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Wednesday, June 15, 2011

भाजपा को मिलेगा बल


सिद्धार्थ शंकर गौतम छह वर्षो से भाजपा से निष्कासन झेल रहीं उमा भारती की आखिरकार पार्टी में वापसी हो ही गई। हालांकि उनकी वापसी के कयास राजनीतिक हलकों में काफी समय से लगाया जा रहा था। पार्टी के ही कुछ नेताओं की वजह से हाईकमान भी पशोपेश में था कि कहीं इससे पार्टी में ही फूट न पड़ जाए पर आखिरकार पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को संघ के आगे झुकना पड़ा और उमा की वापसी सुनिश्चित हो गई। 2003 में मध्य प्रदेश से दिग्विजय सिंह की सत्ता को उखाड़ फेंकने के बाद उमा का राजनीतिक ग्राफ काफी तेजी से ऊपर चढ़ा अपने संक्षिप्त मगर प्रभावपूर्ण शासनकाल में ही उमा ने प्रदेश में अपने कई समर्थक खड़े कर लिए थे, लेकिन जिस तेजी से उमा का प्रभाव बढ़ा उतनी ही तेजी से नीचे भी आया। 2005 में हुबली में तिरंगा यात्रा निकालने के मामले में उनके खिलाफ वारंट जारी हुआ फलस्वरूप उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा, बस यहीं से उनके राजनीतिक जीवन में गिरावट का दौर भी शुरू हो गया। उमा ने भाजपा की आपसी गुटबाजी और शीर्ष नेतृत्व से अपने तल्ख रवैये के चलते भारतीय जनशक्ति पार्टी बनाई। एक समय ऐसा लगा कि उमा अपनी पार्टी के जरिए भाजपा की नाक में दम कर देंगी, लेकिन उनकी पार्टी को मध्य प्रदेश में कोई खास सफलता नहीं मिली। यहां तक की उमा भी अपने गृह जिले टीकमगढ़ से विधानसभा चुनाव हार गईं। फिर भी जीवन के तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद उमा राजनीतिक जीवन में अपनी प्रासंगिकता बरकरार रखने में सफल रहीं। संघी पृष्ठभूमि का होना उमा के लिए संजीवनी का काम कर गया। उमा का भाजपा नेताओं से भले ही संबंध तल्ख रहे हों मगर संघ के नेताओं से उनके मधुर संबंधों के कारण उनका नागपुर आना-जाना बना रहा। उमा ने भले ही भाजपा से किनारा कर लिया हो मगर करिश्माई व्यक्तित्व तथा उनकी जनस्वीकारिता की कमी भाजपा को हमेशा खलती रही। उनकी भाजपा में वापसी के कई बार गंभीर प्रयास हुए मगर हर बार अक्खड़ छवि उनकी वापसी की राह में रोड़ा बनी। फिर संघ पृष्ठभूमि से संबंध रखने वाले नितिन गडकरी के भाजपा की कमान संभालने के बाद उमा की पार्टी में वापसी की चर्चाएं गर्म हो गईं। मगर भारी विरोध के चलते यह वापसी पुन: मूर्त रूप नहीं ले सकी। उमा की वापसी के कयास लग ही रहे थे कि हाल ही में उन्होंने गंगा शुद्धिकरण के अपने मिशन को खूब भुनाया। उत्तराखंड में भाजपा सरकार के खिलाफ ही उमा धरने पर बैठ गईं। ऐसा लगा मानो इस बार भी उनकी वापसी टल जाएगी मगर लखनऊ में भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी कि बैठक के समय जिस तरह नितिन गडकरी को नागपुर तलब किया गया वह यह बताने के लिए काफी था कि उमा का राजनीतिक वनवास अब खत्म ही होने वाला है और जब उमा की भाजपा में वापसी की औपचारिक घोषणा हुई तो सभी आशंकाएं सच साबित हुईं। संघ और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की