संसद की लोक लेखा समिति (पीएसी) और संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) पर हालिया मीडिया रिपोर्ट उन लोगों के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं, जो सशक्त, प्रभावी और विश्वसनीय लोकतांत्रिक संस्थानों में यकीन रखते हैं। अन्ना हजारे के आमरण अनशन के दबाव में गठित संयुक्त समिति के कुछ सदस्यों के खिलाफ जो विषैला अभियान चलाया जा रहा है, वह भी गहरी चिंता का कारण है। इस समिति का गठन लोकपाल विधेयक का मसौदा तैयार करने के लिए किया गया है। जनहित में तैयार इन समितियों पर निर्भर करता है कि वे विषम परिस्थितियों में किस प्रकार सुचारू ढंग से अपने उद्देश्य की पूर्ति करती हैं। 2-जी स्पेक्ट्रम को लेकर गठित जेपीसी और पीएसी के मामले में कामकाज संबंधी नियम, प्रक्रियाएं, परंपराएं और व्यवहार का अनुभव उपलब्ध हैं। न्यायपालिका के क्षेत्र में दखलंदाजी से बचने के लिए दोनों समितियों के अध्यक्षों को लोकसभा के स्पीकर से मार्गदर्शन लेना चाहिए। समिति की कार्यवाही में सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि इसे निरपेक्षता और निष्पक्षता के साथ कार्य करना चाहिए ताकि शासन की गुणवत्ता पर संसदीय प्रभाव में वृद्धि हो सके। सदन के पटल पर बहस दलगत आधार पर होगी, जिसमें पार्टियों के निहित स्वार्थ की पूर्ति का प्रयास होता है, किंतु समिति में गंभीर, संयत, सृजनात्मक और तटस्थ रुख अपनाया जाता है। समिति में अपनी पार्टी की नीतियों के बंधन से मुक्त होकर सदस्य खुलकर अपने विचार रखते हैं। आमतौर पर समितियों के फैसले सर्वसम्मति से लिए जाते हैं और अंतिम रिपोर्ट में शायद ही कभी मतभेद उभरते हैं। विभाजित राय के मामले में सदन के स्पीकर की तरह अध्यक्ष का फैसला ही अंतिम होता है। अध्यक्ष के पद पर लंबे संसदीय अनुभव संपन्न और विद्वान व्यक्ति का चुनाव होता है, जो समिति के व्यापक हितों में दलगत भावनाओं से ऊपर उठकर फैसला लेता है। सर्वसम्मति से जारी रिपोर्ट की परंपरा समिति की संस्तुतियों का वजन बढ़ा देती है और कार्यपालिका उन्हें निर्देश के रूप में स्वीकार कर ईमानदारी से क्रियान्वयन का प्रयास करती है। सदन के विपरीत, संसदीय समिति मीडिया से बात करने से बचती है। कुछ वर्षो से यह रीति सी बन गई है कि समिति का अध्यक्ष प्रमुख फैसलों से मीडिया को अवगत कराता है। मीडिया में आईं ये रिपोर्ट तकलीफदेह हैं कि पीएसी द्वारा कुछ अधिकारियों को तलब किया गया किंतु समिति के सदस्यों की आपत्तियों के कारण घंटों इंतजार कराने के बाद उन्हें अपना पक्ष रखे बिना ही वापस भेज दिया गया। एक आपत्ति यह भी रही कि जिन मुद्दों पर जेपीसी विचार कर रही है, उनमें पीएसी को दखल देने की कोई जरूरत नहीं है। एक अन्य आपत्ति यह रही कि मामला न्यायालय के विचाराधीन है इसलिए पीएसी को इस पर विचार नहीं करना चाहिए। दोनों ही आपत्तियां हल्की थीं और अध्यक्ष ने इन आपत्तियों को खारिज करके सही किया। जेपीसी के गठन को लेकर जो विवाद और बखेड़ा हुआ, वह सबके सामने है। जेपीसी का गठन विशेष शर्तो के साथ हुआ है जिनका उल्लेख दोनों सदनों के प्रस्ताव में किया गया है। इसमें पहले से ही इस मामले की जांच कर रही पीएसी को जांच कार्य रोकने का कोई निर्देश नहीं है। इस स्थिति में