Showing posts with label २ जनवरी २०११. Show all posts
Showing posts with label २ जनवरी २०११. Show all posts

Tuesday, January 4, 2011

कौन होगा इस साल का सिकंदर



नए साल को हर कोई उम्मीद के साथ देखता है और सबकी तमाम ख्वाहिशें भी होती हैं। राजनीति की दुनिया भी इससे अलग नहीं है। राजनीति की दुनिया में विगत के अच्छे-बुरे हर कदमों की बुनियाद नई संभावनाओं और चुनौतियों को लेकर आ खड़ी होती है। जाहिर है, 2011 भी राजनीति की दुनिया के लिए नई चुनौतियां लेकर आएगा

नए साल की आहट के साथ ही मन के कोने में दुबकी एक इच्छा जोर मारने लगती है। हर शख्स की यही ख्वाहिश होती है कि नए साल में विगत की दुश्वारियों का सामना न हो। राजनीति की दुनिया की ख्वाहिशें इससे अलग नहीं होतीं, लेकिन वहां ऐसा संभव नहीं होता। राजनीति की दुनिया में विगत के अच्छे-बुरे हर कदमों की बुनियाद नई संभावनाओं और चुनौतियों को लेकर आ खड़ी होती हैं। जाहिर है, 2011 भी राजनीति की दुनिया के लिए नई चुनौतियां लेकर आएगा। भावी घटनाओं का सटीक विवरण शायद भविष्यवक्ता भी न बता पाएं, लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि यह नया साल न सिर्फ कांग्रेस, बल्कि भारतीय जनता पार्टी के लिए भी खासा अहम होगा। राहुल गांधी को जिस तरह भारतीय राजनीति में प्रोजेक्ट किया जा रहा है, उससे साफ है कि अगले साल भी उनकी सक्रियता बनी रहेगी। इस साल तमिलनाडु, पांडिचेरी, केरल, असम और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। अगर असम को छोड़ दें तो इन विधानसभा चुनावों में भाजपा का कुछ खास दांव पर नहीं लगा है। लिहाजा, उसे इन राज्यों में बेहतर प्रदर्शन का उतना दबाव नहीं होगा, जितना कांग्रेस पर होगा। चूंकि राहुल गांधी को ही कांग्रेस का भावी खेवनहार माना जा रहा है। लिहाजा, उनकी कोशिश यही होगी कि केरल में कांग्रेस की वापसी हो। केरल के पड़ोसी राज्य तमिलनाडु में कांग्रेस की पकड़ मजबूत हो, ताकि किसी राजा को मंत्रिमंडल में रखने की कांग्रेस की मजबूरी कम हो। जैसा कि केरल की राजनीति का अब तक का इतिहास रहा है, ऐसा माना जा रहा है कि वहां इस बार कांग्रेस की बारी है। वैसे भी वीएस अच्युतानंदन की अगुआई में वामपंथियों की सरकार का केरल में दोबारा सत्तारूढ़ होना खुद वामपंथियों को ही हजम नहीं होगा। केरल की मा‌र्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में जितनी गुटबाजी है, उससे तय है कि उनकी आपसी लड़ाई ही केरल में कांग्रेस को फायदा पहुंचाएगी यानी इस बार केरल में कांग्रेस की वापसी लगभग तय मानी जा सकती है। भारतीय राजनीति कितनी विडंबनापूर्ण है कि जिस आरएसएस को गांधी के हत्यारे और सांप्रदायिक के तौर पर कांग्रेस पूरे देश में प्रचार करती रहती है, केरल में वामपंथियों के विरोध के लिए उसी आरएसस का साथ लेने से नहीं हिचकती। लेकिन जिस तरह संघ ने बीजेपी की कमान अपने हाथों में थाम रखी है, उससे संभव है कि संघ इस बार केरल में बीजेपी को तीसरे मोर्चे के तौर पर उभारने की कोशिशें जरूर तेज करेगा। पश्चिम बंगाल में तो माना ही जा रहा है कि वामपंथ का तंबू इस बार उखड़ जाएगा। निश्चित तौर पर इसका श्रेय ममता बनर्जी को ही जाएगा। ममता की जैसी राजनीतिक अदाएं रही हैं, उससे