम क्यों नहीं उठाया? केंद्र सरकार हो या फिर जम्मू-कश्मीर सरकार, कश्मीर समस्या के समाधान के लिए हमारा रवैया शुरू से ही ढुलमुल रहा है। अब तक हम तुष्टिकरण की राजनीति करते रहे और घाटी में अलगाववाद की जड़ें गहरी होती चली गई। 1990 से लेकर अब तक घाटी में सीमा पार आतंकवाद बेकसूर लोगों की जानें लेता रहा। सेना के जवान और अफसर शहीद होते रहे, लेकिन हमारी सरकारें कुछ ठोस कदम उठाने की बजाय कश्मीर की जनता को अलग-अलग मात्रा में स्वायत्तता दिलाने का राग अलापती रहीं। स्वायत्तता के नाम पर जम्मू-कश्मीर में राजनीति का खेल बरसों से खेला जा रहा है, लेकिन संविधान की धारा 370 (जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा) को लेकर पुनर्विचार करने की जरूरत केंद्र सरकार ने कभी भी नहीं उठाई। 7 अगस्त 1952 को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की उस बात को राजनीतिक नफे-नुकसान से ऊपर उठकर क्यों नहीं देखा गया, जिसमें उन्होंने कहा था कि धारा 370 भारत को विखंडित कर देगी और यह उन लोगों को मजबूत कर सकती है, जो यह भरोसा रखते हैं कि भारत एक देश नहीं, बल्कि कई भिन्न राष्ट्रों का समूह है। शेख अब्दुल्ला की राज्य के लिए अलग झंडे की जिद पर मुखर्जी ने साफ कहा था कि आप निष्ठा को नहीं बांट सकते और यह कोई आधा-आधा वाला मामला नहीं है। 1952-53 के पहले की स्थिति को बहाल करने की मांग करने वालों को यह समझना होगा कि केंद्र सरकार राज्य की पंचवर्षीय योजना के लिए सारा धन मुहैया कराती है। इसके साथ ही गैर योजना खर्च के एक बड़े हिस्से को भी केंद्र वहन करता है। इतना ही नहीं, केंद्र की तरफ से जम्मू-कश्मीर को मिलने वाली धन राशि में 90 फीसदी सहायता के रूप में होती है और बाकी 10 फीसदी कर्ज के रूप में। जबकि दूसरे राज्यों में यह राशि 70 फीसदी कर्ज के तौर पर होती है और 30 फीसदी सहायता के रूप में होती है। कश्मीर को लेकर आज हमें तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू या फिर इतिहास की गलतियों का जिक्र करने की जरूरत नहीं, बल्कि हमें यह देखना होगा कि मौजूदा हालात में हम किस तरह इस समस्या का स्थायी समाधान ढूंढ़ सकते हैं? इसमें कोई शक नहीं कि कश्मीर घाटी में अमन-चैन की बहाली के लिए अर्थव्यवस्था में सुधार बेहद जरूरी है। हर आदमी के हाथ में रोजगार होगा तो पत्थर उठाकर फेंकने वाले हाथ भी अलगाववादियों को कम ही मिल सकेंगे, लेकिन इन सबके बावजूद कश्मीर में अलगाववाद की फैल चुकी जड़ों को किसी बड़े आर्थिक पैकेज भर से नहीं उखाड़ा जा सकता। यह बात केंद्र और राज्य सरकार भी जानती है कि घाटी से सेना की तादाद कम कर कश्मीर समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता। अलगाववादी ताकतों के घर सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल लेकर पहुंचने से हम विश्व बिरादरी को एक सकारात्मक संदेश तो दे सकते हैं, लेकिन अलगाववाद के नाम पर अपनी रोटी सेंकने वालों को मुख्यधारा से नहीं जोड़ सकते। बंकरों को कम कर या सेना की तादाद कम कर घाटी में हालात नहीं सुधारे जा सकते हैं। आज जरूरत इस बात की है कि केंद्र सरकार राज्य में आर्थिक पैकेज के साथ-साथ घाटी में सेना के मनोबल को भी बरकरार रखे। इसके साथ ही हाशिए पर रहकर अपनी जिंदगी गुजर-बसर कर रहे कश्मीरी पंडितों का पुनर्वास भी इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए उतना ही जरूरी है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

