Showing posts with label पृ.सं. ९. Show all posts
Showing posts with label पृ.सं. ९. Show all posts

Sunday, January 23, 2011

राजनीति के भंवर में खाद्य सुरक्षा का अधिकार


जून 2004 में सोनिया गांधी की अध्यक्षता में जब राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का गठन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने किया, तभी इसका विरोध शुरू हो गया था। खासकर विपक्षी दलों का आरोप था कि सोनिया की अध्यक्षता के चलते यह परिषद सुपर कैबिनेट की तरह व्यवहार करेगी। हाल के दिनों में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सलाहकारों ने राष्ट्रीय सलाहकार परिषद यानी एनएसी के सुझावों को जिस तरह खारिज किया, उससे विपक्षी दलों के आरोप गलत साबित होते नजर आ रहे हैं। मनरेगा के तहत मजदूरी की दरें सरकारों द्वारा तय मजदूरी की न्यूनतम दरों जितना करने का राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने सलाह दी, उसे प्रधानमंत्री कार्यालय ने नामंजूर कर दिया। यह बात और है कि मनरेगा की मजदूरी दरों को उपभोक्ता सूचकांक से जोड़ते हुए इंकार के दो दिन बाद ही एक हद तक मान लिया गया। ताजा मसला खाद्य सुरक्षा विधेयक का है। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने काफी विचार-विमर्श के बाद इसे प्रधानमंत्री कार्यालय को सौंपा, लेकिन प्रधानमंत्री की ओर से गठित रंगराजन समिति ने इसे अव्यवहारिक बताते हुए खारिज कर दिया। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि क्या सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली परिषद की सलाह को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा या फिर मनरेगा की तरह देर-सबेर मंजूरी मिल जाएगी। प्रधानमंत्री कार्यालय और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के बीच खींचतान फिलहाल मीडिया की सुर्खियों में है। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने कुछ साल पहले देश के नागरिकों को भोजन का अधिकार देने का फैसला किया था। इसके अगले दौर में देश की चौथाई आबादी को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए शामिल करने की बात कही गई थी। इसे भी अव्यावहारिक मानते हुए पहले खारिज किया गया और फिर प्रस्ताव करके नए कानून की सिफारिश की गई। जिस पर भी अभी विचार-विमर्श जारी है। इसके तहत परिषद ने 46 प्रतिशत ग्रामीण और 28 प्रतिशत शहरी आबादी को 7 किलो प्रति व्यक्ति की दर से हर महीने अनाज देने की सिफारिश की है। इसके अलावा देश की करीब 75 फीसदी आबादी को दो किलो अनाज प्रति व्यक्ति की दर से हर महीने देने की बात की गई है। प्रधानमंत्री की समिति ने 46 फीसदी ग्रामीण और 28 फीसदी शहरी आबादी को 7 किलो प्रति व्यक्ति हर महीने अनाज देने की बात तो स्वीकार कर ली है, लेकिन बाकी लोगों को सरकारी आदेश के जरिये अनाज देने की बात कही जा रही है। यह अनाज उपलब्धता के आधार पर तय होगा। विवाद केवल इस पर नहीं है कि कितना अनाज दिया जाए, बल्कि विवाद इस बात पर भी है कि अगर राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की योजना को ज्यों का त्यों लागू कर दिया जाएगा तो सरकारी खजाने पर कितना बोझ पड़ेगा। सलाहकार समिति के मुताबिक इस योजना पर 80 हजार करोड़ रुपये सालाना का खर्च बैठेगा, जबकि रंगराजन समिति का अनुमान है कि इस पर 92 हजार करोड़ रुपये खर्च होंगे। सबसे बड़ी बात यह है कि भूख खत्म करने की इस महत्वाकांक्षी योजना को लागू करने के लिए प्रधानमंत्री की समिति ने सिर्फ 69 हजार करोड़ रुपये ही सालाना खर्च करने की सिफारिश की है। राष्ट्रीय सलाहकार समिति के मुताबिक यदि विधेयक पारित होता है तो देश को सालाना 540 लाख टन अनाज की जरूरत होगी, जबकि रंगराजन समिति के मुताबिक 690 लाख टन सालाना अनाज की जरूरत होगी। रंगराजन समिति का यह आकलन 2013-14 में अनाज उत्पादन के अनुमान की परिधि में ही है। समिति का अनुमान है कि 2013-14 में 570 लाख टन अनाज का उत्पादन