कुछ मुद्दों का दोनों समितियों के दायरे में आना स्वाभाविक है। जेपीसी के अध्यक्ष द्वारा स्पीकर को की गई शिकायतों को भी स्पीकर के निर्देशानुसार दूर कर गया। संसद के दोनों सदनों द्वारा जेपीसी के गठन को मंजूरी देने और स्पीकर द्वारा समिति की कार्रवाई आगे बढ़ाने के निर्देश दिए जाने के बाद इस तरह की आपत्तियां महज अड़ंगेबाजी हैं। मामले के अदालत में होने की आपत्ति की भी कोई वैधानिकता नहीं है। मामला न्यायालय के विचाराधीन होने का भी सीमित प्रयोजन है। यह खुद ही लगाया गया प्रतिबंध है और इससे सदन या समिति के अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं होता। अपने विवेक के आधार पर पीएसी ने कानून सचिव, एटॉर्नी जनरल, कैबिनेट सचिव, प्रधानमंत्री के मुख्य सचिव, सीबीआइ निदेशक और कुछ अन्य ऐसे अधिकारियों को तलब किया था, जिनके बारे में समिति का मानना था कि ये मामले में संलिप्त हो सकते हैं और जिनकी गवाही से समिति को सही निष्कर्षो पर पहुंचने में आसानी होती। उनका पक्ष न जानना गलत होता। उन्हें फिर से न बुलाया जाना एक और गलती होगी। इतने महत्वपूर्ण अधिकारियों का पक्ष न जान कर समिति बड़े लाभ से वंचित हो सकती है। उन्हें फिर से न बुलाए जाने का यह भी संकेत जाएगा कि समिति दबाव में आकर गलत परंपरा कायम कर रही है और संसदीय समितियों के संस्थान को क्षति पहुंच रही है। समिति को व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए इस संबंध में फिर से विचार करने की जरूरत है। लोकपाल बिल पर संयुक्त समिति संसदीय समिति नहीं है, किंतु यह संसदीय समिति के दिशानिर्देशों के अनुपालन से गुरेज नहीं करेगी। मीडिया में छाए रहने के बजाय समिति को चुपचाप काम करते रहना चाहिए। प्रचार में ग्लैमर जरूर है किंतु इससे मूलभूत मुद्दे से ध्यान भटकता है। यह उन शक्तियों के हाथों में खेलना भी है, जो लोकपाल बिल के रास्ते में बाधाएं खड़ी करना चाहती हैं। इस समय लोकपाल बिल का ऐसा मसौदा तैयार करने की महती आवश्यकता है, जो राजनीति में गहरे पैठ कर चुके भ्रष्टाचार के वायरस के खात्मे के लिए एक मजबूत और प्रभावी संस्थान का गठन कर सके। निहित स्वार्थो को अपने अस्तित्व पर खतरा महसूस हो रहा है और वे समिति के कामकाज में बाधा पहुंचाने का हरसंभव प्रयत्न कर रहे हैं। इसके लिए वे समिति के सदस्यों में मतभेद पैदा करने की भी कोशिश में हैं। अध्यक्ष और सह अध्यक्ष हर बैठक के बाद संयुक्त रूप से मीडिया को जानकारी दे सकते हैं। सदस्यों को अपने विचार सार्वजनिक करने से बचना चाहिए। यह एकमात्र उपाय है जो सदस्यों की बयानबाजी से उठने वाले विवादों पर अंकुश लगा सकता है। जिन सदस्यों पर व्यक्तिगत आरोप लगाए जा रहे हैं या जिनका चरित्र हनन करने का प्रयास किया जा रहा है, वे इन हमलों का जवाब अपने स्तर पर दे सकते हैं। इस प्रकार की समितियों में उसी प्रकार की सावधानी रखनी पड़ती है, जैसे व्यस्त चौराहे पर फर्राटे से दौड़ती गाडि़यों के बीच कोई व्यक्ति सड़क पार करते समय रखता है। उसे दाएं-बाएं, आगे-पीछे हर तरफ निगाह रखनी पड़ती है। तेज रफ्तार गाडि़यां दौड़ाने वाले बहुत से ड्राइवर नियमों का उल्लंघन करते हैं और जरा सी सावधानी हटते ही दुर्घटना घट जाती है। (लेखक लोकसभा के पूर्व महासचिव हैं).
