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Tuesday, May 3, 2011

वाम दलों ने अब पीएम से लगाई गुहार


पुरुलिया मामले में आरोपी किम डेवी के नए खुलासे की न्यायिक जांच की मांग को लेकर वाम दलों ने रविवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से गुहार लगाई। इससे पहले गृह मंत्री और वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी न्यायिक जांच की मांग को सिरे से खारिज कर चुके हैं। लेफ्ट फ्रंट ने प्रधानमंत्री से पुरुलिया में हथियार गिराए जाने के मामले में उच्चतम न्यायालय के किसी सेवारत न्यायाधीश से न्यायिक जांच कराने का अनुरोध किया है। प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में माकपा महासचिव प्रकाश करात और भाकपा महासचिव एबी वर्धन ने कहा कि सिर्फ इसी तरह की जांच से वर्ष 1995 की घटना के बारे में पूरी सच्चाई का पता लग सकेगा। पत्र में कहा गया है कि हाल ही में इस मामले में संलिप्त दो लोगों नील्स नीलसन उर्फ किम डेवी और पीटर ब्लीच मीडिया से बातचीत के दौरान हथियार गिराए जाने के मामले की जानकारी देते, कुछ आरोप लगाते और साजिश रचे जाने के बारे में बताते नजर आए हैं। दोनों नेताओं ने जोर दिया कि पूरे मामले की व्यापक जांच कराए जाने की जरूरत है। इसके लिए वे प्रधानमंत्री से उच्चतम न्यायालय के एक सेवारत न्यायाधीश से न्यायिक जांच कराने का अनुरोध करते हैं। वाम नेताओं ने कहा कि मामले के मुख्य आरोपी डेवी ने इस बारे में कुछ चौंका देने वाली जानकारी दी है कि वह हथियार गिराने वाले विमान का पता लगने और उसे उतारे जाने के बाद किस तरह मुंबई हवाई अड्डे से भाग निकलने में कामयाब रहा। करात और वर्धन ने कहा कि हालांकि इस मामले को 16 वर्ष बीत चुके हैं और कोलकाता की अदालत ने सुनवाई कर कुछ आरोपियों को सजा भी सुनाई है, लेकिन इस घटना को लेकर अब भी काफी कुछ स्पष्ट होना बाकी है। क्योंकि यह घटना देश की संप्रभुता तथा सुरक्षा पर गंभीर हमले की तरह थी। इन नेताओं ने आरोप लगाया कि यह प. बंगाल की तत्कालीन निर्वाचित सरकार के खिलाफ साजिश थी। वहीं गृह मंत्रालय के बयान ने कहा है कि डेवी इसके पहले भी पूरे मामले को राजनीतिक रंग देकर अपने को बेगुनाह साबित करने की कोशिश कर चुके हैं। वहीं भारत सरकार डेनमार्क से प्रत्यर्पण संधि नहीं होने के बाद भी पुख्ता सबूतों के साथ उसके प्रत्यर्पण की लगातार कोशिश करती रही है। इसी का नतीजा है कि किम डेवी के प्रत्यर्पण के मुद्दे पर डेनमार्क की स्थानीय अदालत में सुनवाई चल रही है। मंत्रालय के अनुसार प्रत्यर्पण की इसी अदालती प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए किम डेवी ने नए सिरे से इस मामलों को राजनीतिक रंग देने की कोशिश की है। गृहमंत्रालय ने किम डेवी को प्रत्यर्पण के बाद भारत की स्थानीय अदालत के सामने खुद को निर्दोष साबित करने की चुनौती दी है। उसके अनुसार पीटर ब्लीच समेत सजा पाए सभी आरोपियों से जुड़े सभी सबूत सार्वजनिक हैं और उन्हें कोई भी देख सकता है। लेकिन डेवी के खिलाफ सबूतों को फिलहाल सार्वजनिक नहीं किया जा सकता क्योंकि इससे उसके प्रत्यर्पण की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। गृह मंत्रालय ने साफ कर दिया है कि किम डेवी के भारत आ जाने के बाद उसके खिलाफ सभी सबूतों को अदालत के सामने पेश कर दिया जाएगा। 1995 में पुरुलिया में हथियार गिराने के मामले की जांच में गड़बड़ी के डेवी के आरोपों को खारिज करते हुए गृह मंत्रालय ने साफ कर दिया है कि शुरू से ही जांच एजेंसियां उसे खोज रही थी और अंतत 2001 में उसके डेनमार्क में होने का पता चला। डेनमार्क के साथ प्रत्यर्पण संधि नहीं होने के बावजूद भारत सरकार लगातार उसके प्रत्यर्पण की कोशिश करती है। यहां तक कि डेनमार्क के उपप्रधानमंत्री की भारत यात्रा के दौरान भी इस मुद्दे को उठाया गया।

