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Tuesday, February 22, 2011
आंध्र के कांग्रेसी सांसदों की नारेबाजी
राष्ट्रपति के सम्बोधन में नहीं था ‘अलग तेलंगाना’ राज्य बनाए जाने का उल्लेख
अलग तेलंगाना राज्य का मुद्दा सोमवार को संसद के अन्दर से लेकर बाहर तक गूंजा। राष्ट्रपति के अभिभाषण में इस मुद्दे का उल्लेख न होने से नाराज कांग्रेस के सांसदों ने पहले तो अभिभाषण के दौरान ही तेलंगाना के गठन को लेकर नारेबाजी की तो बाद में संसद परिसर में महात्मा गांधी की प्रतिमा के सामने धरना दिया। नारेबाजी उस समय हुई जब उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल के अभिभाषण का अंग्रेजी रूपान्तरण पढ़ रहे थे। कांग्रेसी सांसदों के इस व्यवहार से कांग्रेस नेतृत्व के साथ ही प्रधानमंत्री भी भौंचक्के रह गए। राष्ट्रपति आज जब संसद के संयुक्त सत्र को हिन्दी में सम्बोधित कर रही थीं तो केन्द्रीय कक्ष में कुछ कांग्रेसी सांसद हाथ में बैनर लिए चुपचाप बैठे थे। सोनिया गांधी जिस पंक्ति में बैठी थीं, ठीक उसके पीछे छठी-सातवीं पंक्ति में बैठे ये सांसद भी राष्ट्रपति का अभिभाषण सुन रहे थे। अभिभाषण के बाद उपराष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी ने जैसे ही उनके अभिभाषण का अंग्रेजी पाठ शुरू किया, ये सांसद ‘जय तेलंगाना’ के नारे लगाने लगे। उन्हें नारा लगाते देख केन्द्रीय कक्ष में बैठे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी समेत सभी लोग हैरत में पड़ गए। कांग्रेस सांसद राजीव शुक्ला पीछे की तरफ दौड़े तथा उनको चुप कराने लगे, पर उन्होंने एक न सुनी। नारेवाजी कर रहे सांसदों के हाथ में सफेद बैनर था जिस पर सोनिया गांधी की तस्वीर थी।
‘वी वांट तेलंगाना, हमें तेलंगाना चाहिए’ के नारे : अभिभाषण खत्म होने के बाद जब राष्ट्रपति के साथ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और लोकसभा अध्यक्ष वापस लौटने लगे तो ये कांग्रेसी सांसद दोबारा अपनी सीट से उठे और हाथों में बैनर लिए ‘वी वांट तेलंगाना, हमें तेलंगाना चाहिए’ के नारे लगाते रहे। राष्ट्रपति जब उनके एकदम करीब पहुंचीं, तब भी वे नारेबाजी करते रहे। इसके बाद ये सांसद केन्द्रीय कक्ष से बाहर निकल कर संसद भवन परिसर स्थित महात्मा गांधी की प्रतिमा के पास आ गए और वहां नारेवाजी की, फिर वहीं बैठ गए।
अभिभाषण में तेलंगाना का उल्लेख होना चाहिए था : आंध्र प्रदेश से कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य केशव राव की अगुवाई में तेलंगाना क्षेत्र से पार्टी के 10 सांसद संसद भवन के बाहर भी बैनर लहरा रहे थे जिनमें ‘तेलंगाना की जनता के 55 साल के सपने को पूरा करो’ और ‘नौ दिसम्बर 2009 को किया वादा पूरा करो’ जैसी मांगें थीं। राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान अलग तेलंगाना राज्य के समर्थन में कांग्रेसी सदस्यों द्वारा बैनर दिखाए जाने को सही ठहराते हुए उन्होंने कहा कि अभिभाषण में तेलंगाना का उल्लेख किया जाना चाहिए था।
कांग्रेस के 2004 के घोषणापत्र में था तेलंगाना निर्माण का वादा : केशव राव ने संसद भवन परिसर में संवाददाताओं से कहा कि कांग्रेस ने 2004 में अपने घोषणापत्र में तेलंगाना के निर्माण का वादा किया था। पार्टी के अध्यक्षीय भाषण में भी इसका जिक्र आया था और नौ दिसम्बर 2009 को गृहमंत्री ने अलग तेलंगाना निर्माण की प्रक्रि या शुरू करने की घोषणा करके एक तरह से अलग राज्य के निर्माण की घोषणा कर दी थी।
अब तक 243 लोग कर चुके हैं आत्मदाह : राष्ट्रपति के अभिभाषण के मौके पर इस तरह से मांग उठाना क्या मर्यादा का उल्लंघन नहीं है, यह पूछे जाने पर राव ने कहा कि मैं नहीं समझता कि हमने किसी तरह से मर्यादा का उल्लंघन किया है। न ही हमने अपने पार्टी के रुख पर विरोध जताया है। हम चाहते थे कि जब इस बारे में मतभेदों पर अध्ययन करने के लिए गठित समिति की रिपोर्ट आ चुकी है तो राष्ट्रपति के अभिभाषण में इसका जिक्र आना चाहिए था। उन्होंने कहा कि अलग राज्य की मांग पूरी नहीं होने पर अब तक 243 लोग आत्मदाह कर चुके हैं।