सोच है कि 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उमा भारती प्रदेश में मायावती के मुकाबले पार्टी को मजबूती दे सकतीं हैं। अव्वल तो उमा अन्य पिछड़ा वर्ग, लोध जाति से हैं जिसका बुंदेलखंड में अच्छा-खासा प्रतिनिधित्व है। फिर उमा की आक्रामक छवि भी मायावती को टक्कर देती नजर आती है। उत्तर प्रदेश में भाजपा इस समय तीसरे नंबर की पार्टी है और चुनावी मुकाबले में आने के लिए जिस जोश की जरुरत है वह उमा ही पार्टी में फूंक सकती हैं। हालंकि उमा की वापसी को उत्तर प्रदेश के अधिकांश नेता भी पचा नहीं पाएंगे मगर यदि पार्टी को उत्तर प्रदेश का किला फतह करना है तो आपसी गुटबाजी को भुलाकर उमा को स्वीकार करना ही होगा। अन्यथा उनकी वापसी जिस मकसद से हुई है वह कभी परवान नहीं चढ़ पाएगी। उमा को उत्तर प्रदेश में लाकर भाजपा ने अनायास ही एक और संयोग बना दिया है। उमा ने मध्य प्रदेश से दिग्विजय सिंह का बोरिया-बिस्तर समेटा था, अब एक बार फिर दिग्विजय सिंह उत्तर प्रदेश कांग्रेस प्रभारी होने के नाते उनके सामने हैं। कहते हैं इतिहास अपने आपको दोहराता है और यकीन मानिए यदि इस बार भी उमा का जादू चला तो दिग्विजय सिंह के राजनीतिक जीवन पर ही सवालिया निशान लग जाएंगे। उमा भारती का अधिक आक्रामक होना राजनीतिक दृष्टि से तो अच्छा है मगर कई बार उनकी यही आक्रामकता उनके गले की फांस बन चुकी है। यदि उमा इस बार अपने इस स्वभाव से वह पार पा सकीं तो उत्तर प्रदेश में उनके लिए संभावनाओं के द्वार खुल सकते हैं। कुल मिलाकर अब यह देखना दिलचस्प होगा कि उमा पार्टी के मंतव्य को कैसे पूरा करती हैं और उन्हें पार्टी का कितना साथ मिलता है।


भाजपा में उमा की वापसी के मायने


उमा भारती की भारतीय जनता पार्टी में वापसी के समय जिस उत्साह की उम्मीद की जा रही थी, दिल्ली के पार्टी मुख्यालय में वैसा तो कुछ नजर नहीं आया, लेकिन जिस उत्तर प्रदेश की कमान उन्हें सौंपी गई है वहां से उनके खिलाफ पहला बयान जरूर आ गया। पार्टी उपाध्यक्ष और कभी भारतीय जनता पार्टी के बजरंगी चेहरा रहे विनय कटियार ने उनका वैसा स्वागत नहीं किया जैसी सदाशयता और उत्साही प्रतिक्रिया शिवराज सिंह चौहान ने दिखाई। विनय कटियार की तरफ से ठंडी प्रतिक्रिया के अपने खास अर्थ हैं, जिन्होंने तेरहवीं और बारहवीं लोकसभा का नजारा देखा है उन्हें पता है कि भारतीय जनता पार्टी की तब की हल्ला ब्रिगेड को संसदीय कार्यमंत्री मदन लाल खुराना या बाद में प्रमोद महाजन तक चुप कराने का अपना संवैधानिक और पार्टीगत दायित्व नहीं निभा पाते थे। हालांकि उस हल्ला ब्रिगेड को उमा भारती अपने एक इशारे से चुप करा देती थीं। मध्य प्रदेश से सांसद प्रह्लाद पटेल, राजस्थान से सांसद श्रीचंद कृपलानी और उत्तर प्रदेश से विनय कटियार भारतीय जनता पार्टी की हल्ला ब्रिगेड के प्रमुख सदस्य थे और कांग्रेसी आरोपों का तल्ख जवाब देने में माहिर थे। उसी ब्रिगेड के सदस्य विनय कटियार को अगर उमा भारती की पार्टी में वापसी सहजता से स्वीकार्य नहीं है तो सवाल उठेंगे