Wednesday, February 23, 2011

राजनीतिक प्रपंच का पर्दाफाश


गोधरा मामले में विशेष न्यायालय के फैसले को कथित सेक्युलरिस्टों की राजनीति उजागर करने वाला मान रहे हैं…

अहमदाबाद के विशेष न्यायालय ने आजाद भारत के इतिहास की क्रूरतम घटना पर फैसला सुना दिया है। 27 फरवरी, 2002 को गोधरा रेल दहन इतिहास की ऐसी दुर्भाग्यशाली घटना थी जिससे निकली सांप्रदायिकता की लपटों ने गुजरात को नफरत की हिंसा में जला दिया। साबरमती एक्सप्रेस के कोच एस 6 के अंदर जलकर 59 लोग मारे गए थे। भारत में पहले ऐसी दर्दनाक घटना कभी नहीं हुई थी, किंतु इसके साथ कुत्सित राजनीति का जो सिललिसा आरंभ हुआ उसका आज तक अंत नहीं हुआ है। इसके अपराधियों का पता लगाने एवं सजा देने की आवाज उठाने की जगह इसे दुर्घटना साबित करने की कोशिशें होती रही हैं। कुछ तो इसे गुजरात सरकार का कारनामा बताते रहे ताकि इससे भड़के सांप्रदायिक धु्रवीकरण का चुनावी लाभ उठा सकें। न्यायालय के फैसले का महत्व इस मायने में है कि इसने इन सबको गलत साबित कर दिया है। गोधरा फैसला गुजरात पुलिस के लिए बड़ी जीत है। विशेष जांच दल (एसआइटी) के आरोप-पत्र में वर्णित घटनाक्रम को न्यायालय ने लगभग स्वीकार कर लिया है। इसमें अमन गेस्ट हाउस में साजिश रचने की बैठक से लेकर वहीं पेट्रोल रखने तथा उसे पीपे द्वारा डिब्बे के बाहर से अंदर डालने और कपड़ों के गट्ठर में आग लगाकर अंदर फेंकने की बात शामिल थी। जांच दल ने अमन गेस्ट हाउस के मालिक रज्जाक कुरकुर को मुख्य अभियुक्त कहा था। न्यायालय ने भी इस पर मुहर लगा दी है और उसे पांच मुख्य साजिशकर्ताओं में माना है। तीन अभियुक्तों द्वारा पीपे से पेट्रोल का छिड़काव तथा कपड़ों के गट्ठर में आग लगाकर अंदर फेंकने की बात भी न्यायालय ने स्वीकार की। राज्य फोरेंसिक विज्ञान निदेशालय ने कोच को जलाने के लिए पेट्रोल के प्रयोग की बात स्वीकार की थी। न्यायालय ने 253 गवाहों के बयान, 1500 दस्तावेजी सबूतों के अध्ययन, परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के गहरे विश्लेषण तथा आठ अभियुक्तों द्वारा अपराध की स्वीकारोक्ति के आधार पर फैसला दिया है। इस फैसले के बाद गोधरा मामले पर जारी गंदी राजनीति बंद होनी चाहिए, किंतु राजनीति बंद हो जाएगी, ऐसा लगता नहीं। बहुत से ऐसे राजनेता और संगठन हैं, जिनके पास पिछले नौ सालों से मोदी विरोध सबसे बड़ा मुद्दा रहा है। पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव द्वारा गठित न्यायमूर्ति बनर्जी आयोग ने किसी षड्यंत्र को नकारते हुए गोधरा कांड को न केवल दुर्घटना करार दिया था, बल्कि कारसेवकों पर ही इसकी जिम्मेदारी डालने की कोशिश