साफ है कि कांग्रेसियों को इस कामयाबी के लिए राहुल का जयगान करना आसान नहीं होगा। अब तक के माहौल के मुताबिक ममता का साथ देना कांग्रेस की मजबूरी है, लेकिन यह भी संभव है कि तृणमूल कांग्रेस को बिहार में जनता दल यूनाइटेड की तरह भारी बहुमत मिल जाए। अगर ऐसा होता है तो वे कांग्रेस का साथ छोड़ने से भी नहीं हिचकेंगी। ऐसे में कांग्रेस की राजनीतिक राह में मुश्किलें खड़ी हो सकतीं हैं। रही बात असम की तो पिछले विधानसभा चुनावों में ही अगर असम गण परिषद दो फाड़ नहीं हुआ होता तो हितेश्वर सैकिया की वापसी संभव नहीं होती, लेकिन हाल के दिनों में जिस तरह जयश्री गोस्वामी सारे गिले-शिकवे भूलकर पति के राजनीति पुनर्वास की तैयारियों में जुटी हुई हैं, असम गण परिषद के दूसरे धड़े के अध्यक्ष चंद्रमोहन पटवारी प्रफुल्ल कुमार महंत के साथ गलबहियां डाले घूम रहे हैं, उससे असम में कांग्रेस की दुश्वारियां बढ़नी तय है। हालांकि प्रवासी बंगाली वोटरों में भाजपा की पकड़ बनी हुई है। लिहाजा, उसने हार नहीं मानी है और 1999 की तरह एक बार फिर असम गण परिषद को अपने साथ लाने की कोशिशों में जुटी हुई है। विधानसभा चुनावों को ही ध्यान में रखते हुए पार्टी ने अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक अगले महीने गुवाहाटी में करने जा रही है यानी अगले साल असम में नए तरह के राजनीतिक समीकरण देखने को मिलें तो हैरत नहीं होनी चाहिए। इन राज्यों की जीत-हार का हिंदी हृदय प्रदेशों में भले ही ज्यादा असर न पड़े, लेकिन यह तय है कि अगर वामपंथी अपने गढ़ वाले दोनों राज्यों में सत्ता की दुनिया से दूर हुए तो उनका राजनीतिक दिमाग कांग्रेस को परेशान करने से नहीं चूकेगा। कांग्रेस विरोध की लहर पैदा करने में जितनी महारत वामपंथियों को हासिल है, उतना भाजपा का भी नहीं है। यह बात दीगर है कि सांप्रदायिकता के नाम पर वामपंथियों की भाजपा से राजनीतिक दूरी बनी रहेगी। लेकिन हाल के दिनों में जिस तरह संसद और उसके बाहर वामपंथियों ने महंगाई और 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के मसले पर भाजपा के साथ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के खिलाफ मोर्चा खोला है, उससे उम्मीद बनती है कि दोनों एक बार फिर 1989 की तरह कांग्रेस के खिलाफ अभियान में शामिल न हो जाएं। 1989 में भाजपा और वामपंथियों को साथ लाने का मोहरा विश्वनाथ प्रताप सिंह बने थे, इस बार नीतीश कुमार और शरद यादव बन सकते हैं। राजनीति जितनी संभावनाओं का खेल है, आशंकाओं का मेल भी है। लिहाजा, आज जिन्हें लग रहा है कि अब लालू प्रसाद यादव खत्म हो गए और नीतीश कुमार के साथ वे कभी नहीं जा सकते, वही लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान भी वामपंथियों के साथ कांग्रेस विरोधी अभियान में शामिल हो सकते हैं। वामपंथी मुखौटे के साथ सांप्रदायिकता विरोधी छवि बनाए रखते हुए सत्ता विरोधी अभियान में शामिल होना उनकी राजनीतिक मजबूरी होगी। इसके आसार कांग्रेस के सवा सौ साल पूरे होने पर आई किताब के तथ्यों को लेकर आई प्रतिक्रियाओं में भी देखा जा सकता है। कांग्रेस एंड द मेकिंग ऑफ द इंडियन नेशन नामक किताब में पार्टी ने जयप्रकाश नारायण को अधिनायकवादी और लोकतंत्र विरोधी करार