ही। हालांकि विनय कटियार ने अगले ही दिन अपना बयान बदलने में देर नहीं लगाई। उत्तर प्रदेश की राजनीति में तीसरे स्थान पर खिसक चुकी भारतीय जनता पार्टी को पहले स्थान पर लाने की नितिन गडकरी की कोशिशों के बीच विनय कटियार की ठंडी और व्यंग्यात्मक प्रतिक्रिया से साफ है उत्तर प्रदेश में भाजपा की राह आसान नहीं है। उमा भारती की वापसी के दौरान यूं तो गडकरी के अलावा दूसरे कोई बड़े नेता मौजूद नहीं थे, सिवाय शहनवाज हुसैन के। 10 नवंबर, 2004 को भारतीय जनता पार्टी की उच्चाधिकार प्राप्त समिति की बैठक में आडवाणी को खरी-खोटी सुनाने के बाद जब उमा भारती बाहर निकली थीं तो उस वक्त मौजूद भारतीय जनता पार्टी के तमाम नेता हक्के-बक्के रह गए थे, लेकिन किसी ने उन्हें रोकने की हिम्मत नहीं दिखाई। उस वक्त उन्हें शांत करते हुए रोकने की कोशिश सिर्फ और सिर्फ राजनाथ सिंह ने की थी। उमा की वापसी के दौरान पार्टी मुख्यालय में राजनाथ सिंह की गैर मौजूदगी इसीलिए खलती रही। शहनवाज हुसैन की मौजूदगी की वजह यह है कि भारतीय जनता युवा मोर्चा का राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते उमा भारती ने शहनवाज को अपनी कार्यसमिति में शामिल किया था। हालांकि शहनवाज बहुत आगे निकल चुके हैं। भारतीय जनता पार्टी में उनकी हैसियत बदल चुकी है। उमा की वापसी के वक्त पार्टी मुख्यालय में मौजूद रहकर उन्होंने सदाशयता का परिचय दिया। 2008 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों के पहले भारतीय जनता पार्टी और उमा भारती के कुछ शुभचिंतकों ने उमा भारती को पार्टी में लौट जाने का सुझाव दिया था। उन शुभचिंतकों की सलाह थी कि उमा जैसी नेता भारतीय जनता पार्टी के पास नहीं है और उमा के पास भारतीय जनता पार्टी जैसा संगठन नहीं है। उमा के लिए मजबूत संगठन बनाना आसान नहीं था तो पार्टी के लिए उमा जैसा नेता मिलना कठिन था। ऐसे में दोनों एक-दूसरे के पूरक बन सकते थे, लेकिन उमा को लगता था कि 2003 के जिस प्रचंड जनादेश के सहारे उन्होंने मध्यप्रदेश में दस साल के दिग्विजयी शासन को उखाड़ फेंका था, उसमें सिर्फ और सिर्फ उनका ही योगदान था। उमा जैसी नेता यह भूल गई कि कैडर आधारित पार्टियों में कार्यकर्ता अपने नेता के साथ सहानुभूति तो रख सकते हैं उसका आदर भी कर सकते हैं, लेकिन वोट डालने का मौका आने पर वह पार्टी की डोर छोड़ने में हिचकते हैं। कैडर आधारित पार्टियों के साथ एक और मजबूरी होती है कि वहां के नेता के लिए अपनी पार्टी से अलग ताकत हासिल कर पाना आसान नहीं होता। यह सिद्धांत सिर्फ भारतीय जनता पार्टी पर ही लागू नहीं होता, उसकी धुर विरोधी वामपंथी पार्टियों के लिए भी यही सच है। एक दौर में मा‌र्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में सैफुद्दीन चौधरी की तूती बोलती थी, लेकिन सीपीएम से अलग होने के बाद उनकी कोई पहचान नहीं है। हालांकि उन्होंने भी अपनी अलग पार्टी बनाई और पश्चिम बंगाल में वामपंथी पार्टियों का विकल्प बनने की कोशिश की। और तो और उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह की सियासत भी इसका उदाहरण है। अगर इस सियासत का थोड़ा-बहुत कोई अपवाद है तो वह हैं झारखंड विकास मोर्चा के अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी, जो भाजपा से अलग होने के बाद भी अपना राजनीतिक वजूद बचाए रखने में कामयाब हैं। रही बात उत्तर प्रदेश में उमा भारती के आने के बाद बदलते चुनावी समीकरणों की तो उसे लेकर अंकगणितीय फार्मूला देना आसान नहीं होगा। उत्तर प्रदेश में सरकार चला चुकी भारतीय जनता पार्टी की हालत यह है कि वह तीसरे नंबर पर खिसक गई है। पिछले दो-तीन चुनावों से माना जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के मतदाता मजबूत नेतृत्व के अभाव में उससे दूर भागते जा रहे हैं। 1991 में जब पहली बार कल्याण सिंह की अगुआई में भारतीय जनता पार्टी को उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत मिला था तो उसमें पिछड़े वर्ग के वोटरों का बड़ा योगदान था। ब्राह्मण और बनिया की पार्टी मानी जाती रही भारतीय जनता पार्टी को पूर्वी उत्तर प्रदेश में जहां चौहान यानी नोनिया, कोइरी, कुर्मी और राजभर जातियों का भरपूर सहयोग मिला था। वहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उसे लोध राजपूतों का एकमुश्त समर्थन मिला था। पूर्वी उत्तर प्रदेश से पार्टी के पास ओमप्रकाश सिंह जैसा पिछड़ा नेतृत्व था, लेकिन पार्टी की गुटबाजी में ओमप्रकाश सिंह किनारे लगा दिए गए। 1999 के लोकसभा चुनावों में कल्याण सिंह की बेरुखी ने लोध राजपूतों को भारतीय जनता पार्टी से अलग कर दिया, जिसकी वजह से पार्टी 23 लोकसभा सीटें हार गईं। उमा भारती भी उसी लोध राजपूत समुदाय से आती हैं और माना जा रहा है कि कल्याण सिंह की नाराजगी की वजह से जो लोध वोट बैंक भारतीय जनता पार्टी से दूर चला गया था उसे वापस खींचने में मदद मिलेगी, लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश में जिस तरह भारतीय समाज पार्टी ने अपना दबदबा बनाया है उसमें नोनिया और राजभर जातियों के वोट वापस भारतीय जनता पार्टी की तरफ मोड़ना आसान नहीं होगा। इसके लिए उमा भारती को कोशिश करनी होगी। हालांकि उनकी कोशिशों का तब तक कोई मतलब नहीं है जब तक उत्साही और मजबूत की नेतृत्व की कमी से जूझ रही उत्तर प्रदेश इकाई के भारतीय जनता पार्टी के सभी प्रमुख नेता उमा भारती का सहयोग करें। वैसे दो-तीन चुनावों से उत्तर प्रदेश से भारतीय जनता पार्टी के मतदाताओं के मोहभंग की वजह राज्य में दमदार नेतृत्व की कमी भी रही। भारतीय जनता पार्टी का आलाकमान कलराज मिश्र और लालजी टंडन पर चाहे जितना भरोसा करे, लेकिन उनकी राजनीतिक हनक वैसी नहीं है जैसी जनता नेतृत्व से उम्मीद करती है। चूंकि उमा राजनाथ सिंह, कलराज मिश्र और लालजी टंडन की तुलना में जवान हैं, घोटाले और भ्रष्टाचार के खुलासों के दौर में उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप नहीं हैं फिर उनका अतीत फायर ब्रांड नेता का रहा है। ऐसे में पार्टी के लिए उनसे उम्मीदें बांधना गलत भी नहीं है। उमा के उत्तर प्रदेश