हो सकता है। समिति का तर्क है कि अगर उसके मुताबिक योजना लागू हुई तो योजना के तहत आने वाले लोगों को भोजन तो मिलेगा ही, पांच लाख टन का बफर स्टॉक भी बनाए रखा जा सकेगा। प्रधानमंत्री कार्यालय और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के बीच टकराव के इन बिंदुओं पर विचार से ज्यादा महत्वपूर्ण भारतीय स्थिति को जानना भी है। देश में अनाज की जरूरत को जिस तरह दोनों समितियों ने आंका है पहले तो वही गलत है, क्योंकि विकासशील देशों की तुलना में भारत में प्रति व्यक्ति अनाज की खपत और उपलब्धता घटी है। विकासशील देशों में जहां यह आंकड़ा 182.1 किलोग्राम सालाना है, वहीं अपने यहां यह आंकड़ा महज 174.2 किलोग्राम है। 2008 की आर्थिक मंदी और विश्वव्यापी महंगाई के लिए तब अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने भारतीयों द्वारा ज्यादा भोजन खाने को जिम्मेदार बताया था। हालांकि हकीकत तो यह है कि अमेरिका, ब्रिटेन, नार्वे, जर्मनी जैसे विकसित देशों में प्रति व्यक्ति अनाज की सालाना खपत 44 फीसदी कम है। इसी तरह झारखंड या दूसरे अति पिछड़े इलाकों से भुखमरी की आने वाली खबरों को हालांकि अधिकारी भुखमरी मानने से इंकार करते रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि भारत में अनाज की न सिर्फ उपलब्धता, बल्कि खपत भी घटी है। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का सुझाव इस स्थिति में बदलाव ला सकता है। एक अर्थशास्त्री आमतौर पर आर्थिक नजरिए से ही आंकड़ों का विश्लेषण औरआकलन करते हैं और वह मानवीय पक्ष को कम महत्व देते हैं। यही बात रंगराजन समिति के आकलन पर भी लागू होती है। वैसे खामियां तो राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के आकलन में भी है। अगर उसे भी ज्यों का त्यों मान लिया जाए तो ग्रामीण आबादी का 50 प्रतिशत और शहरी का 70 प्रतिशत हिस्सा उसमें नहीं शामिल हो पाएगा। सलाहकार परिषद ने 46 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों को पूर्वाधिकार सूची में रखा है। यह आंकड़ा तेंदुलकर कमेटी के आकलन से थोड़ा ही ज्यादा है। प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार रहे सुरेश तेंदुलकर की समिति ने 41.8 फीसदी आबादी को गरीबी रेखा के नीचे बताया था। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने इसी तरह 28 फीसदी शहरी आबादी को इस श्रेणी में रखा है। यह तेंदुलकर समिति के 27.8 प्रतिशत से कुछ ही ज्यादा है। ज्यां द्रेज की मेहनत के बाद राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने इस अहम विधेयक की सिफारिश की है। उन्हें इस बात पर एतराज है कि प्रधानमंत्री की समिति ने उनके सुझाव को खारिज करते वक्त पिछले तीन साल के औसत अनाज उत्पादन को ही आकलन का आधार बनाया। पिछले तीन साल में औसत 550 लाख टन अनाज का उत्पादन हुआ है, लेकिन ज्यां द्रेज को लगता है कि इसमें सालाना 5 फीसदी की बढ़ोतरी संभव है। जिस तरह देश की उपजाऊ जमीन पर कारपोरेट घरानों का कब्जा बढ़ रहा है उससे उपजाऊ भूमि की कमी हो रही है, जिस पर शरद यादव को छोड़कर बाकी राजनेता सवाल नहीं उठा रहे। कई बार गरीबी रेखा के नीचे आने वाले वास्तविक हकदार भी वंचित रह जाते हैं, क्योंकि गरीबी रेखा के नीचे खुद को मनवाने के लिए इनके पास जरूरी कागजात नहीं होते। उसकी सूखी चमड़ी और काया भी इस गवाही में कमजोर साबित होती है। फिर समाज में जिस तरह नैनो परिवारों का चलन बढ़ रहा है और समाज में उपभोक्तावाद बढ़ रहा है, उससे वृद्ध और कमजोर लोगों की हिफाजत करने व उनका भरण-पोषण करने की जिम्मेदारी से परिवार के लोग भी मुंह मोड़ रहे हैं। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के प्रस्तावित विधेयक में इन तथ्यों का भी ध्यान रखा गया है, लेकिन दुख की बात यह है कि प्रधानमंत्री की समिति ने इन तथ्यों पर ध्यान देना जरूरी नहीं समझा। पिछली यूपीए सरकार में नरेगा को लागू करने के लिए वामपंथियों का दबाव कारगर रहा था, लिहाजा मंदी का भारत में उतना असर नहीं हुआ जैसा कि पश्चिमी देशों में देखा गया। मौजूदा यूपीए सरकार में वामपंथियों की दखल नहीं है, जिस कारण राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। यह मानने का कोई कारण नहीं कि सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली सलाहकार परिषद कमजोर पड़ रही है, लेकिन इसके प्रस्तावों को ठुकराने से यह सवाल उठना लाजिमी है कि मानवता और नागरिकों के हितों को तरजीह देने वाली योजनाएं भी राजनीति और अर्थवाद की भेंट चढ़ रही हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


Friday, January 21, 2011

फीका पड़ता राहुल का करिश्मा


ऐसा प्रतीत हो रहा है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का मिशन 2012 परवान चढ़ने से पहले ही झंझावात का शिकार हो रहा है। राहुल गांधी के दो दिवसीय उत्तर प्रदेश भ्रमण के दौरान प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में युवाओं ने जिस तरीके से उनका विरोध किया उससे तो यही प्रतीत हो रहा है कि राहुल गांधी का करिश्मा अब चल नहीं पा रहा है, क्योंकि युवाओं की बात और उनकी वकालत करने के बावजूद युवा ही उनका विरोध सबसे ज्यादा कर रहे हैं। हालांकि देश के अलग-अलग हिस्सों में युवाओं के बीच जाकर राजनीति का ज्ञान बांटने वाले राहुल गांधी को भी यह आशा नहीं रही होगी कि उन्हें उत्तर प्रदेश में इस तरह युवाओं का विरोध झेलना पड़ेगा। अब तक तो यही कहा जाता रहा है कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय में कांग्रेस के लोगों का प्रवेश आसान नहीं होता है, लेकिन कांग्रेसी रणनीतिकारों ने भले ही मदन मोहन मालवीयजी की कर्मस्थली में युवा तुर्क राहुल गांधी को प्रवेश दिलाने में कामयाबी पा ली हो, लेकिन राहुल गांधी के खिलाफ युवाओं के विरोध व असंतोष को वह संभाल पाने में असमर्थ ही रहे। इस तरह आरती सजाकर खैरकदम की ख्वाहिश अधूरी ही रह गई। युवा छात्रों के विरोध का दंश कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी को दीर्घकाल तक सालता रहेगा। काशी हिंदू विश्वविद्यालय से उठी राहुल गांधी के विरोध की लपट न केवल इलाहाबाद और लखनऊ में देखी गई, बल्कि उसकी तपिस मोहब्बत की नगरी आगरा और महारानी लक्ष्मीबाई की नगरी झांसी में भी देखी गई। समझने वाली बात यह है कि आखिर राहुल गांधी के विरोध में अचानक कौन सी ऐसी हवा बही कि पूरा युवा वर्ग ही उनके खिलाफ खड़ा होने का मन बनाता दिख रहा है। कल तक राहुल गांधी का आभामंडल संपूर्ण भारत के युवाओं को आकर्षित कर रहा था और लग रहा था कि नेहरु-गांधी परिवार का यह वारिस नई पीढ़ी का केंद्रबिंदु बनेगा। कांग्रेस पार्टी भी यह कहते नहीं अघाती थी कि राहुल गांधी भविष्य के जयप्रकाश नारायण हैं और वह देश और समाज में एक नया क्रांतिकारी परिवर्तन लाएंगे। देखा जाए तो युवाओं के मन में भी राहुल गांधी को लेकर एक भरोसा जगा था। उनकी आदर्शवादी बातों को सुन-सुनकर युवाओं को भी लगने लगा था कि राहुल गांधी देश की भ्रष्ट राजनीति और आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे राजनीतिकों के खिलाफ जोरदार मुहिम चलाएंगे। हालांकि वैसा कुछ भी नहीं हुआ और युवाओं के हाथ निराशा लगी। कई बार यह भी देखा गया कि राहुल गांधी का राजनीतिक आचरण भी उन्हीं राजनीतिक नेताओं के जैसा ही है जो राजनीतिक भ्रष्टाचार के मुद्दे पर दोमुंही बात किया करते हैं और जनता को मूर्ख बनाने का काम करते हैं। इतिहास गवाह है कि देश का युवा अपना नायक उसे चुनता है जो जुबान और कर्म में सामंजस्य बनाए रखता है। शायद युवाओं को लगने लगा है कि राहुल गांधी इन दोनों गुणों में सामंजस्य नहीं स्थापित कर पा रहे हैं। राहुल गांधी जिन विश्वविद्यालयों में गए वहां अपनी कांग्रेस पार्टी की राजनीतिक बखान ही करते देखे गए। यहां तक कि वह विपक्षी दलों की सारगर्भित और रचनात्मक आलोचना करने की बजाय विषवमन ही किए। विशेष तौर पर भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस के खिलाफ उन्होंने जिन शब्दों का इस्तेमाल किया उससे देश का युवा बेहद ही नाराज दिखा। राहुल गांधी की नजर में भले ही देश का युवा कच्चा और नासमझ हो, लेकिन आदर्शवादी राहुल गांधी के संदेश में छिपा सियासत की गंध युवाओं को महसूस करते देर नहीं लगी। वह अच्छी तरह समझ गए हैं कि राहुल गांधी युवाओं को नैतिकता की सीख देने के बहाने कांग्रेस पार्टी के एजेंडा को ही आगे बढ़ा रहे हैं। बिहार विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी की राजनीतिक कलाकौशल की परीक्षा और उसमें उनके चारों खाने चित्त होने के बाद युवाओं को लगने लगा कि राहुल गांधी का आभामंडल कुछ रणनीतिकारों द्वारा अत्यंत चालाकी से गढ़ा और बुना गया है, न कि उनका वह मूल स्वरूप है। बिहार विधानसभा में नीतीश कुमार से पटकनी खाने के बाद राहुल गांधी का करिश्माई मिथक जो जाने-अनजाने उत्तर प्रदेश के विपक्षियों के सिर पर भी चढ़-बढ़कर बोल रहा था और उन्हें भयभीत कर रहा था, वह अचानक गायब हो गया। विकीलीक्स के रहस्योद्घाटन के बाद युवाओं की समझ में पूरी तरह से आ गया कि राहुल गांधी में अभी राजनीतिक परिपक्वता और कूटनीतिक धार न के बराबर है। अन्यथा अमेरिकी राजदूत से हिंदू आतंकवाद की तर्कहीन चर्चा वह शायद ही करते। रही सही कसर संप्रग सरकार के मंत्रियों के भ्रष्टाचार ने पूरा कर दिया। युवाओं को लग रहा था कि राहुल गांधी इन भ्रष्टाचारियों के खिलाफ जरूर मजबूत कार्यवाही करेगें, लेकिन कार्रवाई करनी तो दूर की बात रही राहुल गांधी ने भ्रष्टाचारियों के खिलाफ जुबान तक खोलने की जहमत नहीं उठाई। देखा गया कि कश्मीर मसले पर उनके मित्र उमर अब्दुला देश विरोधी बयान देते नजर आए, लेकिन राहुल गांधी ने उन्हें एक और मौका देने की बात कही। कश्मीर मसले पर अलगाववादियों की जुबान कैंची की तरह चलती रही, लेकिन राहुल गांधी तमाशबीन बने रहे और उनके खिलाफ एक शब्द भी बोलना उचित नहीं समझा। लोगों का यह भी मानना है कि देश में कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग की सरकार है और राहुल गांधी का कर्तव्य बनता है कि वह उन कार्यों का जरूर विरोध करें जो देश की सुरक्षा व एकता तथा नागरिकों के जीवन से जुड़ा हुआ है। इस सबकी बजाय राहुल गांधी चुप्पी साध रखे हैं। वह सिर्फ अपनी सरकार के मंत्रियों का बचाव करते ही नजर आ रहे हैं। ऐसे में देश का युवा उनकी राजनीतिक चालाकियों को अच्छी तरह भांप गया है। ऐसे में यदि युवा वर्ग उनका विरोध करता है तो आश्चर्य नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि यह राहुल से जुड़ी अपेक्षाओं के प्रति युवाओं का आक्रोश है, जो उन्हें नए सिरे से सोचने के लिए कह रहा है अथवा संदेश दे रहा है। राहुल गांधी के विरोध का एक और प्रमुख कारण है उनके द्वारा किया गया वादा खिलाफी का आचरण है। वह छात्रों को लगातार विश्वास दिला रहे थे कि छात्रसंघ बहाल कर दिया जाएगा, लेकिन छात्रसंघ की बहाली के बजाय वह एनएसयूवाई का संगठन खड़ा करने में ही अपनी जुगत भिड़ाते दिखे। झांसी में उनके विरोध की मूल वजह बुंदेलखंड राज्य के निर्माण से जुड़ा हुआ है। राहुल गांधी यहां के लोगों को कई बार भरोसा दे चुके हैं, लेकिन अलग राज्य का सपना अभी भी दूर की कौड़ी बना हुआ है। अगर महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ देश का युवा वर्ग सड़कों पर उतर रहा है तो इसके लिए कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार ही जिम्मेदार है। वह भले ही राहुल गांधी को देवत्व के गुणों से लैस करके सियासत के मैदान में उतारना चाहती हो, लेकिन एक लोकतांत्रिक देश की जनता में तो वहीं पूजा जाएगा जो जनता के हृदय का सम्राट बनेगा। कांग्रेस को अपनी बाजीगरी भरी नीतियों पर फिर से करना चाहिए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


Monday, January 10, 2011

भूमि सुधार का क्या है भविष्य

