कांग्रेस को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का साथ अब भले सुखद लगे लेकिन वह एक सचाई भूल गई है। नीतीश राजनीति में पिता के अपमान का जख्म लेकर उतरे हैं। कांग्रेस ने उनके पिता के साथ उचित व्यवहार नहीं किया था। पुस्तक नीतीश कुमार एंड राइज ऑफ बिहार में यह दावा किया गया है। बचपन के दोस्त अरुण सिन्हा की लिखी इस पुस्तक का विमोचन नीतीश ने ही किया है। इसमें कहा गया है कि कांग्रेस ने नीतीश के पिता रामलखन सिंह को 1952 व 1957 के चुनाव में बख्तियारपुर से टिकट देने से इन्कार कर दिया था। इससे आहत स्वतंत्रता सेनानी रहे उनके पिता ने कांग्रेस छोड़ दी थी। वह रामगढ़ के राजा आचार्य जगदीश के नेतृत्व में बनी जनता पार्टी के टिकट पर 1957 में चुनाव लड़े थे। वह खुद तो नहीं जीत पाए थे पर वोटों का बंटवारा कराकर कांग्रेस को हराने में सफल रहे थे। रामलखन पटना के बाहरी इलाके बख्तियारपुर में लोगों का आयुर्वेदिक इलाज करते थे। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के आह्वान पर वह डॉक्टरी बंद कर आजादी के आंदोलन में कूद गए थे। उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था। स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस का सक्रिय सदस्य होने के बावजूद रामलखन का नाम 1951-52 के चुनाव में प्रत्याशियों की सूची से हटा दिया गया। उस समय बिहार में कांग्रेस के श्रीकृष्ण सिंह और अनुग्रह नारायण सिंह के दोनों गुटों में से वह किसी की सूची में जगह नहीं बना पाए। ऐसा इस वजह से कि वह पिछड़ी जाति का प्रतिनिधित्व करते थे। दोनों गुटों में हुए समझौते के तहत भूमिहार जाति की महिला प्रत्याशी तारकेश्वरी सिन्हा को पटना पूर्वी लोस क्षेत्र से कांगे्रस का टिकट दिया गया। स्व. प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की बहन सुंदरी देवी को बख्तियारपुर विधानसभा का टिकट मिला। रामलखन को 1957 में टिकट देने का वादा किया गया पर कांग्रेस ने वादा पूरा नहीं किया।
Saturday, June 30, 2012
Friday, June 22, 2012
मोदी विरोधियों ने दिल्ली में भी खोला मोर्चा
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ दिल्ली में मोर्चा खोले बैठे पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल के साथ अब गोरधन झड़पिया भी खड़े हो गए हैं। केशुभाई ने सुषमा स्वराज और अरुण जेटली से मुलाकात कर मोदी की आलोचना की। तो महागुजरात जनता पार्टी के अध्यक्ष झड़पिया ने दस्तावेजों के सहारे मोदी के शासनकाल में विकास के दावों पर सवाल खड़ा कर दिया। झड़पिया बुधवार सुबह पूरी तैयारी के साथ मीडिया से रूबरू थे। सूचना के अधिकार के जरिए लिए गए सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि 2003 से लेकर अब तक वाइब्रेंट गुजरात के माध्यम से लगभग 39 लाख करोड़ के निवेश का सपना दिखाया गया था, लेकिन वस्तुत: महज 1.85 लाख करोड़ का ही निवेश हुआ। जाहिर है कि रोजगार भी प्रस्तावित आंकड़ों के मुकाबले महज 4 फीसदी ही हासिल हुआ। सीएजी के आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने मोदी के कार्यकाल में लगभग 25 हजार करोड़ के घोटालों का भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि पिछले दस वर्षो में मोदी ने यह भ्रमजाल फैलाया है कि उनके काल में भ्रष्टाचार मुक्त शासन और विकास हुआ है, लेकिन सच्चाई इससे परे है। चुनावी आहट के बीच