की थी। बिहार चुनाव में इस रिपोर्ट का खूब इस्तेमाल किया गया। इसके विपरीत नानावती आयोग (सेवानिवृत्त न्यायाधीश जीटी नानावती एवं केजी शाह) ने भी इसे सुनियोजित आपराधिक षड्यंत्र का नतीजा करार दिया। अब न्यायालय ने न्यायमूर्ति बनर्जी रिपोर्ट को झूठ करार दे दिया है। बनर्जी और लालू प्रसाद यादव की प्रतिक्रिया तो फैसले को शिरोधार्य करने की नहीं हो सकती। इस श्रेणी के लोग फैसले के उन पहलुओं को सामने लाने की कोशिश कर रहे हैं, जिनसे यह साबित हो सके कि उन्होंने कुछ गलत नहीं कहा था। वे 63 लोगों के बरी होने का मामला उठा रहे हैं। मौलवी उमरजी को दोषमुक्त करार देने की बात रेखांकित कर रहे हैं। इसके आधार पर वे मोदी और गुजरात पुलिस को इनका अपराधी साबित कर रहे हैं। वे पूछ रहे हैं कि इन लोगों का क्या कसूर था कि इन्हें नौ साल जेल में रहना पड़ा? जिन 94 लोगों के खिलाफ मामला चल रहा था, उनमें से 80 तो साबरमती जेल में हैं और 14 जमानत पर बाहर हैं। जिन 134 लोगों को अभियुक्त बनाया गया उनमें 14 पहले ही बरी हो गए, पांच की मृत्यु हो गई, पांच अवयस्क थे एवं 16 फरार हैं। अभियुक्तों में से 63 यानी करीब दो-तिहाई का बरी होना साधारण बात नहीं है, किंतु न्यायालय के फैसले में इन सभी को निर्दोष नहीं माना गया है। न्यायालय ने कहा है कि इनके खिलाफ प्रत्यक्ष सबूतों का अभाव है। मौलवी हुसैन उमरजी के बारे में भी न्यायालय ने यही कहा है कि उनके विरुद्ध प्रत्यक्ष सबूत नहीं हैं। न घटना के समय उनकी उपस्थिति के प्रमाण हैं और न ही अमन गेस्ट हाउस की बैठक में। प्रत्यक्ष सबूत न होने के आधार पर बरी होने का अर्थ किसी का बिल्कुल निर्दोष होना नहीं है। वैसे भी, अभियुक्तों की तरह ही गुजरात पुलिस के सामने भी उच्च एवं उच्चतम न्यायालय में जाने का विकल्प खुला है। अफसोस की बात है कि फैसला आने के बाद भी बहुत से राजनेताओं और संगठनों की प्रतिक्रिया रेल कोच में मारे गए कारसेवकों के प्रति उतनी ही क्रूर है। यही वह भाव है जिसके विरुद्ध प्रतिक्रियाएं होती हैं। बरी हुए 63 लोगों के प्रति सहानुभूति रखने वालों की नजर में क्या जला कर मारे गए 59 लोग मनुष्य नहीं थे? वस्तुत: यह रवैया दुर्भाग्यपूर्ण, अमानवीय और शर्मनाक है। इन्हें नहीं भूलना चाहिए कि गोधरा कांड से लेकर गुजरात दंगों के प्रमुख नौ मामलों की कानूनी कार्रवाई उच्चतम न्यायालय की निगरानी में चल रही है। इसमें यह पहला फैसला उच्चतम न्यायालय द्वारा हरी झंडी मिलने के बाद आया है। इसलिए देश हित में यही है कि न्यायालय के निष्कषरें को स्वीकार कर भविष्य की ओर कदम बढ़ाए जाएं। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)