दिया है। जेपी को लेकर की गई ऐसी प्रतिक्रिया पर बिफरे लालू यादव और शरद यादव की भाषा एक जैसी रही। दोनों का कहना था कि कांग्रेस को अपने गुनाहों की कीमत चुकानी होगी। इस बयान को ही सूत्र वाक्य मानें तो एक हद तक 2011 के राजनीतिक परिदृश्य का खुलासा हो सकता है। अगर गैर कांग्रेसवाद के पुराने अलंबरदार एक बार फिर एक हो गए तो कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ जाएंगी, लेकिन सबसे बड़ा राजनीतिक संकट यह है कि इस पूरे अभियान में जिस पार्टी को अगुआई करनी चाहिए, उस भाजपा में आपसी समन्वय और एकता नजर नहीं आ रही। कांग्रेस की कमी यह है कि वह दूसरी लाइन के लिए भ्रष्ट और अक्षम लोगों पर ज्यादा भरोसा करती है। दोनों पार्टियों में यह संकट हर साल की तरह 2011 में ही नजर आएगा। यह सच है कि उत्तर प्रदेश में 2011 में चुनाव नहीं होने जा रहा है, लेकिन इसके ठीक अगले साल यानी 2012 की शुरुआत में ही उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव संभावित हैं। बहुजन समाज पार्टी में मायावती के लिए कोई चुनौती तो नहीं होगी, लेकिन उन्हें बाहरी चुनौतियां मिलती रहेंगी। पंचायत चुनावों में जिस तरह कुछ जिलों में बीएसपी विरोधी तमाम ताकतें साथ नजर आई हैं, उसे लिटमस टेस्ट माना जा सकता है। यानी मायावती को हराने के लिए बाकी दलों में अंदरखाने में एक हद तक एकता होने की संभावना नजर आ रही है। इसी तरह हरियाणा में कांग्रेस को फिलहाल कोई चुनौती नजर नहीं आ रही, लेकिन 2010 के आखिरी महीने में हरियाणा जनहित कांग्रेस नेता कुलदीप विश्नोई ने जिस तरह हुंकार भरी है, उससे उनकी राजनीतिक वकत बढ़ी है। इस पर भाजपा की निगाह है। हरियाणा जनहित कांग्रेस अपने विधायकों का भूपिंदर सिंह हुड्डा द्वारा ले उड़ना पचा नहीं पाई है। लिहाजा, आने वाले वक्त में भाजपा और हरियाणा जनहित कांग्रेस में नजदीकी बढ़ सकती है। पंजाब में बादल सरकार भी भ्रष्टाचार के आरोपों से जूझ रही है। प्रकाश सिंह बादल को घर से लेकर अमरिंदर सिंह से चुनौती मिल रही है। जिनसे उन्हें पूरे साल जूझना पड़ेगा। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान अब तक उमा भारती को भाजपा से दूर रखने में कामयाब रहे हैं। केंद्र में सुषमा स्वराज उनकी सरपरस्त बनी हुई हैं, लेकिन एक बार उमा अगर पार्टी में शामिल हो गई तो सबसे ज्यादा चुनौती शिवराज की ही बढ़ेगी। यह ठीक है कि दक्षिण में कमल खिलाने वाले येदयुरप्पा अपनी गद्दी बचाने में कामयाब रहे, लेकिन उन पर आरोपों की फेहरिस्त अभी कम नहीं हुई है। उन्हें पूरे साल विपक्ष से कहीं ज्यादा अपनी ही पार्टी की चुनौतियों से जूझना पड़ेगा। आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू की भूख हड़ताल भले ही कामयाब रही हो, लेकिन वहां कांग्रेस के लिए असल खतरा जगनमोहन रेड्डी ही होंगे। अभी उन्होंने अपनी अलग पार्टी तो नहीं बनाई है, लेकिन यह तय है कि यदि एक बार उन्होंने पार्टी बनाई तो उनकी तरफ कांग्रेसी विधायकों का जाना शुरू हो जाएगा और निश्चित तौर पर यह मुख्यमंत्री किरण रेड्डी की राजनीतिक सेहत के लिए अच्छा नहीं होगा। महाराष्ट्र की कांग्रेस-एनसीपी सरकार को जितना खतरा शिवसेना और भाजपा से नहीं है, उससे कहीं ज्यादा दोनों पार्टियों के आपसी अंतर्विरोधों से खतरा है। घोटाले दर घोटाले की खबरों से कांग्रेस पार्टी को दो-चार होना पड़ रहा है। इन घोटालों को उजागर करने में निश्चित तौर पर मीडिया की भूमिका है, लेकिन इन्हें हवा कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अंदर सत्ता संतुलन साध रहे लोग ही दे रहे हैं। चूंकि ऐसे लोगों के बीच आपसी राजनीतिक तालमेल बनता नहीं दिख रहा है, लिहाजा अगले साल तय है कि पृथ्वीराज चव्हाण की मुश्किलें बनी रहेंगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


कांग्रेस की बौद्धिक बेईमानी

आपातकाल का दोष संजय गाँधी पर मढ़ने को कांग्रेस की बौद्धिक बेईमानी करार दे रहे हैं लेखक…

कांग्रेस ने कांग्रेस ऐंड द मेकिंग ऑफ इंडियन नेशन शीर्षक से दो खंडों में पुस्तक प्रकाशित की है। पार्टी 125 वर्षों का भारतीय इतिहास लिखकर उसकी कुल पूंजी खुद चुरा लेने के चक्कर में है। राष्ट्रीय आंदोलन और उसके विकास के इतिहास के साथ बहुत कम छेड़छाड़ की गई है। भारतीय समाजवाद के पितामह दादा भाई नौरोजी को इज्जत के साथ याद किया गया है। मोहम्मद अली जिन्ना के उदारवादी व हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए प्रारंभ में किए गए प्रयासों को ईमानदारी से स्वीकार किया गया है। भारत में लोकतांत्रिक मूल्यों के संग्राम की शुरुआत 1916 के लखनऊ करार के बाद शुरू हुई थी। खिलाफत आंदोलन के बहाने गांधी और जिन्ना ने हिंदू-मुस्लिम एकता की शुरुआत की थी, इसका भी संकेतात्मक उल्लेख है। मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन पद्धति को भविष्य में हिंदू-मुसलमान के झगड़े का कारण समझने वाले जिन्ना 1920 के बाद पूरी तौर पर मुस्लिम हितैषी और मुस्लिम लीग के समर्थक क्यों हो गए? यह चिंतन का मुद्दा होना चाहिए। जिन्ना को लीग से नफरत थी, फिर वह उसी के अध्यक्ष क्यों हो गए? इतनी छोटी पुस्तक में इतिहास के जितने पेंच हैं उनकी समीक्षा की अपेक्षा नहीं की जा सकती, लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने के बाद कांग्रेस सोशलिस्ट के दबाव में गांधीजी को अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेंकने का मन बनाना पड़ा। खामोश बैठे नेहरू को भी सोशलिस्ट लोगों का दबाव स्वीकार करना पड़ा, जिसके फलस्वरूप 1942 का महासंग्राम शुरू हुआ। कांग्रेस द्वारा प्रकाशित किसी साहित्य में पहली बार 1942 की क्रांति में जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया, अच्युत पटवर्धन, अरुणा आसफ अली, सुचेता कृपलानी सहित सभी समाजवादी नेताओं का उल्लेख है। यह पुस्तक 1969 तक कांग्रेस के इतिहास के संबंध में संतुलित है, किंतु जबसे कांग्रेस एकाधिकारवादी हुई, भ्रष्टाचार और परिवादवाद की स्तंभ बनी, उसके बाद के इतिहास के साथ बौद्धिक बेईमानी की गई है। 