वह हर महीने दिल्ली में दस्तावेजों के सहारे इसका खुलासा करेंगे। केशुभाई के काल को बेहतर बताते हुए उन्होंने कहा कि उनके समय गुजरात पर 34 हजार करोड़ का ऋण था जो अब बढ़कर 1.32 लाख करोड़ हो गया है। उन्होंने कहा कि मोदी ने टाटा समेत विभिन्न उद्योगपतियों को जिस तरह जमीन का आवंटन और सुविधाएं दी हैं उसका खामियाजा आम गुजराती को भुगतना पड़ रहा है। गुजरात दूसरे राज्यों को भले ही बिजली मुहैया करा रहा हो, खुद गुजरात में 4.5 लाख किसान का कृषि बिजली के लिए आवेदन वर्षो से अनसुना पड़ा है। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि मोदी की लोकप्रियता कम हो रही है और 2012 में उन्हें सत्ता गवांनी पड़ेगी। इससे पहले केशुभाई ने भी सुषमा और जेटली से मुलाकात कर अपनी शिकायत सुनाई। यह और बात है कि उनकी शिकायतों पर केंद्रीय नेतृत्व बहुत गंभीर नहीं है।
Friday, June 1, 2012
आडवाणी भाजपा से निराश
नरेंद्र मोदी-संजय जोशी विवाद अभी ठंडा भी नहीं हुआ था कि भाजपा के शीर्ष नेता लालकष्ण आडवाणी ने पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी और संघ पर अपने ब्लॉग का बम फोड़ दिया। गुरुवार को जब पार्टी भारत-बंद के जरिए केंद्र को घेरने में जुटी थी, आडवाणी ने मौजूदा भाजपा की क्षमता और भ्रष्टाचार के मोर्चे पर उसकी नीयत पर गंभीर सवाल उठाए। आडवाणी ने यहां तक कह डाला कि संप्रग सरकार से नाराज जनता राजग को लेकर भी निराश है। पार्टी नेतृत्व की ओर से लिए गए कुछ पुराने फैसलों का हवाला देते हुए वह यह कहने से नहीं चूके कि भ्रष्टाचार के खिलाफ भाजपा के अभियान की धार कुंद हो गई है। लिहाजा पार्टी को आत्मचिंतन करना चाहिए। लंबे समय तक संघ के चहेते रहे आडवाणी ने ब्लॉग में परोक्ष रूप से पार्टी में उसके हस्तक्षेप पर सवाल खड़ा कर दिया। गडकरी का नाम लिए बगैर उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश की हार और मायावती सरकार में बसपा से हटाए गए भ्रष्टाचार के आरोपी बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में शामिल करना, कर्नाटक की घटना और झारखंड राज्यसभा चुनाव ने भाजपा की साख गिरा दी। गौरतलब है कि कुशवाहा को पार्टी में शामिल करने का फैसला गडकरी ने ही लिया था। कर्नाटक में बीएस येद्दयुरप्पा मुख्यमंत्री पद से तब हटाया गया था जब आडवाणी ने खुले तौर पर इसका निर्देश दिया था। इसी तरह झारखंड में निर्दलीय अंशुमान मिश्रा को टिकट देने का फैसला भी गडकरी का माना जाता है। पार्टी के अंदर यह धारणा है कि गडकरी के फैसले को संघ की भी सहमति है या फिर संघ के इशारे पर कोई फैसला लिया गया है। लिहाजा आडवाणी यहीं नहीं रुके। उन्होंने कहा कि 1984 में जब भाजपा को संसद में सिर्फ दो सीटें मिली थीं उस वक्त भी कार्यकर्ताओं का जोश खत्म नहीं हुआ था, लेकिन आज हर स्तर पर निराशा है और जनता विकल्प के तौर पर राजग को लेकर आश्वस्त नहीं है। उन्होंने आगाह किया पार्टी को आत्मचिंतन की जरूरत है। परोक्ष तौर पर आडवाणी ने गडकरी के दूसरे कार्यकाल को लेकर सवाल खड़ा किया। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के करीबी हैं। उन्हें पहली बार अध्यक्ष बनाने से लेकर दूसरे कार्यकाल का रास्ता साफ करने तक में संघ की भूमिका मानी जाती है। अध्यक्ष का कार्यकाल बढ़ाने के मुद्दे पर भी आडवाणी सहमत नहीं थे। शायद यही कारण था कि मुंबई कार्यकारिणी की बैठक में इस बाबत आए संविधान संशोधन पारित होने के वक्त भी आडवाणी गैरहाजिर थे। बाद में मुंबई की रैली से आडवाणी ने दूरी बनाए रखी थी। हालांकि इसका कारण पूर्व निर्धारित कार्यक्रम बताया गया था, बावजूद इसके कार्यकारिणी और रैली का निर्धारण भी काफी वक्त रहते किया जाता है।