कौटिल्य समग्र प्रजाहित को राजा की जवाबदारी मानते थे। कार्ल मा‌र्क्स भी सर्वहारा के प्रति चितिंत रहे। इसलिए उनका अर्थचिंतन किसान और मजदूर के प्रति समर्पित है। गांधी और विनोबा भावे का तो समग्र चिंतन और व्यक्तिगत आचरण समावेशी विकास की आधारशिला रहा है। गोया, इनमें वैभव और आडंबर के दर्शन ही नहीं होते, लेकिन यह कैसी विडंबना है कि आर्थिक घोटालों और बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक आतंकवाद की पृष्ठभूमि में संपन्न हुए कांग्रेस महाधिवेशन में बदली हुई परिस्थितियों को रेखांकित करते हुए खुद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को कांग्रेस शासित केंद्र सरकार से व्यापक भूमि सुधार नीति तैयार करने की मांग करनी पड़ी है। इससे जाहिर होता है कि अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनके सहयोगी अर्थवेत्ता नीति-नियंताओं की चिंता कृषि, किसान और मजदूर को गरीबी के संकट से उबारने की बजाय यह रहती है कि गरीबी कम होती नजर आए, जिससे मौजूदा आर्थिक नीतियों के औचित्य को सही ठहराया जा सके। क्योंकि आंकड़ों के खिलाड़ी अर्थशास्ति्रयों को हर समस्या का हल आंकड़ों की चालाक बाजीगरी में ही दिखता है। इस प्रस्ताव में न केवल 116 साल पुराने भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 के संशोधन की पैरवी की गई है, बल्कि भूमि अधिग्रहण और विस्थापन से जुड़े उन तमाम किसान-आदिवासियों की चिंता की गई है, जिनकी जमीन बांध, उद्यान और शहरों का आधुनिक विकास लीलता जा रहा है। उदारवादी आर्थिक विकास के पैरोकारों के लिए भले ही औद्योगिक विकास कथित प्रगति का सूचकांक हो, लेकिन सच्चाई यह है कि राष्ट्रीय आजीविका और सुदृढ़ आर्थिकी का आधार आखिरकार खेती और किसानी ही है। इसलिए भूमि अधिग्रहण कानून 1894 को बदले जाने के परिप्रेक्ष्य में मुख्यधारा के सभी प्रमुख राजनीतिक दल पहले ही सहमति जता जा चुके हैं। अब कांग्रेस ने भी सहमति जताकर किसान संगठनों से कदमताल मिला लिए हैं। निश्चित है कांग्रेस की इस भूमिका से जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय को बल मिलेगा। यही वह आंदोलन है, जो एक नए विधेयक के रूप में राष्ट्रीय विकास, विस्थापन और पुर्नवास नीति (नेशनल डेवलपमेंट, डिस्प्लेसमेंट एंड रिहैबिलिटेशन पालिसी) के प्रारूप को कानूनी रूप देकर अमल में लाने की मांग कर रहा है। 2006 में इस मसौदे को राष्ट्रीय सलाहकार परिषद पास कर चुकी है। इसमें ग्रामीण विकास 2007-08 के वे तमाम प्रगतिशील विचार और प्रस्ताव शामिल हैं, जो संविधान के मौलिक अधिकारों का आदर करते हैं। मसलन, कम से कम विस्थापन, उचित पुनर्वास और संविधान की धारा 243 के तहत विकेंद्रित विकास तथा वनाधिकार कानून 2006 की अवधारणा का ख्याल रखते हैं। भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 और वनाधिकार अधिनियम 1927 के अंतर्गत अब तक ब्रितानी हुकूमत और आजाद भारत में विकास और पर्यावरण संरक्षण के नाम पर सात करोड़ से भी ज्यादा देशवासियों को अपने मूल आवास स्थलों से विस्थापित कर दिया गया है। इनमें ज्यादातरों की न तो वाजिब पुनर्वास की व्यवस्था हो पाई और न ही उन्हें उचित मुआवजा मिला। इसलिए कांग्रेस जो भूमि सुधार प्रस्ताव महाधिवेशन में लाई है, उसमें आर्थिक स्वतंत्रता की वकालत करते हुए कहा गया है कि 100 करोड़ से भी ज्यादा लोगों के लिए यह आर्थिक आजादी तभी वास्तविक आजादी के रूप में तब्दील हो पाएगी, जब आर्थिक प्रगति और खुशहाली को सामाजिक और आर्थिक न्याय से स्थायी रूप से जोड़ा जाए। प्रस्ताव में उल्लेख है कि जमीन के इस्तेमाल और आवंटन संबंधी नीतियों का उपयोग पक्षपातपूर्ण और अपारदर्शी रहा है। इन कारणों से आदिवासियों को न तो खनिजों के दोहन और उद्योगों की स्थापना में उचित क्षतिपूर्ति मिल पाई और न ही उन्हें आजीविका के भरोसेमंद वैकल्पिक साधन मिल पाए। लिहाजा, आदिवासियों को बगैर वैकल्पिक साधन मुहैया कराए विस्थापित किया जाना अनुचित है। इस नजरिए से केंद्र सरकार का कैबिनेट में सितंबर 2010 में लिया गया यह फैसला महत्वपूर्ण था कि विस्थापित होने वाले परिवारों को परियोजनाओं के