1969 में कांग्रेस में बड़ी टूट हुई। बेंगलूर में कांग्रेस चुनाव कमेटी की बैठक में डॉ. जाकिर हुसैन की मृत्यु से रिक्त हुए राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार निश्चित होना था। पार्लियामेंट्री बोर्ड ने बहुमत से नीलम संजीव रेड्डी का नाम स्वीकार कर लिया। इंदिरा गांधी वहां उपस्थित थीं। कांग्रेस अध्यक्ष निजलिंगप्पा ने रेड्डी के नाम का प्रस्तावक होने के लिए इंदिरा गांधी से आग्रह किया। उन्होंने कांग्रेस के फैसले का सम्मान करते हुए रेड्डी के प्रस्तावक रूप में नामांकन किया, किंतु उन्हीं के लोगों ने कार्यवाहक राष्ट्रपति वीवी गिरि को उम्मीदवार बना दिया और इंदिरा गांधी के इशारे पर आत्मा की पुकार के आधार पर राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के लिए वोट करने की मांग तेज हुई। कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी रेड्डी की हार ने कांग्रेस के विभाजन के रास्ते खोल दिए। कांग्रेस का स्वरूप व्यक्तिवादी, हिंसावादी, किसी भी कीमत पर कुर्सी पर चिपके रहने वाला हो गया। इन्हीं परिस्थितियों में संजय गांधी का प्रादुर्भाव हुआ। अपने से विपरीत राय रखने वालों के लिए आदर का युग समाप्त हुआ। इसी बीच गुजरात में नव निर्माण समिति के नेतृत्व में 1973 में आंदोलन की शुरुआत हुई। बिहार से जयप्रकाश ने शंख फूंका। कांग्रेसियों ने जेपी पर फासिस्ट शक्तियों से मिले होन का आरोप मढ़ दिया। इससे जेपी के आंदोलन को बल मिला। कांग्रेस जेपी के राष्ट्रीय आंदोलन की पूंजी को नजरअंदाज कर उनकी सत्य निष्ठा पर हमले करने लगी। इसी बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट में राजनारायण द्वारा दाखिल चुनाव याचिका की सुनवाई तेज हुई। हाईकोर्ट ने तकनीकी आधार पर इंदिरा गांधी का 1971 का चुनाव रद्द घोषित कर दिया। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में अपील दाखिल की और हाईकोर्ट के फैसले पर रोक की याचना की। माननीय जज ने कुछ शर्तो के साथ हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील स्वीकार की। कांग्रेस के अंदर नेतृत्व परिवर्तन की मांग उठने लगी। देश में आपातकाल की घोषणा का मुख्य बिंदु चुनाव याचिका का फैसला था। देश की संसद में जन प्रतिनिधित्व कानून में संशोधन कर दिए गए। संविधान में मनमाफिक परिवर्तन किए गए। लगभग 19 महीने बाद आपातकाल समाप्त हुआ। दमन की चक्की में पिस रहे सभी लोकतांत्रिक दलों के नेताओं ने एक चिन्ह पर जनता पार्टी के नाम पर चुनाव लड़ा। दक्षिण के राज्यों को छोड़कर कांग्रेस का सफाया हो गया। इसलिए आपातकाल की ज्यादती का ठीकरा अकेले संजय गांधी के सिर पर फोड़ना बौद्धिक वेईमानी है। केवल आज के गांधी परिवार के सत्ता के दावेदारों को वचाने के लिए दोष संजय गांधी पर डाल दिया गया। जब कभी नेहरू-गांधी परिवार की सत्ता खतरे में पड़ी, दोष किसी और पर डालकर अपना पल्ला झाड़ लिया गया। इस पुस्तक में नेहरू-इंदिरा युग का आकलन कुछ इसी आधार पर किया गया है। (लेखक राज्यसभा सदस्य हैं)

चुनौतियों का चक्रव्यूह


लेखक नए वर्ष में केंद्र सरकार के समक्ष राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौतियां बढ़ती देख रहे हैं
बीता वर्ष उन तमाम विरोधाभासों और विडंबनाओं के लिए जाना जाएगा जिनकी मिसाल मिलना शायद मुश्किल हो। बीते वर्ष जहां भारत की अंतरराष्ट्रीय ख्याति बढ़ी और अमेरिका समेत सभी प्रमुख देशों से भारत के रिश्ते प्रगाढ़ हुए वहीं सरकारी अकर्मण्यता, भ्रष्टाचार और बेकाबू महंगाई ने देश के लिए मुसीबतें खड़ी कीं। भारत की बढ़ती आर्थिक शक्ति का दुनिया लोहा मान रही है। एक बड़े मध्यवर्ग से निर्मित विशाल बाजार पूरे विश्व को आकर्षित कर रहा है। भारतीय उद्योग घरेलू बाजार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर भी अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं। आर्थिक दृष्टि से भारत के हालात हर लिहाज से मजबूत हैं और इसी कारण यह माना जा रहा है कि आने वाले समय में भारत आर्थिक प्रगति में चीन को भी पछाड़ सकता है। भारत की इस प्रगति के लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था को श्रेय दिया जाता है, लेकिन यही लोकतांत्रिक व्यवस्था घरेलू मोर्चे पर असफल सिद्ध हो रही है और इससे देश की अंतरराष्ट्रीय छवि पर असर पड़ रहा है। जो देश भारत की प्रशंसा कर रहे हैं वही भारत की असफलताओं पर नजर भी गड़ाए हैं। इस नए वर्ष में केंद्र सरकार के सामने अनेक चुनौतियां हंै, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस के सहयोगी दलों-द्रमुक और तृणमूल कांग्रेस की ओर से खड़ी की जा सकती हैं। 2जी घोटाले में द्रमुक को जिस तरह कठघरे में खड़ा किया गया उसके कारण वह कभी भी केंद्र सरकार के लिए परेशानी का सबब बन सकता है। पश्चिम बंगाल में चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आते जा रहे हैं, ममता बनर्जी केंद्र पर दबाव बढ़ाती जा रही हैं। आंध्र प्रदेश में भी कांग्रेस के बागी नेता जगनमोहन पार्टी के लिए चुनौती बन गए हैं और साथ ही तेलंगाना मामला भी नए सिरे से मुसीबत बनकर उभरता दिख रहा है। स्पष्ट है कि नए वर्ष में कांग्रेस के साथ-साथ सरकार की राजनीतिक मुसीबतों का अंत होता नहीं दिख रहा। द्रमुक और तृणमूल कांग्रेस के अलावा कुछ अन्य घटक भी सरकार के लिए लिए परेशानी पैदा कर सकते हैं। इनमें प्रमुख है एनसीपी, जिसके मुखिया शरद पवार केंद्रीय कृषि और खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री हैं। वह महंगाई पर लगाम लगाने में बिलकुल भी समक्ष नहीं। केंद्र सरकार महंगाई पर लगाम लगाने के जितने दावे करती है, शरद पवार उतने ही असफल साबित होते चले जाते हैं। महंगाई बढ़ने के लिए वे जिन कारणों को जिम्मेदार ठहराते हैं वे उनकी बहानेबाजी का पर्याय बन गए हैं। संप्रग के घटक दल अपनी अकर्मण्यता के कारण न केवल सरकार के संचालन में मुसीबत बन रहे हैं, बल्कि प्रधानमंत्री पर भी दबाव बनाते दिख रहे हैं। माना जाता है कि प्रधानमंत्री अपनी छवि के अनुरूप एक स्वच्छ और पारदर्शी सरकार चलाना चाहते हैं, लेकिन गठबंधन राजनीति की मजबूरी के कारण वह घटक दलों की स्वार्थपरता पर अंकुश नहीं लगा पा रहे। आखिर यह तथ्य है कि 2 जी स्पेक्ट्रम मामले में प्रधानमंत्री कार्यालय ए.राजा के खिलाफ मुकदमे की अनुमति देने से बचता रहा। केंद्र सरकार के सामने एक अन्य बड़ी चुनौती बेकाबू होती महंगाई है और ऐसा लगता है कि इस चुनौती से इस वर्ष भी पीछा नहीं छूटने वाला। दो वर्षो से खाद्य पदार्थो के दामों में लगातार वृद्धि हो रही है, लेकिन प्रधानमंत्री चाहकर भी शरद पवार पर लगाम नहीं लगा पा रहे हैं। महंगाई पर रोक लगाने में मिल रही असफलता से प्रधानमंत्री की खुद की छवि भी प्रभावित होती हुई दिख रही है। उन पर विपक्ष का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। केंद्र सरकार खुद को कितना भी सक्षम क्यों न बनाए, आम जनता महसूस कर रही है कि यह सरकार