अरुणाचल के सीएम का अब तक पता नहीं


अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री दोरजी खांडू और उनके हेलीकॉप्टर का रविवार दूसरे दिन भी कोई पता नहीं चला। खराब मौसम के कारण खोज अभियान में लगी वायुसेना और थल सेना की टीमों को कामयाबी हाथ नहीं लग सकी है। वायुसेना के दो सुखोई-30 एमकेआइ विमान संभावित दुर्घटना क्षेत्र का जायजा लेकर वापस बरेली लौट चुके हैं। संभावित घटनास्थल के आसपास बेहद धुंध होने के कारण इसरो के सेटेलाइट से ली गईं तस्वीरों से भी कुछ स्पष्ट नहीं हो रहा है। केंद्र सरकार ने मंत्री मुकुल वासनिक व वी नारायणसामी को खोजबीन अभियान की निगरानी के लिए ईंटानगर रवाना कर दिया है। पड़ोसी मुल्क भूटान से भी मदद मांगी गई है। विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने भूटान के प्रधानमंत्री जिग्मे थिनले से बात कर भूटानी क्षेत्र में अरुणाचल मुख्यमंत्री के लापता हेलीकॉप्टर की खोज में सहयोग करने को कहा है। 36 घंटों के दौरान जारी कोशिशों के बारे में सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह ने कहा,अभी तक मुख्यमंत्री के हेलीकॉप्टर का सुराग नहीं मिल सका है। सेना प्रमुख ने माना कि हेलीकॉप्टर की सुरक्षित लैंडिंग की खबरों के बाद खोज अभियान रोक दिया गया था, जिसे रविवार सुबह फिर शुरू किया गया। खांडू के हेलीकॉप्टर के भूटान में सुरक्षित उतरने को लेकर फैले भ्रम की वजह एक सैटेलाइट फोन से आयी कॉल थी। हालांकि इस बात की पुष्टि नहीं हो सकी कि यह कॉल मुख्यमंत्री के सेटेलाइट फोन से किया गया। मुख्यमंत्री के लापता हेलीकॉप्टर की खोज में वायुसेना के चार और सेना के दो हेलीकॉप्टर लगाए गए हैं। वहीं सेना के खोजी व बचाव दल के लगभग तीस कॉलम भी उतारे गए हैं। हालांकि खराब मौैसम व बादलों के कारण इस बात की आशंका जताई जा रही है कि सुखाई-30 के कैमरों में कैद हुई तस्वीरें भी जमीन की पूरी हकीकत शायद न दे पाएं। रविवार सुबह दस बजे तवांग से खांडू को ईटानगर के लिए लेकर उड़े पवनहंस कंपनी के हेलीकॉप्टर का करीब 20 मिनट बाद ही रेडियो संपर्क टूट गया था।

Tuesday, February 22, 2011

आंध्र के कांग्रेसी सांसदों की नारेबाजी


राष्ट्रपति के सम्बोधन में नहीं था अलग तेलंगानाराज्य बनाए जाने का उल्लेख
अलग तेलंगाना राज्य का मुद्दा सोमवार को संसद के अन्दर से लेकर बाहर तक गूंजा। राष्ट्रपति के अभिभाषण में इस मुद्दे का उल्लेख न होने से नाराज कांग्रेस के सांसदों ने पहले तो अभिभाषण के दौरान ही तेलंगाना के गठन को लेकर नारेबाजी की तो बाद में संसद परिसर में महात्मा गांधी की प्रतिमा के सामने धरना दिया। नारेबाजी उस समय हुई जब उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल के अभिभाषण का अंग्रेजी रूपान्तरण पढ़ रहे थे। कांग्रेसी सांसदों के इस व्यवहार से कांग्रेस नेतृत्व के साथ ही प्रधानमंत्री भी भौंचक्के रह गए। राष्ट्रपति आज जब संसद के संयुक्त सत्र को हिन्दी में सम्बोधित कर रही थीं तो केन्द्रीय कक्ष में कुछ कांग्रेसी सांसद हाथ में बैनर लिए चुपचाप बैठे थे। सोनिया गांधी जिस पंक्ति में बैठी थीं, ठीक उसके पीछे छठी-सातवीं पंक्ति में बैठे ये सांसद भी राष्ट्रपति का अभिभाषण सुन रहे थे। अभिभाषण के बाद उपराष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी ने जैसे ही उनके अभिभाषण का अंग्रेजी पाठ शुरू किया, ये सांसद जय तेलंगानाके नारे लगाने लगे। उन्हें नारा लगाते देख केन्द्रीय कक्ष में बैठे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी समेत सभी लोग हैरत में पड़ गए। कांग्रेस सांसद राजीव शुक्ला पीछे की तरफ दौड़े तथा उनको चुप कराने लगे, पर उन्होंने एक न सुनी। नारेवाजी कर रहे सांसदों के हाथ में सफेद बैनर था जिस पर सोनिया गांधी की तस्वीर थी।
वी वांट तेलंगाना, हमें तेलंगाना चाहिएके नारे : अभिभाषण खत्म होने के बाद जब राष्ट्रपति के साथ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और लोकसभा अध्यक्ष वापस लौटने लगे तो ये कांग्रेसी सांसद दोबारा अपनी सीट से उठे और हाथों में बैनर लिएवी वांट तेलंगाना, हमें तेलंगाना चाहिएके नारे लगाते रहे। राष्ट्रपति जब उनके एकदम करीब पहुंचीं, तब भी वे नारेबाजी करते रहे। इसके बाद ये सांसद केन्द्रीय कक्ष से बाहर निकल कर संसद भवन परिसर स्थित महात्मा गांधी की प्रतिमा के पास आ गए और वहां नारेवाजी की, फिर वहीं बैठ गए।
अभिभाषण में तेलंगाना का उल्लेख होना चाहिए था : आंध्र प्रदेश से कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य केशव राव की अगुवाई में तेलंगाना क्षेत्र से पार्टी के 10 सांसद संसद भवन के बाहर भी बैनर लहरा रहे थे जिनमें तेलंगाना की जनता के 55 साल के सपने को पूरा करोऔर नौ दिसम्बर 2009 को किया वादा पूरा करोजैसी मांगें थीं। राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान अलग तेलंगाना राज्य के समर्थन में कांग्रेसी सदस्यों द्वारा बैनर दिखाए जाने को सही ठहराते हुए उन्होंने कहा कि अभिभाषण में तेलंगाना का उल्लेख किया जाना चाहिए था।
कांग्रेस के 2004 के घोषणापत्र में था तेलंगाना निर्माण का वादा : केशव राव ने संसद भवन परिसर में संवाददाताओं से कहा कि कांग्रेस ने 2004 में अपने घोषणापत्र में तेलंगाना के निर्माण का वादा किया था। पार्टी के अध्यक्षीय भाषण में भी इसका जिक्र आया था और नौ दिसम्बर 2009 को गृहमंत्री ने अलग तेलंगाना निर्माण की प्रक्रि या शुरू करने की घोषणा करके एक तरह से अलग राज्य के निर्माण की घोषणा कर दी थी।
अब तक 243 लोग कर चुके हैं आत्मदाह : राष्ट्रपति के अभिभाषण के मौके पर इस तरह से मांग उठाना क्या मर्यादा का उल्लंघन नहीं है, यह पूछे जाने पर राव ने कहा कि मैं नहीं समझता कि हमने किसी तरह से मर्यादा का उल्लंघन किया है। न ही हमने अपने पार्टी के रुख पर विरोध जताया है। हम चाहते थे कि जब इस बारे में मतभेदों पर अध्ययन करने के लिए गठित समिति की रिपोर्ट आ चुकी है तो राष्ट्रपति के अभिभाषण में इसका जिक्र आना चाहिए था। उन्होंने कहा कि अलग राज्य की मांग पूरी नहीं होने पर अब तक 243 लोग आत्मदाह कर चुके हैं।
कांग्रेस में हमारी पूरी निष्ठा, सात साल कर चुके हैं इंतजार : राव ने कहा कि कांग्रेस पार्टी के प्रति हमारी पूरी निष्ठा है और हमें पता है कि सोनिया गांधी जो फैसला करती हैं, वही होता है। उन्होंने कहा कि अलग तेलंगाना का निर्माण जल्द होना चाहिए अन्यथा वहां स्थिति और अधिक बिगड़ जाएगी। हमने सात साल तक इंतजार किया है, अब केंद्र सरकार को जल्दी फैसला करना चाहिए।

Monday, February 7, 2011

थॉमस का सच


सीवीसी पर इतना शोर, लेकिन हवाला मामले में चुप्पी क्यों  ?
जब से सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्रीय सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई शुरू की है, तब से यह पद लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। मामला काफी पेचीदा है। केंद्रीय सतर्कता आयुक्त पीजे थॉमस का कहना है कि केरल की दो सरकारों ने आपसी राजनीति के कारण पाम ऑयल घोटाले की जांच प्रक्रिया को न तो आगे चलने दिया और न ही खत्म किया। इस तरह दो दलों की राजनीति का वह नाहक शिकार बने। वह खुद को इस कांड में दोषी नहीं मानते। केरल कैडर के आईएएस अधिकारियों के संगठन ने भी थॉमस को बेदाग बताते हुए उनके प्रति खुला समर्थन व्यक्त किया है।
थॉमस का तर्क यह भी है कि दोनों ही दलों की सरकारों ने उनकी प्रगति में रुकावट नहीं डाली और उन्हें राज्य के मुख्य सचिव के पद तक पहुंचने दिया। यदि उनकी छवि खराब थी, तो इन सरकारों ने ऐसा क्यों किया? इसके बाद उन्हें केंद्र सरकार में सचिव बनने से भी किसी ने नहीं रोका। तत्कालीन केंद्रीय सतर्कता आयुक्त प्रत्यूष सिन्हा ने भी थॉमस की फाइल बिना किसी आपत्ति के केंद्र सरकार को भेज दी थी। ऐसे में, कानूनी प्रक्रिया की देरी के लिए वह अपना जीवन बरबाद नहीं करना चाहते। इसलिए वह सीवीसी का पद छोड़ने को भी तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि उन्होंने कोई आवेदन कर और साक्षात्कार का सामना कर किसी चयन प्रक्रिया के तहत इस पद की प्राप्ति के लिए कोई प्रयास नहीं किया। केंद्र सरकार ने खुद उन्हें इस पद के योग्य समझकर सीवीसी की कुरसी पर बिठाया है, तो वह इस्तीफा क्यों दें? केरल के आईएएस अधिकारियों का कहना है कि पाम ऑयल घोटाले में दो दलों की लड़ाई ने कई अधिकारियों का जीवन तबाह कर दिया, जिससे उनके कैडर में भारी निराशा है।
यह भी रोचक तथ्य है कि पीजे थॉमस की नियुक्ति को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देनेवाले पूर्व अधिकारियों के दल के प्रमुख और देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंग्दोह ने एक सार्वजनिक वक्तव्य के जरिये पीजे थॉमस के ईमानदार होने की पुष्टि की है। फिर भी वह अपनी जनहित याचिका को सही ठहराते हुए कहते हैं कि चूंकि सीवीसी की नियुक्ति में सर्वोच्च न्यायालय के विनीत नारायण केसके निर्देशों की अवहेलना करनेता प्रतिपक्ष की सहमति नहीं ली गई, इसलिए यह नियुक्ति वैध नहीं है। लिंग्दोह का यह भी कहना है कि पाम ऑयल घोटाले में आरोपित होने के कारण थॉमस को यह पद खुद ही स्वीकार नहीं करना चाहिए था।
उल्लेखनीय है कि सीवीसी की नियुक्ति पर इतना बवंडर मचाने वाला मीडिया पिछले साल भर से सोया पड़ा था। नवंबर, 2009 में सीवीसी के तीन में से दो सदस्य सुधीर कुमार और रंजना कुमार अपना कार्यकाल पूरा कर चुके थे। नियमानुसार इन दोनों पुलिस और बैंक अधिकारियों की जगह नए अधिकारियों की नियुक्ति इनकाकार्यकाल पूरा होने से पहले ही हो जानी चाहिए थी। पर सरकार ने एक वर्ष तक इसकी कोई परवाह नहीं की। मजबूरन अकेले प्रत्यूष सिन्हा के सहारे सीवीसी चलता रहा। एक अगस्त, 2010 को अपने साप्ताहिक कॉलम में जब मैंने यह सवाल उठाया (सतर्कता आयोग की दुर्गति क्यों?) तब कहीं जाकर तत्कालीन गृह राज्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण की नींद टूटी और उन्होंने सीवीसी के रिक्त पदों को भरने की कवायद शुरू की। इतनी महत्वपूर्ण संस्था के प्रति सरकार की इस कोताही पर याचिकाकर्ता साल भर तक क्यों सोए रहे?
इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि थॉमस के खिलाफ शोर मचाने वाले उस वक्त कहां थे, जब संसदीय समिति ने केंद्रीय सतर्कता आयोग के पुनर्गठन का विधेयक बनाते समय सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की अवहेलना करते हुए उसे एक पंगु संस्था बनाकर छोड़ दिया था? चिंता की बात तो यह भी है कि दिसंबर, 1997 में हवाला मामले में निर्णय देते समय सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति जेएस वर्मा ने इस जनहित याचिका की प्रमुख प्रार्थनाओं की अनदेखी कर एक अलग ही फैसला दे डाला, जिसे बिना समझे ही मीडिया ने ऐतिहासिक फैसलामाना। इस तरह राजनीतिक क्षेत्रों में व्याप्त भारी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ी जा रही आजादी के बाद की इस सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण लड़ाई को कुचल दिया गया।
साफ जाहिर है कि संसद हो या मीडिया, सभी ने हवाला कांड पर एक खतरनाक चुप्पी साधी थी और आज भी उसी मानसिकता से जैन हवाला घोटालेकी चर्चा तक करने से हिचकते हैं। इसलिए थॉमस की नियुक्ति पर विवाद कोई महत्वपूर्ण सवाल नहीं है। अगर वास्तव में याचिकाकर्ता भ्रष्टाचार के मुद्दे से कड़ाई से निपटना चाहते हैं, तो उन्हें जैन हवाला कांड यानी विनीत नारायण केसको फिर से खोलकर जांच की मांग करनी चाहिए। पर ऐसा वे नहीं करेंगे। क्योंकि ये वही लोग हैं, जिन्होंने हवाला संघर्ष के दौरान भाजपा के एक वरिष्ठ नेता को बचाने कापुरजोर प्रयास किया।
जाहिर है, नैतिकता के दो मानदंड कदापि नहीं हो सकते। जबकि हवाला केस में भी कुछ लोगों के अनैतिक आचरण पर मैंने तभी कई सवाल खड़े किये थे, जिनका जवाब आज तक नहीं दिए गए और सीवीसी के गठन का अधकचरा फैसला देकर हवाला केस मामले को फिर रफा-दफा कर दिया गया। इस सारे इतिहास को देखते हुए यह जरूरी है कि पीजे थॉमस के मामले में सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय मेरी मूल याचिका के तथ्यों की ओर भी ध्यान दे। ऐसा किए बिना भ्रष्टाचार के खिलाफ उसका कोई भी कदम कारगर सिद्ध नहीं होगा। इसलिए मैंने भी सर्वोच्च न्यायालय में फिर से सक्रिय होने का मन बनाया है.

Friday, December 24, 2010

राजनीति में आदर्श

आज चुनावों के दौरान वैचारिक बहस गायब हो गई है

बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में जदयू-भाजपा गठबंधन को पिछले चुनाव में भारी सफलता मिली। सीटों के हिसाब से यह दो तिहाई से अधिक का बहुमत है। लेकिन मतों की संख्या पर विचार करने पर नीतीश हवाकी हवा निकल जाती है। जदयू-भाजपा गठबंधन को कुल डाले गए वोटों का मात्र 39 प्रतिशत प्राप्त हुआ है, जबकि 61 प्रतिशत लोगों ने इसके खिलाफ वोट दिया है। अगर इसमें उन 48 प्रतिशत मतदाताओं को भी शामिल कर लिया जाए, जिन्होंने किसी भी दल को समर्थन के योग्य न समझकर मतदान नहीं किया, तो नीतीश समर्थन का शोर और भी अर्थहीन लगेगा।
नीतीश कुमार की जीत का अगर कोई अर्थ निकाला जा सकता है, तो यही कि लोगों को किसी स्थापित दल पर भरोसा नहीं है और जाति आधारित या दूसरे तरह के जो गुट चुनाव मैदान में आए, उनमें से किसी को उन्होंने तात्कालिक कारणों से समर्थन दे दिया। भाजपा को इसका लाभ इसलिए मिला कि संघ के समर्थन से इसका एक सांगठनिक आधार लगातार बनता रहा है और बिखरे समूहों पर यह भारी पड़ा।
नीतीश कुमार की उपस्थिति सत्ता में होने के कारण सभी जगह थी। एंटी इन्कम्बेंसी फैक्टर के बजाय बिहार में विशेष स्थिति के कारण सत्तारूढ़ गठबंधन के पक्ष में रूझान बन गया। यह कुछ अचरज में डालने वाली बात लगती है। लेकिन थोड़ा विचार करने पर इसका तर्क समझ में आता है। दरअसल पिछले कुछ वर्षों से कई केंद्र प्रायोजित कल्याणकारी योजनाएं देश में चल रही हैं, जैसे गरीबी रेखा के नीचे के लोगों के लिए सस्ता अनाज या इंदिरा आवास के तहत घर या वृद्धा पेंशन योजना या मनरेगा के तहत रोजगार गारंटी योजना। इन्हें लागू करने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है और अपने त्रुटिपूर्ण और भ्रष्ट कार्यान्वयन के बावजूद गरीब लोगों को इसका लाभ दिखाई देता है। इसका पूरा श्रेय नीतीश कुमार को मिला। इसीलिए एक ऐसे समाज में, जहां राजनीति का नैतिक और वैचारिक आधार ध्वस्त हो चुका है, नीतीश और भाजपा गठबंधन औरों से अधिक समर्थन जुटा सका।
जिन लोगों ने आजादी के बाद के दो दशकों के चुनावों को देखा है, उन्हें याद होगा कि आपदाओं के बाद लोग कहा करते थे कि कांग्रेस की जीत अब सुनिश्चित है। दरअसल आपदाओं के बाद सरकार की ओर से राहत पहुंचाई जाती थी, जो आपदा से घिरे लोगों को प्रभावित करती थी। पिछले चुनाव में काफी हद तक जनहितकारी योजनाएं और बाढ़ राहत आदि राज्य के सत्ताधारी दल की लोकप्रियता बढ़ाने में सहायक हुई।