राजनीतिक चोला ओढ़ने की तैयारी में पूर्व आतंकी


अलगाववादियों और मुख्यधारा के खेमों में बंटे जम्मू कश्मीर के सियासी मंच पर जल्द ही दो नए राजनीतिक दलों का उदय होने वाला है। खासबात यह है कि दोनों ही दलों की कमान बरसों पहले हिंसा का खूनी खेल खेलने वाले पूर्व आतंकियों के हाथों में है। एक दल हिजबुल के पूर्व आप्रेशनल कमांडर इमरान राही और जुबैर-उल-इस्लाम तैयार करने में लगे हैं, जबकि दूसरा संगठन पूर्व इख्वान कमांडर लियाकत अली खान बना रहे हैं। कश्मीर को भारत का हिस्सा बताने के साथ ही उनका दावा है कि वे राज्य में तीसरे फं्रट की भूमिका निभाने के साथ ही जनता को हुर्रियत, नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी समेत का प्रभावशाली विकल्प देंगे। उल्लेखनीय है कि राही और लियाकत पहले भी सियासी संगठन बना चुके हैं,लेकिन मुख्यधारा की सियासत में किसी तरह की जमीन तैयार करने में नाकाम रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, पूर्व आतंकी कमांडरों की पार्टी खड़ा करने में कई राजनीतिक संगठन शामिल हैं। इनमें वह दल प्रमुख हैं जो अलगाववादियों व आतंकियों के प्रति उदार रवैया रखते हैं। इनमें अवामी नेशनल कांफ्रेंस का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। अवामी नेशनल कांफ्रेंस के संस्थापक जीएम शाह राज्य के मुख्यमंत्री भी रहे हैं और वह अलगाववादियों के करीब माने जाते रहे हैं। हालांकि इन दोनों संगठनों के गठन की अभी तैयारी ही चल रही है, लेकिन वादी में चर्चा है कि इनका गठन केंद्र सरकार और सेना आतंकियों व हुर्रियत के सफाए के लिए करा रही है। इमरान राही को जहां केंद्र समर्थन दे रही है, वहीं लियाकत अली को सेना। लियाकत अली का कहना है कि घाटी के कई मुख्यधारा के सियासी नेताओं के साथ-साथ हुर्रियत का कैडर भी हमारे साथ संपर्क में है। सही समय आने पर हम इन सभी का खुलासा करेंगे। उन्होंने कहा, जो लोग कह रहे हैं कि हमारे संगठनों को केंद्र सरकार या सेना द्वारा तैयार किया जा रहा है, वह हुर्रियत और आतंकियों का प्रापोगंडा कर रहे हैं, ताकि आम लोग हमसे दूर रहें, लेकिन असलियत सभी को पता है। भारतीय सेना कोई पाक फौज नहीं है जो यहां सियासी संगठनों को चलाए या बनाए। यह हिंदुस्तान है और कश्मीर हिंदुस्तान का हिस्सा। वहीं, इमरान राही ने भी कयासों को बेबुनियाद बताते हुए कहा,हमारा केंद्र या सेना से कोई तालमेल नहीं है। कश्मीर में अमन बहाली और कश्मीर समस्या के सही समाधान के प्रति गंभीर लोग हमारा पूरा समर्थन कर रहे हैं। यह लोग हमसे जुड़ रहे हैं। मेरा पहले भी सियासी संगठन रहा है। जुबैर भी सियासत में रहे हैं। अवामी नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष मुजफ्फर शाह ने भी इस मामले में सफाई देते हुए कहा, हम किसी एजेंसी के पिट्ठू नहीं हैं।जो लोग हम पर सेना या केंद्र सरकार के साथ मिलीभगत का आरोप लगा रहे हैं, वह खुद ही इनके या फिर किसी और संगठन के एजेंट हैं।इमरान राही हिजबुल मुजाहिद्दीन के उन चार कमांडरों में शामिल है जिन्होंने आठ फरवरी 1996 को केंद्र सरकार से कश्मीर में अमन बहाली के लिए पहली बार वार्ता प्रक्रिया शुरू की थी। इसी बातचीत के चलते सूबे में लगभग 16 साल बाद राष्ट्रपति शासन समाप्त हुआ था और एक निर्वाचित सरकार ने सत्ता संभाली थी।