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Saturday, April 23, 2011
झूठी गवाही के लिए तीस्ता ने दिया था प्रलोभन
बेस्ट बेकरी मामले के नौ दोषियों की ओर से बांबे हाईकोर्ट में दायर अपील के लंबित होने के बीच इस नरसंहार में अभियोजन पक्ष की एक प्रमुख गवाह शेख यास्मीन बानो अपने बयान से पलट गई है। यास्मीन ने दावा किया है कि इस मामले में झूठी गवाही देने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ ने उसे प्रलोभन दिया और गुमराह किया। उसका साफ कहना है कि अदालत में झूठ बोलने के लिए उसे बाध्य किया गया था। इस हफ्ते की शुरूआत में जारी एक वक्तव्य में यास्मीन ने कहा कि तीस्ता ने बेस्ट बेकरी मामले में प्रलोभन देकर और गुमराह करके मुझसे गलत गवाही दिलाई। बांबे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पिछले साल जून में दिए गए हलफनामे में मैंने सबकुछ लिखा था। आरोपों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए सीतलवाड़ ने कहा कि मुकदमा काफी पहले खत्म हो चुका है। दोषियों को दंडित किया जा चुका है। मैं नहीं जानती कि यह बयान अब क्यों दिया गया है। शेख परिवार की तरफ से यास्मीन अभियोजन पक्ष की एकमात्र गवाह थी जो 17 आरोपियों के खिलाफ पुलिस के मामले के पक्ष में खड़ी रही। मुख्य गवाह और यास्मीन की रिश्तेदार जाहिरा शेख समेत परिवार के शेष सदस्य अपने बयान से मुकर गए थे। उन्होंने आरोप लगाया था कि सीतलवाड़ ने उन्हें झूठ बोलने के लिए बाध्य किया था। 17 जून 2010 को दिए गए अपने हलफनामे में यास्मीन ने कहा है कि निचली अदालत के समक्ष उन्होंने सीतलवाड़ के इशारे पर गवाही दी। यास्मीन के अनुसार सीतलवाड़ का करीबी सहयोगी रईस खान स्थानीय मुस्लिम नेताओं के साथ उनसे मिला और दावा किया कि गुजरात में उनकी जान को खतरा है इसलिए उन्हें मुंबई चले जाना चाहिए। वहां उनका ख्याल रखा जाएगा। मेरे हलफनामे को याचिका के तौर पर माना जाना चाहिए। मैं और कुछ नहीं कहना चाहती। बांबे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त यास्मीन के हलफनामे को भारत के प्रधान न्यायाधीश, मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष और गुजरात के पुलिस महानिदेशक को भी भेजा गया है। फरवरी 2006 में सत्र अदालत ने यहां नौ लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। अदालत ने बाद में जाहिरा और अन्य के खिलाफ शपथ लेकर झूठी गवाही देने के मामले में मुकदमा चलाया था और उन्हें दोषी ठहराया था|
मोदी के इशारे पर निष्कि्रय थी पुलिस
गुजरात दंगों का मामला नए सनसनीखेज खुलासे के साथ मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को फिर घेरने लगा है। गुजरात के आइपीएस अधिकारी संजीव भट्ट ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर कहा है कि दंगों में पुलिस की अकर्मण्यता के पीछे मोदी के निर्देश थे और इसीलिए गुजरात पुलिस ने प्रभावी ढंग से दंगों को रोकने की कोशिश नहीं की थी। संजीव का कहना है कि यह बयान उन्होंने गुजरात दंगों की जांच कर रही एसआइटी (विशेष जांच दल) के सामने भी दिया था। संजीव ने हलफनामे में एसआइटी जांच पर भी सवाल उठाए हैं। भट्ट वर्ष 2002 में हुए गुजरात दंगों के समय स्टेट इंटेलीजेंसी ब्यूरो में डिप्टी कमिश्नर आफ इंटेलीजेंस के पद पर तैनात थे। उनका दावा है कि वह 27 फरवरी 2002 की रात में मुख्यमंत्री द्वारा बुलाई गई बैठक में मौजूद थे। उन्हें उस बैठक में मुख्यमंत्री द्वारा दिए निर्देशों की जानकारी है। भट्ट ने हलफनामे में आरोप लगाया गया है कि गोधरा ट्रेन अग्निकांड के बाद बुलाई गई बैठक में मुख्यमंत्री ने कहा था कि जिस बंद का आह्वान किया गया है, पार्टी उसके साथ है। उन्होंने कहा कि