इन चीजों ने चुनाव को प्रभावित करने में निर्णायक भूमिका निभाई, तो इसकी वजह है वैचारिक बहस का पूर्ण अभाव। इस चुनाव में जातिगत गठबंधन और व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप ही असरदार रहे। लालू प्रसाद का राजद 18.84 प्रतिशत मत और 22 प्रत्याशियों की जीत से दूसरे स्थान पर रहा, तो इसलिए कि जातिगत समीकरण अभी पूरी तरह ध्वस्त नहीं हुआ है। भाकपा-माले समेत सभी कम्युनिस्ट पार्टियां ध्वस्त हो गईं। सिर्फ भाकपा को एक सीट पर कामयाबी मिली।
जैसे-जैसे आवास योजनाएं, सस्ता राशन देने जैसी जनहितकारी योजनाएं सभी दलों की नीति का हिस्सा बनेंगी, वैसे-वैसे इनसे मिलने वाला समर्थन नगण्य हो जाएगा। तब नीतियों या इसके अभाव का महत्व राजनीति में दिखाई देगा। वैसे में सबसे बड़ी चुनौती वाम दलों के सामने होगी। समाजवादी पार्टियां तो लगभग खत्म ही हो चुकी हैं। बुनियादी तौर पर ये सभी पार्टियां तथाकथित नव उदारवाद की मूल नीतियों का ही पोषण करती हैं। कमोबेश ये सभी दल केंद्रीय सत्ता में समय-समय पर भागीदार रहे हैं और नीति संबंधी कोई मतभेद इनमें नहीं दिखा है।
यह सच है कि लोकहितकारी नीतियों के मामले में मनमोहन सिंह ने पिछले दिनों कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इसके कारण भी हैं। निर्बाध पूंजीपरस्त नीतियों के चलते एक तरफ देश में भयंकर कंगाली फैली है, दूसरी तरफ एक छोटा वर्ग अत्यधिक अमीर हो गया है। थोड़ी बहुत समृद्धि शहरी क्षेत्रों में ही फैली है। इससे गांवों और आदिवासी बहुल इलाकों से लोगों का नगरों की तरफ पलायन हो रहा है। इससे उबरने के लिए गांवों में कुछ राहत पहुंचाना अपरिहार्य था।
जो दल वर्तमान वैश्विक पूंजीवादी व्यवस्था और तथाकथित उदारीकरण की नीति को कुबूल नहीं करते, उनके सामने एक वैकल्पिक नीति विकसित करने की बड़ी चुनौती है। कम्युनिस्ट पार्टियों ने औद्योगीकरण की नीति को कुबूल कर लिया है। पश्चिम बंगाल में माकपा का संकट इसी का नतीजा है, जिससे वह उबर नहीं पा रही। लगता है कि कम्युनिस्ट धारा के लोग इस नतीजे पर पहुंच चुके हैं कि पूंजीवाद का चरम विकास करना ही उनका लक्ष्य है। एक छोटे और लगभग हाशिये पर पड़े समूह को छोड़ समाजवादियों ने भी वैकल्पिक समाज की चिंता छोड़ दी है।
इस तरह व्यापकता में देखें, तो बिहार का चुनावी नतीजा पूरे देश में फैले वैचारिक शून्य को ही रेखांकित करता है। समस्या सिर्फ आदर्शों की फिर से स्थापना की ही नहीं, बल्कि एक ऐसा सांगठनिक ढांचा विकसित करने की भी है, जिसमें बड़े पैमाने पर लोगों को इन आदर्शों के इर्द-गिर्द जोड़ा जा सके और राजनीति में बदलाव आए। शायद इन दबावों में लोगों को गांधी के स्वावलंबी ग्राम गणतंत्रों की बात समझ में आने लगे। आज वामपंथ इन्हीं भूले-बिसरे सूत्रों के आधार पर भारत के बहुसंख्य लोगों को जोड़ने वाली व्यापक नीति का विकास कर सकता है। बिहार का चुनाव परिणाम वाम दलों के लिए आत्ममंथन का एक अच्छा अवसर है।