Monday, May 28, 2012
मजबूरी में मुलायम होता हाथ
यूपीए सरकार की तीसरी सालगिरह के मौके पर आयोजित समारोह में समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव की प्रमुखता से शिरकत को लेकर राजनीतिक हलकों में अटकलों का बाजार गर्म हो गया। यद्यपि दोनों ने इसे शिष्टाचार का नाम दिया है, किंतु इसके गूढ़ राजनीतिक निहितार्थ की अनदेखी नहीं की जा सकती। कांग्रेस पर आर्थिक स्थिति लगातार खराब होने और सरकार पर नीतिगत फैसलों में ढिलाई का आरोप लग रहा है तो नित नए घोटालों का उजागर होना और बढ़ती महंगाई कोढ़ में खाज की तरह है। आम चुनाव (2014) से पहले कांग्रेस आमजन के बीच अपनी इस छवि को तोड़ना चाहती है। इसलिए सपा सुप्रीमो से नजदीकियां उसकी राजनीतिक जरूरत हो गई है। इसीलिए डिनर पार्टी में गठबंधन के नये उभरते समीकरण की यह तस्वीर दिखी है ताकि कांग्रेस अपने सहयोगियों को उनकी हद बता सके। अभी तक वह उनके आगे घुटनों के बल खड़ी थी। ऐसे में राजनीतिक हलकों में यह चर्चा शुरू हो गई है कि मुलायम सिंह किस हद तक कांग्रेस का साथ निभाएंगे और किस कीमत पर। राजनीति में कुछ असंभव नहीं है। जरूरत के अनुसार दूरियां नजदीकियों में और नजदीकियां दूरियों में बदलती रहती हैं। गठबंधन राजनीति में अपने ‘नंबर गेम’ को दुरुस्त देखकर सरकार ने कठोर कदम उठाने के संकेत दे दिये हैं। उसकी पहली कोशिश आर्थिक सुधारों की धीमी पड़ी गति को रफ्तार देने की है ताकि खराब आर्थिक स्थिति को सुधारा जा सके। सहयोगी दलों के अड़ियल रुख के कारण ही रिटेल तथा पेंशन में एफडीआई और बैंकिंग संशोधन बिल अधर में लटके हैं। अब उसकी प्राथमिकता इन्हें यथाशीघ्र पास कराने की है। साथ उसकी कोशिश वर्ष 2012-13 में अनुमानित वृद्धि दर 7.75 फीसद को बनाए रखने की है। फिलहाल रुपया डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक न्यूनतम स्तर पर है तो औद्योगिक विकास दर 3.5 प्रतिशत के करीब है। ऐसे में बाजार को आशंका है कि यदि देश की अनुमानित वृद्धि दर इससे कम हुई तो रोजगार, वेतन और बचत पर मार पड़ेगी। परिणामस्वरूप बीस साल में पहली बार मध्यवर्ग के जीवन स्तर में गिरावट आएगी। अभी सरकार पेट्रोल के दामों में साढ़े सात रुपये की वृद्धि कर कठोर फैसला लेने की दिशा में आगे बढ़ी है। हालांकि उसकी राजनीतिक दुारियां भी कम नहीं हैं। आसन्न राष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस की साख दांव पर है। उसे अपने प्रत्याशी की जीत के लिए सहयोगियों के अलावा सपा का समर्थन चाहिए। अब सपा के साथ कांग्रेस की बढ़ी निकटता से यह चुनौती आसान होती दिख रही है क्योंकि राज्यसभा में पेश लोकपाल बिल को प्रवर समिति को भिजवाकर सपा ने इसका इजहार कर दिया है। आज क्षेत्रीय नेताओं में मुलायम की स्थिति सबसे मजबूत है। उत्तर प्रदेश में बहुमत की सरकार होने से सपा उत्साह से लबरेज है। मुलायम की धर्मनिरपेक्ष छवि पर कोई दाग नहीं है। अभी यूपीए में जो दल शामिल हैं, उनमें राष्ट्रवादी कांग्रेस को छोड़कर अन्य सभी कभी न कभी भाजपा से हाथ मिला चुके हैं। ऐसे में कांग्रेस को मुलायम का आंखमूंदकर समर्थन मिल पाना दूर की कौड़ी माना जा रहा है क्योंकि उनकी नजर 2014 के आम चुनावों पर है, जहां उनका सीधा मुकाबला कांग्रेस से होगा। इसलिए उनकी हर कोशिश कांग्रेस को कमजोर रखने की ही होगी। सपा ने लोस चुनाव में 50 से अधिक सीटें जीतने का लक्ष्य तय किया है। वैसे यूपीए सरकार की बदहाली को लेकर जनता में गुस्सा है तो भाजपा की आपसी लड़ाई से वह निराश है। ऐसे में आने वाले दिनों में क्षेत्रीय दलों की केंद्र की राजनीति में मुख्य भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। मुलायम उसका केंद्रबिंदु बनना चाहते हैं। अभी कुछ दिन पूर्व संसद की साठवीं सालगिरह पर मुलायम ने कांग्रेस और भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा था कि 2014 में केंद्र में ऐसी सरकार बनेगी जिसे कांग्रेस और भाजपा चाहकर भी नहीं गिरा सकेंगी। इससे स्पष्ट है कि वे 2014 में केंद्रीय राजनीति में अपनी बड़ी भूमिका की तैयारी में हैं। इसलिए वह कांग्रेस के लिए उसके किसी भी सहयोगी दल से नाराजगी मोल नहीं लेंगे। दूसरे, उनकी राजनीति कांग्रेस विरोध की रही है। अभी हर मुद्दे पर सरकार के विफलता के कारण कांग्रेस की जनता के बीच भद पिट रही है। ऐसे में मुलायम सार्वजनिक तौर पर कांग्रेस से अपनी निकटता दिखाने से भी परहेज करेंगे। मुलायम सिंह राजनीति के चतुर खिलाड़ी हैं इसलिए उन्हें अपनी कमजोरी और मजबूती का बखूबी पता है। उन्होंने वर्ष 2008 में परमाणु करार के सवाल पर यूपीए-एक की सरकार बचाई थी। ऐसा उन्होंने अपने अपमान की परवाह किये बगैर किया था, क्योंकि 2004 में कांग्रेस के भोज में उनकी घोर उपेक्षा हुई थी। इतना ही नहीं, तब वामपंथियों ने सरकार से समर्थन वापस लिया था और उनसे मुलायम के मधुर संबंध थे। किंतु देशहित की खातिर उन्होंने उनकी भी परवाह नहीं की थी। उस समय लोकसभा में उनके 36 सदस्य थे। उस समय भी वह यूपीए सरकार में शामिल नहीं हुए जिसके चलते उनकी अलग पहचान बनी। अब यूपीए-दो सरकार में शामिल घटक दलों की सौदेवाजी, आसन्न मध्यावधि चुनाव से देश को बचाने तथा खस्ताहाल अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए भंवर में फंसी कांग्रेस को उबारने के लिए उनकी यह निकटता फिर से बढ़ी है। किंतु राजनीतिक खटास यथावत है। लड़खड़ाती कांग्रेस को इस संकट की घड़ी में सहारा देकर मुलायम अपनी अलग पहचान बनाना चाहते हैं ताकि लोस चुनाव के दौरान वोटों की फसल काटी जा सके। इसलिए जन सरोकार के मुद्दों पर ही वह यूपीए सरकार के संकट मोचक बनेंगे। ऐसे में मुलायम कांग्रेस के कितने निकट और कितने दूर होंगे, यह अंदाजा लगाना स्वयं कांग्रेस के लिए भी काफी कठिन होगा। मसलन, पेट्रोल मूल्य वृद्धि के विरोध में विपक्षी दलों द्वारा आयोजित देशव्यापी बंद का समर्थन मुलायम भी कर रहे हैं। यूपीए-दो में कांग्रेस की जनछवि और राजनीति साख काफी कमजोर हुई है। भ्रष्टाचार और महंगाई से निपटने में उसकी अक्षमता के चलते जनता का आक्रोश बढ़ा है जिससे कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा है। इस गिरते मनोबल को उठाने के लिए कांग्रेस को उन्हें जीत का टॉनिक देना होगा। लेकिन वह इतना आसान नहीं दिखता। क्योंकि 2014 के आम चुनाव से पहले अभी कई विधानसभा चुनाव होने हैं, इनमें गुजरात, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान, मध्यप्रदेश, दिल्ली तथा छत्तीसगढ़ आदि शामिल है। वैसे