की चुनावी कमान संभालने के बाद अगर किसी पार्टी की परेशानी बढ़ सकती है तो वह कांग्रेस हो सकती है, क्योंकि ऐसा माना जा रहा था कि ब्राह्मण मतदाता कांग्रेस की तरफ झुक रहा है, लेकिन हकीकत तो यही है कि भ्रष्टाचार, महंगाई और बाबा रामदेव से निबटने के तरीकों को लेकर ब्राह्मण मतदाता कांग्रेस से नाराज नजर आ रहा है। पिछले दो चुनावों से अगर वह कभी कांग्रेस और कभी बहुजन समाज पार्टी की तरफ तैरता रहा है तो इसकी बड़ी वजह भारतीय जनता पार्टी के पास राज्य में मजबूत नेतृत्व का अभाव रहा है। चूंकि उमा दमदार रहीं हैं लिहाजा भारतीय जनता पार्टी का पारंपरिक मतदाता उन पर भरोसा कर सकता है। (लेखक पत्रकार हैं)


नीयत और नेतृत्व पर सवाल


कहावत है कि दूसरा खसम किया बुरा किया और उसे भी छोड़ दिया और बुरा किया। केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार की हालत कुछ ऐसी ही है। उसके रणनीतिकारों को समझ में नहीं आ रहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ बढ़ते जनसमर्थन से कैसे निपटा जाए? मनमोहन सिंह की सरकार कभी अन्ना हजारे के खिलाफ मोर्चा खोलती है तो कभी उनसे बात करती है। बाबा रामदेव जैसे ही कहते हैं कि प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश को लोकपाल के दायरे से बाहर रखा जाए, उसके रणनीतिकारों की बांछें खिल जाती हैं। उन्हें लगता है कि अन्ना और उनकी टीम से लड़ाने के लिए उन्हें पहलवान मिल गया है। सो रामदेव के स्वागत में सरकार बिछी हुई नजर आती है। सरकार ज्यों-ज्यों दवा कर रही है उसका मर्ज बढ़ता जा रहा है। दरअसल सरकार मर्ज को समझे बिना उसके इलाज में लगी है। वह इस मुगालते में है कि अन्ना हजारे और बाबा रामदेव को कठघरे में खड़ा करके लड़ाई जीत सकती है। आम लोगों की नजर में राजनीति और नेता भ्रष्टाचार का पर्याय बन गए हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी राजनेता की बात को लोग गंभीरता से लेने को तैयार नहीं हैं। यही वजह है कि इतने घोटाले सामने आने के बावजूद देश की मुख्य विपक्षी पार्टी कहीं नजर नहीं आ रही थी। कांग्रेस एक बड़ी लकीर खींचने की बजाय अन्ना हजारे और बाबा रामदेव जैसी बड़ी लकीरों को छोटा करने में लगी हुई है। पार्टी में यह कोई नहीं सोच रहा है कि आखिर अन्ना हजारे या बाब रामदेव के साथ इतनी बड़ी संख्या में लोग क्यों जुड़ रहे हैं? कांग्रेस की दिक्कतें कई हैं। पहली दिक्कत तो यह कि जितने भी घपले-घोटाले सामने आए हैं सब उसकी सरकार के हैं। अब उसमें कांग्रेसी शामिल हों या उसके घटक दल। दूसरी समस्या है-भ्रष्टाचार से निपटने में कांग्रेस और उसकी सरकार की निष्कि्रयता। सरकार भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों से निपटने की बजाय उनका बचाव करती हुई नजर आ रही है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने राजनीतिक गुरु से एक कला सीखी है-चुप रहना। उन्हें लगता है कि यह सबसे अच्छी शासनकला है। रामलीला मैदान में पुलिस की बर्बरता पर दो दिन बाद उन्होंने चुप्पी तोड़ी तो कहा