लाभ का 26 प्रतिशत हिस्सा ताजिंदगी दिया जाए, लेकिन इस फैसले को विधेयक लाकर संसद में जब तक कानूनी रूप नहीं दिया जाएगा, इस पर अमल नमुमकिन है। आजादी के बाद यह पहला अवसर है कि किसी सत्तारूढ़ पार्टी ने भूमि सुधार की जरूरत को रेखांकित करते हुए इस मुगालते को तोड़ा है कि आधुनिक विकास के समावेशी न होने के कारण किसान, आदिवासी और दलित जैसे बड़े तबकों के साथ न केवल नाइंसाफी हो रही है, बल्कि दो हिस्सों में बंटते जा रहे भारत की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है। हालांकि कांग्रेस इस हकीकत को आसानी से मंजूर नहीं कर रही है। इसकी पृष्ठभूमि में अलगाववादियों की जोर पकड़ती जा रही ताकतें, नक्सली हिंसा, जमीन और अनाज के कई घोटाले तो हंै ही, भूमि अधिग्रहण को लेकर किसानों का सड़क पर उतरकर प्रदर्शन और आंदोलनों को अंजाम देना भी है। ये ऐसी ठोस वजह हैं, जिनके चलते कांग्रेस ही नहीं, अन्य राजनीतिक दलों का रुझान भी खेती-किसानी से जुड़े मुद्दों की ओर बढ़ रहा है। कांग्रेस ने अपने आर्थिक प्रस्ताव में भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 और वनाधिकार अधिनियम 1927 को संशोधित करने का हवाला दिया हुआ है, जो लंबे समय से संशोधित होकर पारित होने के लिए केंद्र सरकार के पास ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ है। संसदीय समिति ने भी इस विधेयक के मौजूदा प्रारूप को खारिज कर दिया है। समिति ने किसान हित से जुड़े कुछ वैकल्पिक सुझाव दिए हैं, लेकिन सरकार बड़ी कंपनियों और भूमाफियाओं के दबाव में बस्ते में बंद पड़े जनविरोधी विधेयक को यथावत रूप में पारित कराने पर आमादा है। प्रधानमंत्री तो इसी शीतकालीन सत्र में पारित कराने पर तुले हुए थे, लेकिन संयोग से यह सत्र घोटालों के हल्ले में पूरे समय ठप ही रहा। हालांकि कांग्रेस का एक गुट राहुल गांधी को आदिवासियों का हितचिंतक जताते हुए उनकी मंशा के अनुरूप इसे किसान व आदिवासी हितकारी बनाने के बाद ही पटल पर रखना चाहता है। प्रस्तावित भूमि सुधार विधेयक इतना विवादास्पद है कि ब्रह्मदेव शर्मा जैसे वंचित तबके के हितचिंतक इसे मौजूदा प्रारूप में पारित होने पर गांव और किसान खत्म होने की चेतावनी दे रहे हैं। इस विधेयक में प्रावधान है कि सरकार किसी परियोजना पर निजी समूहों या कंपनियों को केवल 30 प्रतिशत जमीन देगी। शेष भूमि की व्यवस्था निजी समूहों को करनी होगी। इससे जाहिर होता है कि आखिरकार सरकार की मंशा यही है कि ऐसी नीति वजूद में आए, जिससे जमीन पूंजीपतियों के हाथ में आ जाए, न कि उसकी बनी रहे, जिसकी पीढि़यां जमीन जोतकर आजीविका चलाती रही हैं। धनी-मानी ही जब खेती करेंगे तो किसान और मजदूर किसके हवाले रह जाएंगे? अब तक किसी भी सरकार द्वारा ऐसा कोई विधेयक वजूद में नहीं लाया गया, जिसके तहत उद्योगपतियों के बंगलों के परिसर अधिग्रहण कर सरकार भूमि व आवासहीन लोगों को आवंटित कर दे। हकीकत तो यह है कि अभी तक देश के किसी भी राज्य में भूमि सुधार और आर्थिक व सामाजिक उपायों के जरिए व्याप्त गरीबी दूर करने के कोई प्रयास हुए ही नहीं? प्रशासनिक अमला एक मर्तबा गरीबों के हक छीनकर अमीरों को देने की वकालत तो करता है, लेकिन अमीरों की नाजायज कमाई से वजूद में आई जमीन-जायदाद को गरीबों के अधिकार के दायरे में लाया गया हो, ऐसी मिसाल देखने में नहीं आई? हां, बिहार से जरूर अब ऐसी खबरें आ रही हैं कि भ्रष्ट आचरण से कमाई अचल संपत्ति को सरकार अपने कब्जे में लेकर विद्यालय एवं छात्रावास खोलने का सिलसिला शुरू करने जा रही है। भूमि सुधार न होना भी वंचित समाजों में अशिक्षा, कुरीति, कुपोषण और महामारियों के कारण बन जाते हैं। बालश्रम और दलितों पर अत्याचार की जड़ में भी किसी हद तक भूमि सुधार न होना है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Thursday, December 30, 2010

विनायक: नायक या खलनायक