गुजरात में हाल के मनसा उपचुनाव में जीत से वहां के कांग्रेसियों में उत्साह है, किंतु वे राज्य को मोदी के हाथों से छीनने की उम्मीद नहीं रखते। दूसरे, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपने 22 विधायकों के विद्रोह का सामना कर रहे हैं। उनके लिए अच्छी खबर यह है कि यहां भाजपा भी अंतर्कलह की शिकार है। इसी तरह हिमाचल प्रदेश में भी कांग्रेस गुटबंदी की शिकार है, हालांकि कर्नाटक में येदियुरप्पा के विरोध के चलते कांग्रेसियों में उम्मीद जरूर जगी है कि इससे पार्टी में नई जान आएगी। यह सच है कि दिल्ली में कांग्रेस के पास शीला दीक्षित जैसी करिश्माई क्षेत्रीय नेता जरूर हैं पर मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान और छत्तीसगढ़ में रमन सिंह जैसे भाजपाई क्षत्रपों के मुकाबले के नेता उसके पास नहीं हैं। कांग्रेस के सामने फौरी चुनौती 12 जून को आंध्रप्रदेश में 18 विधानसभा सीटों के लिए होने वाले उपचुनाव हैं। यहां जगन मोहन रेड्डी कांग्रेस को सांसत में डाले हैं तो अलग तेलंगाना राज्य के मुद्दे पर उसका ढुलमुल रवैया गले की फांस बना हुआ है। ऐसे में आम चुनाव से पूर्व होने वाले ये चुनाव कांग्रेस के लिए काफी अहम माने जा रहे हैं। इसीलिए कांग्रेस मुलायम के सहारे अपने सहयोगी दलों के दबाव को कम करने की जुगत में है। मुलायम सिंह को पता है कि कांग्रेस आज मजबूरी में उनके निकट आई है। इसलिए उन्हें इस सहयोग की राजनीतिक कीमत बसूलने में तनिक चूक नहीं करना चाहिए। उत्तर प्रदेश के लिए विशेष पैकेज के लिए उन्हें दबाव डालना चाहिए। साथ ही राज्य में चल रही केंद्रीय योजनाओं के लिए ज्यादा से ज्यादा धन की मांग करनी चाहिए। इसके अलावा उन्हें कांग्रेस के साथ अपनी निकटता दिखाने में यह सतर्कता बरतनी होगी कि उसकी अक्षमता के लिए जनता उनकी पार्टी सपा को भी उसी के कतार में न खड़ी कर सके। क्योंकि उत्तर प्रदेश में बहुमत की सरकार बनाने के बाद उनकी असल चुनौती 2014 में केंद्रीय राजनीति की मजबूत धुरी बनने की है। क्योंकि दोनों राष्ट्रीय दल (कांग्रेस- भाजपा) अपनी कमजोरियों से जूझ रहे हैं। ऐसे में केंद्रीय राजनीति में क्षत्रपों की अहम भूमिका की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
Monday, April 30, 2012
प्रणब ने बंद कराई थी टाट्रा ट्रक सौदे की जांच!
टाट्रा ट्रक सौदे को लेकर अगर 2005 में उठी शिकायतों पर शिद्दत से कार्रवाई हुई होती तो घोटाले का जिन्न आज सरकार के सिर पर न नाच रहा होता। सौदे की पड़ताल से जुड़ी फाइलें कहती हैं कि इस मामले में उठी शिकायतों की जांच को तत्कालीन रक्षामंत्री प्रणव मुखर्जी की इजाजत से जून 2005 में बंद किया गया था। 2005 के मध्य में मीडिया में शिकायतें आई थीं कि भारत टाट्रा ट्रकों की खरीद एजेंट के जरिए रहा है और टाट्रा सिपोक्स कंपनी इसकी मूल निर्माता नहीं है। सौदे में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी बीईएमएल की भूमिका महज पुर्जे जोड़ने वाले की ही है। इसमें कोई तकनीकी हस्तांतरण नहीं हो रहा। 