कि कोई विकल्प नहीं था। विकल्पहीनता शासनकला और नेतृत्व की नाकामी का परिचायक है। कांग्रेस पार्टी का हाल और बुरा है। पार्टी और सरकार के पीछे की ताकत सोनिया गांधी और राहुल गांधी को अक्सर पता ही नहीं होता कि सरकार ने अन्ना हजारे के साथ या बाबा रामदेव के साथ क्या किया? भट्टा-पारसौल में जाकर राहुल गांधी पूछते हैं कि अगर मायावती कुछ छिपाना नहीं चाहतीं तो वहां धारा 144 क्यों लगी है? पर वह दिल्ली में अपनी सरकार से यही बात नहीं पूछते। पार्टी का एक वरिष्ठ नेता जिसे ठग कहता है उसकेस्वागत में चार केंद्रीय मंत्री हवाई अड्डे क्यों गए? अन्ना हजारे और उनकी टीम की बातें अगर फासीवादी है तो ये लोग सरकारी समिति में क्या कर रहे हैं? भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आम लोगों की नजर में भाजपा की छवि कोई साफ-सुथरी नहीं है। बाबा रामदेव के साथ ही अन्ना हजारे को भी भाजपा-संघ के पाले में धकेलकर कांग्रेस ने उसकी मदद ही की है। देश की मुख्य विपक्षी पार्टी को भी सोचना चाहिए कि देश के ज्वलंत मुद्दों पर बहस अगर संसद की बजाय सड़क पर हो रही है तो यह उसकी नाकामी है। भाजपा की किस्मत से इस समय देश में कोई गैर-कांग्रेसी और गैर-भाजपा राजनीतिक ताकत नहीं है। मुख्य विपक्षी दल के नाते सरकार के खिलाफ बनने वाले माहौल का फायदा उसे ही मिलेगा। उन्हें पता है कि बाबा रामदेव और भाजपा-संघ का एजेंडा एक ही है। फिर भी सरकार ने रामलीला मैदान में जो किया उसके बाद बाबा का समर्थन करना उनकी मजबूरी थी, लेकिन कांग्रेस को अब भी समझ में नहीं आ रहा है कि दमन से जनभावनाओं को दबाया नहीं जा सकता। बाबा रामदेव के खिलाफ मोर्चा खोलने के बाद अब सरकार अन्ना हजारे की टीम से छुटकारा पाना चाहती है। कांग्रेस पार्टी धीरे-धीरे अकेली पड़ती जा रही है। अन्ना के साथ देश का शहरी नागरिक समाज है तो बाबा के साथ गांव-देहात। जनसमर्थन के नजरिए से दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। दोनों के बीच की दूरी काफी हद तक मनमोहन सिंह की सरकार और उनकी पार्टी ने मिटा दी है। ये दोनों साथ चलें या अलग, कांग्रेस की परेशानी कम नहीं होने वाली है। कांग्रेस को इस बात की भी चिंता करना चाहिए कि इस पूरे प्रकरण में उसके सहयोगी दल मौन हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए एक साल से भी कम समय बचा है। ऐसे में समाजवादी पार्टी या बहुजन समाज पार्टी कांग्रेस की मदद के लिए आगे आकर राजनीतिक हाराकिरी तो करेंगे नहीं। यदि द्रमुक ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया तो मनमोहन सिंह के लिए पांच साल का कार्यकाल पूरा कठिन हो जाएगा। मनमोहन सिंह और कांग्रेस के लिए अच्छा यही होगा कि वे अन्ना और बाबा की बजाय भ्रष्टाचार से लड़ते हुए नजर आएं, क्योंकि आम लोगों के मन में सरकार की नीति, नीयत और नेतृत्व, तीनों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)


कांग्रेस का असली चेहरा


लेखक रामलीला मैदान की कार्रवाई को केंद्र के दमनकारी रवैये की बानगी मान रहे हैं….

कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार यदि यह सोच रही है कि रामलीला मैदान से बाबा रामदेव और उनके समर्थकों को आधी रात गद्दाफी की शैली में बलपूर्वक बाहर निकाल देने से वह देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता के आंदोलन को कुचल देगी तो यह उसकी भारी भूल है। आपातकाल के दिनों की याद दिलाने वाली केंद्र सरकार की यह कार्रवाई केवल यही प्रदर्शित करती है कि कांग्रेस पार्टी के भीतर कुछ नहीं बदला है। यह अभी भी एक परिवार विशेष के स्वामित्व वाली प्राइवेट कंपनी की तरह चलाई जा रही है, जिसके प्रमोटरों में न केवल फासीवादी प्रवृत्तियां विद्यमान हैं, बल्कि वे भ्रष्टाचार के आरोपों को तनिक भी सहन नहीं कर पाते। राजधानी के रामलीला मैदान में बाबा रामदेव और उनके समर्थकों को बलपूर्वक निकालने के अलावा कांग्रेस ने योग गुरु के खिलाफ विषवमन का अभियान भी छेड़ दिया है। उन्हें ठग, धोखेबाज जैसी संज्ञाएं दी जा रही हैं और उनके ट्रस्ट के हिसाब-किताब पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। इस सबमें कुछ भी नया नहीं है। ठीक यही हथकंडे अन्ना हजारे और उनकी टीम के खिलाफ भी अपनाए गए थे, जब उन्होंने सख्त लोकपाल बिल के लिए जंतर-मंतर पर अनशन किया था। अब ऐसा ही अभियान कहीं अधिक भद्दे रूप में रामदेव के खिलाफ छेड़ दिया गया है। कांग्रेस का रामदेव के खिलाफ छेड़ा गया दुष्प्रचार किसी काम नहीं आने वाला, क्योंकि यह समय बाबा रामदेव की संपत्तियों की जांच का नहीं है, बल्कि यह जांच करने का है कि काले धन का Fोत क्या है और क्यों मनमोहन सिंह सरकार विदेशी बैंकों में अवैध तरीके से धन जमा कराने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करना चाहती है? नि:संदेह संप्रग सरकार रामदेव के आंदोलन से हिल गई है, क्योंकि उन्होंने भ्रष्टाचार की जड़ पर प्रहार किया है। अन्ना हजारे के आंदोलन का उद्देश्य अपेक्षाकृत सीमित था। उनकी टीम केवल सशक्त लोकपाल संस्था के गठन पर जोर दे रही थी। उच्च पदस्थ लोगों के भ्रष्ट आचरण की निगरानी के लिए लोकपाल संस्था का गठन भ्रष्टाचार के खिलाफ व्यापक लड़ाई का एक हिस्सा भर है। चूंकि भ्रष्टाचार कई सिर वाले एक दैत्य के समान है जिसने राजनीति, शासन और सामान्य जीवन के विभिन्न पहलुओं पर दुष्प्रभाव डाला है इसलिए यह आवश्यक है कि एक व्यापक एजेंडे के साथ भ्रष्टाचार का सामना किया जाए। उदाहरण के लिए धन शक्ति ने निर्वाचन प्रक्रिया को बुरी तरह प्रभावित किया है। विधानसभा और लोकसभा के चुनावों में किए जाने वाले खर्च ने कुल मिलाकर खर्च की सीमा के निर्वाचन आयोग के प्रावधानों का उपहास ही उड़ाया है। अब काफी समय बाद निर्वाचन आयोग ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव के लिए खर्च की सीमा को बढ़ाकर क्रमश: 40 और 16 लाख कर दिया है, लेकिन जो लोग भारतीय राजनीति से परिचित हैं वे जानते हैं कि औसत खर्च इससे कहीं अधिक 3 से 5 करोड़ के आसपास है। यह सारा खर्च काले धन के जरिए किया जाता है। इसमें से कुछ तो देश में ही कमाया जाता है और कुछ स्विट्जरलैंड सरीखे टैक्स चोरी के गढ़ से मंगाया जाता है। लिहाजा स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार विरोधी किसी भी मुहिम की शुरुआत काले धन की समस्या से निपटने के साथ होनी चाहिए। हमें इस ससस्या को ऊंची प्राथमिकता देने की जरूरत है। भ्रष्टाचार का दूसरा