छत्तीसगढ़ की एक अदालत ने मानवाधिकार कार्यकर्ता और पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज के उपाध्यक्ष विनायक सेन को राजद्रोह के मामले में उम्र कैद की सजा सुनाई है। विनायक सेन को यह सजा नक्सलियों के साथ संबंध रखने और उनको सहयोग देने के आरोप साबित होने के बाद सुनाई गई है। अदालत द्वारा विनायक सेन को उम्रकैद की सजा सुनाए जाने के बाद देशभर के चुनिंदा वामपंथी लेखक, बुद्धिजीवी आंदोलित हो उठे हैं। इन्हें लगता है कि न्यायपालिका ने विनायक सेन को सजा सुनाकर बेहद गलत किया है और उसने राज्य की दमनकारी नीतियों का साथ दिया है। उन्हें यह भी लगता है कि यह विरोध की आवाज को कुचलने की एक साजिश है। विनायक सेन को हुए सजा के खिलाफ वामपंथी छात्र संगठन से जुड़े विद्यार्थी और नक्सलियों के हमदर्द दर्जनों बुद्धिजीवी दिल्ली के जंतर-मंतर पर इकट्ठा हुए और जमकर नारेबाजी की। बेहद उत्तेजक और घृणा से लबरेज भाषण दिए गए। जंतर-मंतर पर जिस तरह के भाषण दिए जा रहे थे वह बेहद आपत्तिजनक थे। वहां बार-बार यह दुहाई दी जा रही थी कि राज्य सत्ता विरोध की आवाज को दबा देती है और अघोषित आपातकाल का दौर चल रहा है। वहां मौजूद एक वामपंथी विचारक ने शंकर गुहा नियोगी और सफदर हाशमी की हत्या को सरकार-पूंजीपति गठजोड़ का नतीजा बताया। उनका तर्क था जब भी राज्य सत्ता के खिलाफ कोई आवाज अपना सिर उठाने लगती है तो सत्ता उसे खामोश करने का हर संभव प्रयास करता है । शंकर गुहा नियोगी और सफदर हाशमी की हत्या तो इन वामंपंथी लेखकों-विचारकों को याद रहती है, उसके खिलाफ डंडा-झंडा लेकर साल दर साल धरना प्रदर्शन और विचार गोष्ठियां भी आयोजित होती हैं, लेकिन उसी साहिबाबाद में नवंबर में पैंतालीस साल के युवा मैनेजर की मजदूरों द्वारा पीट-पीट कर हत्या किए जाने के खिलाफ इन वामपंथियों ने एक भी शब्द नहीं बोला। मजदूरों द्वारा मैनेजर की सरेआम पीट-पीटकर नृशंस तरीके से हत्या पर इनमें से किसी ने भी मुंह खोलना गंवारा नहीं समझा। कोई धरना प्रदर्शन या बयान तक जारी नहीं हुआ, क्योंकि मैनेजर तो पूंजीपतियों का नुमाइंदा होता है लिहाजा उसकी हत्या को गलत करार नहीं दिया जा सकता है। परंतु हमारे देश के वामपंथी यह भूल जाते हैं कि गांधी के इस देश में हत्या और हिंसा को किसी भी तरह जायज नहीं ठहराया जा सकता है। शंकर गुहा नियोगी या सफदर हाशमी की हत्या की जिसकी पुरजोर निंदा की जानी चाहिए और दोषियों को किसी भी कीमत पर नहीं बख्शा जाना चाहिए, लेकिन उतने ही पुरजोर तरीके से फैक्ट्री के मैनेजर की हत्या का भी विरोध होना चाहिए और उसके मुजरिमों को भी उतनी ही सजा मिलनी चाहिए जितनी नियोगी और सफदर के हत्यारे को। दो अलग-अलग हत्या के लिए दो अलग-अलग मापदंड नहीं अपनाए जा सकते। ठीक उसी तरह से अगर विनायक सेन के कृत्य राजद्रोह की श्रेणी में आते हैं तो उन्हें इसकी सजा मिलनी ही चाहिए और अगर निचली अदालत से कुछ गलत हुआ है तो वह हाईकोर्ट या फिर सुप्रीम कोर्ट से निरस्त हो जाएगा। अदालतें सुबूत और गवाहों के आधार पर फैसला करती हैं। आप अदालतों के फैसले की आलोचना तो कर सकते हैं, लेकिन उन फैसलों को वापस लेने के लिए धरना प्रदर्शन करना घोर निंदनीय है। भारतीय संविधान में न्याय की एक प्रक्रिया है और यदि निचली अदालत से किसी को सजा मिलती है तो उसके बाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का विकल्प खुला हुआ है। अगर निचली अदालत में कुछ गलत हुआ है तो ऊपर की अदालत उसको हमेशा सुधारती रही है। ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं जहां निचली अदालत से मुजरिम बरी करार दिए गए हैं, लेकिन ऊपरी अदालत ने उनको कसूरवार ठहराते हुए सजा मुकर्रर की है। दिल्ली के चर्चित मट्टू हत्याकांड में आरोपी संतोष सिंह को निचली अदालत ने बरी कर दिया, लेकिन उसे ऊपरी अदालत से जमानत मिली। ठीक इसी तरह से निचली अदालत से दोषी करार दिए जाने के बाद भी कई मामलों में ऊपर की अदालत ने मुजरिमों को बरी किया है। लोकतंत्र में संविधान के मुताबिक एक तय प्रक्रिया है तथा संविधान और लोकतंत्र में आस्था रखने वाले सभी जिम्मेदार नागरिकों से उस तय संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करने की अपेक्षा की जाती है। विनायक सेन के मामले में भी उनके परिवार वालों ने हाईकोर्ट जाने का ऐलान कर दिया है, लेकिन बावजूद इसके यह वामपंथी नेता और बुद्धिजीवी अदालत पर दबाव बनाने के मकसद से धरना-प्रदर्शन और बयानबाजी कर रहे हैं। दरअसल इन वामपंथियों के साथ बड़ी दिक्कत यह है कि अगर कोई भी संस्था उनके मन मुताबिक चले तो वह संस्था आदर्श है, लेकिन अगर उनके सिद्धांतों और चाहत के खिलाफ कुछ काम हो गया तो वह संस्था सीधे-सीधे सवालों के घेरे में आ जाती है। अदालतों के मामले में भी ऐसा ही हुआ है जो फैसले इनके मन मुताबिक होते हैं उसमें न्याय प्रणाली में इनका विश्र्वास गहरा जाता है, लेकिन जहां भी उनके अनुरूप फैसले नहीं होते हैं वहीं न्यायप्रणाली संदिग्ध हो जाती है। रामजन्म भूमि बाबरी मस्जिद विवाद के पहले यही वामपंथी नेता कहा करते थे कि कोर्ट को फैसला करने दीजिए वहां से जो तय हो जाए वह सबको मान्य होना चाहिए, जब इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला उनके मनमुताबिक नहीं आया तो अदालत की मंशा संदिग्ध हो गई। इस देश में इस तरह के दोहरे मानदंड नहीं चल सकते। अगर हम वामपंथ के इतिहास को देखें तो उनकी भारतीय गणतंत्र और संविधान में आस्था हमेशा से शक के दायरे में रही है। जब भारत को आजादी मिली तो उसे शर्म करार देते हुए उसे महज गोरे बुर्जुआ के हाथों से काले बुर्जुआ के बीच शक्ति हस्तांतरण बताया गया था। यह भी ऐतिहासितक तथ्य है कि कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया यानी सीपीआई ने फरवरी 1948 में नवजात राष्ट्र भारत के खिलाफ हथियारबंद विद्रोह शुरू किया था और उस पर काबू पाने में तकरीबन तीन साल लग गए थे और वह भी रूस के शासक स्टालिन के हस्तक्षेप के बाद ही संभव हो पाया था। 1950 में सीपीआई ने संसदीय व्यवस्था में आस्था जताते हुए आम चुनाव में हिस्सा लिया, लेकिन साठ के दशक के शुरुआत में पार्टी दो फाड़ हो गई और सीपीएम का गठन हुआ। सीपीएम हमेशा से रूस के साथ-साथ चीन को भी अपना रहनुमा मानता आया है। तकरीबन एक दशक बाद सीपीएम भी टूटा और माओवादी के नाम से एक नया धड़ा सामने आया। सीपीएम तो सिस्टम में बना रहा, लेकिन माओवादियों ने सशस्त्र क्रांति के जरिये भारतीय गणतंत्र को उखाड़ फेंकने का ऐलान कर दिया। विचारधारा के अलावा भी वह हर चीज के लिए चीन का मुंह देखते थे। माओवाद में यकीन रखने वालों का एक नारा उस समय काफी मशहूर हुआ था कि चीन के चेयरमैन हमारे चेयरमैन। माओवादी नक्सली अब भी सशस्त्र क्रांति के माध्यम से भारतीय गणतंत्र को उखाड़ फेंकने की मंशा पाले बैठे हैं। क्या इस विचारधारा को समर्थन देना राजद्रोह नहीं है? नक्सलियों के हमदर्द हमेशा से यह तर्क देते हैं कि वो हिंसा का विरोध करते हैं, लेकिन साथ ही वह यह जोड़ना नहीं भूलते कि हिंसा के पीछे राज्य की दमनकारी नीतियां हैं। देश में हो रही हिंसा का खुलकर विरोध करने के बजाय नक्सलियों को हर तरह से समर्थन देना कितना जायज है इस पर राष्ट्रव्यापी बहस होनी चाहिए। एंटोनी पैरेल ने ठीक कहा है कि भारत के मा‌र्क्सवादी पहले भी और अब भी भारत को मा‌र्क्सवाद के तर्ज पर बदलना चाहते हैं, लेकिन वह मा‌र्क्सवाद में भारतीयता के हिसाब से बदलाव नहीं चाहते हैं। एंटोनी के इस कथन से यह साफ हो जाता है कि यही भारत में मा‌र्क्स के चेलों की सबसे बड़ी कमजोरी है । विनायक सेन अगर बेकसूर हैं तो अदालत से वह बरी हो जाएंगे, लेकिन अगर कसूरवार हैं तो उन्हें सजा अवश्य मिलेगी। भारत के तमाम बुद्धिजीवियों को अगर देश के संविधान और कानून में आस्था है तो उनको धैर्य रखना चाहिए और अंतिम फैसले का इंतजार करना चाहिए। इसलिए न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े करने अथवा किसी तरह दबाव बनाने की राजनीति से बाज आना चाहिए और इसके लिए किए जा रहे धरने-प्रदर्शन को तत्काल बंद कर दिया जाए। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं )