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Wednesday, June 15, 2011

जया ने हिटलर से की द्रमुक शासन की तुलना



तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे. जयललिता ने द्रमुक शासन की तुलना हिटलर और ईदी अमीन जैसे तानाशाहों के शासन से करते हुए कहा कि जनता ने द्रमुक के खिलाफ इसीलिए मतदान किया क्योंकि उसे लगता था कि एक तानाशाह के शासनकाल में रह रहे हैं। अन्नाद्रमुक सुप्रीमो ने कहा, हालांकि वह द्रमुक नेताओं के खिलाफ मामले दर्ज कराने के मौकों की तलाश नहीं कर रही हैं, लेकिन इस पार्टी के कई और नेता जेल जाएंगे। जया ने मंगलवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ बैठक के बाद संवाददाताओं से बातचीत में कहा, तमिलनाडु की पूर्ववर्ती द्रमुक सरकार ने तानाशाही चला रखी थी। मीडिया तक की स्वतंत्रता को बंधक बना लिया गया था। द्रमुक शासनकाल में लोग महसूस करने लगे थे कि वह हिटलर या ईदी अमीन के तहत हैं। लोग दंडित करने के लिए सही अवसर की तलाश कर रहे थे। इसीलिए उन्होंने विधानसभा चुनाव में द्रमुक के खिलाफ वोट किया और उसे सत्ता से बाहर कर दिया। जयललिता ने आरोप लगाया कि कामकाज का खर्चीला अंदाज, भ्रष्टाचार, भाई भतीजावाद, प्रशासन की विफलता और प्रत्येक कारोबार में एक ही परिवार का प्रभुत्व द्रमुक सरकार के गिरने के लिए जिम्मेदार है। उन्होंने कहा, पूर्ववर्ती सरकार ने पूरे सूबे को बड़ा कूड़ाघर बना कर रख दिया था। राज्य में बिजली नहीं, ज्यादातर जगहों पर लोगों को पेयजल मयस्सर नहीं। सत्ता में काबिज लोगों ने सिर्फ धन बटोरने पर ध्यान दिया। मुख्यमंत्री ने कहा, वह किसी (द्रमुक नेताओं) के खिलाफ मामले दर्ज कराने के लिए मौके नहीं तलाश रही हैं। इससे प्रदेश के विकास में मदद नहीं मिलेगी। उन्होंने कहा,जिन मामलों में डीएमके के नेता ए. राजा और पार्टी प्रमुख एम. करुणानिधि की बेटी कनीमोरी जेल गई हैं। वह उन्होंने या उनकी सरकार ने दर्ज नहीं कराए हैं। ये मामले केंद्र सरकार ने दर्ज कराए हैं। द्रमुक के कुछ नेता और उनके परिवार के सदस्य जेल में हैं, और भी कुछ नेता जेल जाएंगे।


किसानों को गुलाम बनाना चाहता है केंद्र


बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बीज विधेयक को काला विधेयक करार देते हुए कहा है कि इसके माध्यम से केंद्र सरकार किसानों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों का गुलाम बनाने की साजिश रच रही है। उन्होंने सभी दलों के सांसदों का आह्वान किया है कि वे किसी भी कीमत पर संसद में इस विधेयक को पास न होने दें। उन्होंने कहा,इस मामले में भाजपा उनके साथ है। वाम दलों समेत अन्य दलों से वे बात करेंगे। नीतीश कुमार ने गुरुवार को पटना के श्रीकृष्ण मेमोरियल हाल में जदयू किसान प्रकोष्ठ द्वारा आयोजित किसान महासभा का उद्घाटन करते हुए विधेयक की खामियां गिनाईं और कहा, कृषि राज्यों का विषय है, लेकिन विधेयक में राज्यों को कोई अधिकार नहीं मिला है। किसानों को बीज की आपस में अदला-बदली करने का अधिकार नहीं रहेगा, कंपनी से ही उन्हें बीज मिलेगा। पूरी तरह से बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मोनोपोली रहेगी। अच्छी गुणवत्ता वाले बीज मुहैया कराने की बात हो रही है,दाम पर कोई चर्चा नहीं है। कीमत तय करने का तंत्र बने और राज्यों की सहमति से दाम तय किये जाएं। विधेयक में बीज के फेल होने पर मुआवजा का कोई प्रावधान नहीं है। मुआवजा बीज की कीमत पर नहीं किसानों की फसल नुकसान के आधार पर दिया जाए। नकली बीज के लिए दंड का प्रावधान नहीं है। बीज बेचने के लिए दिल्ली में रजिस्ट्रेशन होगा। ऐसे में प्रदेश के किसानों को बीज के लिए दिल्ली जाना होगा? राज्यों में भी निबंधन की व्यवस्था हो। बहुराष्ट्रीय कंपनियों को व्यापार के लिए राज्यों से इजाजत लेने का भी प्रावधान किया जाए। किसानों की परिभाषा स्वामीनाथन आयोग द्वारा निर्धारित परिभाषा के अनुसार ही तय हो। बीज के पैकेट पर स्थानीय भाषाओं में भी जानकारी लिखी जाए। उन्होंने कहा, दो साल पहले प्रदेश में 61,000 हेक्टेयर में मक्के के बीज फेल हुए तो उल्टा किसानों पर ही कंपनी ने तोहमत लगा दी कि बीज ढंग से नहीं बोए। राज्य सरकार ने प्रति हेक्टेयर दस हजार रुपये के हिसाब से किसानों को मुआवजा दिया। नीतीश ने कहा, आप सभी जाग जाएं, आपके जागने भर की देर है.


Wednesday, June 1, 2011

अल्पसंख्यकों के लिए खुलेंगे विश्वविद्यालय


अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय ने बिहार के किशनगंज में रफी अहमद किदवई यूनिवर्सिटीज आफ हेल्थ एंड मेडिकल साइंसेज, राजस्थान के अजमेर में ख्वाजा गरीब नवाज यूनिवर्सिटीज आफ प्रोफेशनल टेक्नोलॉजी और कर्नाटक के बेंगलूर में टीपू सुल्तान यूनिवर्सिटीज आफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी खोलने का फैसला किया है। यह तीनों विश्वविद्यालय वक्फ की जमीन पर खोले जाएंगे। मुस्लिम समुदाय में उच्च शिक्षा की कमी को देखते हुये मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने उक्त तीनों विश्वविद्यालयों के गठन पर सैद्धांतिक स्वीकृति दे दी है। मानव संसाधन मंत्रालय ने अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय से कहा है कि वह अगर इन तीनों विश्वविद्यालयों को ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में खुलवाना चाहता है तो वह इसके लिए जमीन और अतिरिक्त संसाधन शीघ्र उपलब्ध कराएं क्योंकि इस योजना की राशि देश में सोलह केंद्रीय विश्वविद्यालयों की स्थापना के लिए पहले ही आवंटित कर दी गई है। ये केंद्रीय विश्वविद्यालय इस पंचवर्षीय योजना के अंत तक बन कर तैयार भी हो जाएंगे। सूत्रों के मुताबिक अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के पास तीन विकल्प रह गए हैं। पहला विकल्प यह कि वक्फ की जमीन में मुस्लिम समुदाय खुद इसे शुरू कर दे और इसे डीम्ड यूनिवर्सिटीज घोषित कर दिया जाए। दूसरा संसद से कानून पास करके अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की तरह इसे अल्पसंख्यक संस्थान घोषित किया जाए। तीसरा विकल्प है कि सरकार और वक्फ बोर्ड मिलकर इसकी स्थापना करें। वक्फ बोर्ड जमीन देकर और सरकार पैसा लगाकर इसके गठन में योगदान करें। मानव संसाधन विकास मंत्रालय तीनों में से किसी भी विकल्प के आधार पर इन विश्वविद्यालयों की स्थापना करने के लिए तैयार है। शिक्षा मंत्रालय नए विश्वविद्यालय खोलने के बजाय इन तीनों को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटीज की विस्तार योजना से जोड़ देने के लिए भी तैयार है.


Sunday, May 15, 2011

रंगासामी ने कांग्रेस से चुकाया बदला



संघ शासित प्रदेश पुडुचेरी में आल इंडिया एनआर कांग्रेस और अन्नाद्रमुक गठबंधन ने कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया है। आइएनआरसी-अन्नाद्रमुक गठबंधन ने 30 सदस्यीय विधानसभा की 19 सीटों पर कब्जा जमाकर सरकार गठन के लिए पर्याप्त बहुमत जुटा लिया है। इसी के साथ आइएनआरसी के मुखिया और जूनियर कामराज के नाम से लोकप्रिय एन रंगासामी ने कांग्रेस से बड़े ही सभ्य अंदाज में बदला ले लिया, जिसने उन्हें मुख्यमंत्री के पद से अकारण हटा दिया था। कांग्रेस द्वारा किनारे लगाए जाने से अपमानित महसूस करने वाले रंगासामी ने विस चुनाव की पूर्व संध्या पर आल इंडिया एनआर कांग्रेस नाम से पार्टी का गठन किया और अन्नाद्रमुक से चुनावी गठजोड़ किया। मृदुभाषी और सादगी से परिपूर्ण अविवाहिक रंगासामी निर्विवादित नेता हैं। मुख्यमंत्री होते हुए भी वह कार के बजाय मोटरसाइकिल से सफर करना पसंद करते थे। अपने सात साल के मुख्यमंत्रित्व काल में रंगासामी को कई विकास परियोजनाएं संचालित करने के लिए जाना जाता है। उन्होने राज्य के स्कूलों में बच्चों के लिए मुफ्त नाश्ते की योजना लागू की थी। उन्होंने कम कीमतों पर आवास योजना शुरू की, जिसके तहत झुग्गी झोपड़ी में रहने वालों को पक्का मकान बनाने के लिए एक लाख रुपये तक की सहायता दी जाती थी। स्वर्गीय कामराज से प्रेरित होकर छात्र जीवन में ही राजनीति में आने वाले रंगासामी पेशे से वकील हैं। 1990 में थट्टानछेवाड़ी से पहली बार विफल चुनाव लड़ा। 1991 में द्रमुक-जद गठबंधन की सरकार गिरने के बाद दूसरे प्रयास में कामयाब हुए। चार अगस्त 1950 को जन्मे रंगासामी वन्निया समुदाय से पहले मुख्यमंत्री हैं, जिसे 2001 में पिछड़ा वर्ग माना जाता है। इससे पूर्व वह 1991 में वैद्यलिंगम मंत्रिमंडल में मंत्री थे। इस बार उन्होंने दो सीटों इंदिरा नगर तथा कादिरकमाम से चुनाव लड़ा और विजयी रहे ।


गोगोई के कौशल से कांग्रेस की हैट्रिक



कांग्रेस ने मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के प्रशासनिक और राजनीतिक कौशल के बल पर असम के विधानसभा चुनावों में जीत की हैट्रिक बना डाली। प्रसन्नचित्त स्वभाव और बेबाक राय रखने वाले गोगोई (75) ने अपने 10 साल के शासनकाल में न सिर्फ उल्फा समेत कई उग्रवादी संगठनों को वार्ता के लिए तैयार किया बल्कि दिवालिया होने की कगार पर खड़े राज्य को वित्तीय स्थिरता प्रदान की। इन्हीं कामों की वजह से वह जनता के नायक बन गए। 6 बार सांसद रहे गोगोई केंद्र सरकार में भी मंत्री पद संभाल चुके हैं। गोगोई ने 2001 के विस चुनाव में असम गण परिषद की हार के बाद मुख्यमंत्री का पद संभाला। 17 मई 2001 को पदभार ग्रहण करने के साथ ही उन्हें उग्रवादी हिंसा और वित्तीय अस्थिरता जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उस वक्त राज्य कर्ज में इस कदर डूबा था कि सरकारी कर्मियों को समय पर वेतन तक नहीं मिल पाता था। गोगोई ने राज्य की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की दिशा में सार्थक प्रयत्न किए। इसी का नतीजा रहा कि 2006 के विस चुनाव में कांग्रेस फिर सत्ता में लौटी। हालांकि, उसे कम सीटें मिली थी। इस वजह से उसने 2006 में बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) के साथ गठबंधन सरकार बनाई। अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान पिछले साल स्वास्थ्य खराब रहने के चलते गोगोई को मुंबई के एशियन हर्ट इंस्टीट्यूट में हृदय की तीन सर्जरी करानी पड़ी। इस साल चुनाव प्रचार शुरू होने से पहले अपना पेस मेकर बदलवाने के लिए उन्हें एक बार फिर सर्जरी करानी पड़ गई। दोनों ही मौकों पर उनके स्वास्थ्य में तेजी से सुधार हुआ और नई स्फूर्ति के साथ उन्होंने अपना कार्यभार संभाला और चुनाव प्रचार किया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के विश्वस्त गोगोई की राज्य के शीर्ष पद तक की यात्रा की पटकथा धैर्य के साथ से लिखी गई। ऊपरी असम के जोरहाट जिले के रंगराजन टी एस्टेट इलाके में एक अप्रैल 1936 को जन्मे तरुण गोगोई को उनके माता पिता पूनाकोन नाम से पुकारते थे। गोगोई का बचपन चाय बागानों में अपने भाई बहनों और वहां काम करने वाले श्रमिकों के बच्चों के साथ खेलते कूदते बीता। जीवन के शुरूआती दिनों में ही राजनीति के प्रति उनकी रूचि पैदा हो गई। हालांकि उनके पिता चाहते थे कि वह मेडिसिन या इंजीनियरिंग की पढ़ाई करे, लेकिन उन्होंने अपना ध्यान राजनीति में केंद्रित किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की 1952 की जोरहाट यात्रा के दौरान गोगोई उनसे खासे प्रभावित हुए। उस वक्त वह 10 वीं कक्षा में पढ़ते थे। उन्होंने विभिन्न राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेना शुरू कर दिया। स्नातक की उपाधि हासिल करने के बाद उन्होंने कानून की उपाधि लेने के लिए इलाहाबाद विवि में दाखिला लिया। हालांकि बीमारी के कारण गुवाहाटी विवि से कानून की उपाधि हासिल की। भारत युवक समाज की असम इकाई का सदस्य रहने के दौरान गोगोई 1963 में कांग्रेस में शामिल हुए और आज तक निष्ठावान हैं। गोगोई 1980 के दशक में कांग्रेस महासचिव और संयुक्त सचिव भी रह चुके हैं। इसके अलावा 1986-90 तक और 1997 से 2001 तक असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भी रहे हैं। उन्होंने जोरहाट म्यूनिसिपल बोर्ड के सदस्य के चुनाव में 1968 में भाग लेकर राजनीतिक कैरियर की शुरूआत की। वह जोरहाट संसदीय सीट से 1971 में पहली बार लोस सदस्य चुने गए। इतना ही नहीं 1991 से 1995 के बीच उनके पास केंद्रीय खाद्य एवं प्रसंस्करण मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार भी था।