अलग राज्य से कम कुछ भी मंजूर नहीं : टीआरएस

आंध्र प्रदेश से अलग तेलंगाना राज्य के गठन संबंधी आंदोलन को धार देने वाली तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) ने श्रीकृष्ण समिति की सिफारिशों को सिरे से खारिज कर दिया है। टीआरएस के मुखिया के.चंद्रशेखर राव ने गुरुवार को यहां कहा कि तेलंगाना के लोग पृथक तेलंगाना राज्य से कम कुछ भी मंजूर नहीं करेंगे जिसकी राजधानी हैदराबाद होगी। तेलंगाना के मुद्दे पर बेमियादी भूख हड़ताल कर चुके राव ने कहा कि केंद्र ने यदि पृथक तेलंगाना का गठन नहीं किया तो वह इसके विरोध में फिर से बेमियादी भूख हड़ताल करेंगे। उन्होंने कहा कि मैंने पहले ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से अपील की थी कि वे तेलंगाना के मसले पर हिचकिचाएं नहीं और आगे बढ़कर 9 दिसंबर, 2009 को किए अलग राज्य संबंधी वादे को पूरा करें। उधर, समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक होते ही यहां अलग राज्य के लिए लंबे समय से आंदोलनरत छात्र सड़कों पर उतर आए। उग्र छात्रों ने उस्मानिया विश्वविद्यालय परिसर में एक बस फूंक दी। छात्रों ने प्रदर्शन कर पथराव किया। छात्रों को तितर-.बितर करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े। छात्रों की संयुक्त कार्रवाई समिति ने श्रीकृष्ण समिति की रिपोर्ट के विरोध में शुक्रवार को तेलंगाना बंद का भी आह्वान किया है। पुलिस ने बताया कि तेलंगाना समर्थक छात्रों ने श्रीकृष्ण समिति की रिपोर्ट के विरोध में विवि परिसर से राजभवन तक मार्च निकालने की कोशिश की और पुलिस ने जब उन्हें रोका जो उन्हें पुलिस पर ही पथराव किया। इसमें चार छात्र घायल हो गए। घायलों को एक अस्पताल में भर्ती कराया गया है। पुलिस उपायुक्त वाई गंगाधर ने कहा कि स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है। गड़बड़ी की आशंका से पुलिस ने राज्य भर में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए थे। राज्य के गृह मंत्री पी.सबिता रेड्डी ने डीजीपी ए.अरविन्दा कुमार और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ कानून व्यवस्था का जायजा लिया।

श्रीकृष्ण समिति का झुकाव क्षेत्रीय परिषद के पक्ष में

अलग तेलंगाना राज्य की मांग पर विचार के लिए गठित की गई श्रीकृष्ण समिति ने अपनी राय एकीकृत आंध्र प्रदेश के पक्ष में ही दी है। इसके मुताबिक तेलंगाना इलाके के आर्थिक विकास एवं राजनीतिक सशक्तिकरण के लिए सबसे अच्छा विकल्प एक क्षेत्रीय परिषद का गठन होगा। अगर इस विकल्प को लागू करवाना मुमकिन नहीं हो तो हैदराबाद तेलंगाना को देते हुए इसे अलग राज्य बनाया जा सकता है। समिति ने जो तीसरा विकल्प सुझाया है उसके मुताबिक आंध्र प्रदेश को दो राज्यों में विभक्त करने के साथ ही हैदराबाद को एक अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाया जा सकता है। श्रीकृष्ण समिति ने अपनी 600 पेज की दो खंड की रिपोर्ट में छह विकल्पों पर विचार किया है। मगर इनमें से यथास्थिति बनाए रखने सहित तीन विकल्पों को अव्यवहारिक बताते हुए खारिज कर दिया है। अपनी रिपोर्ट में इसने तेलंगाना के सामाजिक-आर्थिक विकास और राजनीतिक सशक्तिकरण के लिए एक वैधानिक अधिकार संपन्न क्षेत्रीय परिषद गठित करने को सर्वश्रेष्ठ विकल्प बताया है। परिषद को सौंपे जाने वाले विषयों में विकास की उप-योजना लागू करवाने के लिए इसके पास संपूर्ण अधिकार होंगे। संवैधानिक रूप से इसके अधिकारों को स्थापित करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 371 के खंड 21 में संशोधन करना होगा। समिति ने साफ तौर पर कहा है कि राज्य का विभाजन पहला विकल्प नहीं हो सकता,लेकिन राज्य के तीनों क्षेत्र तेलंगाना, रायलसीमा और तटीय आंध्र प्रदेश अगर इस पर सहमत हों तो इसे सीमांध्र और तेलंगाना के रूप में दो भाग में विभाजित किया जा सकता है। ऐसे में मौजूदा राजधानी हैदराबाद भी तेलंगाना को दी जा सकती है। समिति ने माना है कि दूसरे विकल्प का खतरा यह है कि रायलसीमा और तटीय क्षेत्र में इससे नाराजगी बढ़ सकती है और अलग रायलसीमा राज्य के लिए हिंसक आंदोलन भी तेज हो सकता है। इसलिए श्रीकृष्ण समिति ने राज्य को तीन प्रशासनिक भागों में बांटने का विकल्प भी पेश किया है। इसके तहत राजधानी हैदराबाद के साथ आसपास के इलाके को मिला कर 12 हजार वर्ग किलोमीटर का केंद्र शासित प्रदेश भी बनाया जाए। समिति ने कहा है कि तेलंगाना के बहुत से लोगों के मन में यह धारणा बन गई है कि उनके क्षेत्र की उपेक्षा की गई है,जबकि आर्थिक समीक्षा में पाया गया कि राज्य में रायलसीमा का इलाका सबसे पिछड़ा है।