कांग्रेस में हमारी पूरी निष्ठा, सात साल कर चुके हैं इंतजार : राव ने कहा कि कांग्रेस पार्टी के प्रति हमारी पूरी निष्ठा है और हमें पता है कि सोनिया गांधी जो फैसला करती हैं, वही होता है। उन्होंने कहा कि अलग तेलंगाना का निर्माण जल्द होना चाहिए अन्यथा वहां स्थिति और अधिक बिगड़ जाएगी। हमने सात साल तक इंतजार किया है, अब केंद्र सरकार को जल्दी फैसला करना चाहिए।
उपचुनावों में क्यों हुआ कांग्रेस का सफाया
देश के पांच राज्यों की छह विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के संदेश भारतीय जनता पार्टी के लिए अच्छी खबर लेकर आए हैं। मध्य प्रदेश, छ्त्तीसगढ़, झारखंड, गुजरात की पांच विधानसभा सीटों पर भाजपा की जीत बताती है कि कांग्रेस ने कई राज्यों में मैदान उसके लिए छोड़ दिया है। यह एक संयोग ही है कि इन सभी राज्यों में भाजपा ही सत्तारूढ़ दल है। झारखंड की खरसांवा सीट की बात न करें, जहां राज्य के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा खुद उम्मीदवार थे तो बाकी सीटों पर बड़े अंतर से भाजपा की जीत बताती है कि कांग्रेस इन चुनावों में गहरे विभ्रम का शिकार थी, जिसके चलते मध्य प्रदेश की दोनों सीटें कुक्षी और सोनकच्छ उसके हाथ से निकल गई। ये दोनों कांग्रेस की परंपरागत सीटें थीं, जहां कांग्रेस का लंबे अंतर से हारना एक बड़ा झटका है। मध्य प्रदेश की ये दोनों सीटें गंवाना दरअसल कांग्रेस के लिए एक ऐसे झटके की तरह है, जिस पर उसे गंभीरता से विचार जरूर करना चाहिए। भाजपा के लिए मुस्कराने का मौका मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कुल तीन विधानसभा सीटों के लिए हुए उपचुनाव में भाजपा की जीत के मायने तो यही हैं कि राज्यों में उसकी सरकारों पर जनता का भरोसा कायम है। ये चुनाव भाजपा के लिए जहां शुभ संकेत हैं, वहीं कांग्रेस के लिए एक सबक भी हैं कि उसकी परंपरागत सीटों पर भी भाजपा अब काबिज हो रही है। जाहिर तौर पर कांग्रेस को अपने संगठन कौशल को प्रभावी बनाते हुए मतभेदों पर काबू पाने की कला सीखनी होगी। भाजपा के लिए सही मायने में यह मुस्कराने का क्षण है। इस संदेश को पढ़ते हुए भाजपा शासित जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है। उन्हें समझना होगा कि इस समय कांग्रेस की दिल्ली की सरकार से लोग खासे निराश हैं और उम्मीदों से खाली हैं। भाजपा देश का दूसरा बड़ा दल होने के नाते कांग्रेस के पहले स्थान की स्वाभाविक उत्तराधिकारी है। ऐसे में अपने कामकाज से जनता के दिल को जीतने की कोशिशें भाजपा की सरकारों को करनी होंगी। उपचुनाव यह प्रकट करते हैं कि भाजपा की राज्य सरकारों के प्रति लोगों में गुस्सा नहीं है, किंतु सरकार में होने के नाते उनकी जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में लगातार दूसरी बार सरकार बनाकर भाजपा ने यह साबित किया है कि उसे जनभावनाओं का साथ प्राप्त है। अब उसे तीसरी पारी के लिए तैयार होना है। अति आत्मविश्वास न दिखाते हुए अपने काम से वापसी की राह तभी आसान होगी, जब जनभावना इसी प्रकार बनी रहे, क्योंकि राजनीति में सारा कुछ अस्थाई और क्षणभंगुर होता है। भाजपा के पीछे संघ परिवार की एक शक्ति भी होती है। मध्य प्रदेश का जीवंत संगठन भी एक बड़ी ताकत है, इसका विस्तार करने की जरूरत है। सत्ता के लिए नहीं विचार और जनसेवा के लिए संगठन सक्रिय रहे तो उसे चुनावी सफलताएं तो मिलती ही हैं। अरसे बाद देश की राजनीति में गवर्नेस और विकास के सवाल सबसे प्रभावी मुद्दे बन चुके हैं। भाजपा की सरकारों को इन्हीं सवालों पर खरा उतरना होगा। खुद को संभाले कांग्रेस कांग्रेस की संगठनात्मक स्थिति बेहतर न होने के कारण वह मुकाबले से बाहर होती जा रही है। एक जीवंत लोकतंत्र के लिए यह शुभ लक्षण नहीं है। कांग्रेस को भी अपने पस्तहाल पड़े संगठन को सक्रिय करते हुए जनता के सवालों पर