जयललिता ने द्रमुक को उसी के दांव से मारा


दक्षिण भारतीय राजनीति में अम्मा के नाम से विख्यात अन्नाद्रमुक सुप्रीमो जे जयललिता ने द्रमुक का सूपड़ा साफ कर तमिलनाडु की सत्ता पर एक बार फिर कब्जा जमा लिया। इसी के साथ जयललिता ने द्रमुक के हाथों 2004 चार में मिली हार का बदला भी ले लिया। अभिनय की दुनिया से राजनीति में आई जया ने द्रमुक को जवाब देने के लिए न सिर्फ डीएमडीके और वाम दलों से हाथ मिलाया बल्कि छोटे-छोटे दलों को गठबंधन में शामिल करने की कोशिश की। द्रमुक ने वोटरों को लुभाने के लिए मिक्सर, ग्रिंडर आदि देने की घोषणाओं का उसी शैली में जवाब दिया। मैसूर निवासी संध्या और जयरमण के घर पैदा हुईं जयललिता को सिर्फ 15 साल की उम्र में घर की मदद के लिए अभिनय के क्षेत्र में आना पड़ा। जयललिता ने करीब तीन दशक के फिल्मी करियर में तमिल, तेलुगू, कन्नड़ और हिंदी की करीब 300 फिल्मों में काम किया। उन्होंने एमजीआर और शिवाजी गणेशन सहित उस दौर के सभी प्रमुख अभिनेताओं के साथ काम किया। अन्नाद्रमुक के संस्थापक स्व एम जी रामचंद्रन अस्सी के दशक में जया को राजनीति में लाए और पार्टी का प्रचार सचिव बनाया। 1982 में वह पहली बार राज्यसभा की सदस्य बनीं। रामचंद्रन की मौत के बाद उन्होंने पार्टी की कमान अपने हाथों में ले ली। 1991 में विस चुनावों के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या होने के बाद सहानुभूमि लहर से अन्नाद्रमुक-कांगे्रस को फायदा हुआ और जयललिता ने मुख्यमंत्री का पद संभाला। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने लिट्टे पर प्रतिबंध लगाने की मांग की जिसे केंद्र ने स्वीकार कर लिया। हिन्दुत्व के प्रति अपना झुकाव रखने वाली जयललिता भाजपा और शिवसेना के अलावा उन कुछ नेताओं में थीं जिन्होंने कार सेवा और अयोध्या का समर्थन किया था। मुख्यमंत्री के रूप में जयललिता का पहला कार्यकाल विवादों से घिरा रहा और उनके दत्तक पुत्र वी एन सुधाकरण की शादी में हुए खर्च की व्यापक आलोचना हुई। मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने लाटरी टिकटों पर प्रतिबंध लगा दिया और हड़ताल कर रहे करीब दो लाख कर्मचारियों को एक ही झटके में बर्खास्त कर दिया। साथ ही किसानों को मुफ्त बिजली जैसी सुविधाओं पर भी रोक लगा दी, लेकिन 2004 में पार्टी के खराब प्रदर्शन के बाद उनके रुख में कुछ नरमी आई।