24 मार्च को शुरू हुई सीबीआइ जांच में भी यही आरोप लगाए गए हैं। दैनिक जागरण के पास मौजूद दस्तावेजों के मुताबिक, 2005 में उठी शिकायत पर रक्षा उत्पादन विभाग ने जांच कराई थी। ब्रातिस्वाला, स्लोवाकिया में भारतीय राजदूत से रिपोर्ट मांगने के साथ ही टाट्रा कंपनी के प्रबंधन से स्पष्टीकरण तलब किया था। इसके आधार पर तैयार विभागीय जांच रिपोर्ट में टाट्रा सिपोक्स, यूके को मूल उपकरण निर्माता का सर्टिफिकेट भी दिया गया था। मंत्रालय ने इस निष्कर्ष तक पहुंचने में टाट्रा सिपोक्स के निदेशक जोजेफ मेजस्की के जवाब को भी आधार बनाया था, जिसमें कहा गया था कि टाट्रा सिपोक्स यूके को टेनेक्स (2002 में टाट्रा सिपोक्स एएस स्लोवाकिया का नाम बदला) चेक गणराज्य की टाट्रा एएस की ओर से दस्तखत का अधिकार है। रोचक बात है कि रक्षा मंत्रालय ने रिपोर्ट में मेजेस्की के जवाब को जगह दी है, जो अगस्त 2004 तक आर्थिक धोखाधड़ी मामले में 22 माह जेल काट चुके हैं। टाट्रा ट्रक खरीद पर भारतीय राजदूत की रिपोर्ट में कहा गया कि वाहनों की आपूर्ति मूल उपकरण निर्माता अपनी ही सहयोगी कंपनियों के जरिए कर रही है। उसके अलावा खरीद का और कोई रास्ता उपलब्ध नहीं है। हालांकि तत्कालीन भारतीय राजदूत एमके लोकेश (इन दिनों अबूधाबी में भारत के राजदूत) से संपर्क किया गया तो उन्होंने कहा,मामला पुराना है, लिहाजा कुछ कहना संभव नहीं है। रक्षा उत्पादन विभाग की रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि टाट्रा सिपोक्स से उपकरण खरीदने के अलावा उसके पास कोई विकल्प नहीं है। विभाग ने रिपोर्ट और कैबिनेट को भेजे नोट में ट्रकों के प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की संभावना नकारते हुए कहा,सेना के ऑर्डर का शेड्यूल इससे मेल नहीं खाता। पर्याप्त मांग के अभाव में बीईएमएल के लिए ट्रकों का भारतीयकरण करने संभव नहीं है। अंत में टिप्पणी है कि शिकायतों व जांच को रक्षामंत्री के संज्ञान में लाया गया और उनकी इजाजत पर इसे बंद कर दिया गया। आरोपों के घेरे में आए बीईएमएल के अध्यक्ष व प्रबंध निदेशक वीआरएस नटराजन भी यही दलीलें दे रहे हैं। मसलन, चेकोस्लोवाकिया के विभाजन के बाद टाट्रा कंपनी भी दो हिस्सों में बंट गई। दोनों कंपनियों ने टाट्रा सिपोक्स यूके को अधिकृत किया है। हालांकि नटराजन से पूछताछ के बाद दर्ज सीबीआइ की एफआइआर इन दलीलों से प्रभावित नहीं नजर आई।
Monday, April 23, 2012
उत्तर प्रदेश पुलिस में 60 फीसदी सीटें खाली
देश में अपराध के सबसे ऊंचे ग्राफ वाले राज्य उत्तर प्रदेश की पुलिस में 60 प्रतिशत पद रिक्त हैं। जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह आंकड़ा 25 फीसदी है। ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड स्टडी की रिपोर्ट में यह बात सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक आंध्र में 31 प्रतिशत, बिहार में 28 प्रतिशत और गुजरात में 27 प्रतिशत, तमिलनाडु में 16 प्रतिशत, महाराष्ट्र में 11 प्रतिशत, राजस्थान व कर्नाटक में 11 प्रतिशत और मध्य प्रदेश में 10 प्रतिशत पुलिस बलों के पद रिक्त हैं। गृह मंत्रालय ने इस रिपोर्ट को सचेत करने वाली बताया है। उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जातियों के खिलाफ हुए प्रताड़ना और हत्या जैसे अपराधों के मामलों में जबर्दस्त बढ़ोतरी के बावजूद राज्य में 1 जनवरी, 2011 तक पुलिस बल के स्वीकृत तीन लाख 68 हजार 260 में सिर्फ एक लाख 49 हजार 68 पदों पर ही तैनाती हुई है। राष्ट्रीय स्तर पर कुल स्वीकृत 20 लाख 64 हजार 370 पदों में पांच लाख से ज्यादा पद खाली पड़े हैं, जो कुल पदों का 25 प्रतिशत है। वर्ष 2010 के दौरान उत्तर प्रदेश में 4,401 हत्याओं समेत कुल 22 लाख 87 