महत्वपूर्ण Fोत है सरकारी सौदे। यह किसी से छिपा नहीं कि सरकार चलाने वाले लोगों और सत्ताधारी दल से जुड़े लोगों को प्रत्येक सरकारी सौदे में दलाली मिलती है। आजादी के बाद शुरुआती दशकों में रिश्वत, दलाली और कमीशन का भुगतान रुपये में किया जाता है, लेकिन इंदिरा गांधी के 1980 में सत्ता में वापस आने के बाद कांग्रेस पार्टी ने अंतरराष्ट्रीय सौदों में दलाली की रकम को चंदे के रूप में स्विट्जरलैंड सरीखे स्थानों में जमा कराने का नया रास्ता खोज लिया। प्रधानमंत्री के रूप में राजीव गांधी के कार्यकाल में कैबिनेट सचिव का पद संभालने वाले बीजी देशमुख सरीखे वरिष्ठ नौकरशाह ने बताया है कि 1980 के बाद से कांग्रेस पार्टी को भारतीय उद्योगपतियों-व्यवसायियों की तुलना में अंतरराष्ट्रीय सौदों में विदेशी कंपनियों से कमीशन लेना अधिक सुविधाजनक लगा। ऐसा करने से कांग्रेस को अपने देश में किसी उद्योगपति अथवा व्यवसायी को लाभान्वित करने के आरोपों से बचने की सहूलियत मिली। इससे कांग्रेस देश में भ्रष्टाचार की चर्चा के आरोपों से भी बच गई। कांग्रेस की यह शानदार योजना हालांकि तब तार-तार हो गई जब स्वीडन के ऑडिट ब्यूरो ने खबर दी कि हथियार निर्माता कंपनी बोफोर्स ने 1986 में भारत को तोप बेचने के सौदे में कुछ लोगों को दलाली दी थी। इस खुलासे से कांग्रेस न केवल शर्मसार हुई, बल्कि उसे चुनावों में पराजय भी झेलनी पड़ी, लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस के रवैये में कोई परिवर्तन नहीं आया है। यही कारण है कि वह विदेशी बैंकों में काला धन जमा कराने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए तनिक भी तैयार नहीं। काले धन के मसले पर जब उच्चतम न्यायालय का दबाव बहुत बढ़ गया तो केंद्र सरकार ने बड़ी चतुराई से एक उच्च अधिकार प्राप्त समिति बना दी। समिति के संदर्भ में कहा गया है कि यह समस्या का परीक्षण करेगी और काले धन को वापस लाने की कार्ययोजना के संदर्भ में अपने सुझाव देगी। सरकार ने ऐसा ही झुनझुना बाबा रामदेव को भी थमाने की कोशिश की थी। उसने काले धन को वापस लाने के लिए कानून का मसौदा तैयार करने के लिए एक समिति बनाने का प्रस्ताव दिया था। इस समिति के गठन का प्रस्ताव करने के बाद सरकार ने दावा किया कि उसने बाबा रामदेव की सभी मांगें पूरी कर दी हैं और अब उन्हें अनशन समाप्त कर देना चाहिए। जब योग गुरु ने ऐसा करने से मना कर दिया तो केंद्र सरकार अत्यंत निर्ममता से बाबा रामदेव और उनके समर्थकों पर टूट पड़ी। ठीक यही इंदिरा गांधी ने जयप्रकाश नारायण के अभियान के खिलाफ 36 वर्ष पहले किया था। आपातकाल लगाने के पहले की परिस्थितियों और आज के हालात में अनेक समानताएं हैं। जेपी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अपना आंदोलन एक राज्य से शुरू किया था। बाद में इसने व्यापक रूप लिया। तब भी सरकार ने उसे कुचलने की कोशिश की थी। रामलीला मैदान की कार्रवाई से यह साबित हो गया कि मनमोहन सिंह सरकार भी उसी राह पर है। संयोग यह भी है कि इंदिरा गांधी ने आपातकाल रामलीला मैदान में ही विपक्ष की विशाल रैली के बाद लगाया था और तब भी जून का ही महीना था। साफ है, चीजें चाहे जितनी बदल जाएं, कांग्रेस का रवैया नहीं बदलता है। जिन्हें भी लोकतंत्र की चिंता है उन्हें मनमोहन सिंह सरकार की कार्रवाई से सचेत हो जाना चाहिए। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)