Tuesday, May 3, 2011

नीति के लिए पीएम जिम्मेदार


वाम दलों ने अब पीएम से लगाई गुहार


पुरुलिया मामले में आरोपी किम डेवी के नए खुलासे की न्यायिक जांच की मांग को लेकर वाम दलों ने रविवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से गुहार लगाई। इससे पहले गृह मंत्री और वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी न्यायिक जांच की मांग को सिरे से खारिज कर चुके हैं। लेफ्ट फ्रंट ने प्रधानमंत्री से पुरुलिया में हथियार गिराए जाने के मामले में उच्चतम न्यायालय के किसी सेवारत न्यायाधीश से न्यायिक जांच कराने का अनुरोध किया है। प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में माकपा महासचिव प्रकाश करात और भाकपा महासचिव एबी वर्धन ने कहा कि सिर्फ इसी तरह की जांच से वर्ष 1995 की घटना के बारे में पूरी सच्चाई का पता लग सकेगा। पत्र में कहा गया है कि हाल ही में इस मामले में संलिप्त दो लोगों नील्स नीलसन उर्फ किम डेवी और पीटर ब्लीच मीडिया से बातचीत के दौरान हथियार गिराए जाने के मामले की जानकारी देते, कुछ आरोप लगाते और साजिश रचे जाने के बारे में बताते नजर आए हैं। दोनों नेताओं ने जोर दिया कि पूरे मामले की व्यापक जांच कराए जाने की जरूरत है। इसके लिए वे प्रधानमंत्री से उच्चतम न्यायालय के एक सेवारत न्यायाधीश से न्यायिक जांच कराने का अनुरोध करते हैं। वाम नेताओं ने कहा कि मामले के मुख्य आरोपी डेवी ने इस बारे में कुछ चौंका देने वाली जानकारी दी है कि वह हथियार गिराने वाले विमान का पता लगने और उसे उतारे जाने के बाद किस तरह मुंबई हवाई अड्डे से भाग निकलने में कामयाब रहा। करात और वर्धन ने कहा कि हालांकि इस मामले को 16 वर्ष बीत चुके हैं और कोलकाता की अदालत ने सुनवाई कर कुछ आरोपियों को सजा भी सुनाई है, लेकिन इस घटना को लेकर अब भी काफी कुछ स्पष्ट होना बाकी है। क्योंकि यह घटना देश की संप्रभुता तथा सुरक्षा पर गंभीर हमले की तरह थी। इन नेताओं ने आरोप लगाया कि यह प. बंगाल की तत्कालीन निर्वाचित सरकार के खिलाफ साजिश थी। वहीं गृह मंत्रालय के बयान ने कहा है कि डेवी इसके पहले भी पूरे मामले को राजनीतिक रंग देकर अपने को बेगुनाह साबित करने की कोशिश कर चुके हैं। वहीं भारत सरकार डेनमार्क से प्रत्यर्पण संधि नहीं होने के बाद भी पुख्ता सबूतों के साथ उसके प्रत्यर्पण की लगातार कोशिश करती रही है। इसी का नतीजा है कि किम डेवी के प्रत्यर्पण के मुद्दे पर डेनमार्क की स्थानीय अदालत में सुनवाई चल रही है। मंत्रालय के अनुसार प्रत्यर्पण की इसी अदालती प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए किम डेवी ने नए सिरे से इस मामलों को राजनीतिक रंग देने की कोशिश की है। गृहमंत्रालय ने किम डेवी को प्रत्यर्पण के बाद भारत की स्थानीय अदालत के सामने खुद को निर्दोष साबित करने की चुनौती दी है। उसके अनुसार पीटर ब्लीच समेत सजा पाए सभी आरोपियों से जुड़े सभी सबूत सार्वजनिक हैं और उन्हें कोई भी देख सकता है। लेकिन डेवी के खिलाफ सबूतों को फिलहाल सार्वजनिक नहीं किया जा सकता क्योंकि इससे उसके प्रत्यर्पण की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। गृह मंत्रालय ने साफ कर दिया है कि किम डेवी के भारत आ जाने के बाद उसके खिलाफ सभी सबूतों को अदालत के सामने पेश कर दिया जाएगा। 1995 में पुरुलिया में हथियार गिराने के मामले की जांच में गड़बड़ी के डेवी के आरोपों को खारिज करते हुए गृह मंत्रालय ने साफ कर दिया है कि शुरू से ही जांच एजेंसियां उसे खोज रही थी और अंतत 2001 में उसके डेनमार्क में होने का पता चला। डेनमार्क के साथ प्रत्यर्पण संधि नहीं होने के बावजूद भारत सरकार लगातार उसके प्रत्यर्पण की कोशिश करती है। यहां तक कि डेनमार्क के उपप्रधानमंत्री की भारत यात्रा के दौरान भी इस मुद्दे को उठाया गया।