ध्यान दिलाते हुए काम करना होगा, क्योंकि जनविश्वास ही राजनीति में सबसे बड़ी पूंजी है। हमें देखना होगा कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की तीन सीटों पर हुए उपचुनावों में कांग्रेस का पूरा चुनाव प्रबंधन पहले दिन से बदहाल था। भाजपा संगठन और सरकार जहां दोनों चुनावों में पूरी ताकत से मैदान में थे, वहीं कांग्रेस के दोनों पूर्व मुख्यमंत्रियों की छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के इन चुनावों में बहुत दिलचस्पी नहीं थी। इससे परिवार की फूट साफ दिखती है। कांग्रेस का यह बिखराव ही भाजपा के लिए विजयद्वार खोलता है। कुक्षी और सोनकच्छ की जीत मध्य प्रदेश में कांग्रेस की बदहवासी का ही सबब है। जहां जमुना देवी जैसी नेता की पारंपरिक सीट भी कांग्रेस को खोनी पड़ती है। अब सांसद बन गए सज्जन सिंह वर्मा की सीट भी भाजपा छीन लेती है। कांग्रेस को कहीं न कहीं भाजपा के चुनाव प्रबंधन से सीख लेनी होगी। खासकर उपचुनावों में भाजपा संगठन जिस तरह से व्यूह रचना करता है, उससे सबक लेनी लेने की जरूरत है। वह एक उपचुनाव ही था, जिसमें छिंदवाड़ा जैसी सीट भी भाजपा ने अपनी व्यूहरचना से दिग्गज नेता कमलनाथ से छीन ली थी। राज्यों में समर्थ नेतृत्व मध्य प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष प्रभात झा और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के लिए इन चुनावों की जीत वास्तव में एक बड़ा तोहफा है। संगठन की शक्ति और सतत सक्रियता के इस मंत्र को भाजपा ने पहचान लिया है। मध्य प्रदेश में जिस तरह के सवाल थे, किसानों की आत्महत्याओं के मामले सामने थे, पाले से किसानों की बर्बादी के किस्सों के बीच भी शिवराज और प्रभात झा की जोड़ी ने करिश्मा दिखाया तो इसका कारण यही था कि प्रतिपक्ष के नाते कांग्रेस पूरी तरह पस्तहाल है। राज्यों में प्रभावी नेतृत्व आज भाजपा की एक उपलब्धि है। इसके साथ ही सर्वसमाज से उसके नेता आ रहे हैं और नेतृत्व संभाल रहे हैं। भाजपा के लिए साधारण नहीं है कि उसके पास आज हर वर्ग में सक्षम नेतृत्व है। उसके सामाजिक विस्तार ने अन्य दलों के जनाधार को भी प्रभावित किया है। छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश कभी एक भूगोल के हिस्से थे, दोनों क्षेत्रों से एक सरीखी प्रतिक्रिया का आना यह संकेत भी है कि ये इलाके आज भी एक-सा सोचते हैं और अपने पिछड़ेपन से मुक्त होने तथा तेजी से प्रगति करने की बेचैनी यहां के गांवों और शहरों में एक जैसी है। ऐसे समय में नेतृत्वकर्ता होने के नाते शिवराज सिंह चौहान और डॉ. रमन सिंह की जिम्मेदारियां बहुत बढ़ जाती हैं, क्योंकि इन क्षेत्रों में बसने वाले करोड़ों लोगों के जीवन और इन राज्यों के भाग्य को बदलने का अवसर समय ने उन्हें दिया है। उम्मीद है कि वे इन चुनौतियों को स्वीकार कर ज्यादा बेहतर करने की कोशिश करेंगें। कुल मिलाकर ये उपचुनाव देश के मानस का एक संकेत तो देते ही हैं। एक अकेली सीट सूदूर मणिपुर की भी कांग्रेस को नहीं मिली है, वहां भी इस उपचुनाव से तृणमूल कांग्रेस का खाता खुल गया है। वहां तृणमूल प्रत्याशी ने कांग्रेस प्रत्याशी को हराकर यह सीट जीती है। ऐसे में कांग्रेस को निश्चय ही अपनी रणनीति पर विचार करना चाहिए। अपने विभ्रमों और बेचैनियों से आगे आकर उसे जनता के सवालों पर सक्रियता दिखानी होगी, क्योंकि हालात ये हैं कि आज सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों का काम विरोधी दल और उससे जुड़े संगठन ही करते दिख रहे हैं। जैसे मध्य प्रदेश में किसानों के सवाल पर भारतीय किसान संघ ने ही सरकार की नाक में दम किया और एक बड़े सवाल को कांग्रेस के खाते में जाने से बचा लिया। ये जमीनी हकीकतें बताती हैं कि कांग्रेस के लिए अभी इन राज्यों में मेहनत की दरकार है, तभी वह अपनी खोई हुई जमीन बचा पाएगी। (लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)
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