अब जेपीसी में घुसने के लिए खींचतान


सरकार जेपीसी बनाने पर राजी हो गई है तो अब उसके स्वरूप और आकार को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच खींचतान शुरू हो गई है। 2जी स्पेक्ट्रम पर जांच के लिए संयुक्त संसदीय दल को प्रधानमंत्री की हरी झंडी के बाद अब विपक्षी दलों में जेपीसी में शामिल होने के लिए खींचतान मच गई है। सरकार चेयरमैन समेत 21 सदस्यीय जेपीसी गठित करने के मूड में है, वहीं विपक्ष यह संख्या 31 कराने के लिए दबाव बना रहा है। विपक्ष की इस मांग में यूपीए के सहयोगी दल एनसीपी ने भी सुर मिला दिया है कि सभी दलों का जेपीसी में प्रतिनिधित्व हो। हालांकि, 31 सदस्य होने पर भी सभी दलों का प्रतिनिधित्व नहीं हो सकता क्योंकि, राजनीतिक दलों की संख्या ही 37 है। कांग्रेस के उच्चपदस्थ सूत्र फिलहाल 21 सदस्यीय समिति गठित करने की तैयारी कर रहे हैं। इसमें 14 सदस्य लोकसभा और सात सदस्य राज्यसभा से होंगे। इस लिहाज से सभी दल तो दूर वामपंथियों, सपा, बसपा, तृणमूल, एनसीपी, एआइडीएमके जैसे दलों के लिए भी अनुपात के हिसाब से जगह मिलना मुश्किल होगा। सूत्रों के मुताबिक, इसके लिए वाम दलों ने तो एक ब्लाक बनाया है और सरकार ने दोनों सदनों से उनका एक-एक सदस्य लाने के संकेत दिए हैं। मुख्य विपक्षी दल भाजपा से चार सदस्यों के इसमें शामिल होने की उम्मीद है। इस पूरी स्थिति से सबसे ज्यादा परेशान तमिलनाडु की मुख्य विपक्षी पार्टी अन्नाद्रमुक है। नौ सीटों वाली अन्नाद्रमुक के थंबीदुरई किसी भी तरह जेपीसी में शामिल होने के लिए तीसरे मोर्चे का ब्लाक बनाने से लेकर भाजपा से मदद मांगने तक सभी उपक्रम कर रहे हैं। उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष और प्रधानमंत्री से सभी दलों के प्रतिनिधित्व की मांग रखी है, जिसका यूपीए के सहयोगी एनसीपी ने भी समर्थन किया है। इसीलिए, सरकार पर 31 सदस्यीय जेपीसी का दबाव बनाकर विपक्ष मुख्य दलों के प्रतिनिधित्व की जुगत भिड़ा रहा है। उधर, सरकार इस मसले पर विपक्ष के बीच की खींचतान को बढ़ाकर दूर से मजे लेने का कोई मौका नहीं छोड़ेगा। बुधवार शाम तक इसकी तस्वीर काफी हद तक स्पष्ट होने की उम्मीद है।


Tuesday, February 22, 2011

गाँधी परिवार नहीं है बेदाग


आंध्र के कांग्रेसी सांसदों की नारेबाजी


राष्ट्रपति के सम्बोधन में नहीं था ‘अलग तेलंगाना’ राज्य बनाए जाने का उल्लेख
अलग तेलंगाना राज्य का मुद्दा सोमवार को संसद के अन्दर से लेकर बाहर तक गूंजा। राष्ट्रपति के अभिभाषण में इस मुद्दे का उल्लेख न होने से नाराज कांग्रेस के सांसदों ने पहले तो अभिभाषण के दौरान ही तेलंगाना के गठन को लेकर नारेबाजी की तो बाद में संसद परिसर में महात्मा गांधी की प्रतिमा के सामने धरना दिया। नारेबाजी उस समय हुई जब उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल के अभिभाषण का अंग्रेजी रूपान्तरण पढ़ रहे थे। कांग्रेसी सांसदों के इस व्यवहार से कांग्रेस नेतृत्व के साथ ही प्रधानमंत्री भी भौंचक्के रह गए। राष्ट्रपति आज जब संसद के संयुक्त सत्र को हिन्दी में सम्बोधित कर रही थीं तो केन्द्रीय कक्ष में कुछ कांग्रेसी सांसद हाथ में बैनर लिए चुपचाप बैठे थे। सोनिया गांधी जिस पंक्ति में बैठी थीं, ठीक उसके पीछे छठी-सातवीं पंक्ति में बैठे ये सांसद भी राष्ट्रपति का अभिभाषण सुन रहे थे। अभिभाषण के बाद उपराष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी ने जैसे ही उनके अभिभाषण का अंग्रेजी पाठ शुरू किया, ये सांसद ‘जय तेलंगाना’ के नारे लगाने लगे। उन्हें नारा लगाते देख केन्द्रीय कक्ष में बैठे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी समेत सभी लोग हैरत में पड़ गए। कांग्रेस सांसद राजीव शुक्ला पीछे की तरफ दौड़े तथा उनको चुप कराने लगे, पर उन्होंने एक न सुनी। नारेवाजी कर रहे सांसदों के हाथ में सफेद बैनर था जिस पर सोनिया गांधी की तस्वीर थी।
‘वी वांट तेलंगाना, हमें तेलंगाना चाहिए’ के नारे : अभिभाषण खत्म होने के बाद जब राष्ट्रपति के साथ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और लोकसभा अध्यक्ष वापस लौटने लगे तो ये कांग्रेसी सांसद दोबारा अपनी सीट से उठे और हाथों में बैनर लिए ‘वी वांट तेलंगाना, हमें तेलंगाना चाहिए’ के नारे लगाते रहे। राष्ट्रपति जब उनके एकदम करीब पहुंचीं, तब भी वे नारेबाजी करते रहे। इसके बाद ये सांसद केन्द्रीय कक्ष से बाहर निकल कर संसद भवन परिसर स्थित महात्मा गांधी की प्रतिमा के पास आ गए और वहां नारेवाजी की, फिर वहीं बैठ गए।
अभिभाषण में तेलंगाना का उल्लेख होना चाहिए था : आंध्र प्रदेश से कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य केशव राव की अगुवाई में तेलंगाना क्षेत्र से पार्टी के 10 सांसद संसद भवन के बाहर भी बैनर लहरा रहे थे जिनमें ‘तेलंगाना की जनता के 55 साल के सपने को पूरा करो’ और ‘नौ दिसम्बर 2009 को किया वादा पूरा करो’ जैसी मांगें थीं। राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान अलग तेलंगाना राज्य के समर्थन में कांग्रेसी सदस्यों द्वारा बैनर दिखाए जाने को सही ठहराते हुए उन्होंने कहा कि अभिभाषण में तेलंगाना का उल्लेख किया जाना चाहिए था।
कांग्रेस के 2004 के घोषणापत्र में था तेलंगाना निर्माण का वादा : केशव राव ने संसद भवन परिसर में संवाददाताओं से कहा कि कांग्रेस ने 2004 में अपने घोषणापत्र में तेलंगाना के निर्माण का वादा किया था। पार्टी के अध्यक्षीय भाषण में भी इसका जिक्र आया था और नौ दिसम्बर 2009 को गृहमंत्री ने अलग तेलंगाना निर्माण की प्रक्रि या शुरू करने की घोषणा करके एक तरह से अलग राज्य के निर्माण की घोषणा कर दी थी।
अब तक 243 लोग कर चुके हैं आत्मदाह : राष्ट्रपति के अभिभाषण के मौके पर इस तरह से मांग उठाना क्या मर्यादा का उल्लंघन नहीं है, यह पूछे जाने पर राव ने कहा कि मैं नहीं समझता कि हमने किसी तरह से मर्यादा का उल्लंघन किया है। न ही हमने अपने पार्टी के रुख पर विरोध जताया है। हम चाहते थे कि जब इस बारे में मतभेदों पर अध्ययन करने के लिए गठित समिति की रिपोर्ट आ चुकी है तो राष्ट्रपति के अभिभाषण में इसका जिक्र आना चाहिए था। उन्होंने कहा कि अलग राज्य की मांग पूरी नहीं होने पर अब तक 243 लोग आत्मदाह कर चुके हैं।
कांग्रेस में हमारी पूरी निष्ठा, सात साल कर चुके हैं इंतजार : राव ने कहा कि कांग्रेस पार्टी के प्रति हमारी पूरी निष्ठा है और हमें पता है कि सोनिया गांधी जो फैसला करती हैं, वही होता है। उन्होंने कहा कि अलग तेलंगाना का निर्माण जल्द होना चाहिए अन्यथा वहां स्थिति और अधिक बिगड़ जाएगी। हमने सात साल तक इंतजार किया है, अब केंद्र सरकार को जल्दी फैसला करना चाहिए।