हजार 799 आपराधिक मामले दर्ज किए गए, जो भारत के किसी भी राज्य के मुकाबले सबसे ज्यादा हैं। राज्य में अनुसूचित जातियों के खिलाफ भी सबसे अधिक 6,272 अपराध हुए, जो पूरे देश के 32,712 मामलों का 19.2 प्रतिशत है। पिछले सप्ताह आंतरिक सुरक्षा पर हुई मुख्यमंत्रियों की बैठक में गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड स्टडी के इस अध्ययन को सचेत हो जाने का संकेत करार दिया। उन्होंने राज्यों से अनुरोध करते हुए कहा कि आने वाली चुनौतियों का सामना करने की क्षमता बढ़ाने के लिए तुरंत आवश्यक कदम उठाए जाएं। इसी बैठक में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी कहा था कि कोई भी ढांचा या प्रणाली उसको चलाने वाले लोगों से बेहतर नहीं हो सकती है। उन्होंने कहा कि हमें पुलिस बल में संख्या बढ़ाने के साथ ही गुणवत्ता बढ़ाने की भी जरूरत है। पर्याप्त संख्या में पुलिस बल नहीं होने से राज्य सरकारों को कई बार काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। किसी भी महत्वपूर्ण समस्या से निपटने के लिए केंद्रीय बलों पर निर्भर होना पड़ता है। इसके अलावा प्रतिदिन की समस्याओं से निजात पाने में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इस खुलासे के बाद हो सकता है कि कोई उचित कदम उठाया जाए।
पार्षदों का चिट्ठा, 21 फीसदी पर दर्ज आपराधिक मुकदमे
दिल्ली की तीन नगर निगमों में जीत कर पहुंचे पार्षदों में से 21 फीसदी ऐसे हैं, जिन पर आपराधिक मुकदमा दर्ज है। भाजपा में ऐसे पार्षदों की तादात 24 फीसदी है, जबकि कांग्रेस में 21 फीसदी है। यह दावा किया है कि एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक राइटस (एडीआर) ने। एडीआर ने राज्य चुनाव आयोग को प्रत्याशियों द्वारा जमा कराये गये शपथ पत्र के विश्लेषण के बाद यह आंकड़े जारी किये हैं। एडीआर अब तक 272 में से 236 नवनिर्वाचित पार्षदों के ही शपथ पत्र का विश्लेषण किया है और उसका दावा है कि अन्य पार्षदों का शपथ पत्र हासिल होते ही नये आंकड़े जारी होंगे। एडीआर के मुताबिक 236 में से 49 पार्षदों ने अपने ऊपर आपराधिक मामले दर्ज होने की जानकारी शपथ पत्र में दी है। इनमें से भाजपा के 121 में से 29, कांग्रेस के 66 में से 14, बसपा के 14 में से दो, इनेलो के तीन में से एक पार्षद शामिल हैं। इनमें 37 पुरुष और 12 महिलाएं हैं। इन 49 में से 12 पार्षदों पर हत्या, हत्या का प्रयास, अपहरण, डकैती, जबरन वसूली के मामले दर्ज हैं, इनमें से भाजपा के 5, कांग्रेस के चार और बसपा का एक पार्षद हैं। जाकिर नगर वार्ड नंबर 205 से चुने गये शोएब दानिश पर चार मुकद्मे दर्ज हैं, इनमें से दो मुकदमे हत्या के प्रयास के हैं। इन 236 पार्षदों में से 120 करोड़पति हैं। इनमें सबसे अधिक संपत्ति का ब्योरा देने वाली पार्षद पंजाबी बाग की सतविंद्र कौर सिरसा हैं, उन्होंने 112 करोड़ रुपये की संपत्ति का ब्योरा दिया है। 126 नवादा से चुनी गई निर्दलीय नरेश बलयान (57.23 करोड़ रुपये) व सुभाष नगर 152 से चुनी गई कांग्रेस की मंजू सेतिया (32.79 करोड़ रुपये) हैं। भाजपा पार्षदों की औसत संपत्ति 3.19 करोड़ रुपये प्रति पार्षद, कांग्रेसी पार्षदों की 2.46 करोड़, बसपा पार्षदों की 1.79 करोड़ रुपये प्रति पार्षद, इनेलो पार्षदों की औसत संपत्ति 4.95 करोड़ रुपये प्रति पार्षद है।
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