Sunday, March 6, 2011

केंद्र सरकार की किरकिरी


थॉमस मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को केंद्र सरकार की प्रतिष्ठा पर एक और आघात मान रहे हैं लेखक
आखिरकार वही हुआ जिसका डर केंद्र सरकार को सता रहा था, उच्चतम न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश एसएच कपाडि़या की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने प्रधानमंत्री को तगड़ा झटका देते हुए केंद्रीय सतर्कता आयुक्त पीजे थॉमस की नियुक्ति को गैरकानूनी करार दिया। भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रवैया रखने वाले प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ के इस निर्णय से केंद्र सरकार और विशेष रूप से मनमोहन सिंह की साख को जबरदस्त धक्का लगा है, क्योंकि थॉमस का चयन उनकी अध्यक्षता वाली उच्चाधिकार प्राप्त समिति ने ही किया था। तीन सदस्यीय इस समिति के अन्य सदस्य थे गृहमंत्री चिदंबरम और लोकसभा में नेता विपक्ष सुषमा स्वराज। सीवीसी पद के लिए थॅामस के नाम पर विचार होते समय सुषमा स्वराज ने न केवल उनका विरोध किया था, बल्कि अपनी असहमति लिखित में भी दर्ज कराई थी। फिर भी उनका चयन किया गया। इसके बाद पूर्व चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह और कुछ अन्य लोगों ने थॉमस की नियुक्ति के खिलाफ इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर कीं कि उनका नाम केरल के पॉमोलिन आयात घोटाले में शामिल है और यह मामला तिरुअनंतपुरम की अदालत में लंबित है। केरल कैडर के आइएएस अधिकारी थॉमस पर पॉमोलिन घोटाले में लिप्त होने का आरोप वर्ष 1992 में तब लगा था जब वह इस राज्य में खाद्य सचिव थे। उन पर आरोप है कि बिना टेंडर जारी किए पॉमोलिन आयात के उनके फैसले से राज्य सरकार को दो करोड़ रुपये की क्षति हुई। उन्हें इस मामले में जमानत तो मिल गई, लेकिन उनके खिलाफ मुकदमा लंबित बना रहा। इसके चलते कार्मिक विभाग ने 2000 से 2004 के बीच कई बार अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश की, लेकिन उस पर अमल नहीं किया गया। अंतत: यही मामला थॉमस पर भारी पड़ा और उच्चतम न्यायालय ने उन्हें सीवीसी पद के लिए अयोग्य ठहराते हुए उनका चयन करने वाली समिति को भी निशाने पर लिया। शीर्ष अदालत के अनुसार, सीवीसी सरीखी संवैधानिक संस्था के लिए चयन सूची में शामिल अधिकारी न केवल बेदाग छवि वाले होने चाहिए, बल्कि उनकी ईमानदारी भी असंदिग्ध होनी चाहिए। शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जब संस्था की साख का सवाल हो तो कसौटी सिर्फ जनहित होनी चाहिए। उसने प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली समिति को फटकार लगाते हुए एक ओरजहां थॉमस को सीवीसी के लिए अनुपयुक्त करार दिया वहीं दूसरी ओर भविष्य के लिए अनेक दिशा-निर्देश भी तय किए। उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बाद केंद्र सरकार और खुद प्रधानमंत्री के समक्ष विकट स्थिति उत्पन्न हो गई है। अब विपक्ष और अधिक हमलावर हो सकता है। वह पहले से ही 2जी स्पेक्ट्रम और काले धन को लेकर सरकार की नाक में दम किए हुए है। हालांकि सरकार स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच संयुक्त संसदीय समिति से कराने पर सहमत हो गई है, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि इस प्रकरण ने उसकी जमकर किरकिरी कराई। सीवीसी मामले में सरकार थोड़ी-बहुत साख बचा सकती थी, यदि उसने समय रहते अपनी गलती का अहसास कर लिया होता। दुर्भाग्य से वह थॉमस की नियुक्ति सही ठहराने