अपनी समस्याओं का समाधान करने में समर्थ नहीं। यदि घटक दल उसकी परेशानी का कारण बन गए हैं तो फिर उसे ऐसी कोई पहल करनी पड़ेगी जिससे सत्ता का नेतृत्व करने वाले दल पर अनुचित दबाव न डाला जा सके। यदि कोई ठोस पहल हो तो गठबंधन राजनीति के संदर्भ में कोई नियम-कानून बनाए जा सकते हैं। यदि देश को आर्थिक विकास दर दहाई अंकों में ले जानी है तो इस नए वर्ष में आधारभूत ढांचे के निर्माण के लिए नए तौर-तरीके विकसित करने होंगे। यह आश्चर्यजनक है कि तमाम विफलताओं के बावजूद आधारभूत ढांचे के विकास के लिए कोई सही रूपरेखा नहीं बनाई जा रही है। इसके चलते राष्ट्रीय महत्व की तमाम योजनाएं-परियोजनाएं लंबित हो रही हैं। इन लंबित परियोजनाओं को बढ़ते भ्रष्टाचार से भी जोड़ कर देखा जाना चाहिए। आधारभूत ढांचे की मौजूदा दशा देश को बहुत महंगी पड़ सकती है। कम से कम सरकार को आधारभूत ढांचे के निर्माण में तेजी लाने के लिए तो कोई उपाय खोजना ही चाहिए। इसके साथ ही उसे शहरी क्षेत्रों के नियोजित विकास पर भी ध्यान देना चाहिए। ऐसा करके ही ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों को पलायन के चलते शहरों के चरमराते ढांचे को रोका जा सकता है। इस संदर्भ में योजनाएं तो बहुत हैं, लेकिन उन पर अमल नहीं हो पा रहा है। इसका एक बड़ा कारण राज्य सरकारों की शिथिलता और अदूरदर्शिता है। रही सही कसर केंद्र और राज्यों के बीच के तालमेल के अभाव ने पूरी कर दी है। नियोजित विकास के अभाव में समय और धन की तो बर्बादी होती ही है, शहर भी बेतरतीब ढंग से विकसित होते चले जाते हैं। इन सारी समस्याओं से हमारे नेता और नौकरशाह अवगत हैं, लेकिन वे मौजूदा तंत्र को बदलने की चेष्टा ही नहीं करना चाहते। सरकारी तंत्र की अकर्मण्यता का कारण खोजें तो उसके मूल में भ्रष्टाचार ही नजर आएगा। आज भारत भ्रष्ट देशों की सूची में लगभग शीर्ष पर है। उसकी तुलना कुछ निर्धन अफ्रीकी और अलोकतांत्रिक देशों से होने लगी है। उभरते भारत के लिए यह स्थिति शर्मनाक है। आज यह कहीं अधिक आवश्यक है कि भ्रष्टाचार की जांच के लिए कोई निष्पक्ष और सक्षम संस्था बने। यह काम सीवीसी और सीबीआइ के वश में नहीं। यह काम तो लोकपाल संस्था ही कर सकती है, बशर्ते उसे सक्षम बनाया जाए। राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो देश को एक निष्पक्ष और सक्षम लोकपाल आसानी से मिल सकता है। बेहतर हो कि उन सुझावों पर गौर किया जाए जो लोकपाल के लिए तैयार एक गैर सरकारी विधेयक में दर्ज किए गए हैं। बढ़ते भ्रष्टाचार के लिए आम लोगों का रवैया भी उत्तरदायी है, क्योंकि वे और विशेष रूप से कारपोरेट जगत के लोग कायदे-कानून तोड़ने के लिए उतावले रहते हैं। बेहतर होगा कि आम आदमी भी भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने की अपनी भूमिका पर विचार करे। भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने की पहल सरकार की ओर से भी होनी चाहिए और आम नागरिकों की ओर से भी। यह सही समय है जब इस धारणा को खारिज करने की पहल होनी चाहिए कि भ्रष्टाचार भारत के राजनीतिक-सामाजिक जीवन का एक अनिवार्य अंग बन गया है। नि:संदेह यह धारणा तब दूर होगी जब भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए कमर कसी जाएगी।