पर अड़ी रही। उसने बाकायदा हलफनामा देकर कहा कि थॉमस पाक-साफ हैं और उनके चयन पर उंगली नहीं उठाई जानी चाहिए। इसका परिणाम यह हुआ कि खुद थॉमस ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह विचित्र तर्क दिया कि जब दागी नेता सांसद बने रह सकते हैं तो वह सीवीसी पद पर क्यों नहीं रह सकते? थॉमस के बचाव में उतरी केंद्र सरकार की तब और फजीहत हुई जब यह सामने आया कि उनका चयन करने वाली समिति इससे अवगत थी कि भ्रष्टाचार का एक मामला उनके खिलाफ लंबित है। खुद गृहमंत्री को यह मानना पड़ा कि थॉमस के चयन के समय उनके खिलाफ लंबित मामले की चर्चा हुई थी, लेकिन कोई भी यह स्पष्ट नहीं कर सका कि बावजूद इसके सुषमा स्वराज की आपत्ति आखिर क्यों खारिज की गई? प्रधानमंत्री ने कहा है कि वह थॉमस की नियुक्ति के संदर्भ में अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं। वैसे तो प्रधानमंत्री विस्तार से अपनी बात संसद में कहेंगे, लेकिन उनकी इस संक्षिप्त सफाई से यह संकेत मिला कि वह अपनी भूल मान रहे हैं और ऐसा कुछ नहीं कहने वाले जिससे कार्यपालिका और न्यायपालिका में टकराव पैदा हो। ध्यान रहे कि इसके पहले वह यह कह चुके हैं कि न्यायपालिका को नीतिगत मामलों में दखल नहीं देना चाहिए। थॉमस के मामले की सुनवाई के दौरान भी केंद्र सरकार की ओर से यह कहा गया था कि न्यायपालिका को सीवीसी के चयन पर दखल देने का अधिकार नहीं। इन स्थितियों में प्रधानमंत्री की ओर से दिया गया संक्षिप्त बयान शुभ संकेत है। वह संसद में अपना और सरकार का पक्ष चाहे जिस तरीके से रखें, थॉमस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यह साफ हो गया कि एसएच कपाडि़या के नेतृत्व में शीर्ष अदालत एक बार फिर सक्रियता दिखाने के लिए तत्पर है। वैसे तो उसकी ओर से पहले भी न्यायिक सक्रियता प्रदर्शित की जा चुकी है, लेकिन पिछले कुछ समय में और विशेष रूप से पूर्व प्रधान न्यायाधीश बालाकृष्णन के कार्यकाल में सक्रियता के दर्शन नहीं हुए। इसके पीछे चाहे जो कारण हो, लेकिन यह महज दुर्योग नहीं हो सकता कि अब बालाकृष्णन भी आरोपों के घेरे में हैं। फिलहाल उनके मामले में भी केंद्र सरकार मौन साधे हुए है। अब जब थॉमस प्रकरण पर प्रधानमंत्री अपनी भूल स्वीकार करते दिख रहे हैं तब विपक्ष के लिए उचित यही होगा कि वह इस मसले पर विराम लगाए, लेकिन इसके साथ यह भी आवश्यक है कि प्रधानमंत्री इस पर विचार करें कि पहले राजा और फिर थॉमस को लेकर उनसे भूल कैसे हुई? क्या उनके ऊपर थॉमस की नियुक्ति के लिए कोई दबाव था अथवा कांग्रेस के राजनीतिक पंडितों ने उनकी अनदेखी कर दी? कहीं ऐसा तो नहीं कि कांग्रेस के रणनीतिकार केंद्र सरकार पर भारी पड़ रहे हैं? आम जनता से यह छिपा नहीं कि कांग्रेस वस्तुत: एक राजनीतिक मंडली द्वारा संचालित हो रही है। बेहतर हो कि कांग्रेसजन भी इस पर विचार करें कि क्या कारण है कि संप्रग के दूसरे कार्यकाल में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की भी किरकिरी हो रही है और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की भी? कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के दामन पर जैसे दाग लग चुके हैं वे आसानी से छूटने वाले नहीं। देखना यह है कि कांग्रेस ये दाग धोने की ईमानदारी से कोई कोशिश करती है या फिर मामूली हेरफेर कर सुधरने का दिखावा भर करती है? यदि वह कुछ नए प्रवक्ता बनाने अथवा टीवी चैनलों में बहस के लिए उनकी टीम और बड़ी करने जैसे उपायों तक सीमित रहती है तो इसका मतलब होगा कि उसे अपनी प्रतिष्ठा की परवाह नहीं|