एक वर्ग विशेष की भावनाएं भड़की हुई हैं। उसी बैठक में दूसरे वर्ग विशेष के लिए की गई मुख्यमंत्री की टिप्पणियों का भी जिक्र हलफनामे में किया गया है। इसी बैठक में मुख्यमंत्री की टिप्पणियों से पुलिस को निष्कि्रय रहने के संकेत भी मिले। सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात दंगों की जांच के लिए एसआइटी गठित की है। कांग्रेस के पूर्व सांसद अहसान जाफरी की पत्नी जाकिया जाफरी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर दंगों के पीछे साजिश का आरोप लगाया है और सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की भी जांच भी एसआइटी को सौंप रखी है। सुप्रीम कोर्ट को डाक से भेजा गया यह हलफनामा भट्ट ने जाकिया की याचिका पर ही दाखिल किया है। 27 अप्रैल को गुजरात दंगों के मामलों में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है। तब पता चलेगा कि कोर्ट भट्ट के हलफनामे पर क्या संज्ञान लेता है। तभी तय होगा कि भट्ट का यह हलफनामा मोदी के लिए कितनी दिक्कत पैदा करता है। भट्ट ने एसआइटी जांच पर भी सवाल उठाया है। उनका आरोप है कि एसआइटी इस मामले की ठीक से जांच नहीं कर रही है। वह ये सारी जानकारी और संबंधित दस्तावेज पहले ही एसआइटी को सौंप चुके हैं। उन्होंने एसआइटी पर उनका बयान लीक करने का भी आरोप लगाया है। उन्होंने कहा है कि एसआइटी के सामने दिए गए उनके बयान के बारे में मीडिया में खबरें आ चुकी हैं। भट्ट ने अपनी जान को खतरा बताते हुए सुप्रीम कोर्ट से उनको व परिवार को पर्याप्त सुरक्षा दिलाए जाने की मांग की है। भट्ट ने कहा है कि इससे पहले उन्होंने ये सारी जानकारी कभी किसी के सामने नहीं उजागर की, क्योंकि वे इंटेलीजेंस विभाग में होने के कारण इसे गोपनीय रखने के लिए बाध्य थे। लेकिन अदालत या किसी कानूनी अथॉरिटी के पूछे जाने पर वह इसे बता सकते हैं। भट्ट का कहना है कि अगर कोर्ट चाहे तो वह ये सारी सूचना और दस्तावेज कोर्ट के सामने पेश कर सकते हैं। उन्होंने मामले में गवाह राज्य सरकार के अधिकारियों को भी पर्याप्त सुरक्षा दिए जाने का अनुरोध किया है ताकि वह निडरता से अपना बयान दे सकें|
Wednesday, February 23, 2011
राजनीतिक प्रपंच का पर्दाफाश
गोधरा मामले में विशेष न्यायालय के फैसले को कथित सेक्युलरिस्टों की राजनीति उजागर करने वाला मान रहे हैं…
अहमदाबाद के विशेष न्यायालय ने आजाद भारत के इतिहास की क्रूरतम घटना पर फैसला सुना दिया है। 27 फरवरी, 2002 को गोधरा रेल दहन इतिहास की ऐसी दुर्भाग्यशाली घटना थी जिससे निकली सांप्रदायिकता की लपटों ने गुजरात को नफरत की हिंसा में जला दिया। साबरमती एक्सप्रेस के कोच एस 6 के अंदर जलकर 59 लोग मारे गए थे। भारत में पहले ऐसी दर्दनाक घटना कभी नहीं हुई थी, किंतु इसके साथ कुत्सित राजनीति का जो सिललिसा आरंभ हुआ उसका आज तक अंत नहीं हुआ है। इसके अपराधियों का पता लगाने एवं सजा देने की आवाज उठाने की जगह इसे दुर्घटना साबित करने की कोशिशें होती रही हैं। कुछ तो इसे गुजरात सरकार का कारनामा बताते रहे ताकि इससे भड़के सांप्रदायिक धु्रवीकरण का चुनावी लाभ उठा सकें। न्यायालय के फैसले का महत्व इस मायने में है कि इसने इन सबको गलत साबित कर दिया है। गोधरा फैसला गुजरात पुलिस के लिए बड़ी जीत है। विशेष जांच दल (एसआइटी) के आरोप-पत्र में वर्णित घटनाक्रम को न्यायालय ने लगभग स्वीकार कर लिया है। इसमें अमन गेस्ट हाउस में साजिश रचने की बैठक से लेकर वहीं पेट्रोल रखने तथा उसे पीपे द्वारा डिब्बे के बाहर से अंदर डालने और कपड़ों के गट्ठर में आग लगाकर अंदर फेंकने की बात शामिल थी। जांच दल ने अमन गेस्ट हाउस के मालिक रज्जाक कुरकुर को मुख्य अभियुक्त कहा था। न्यायालय ने भी इस पर मुहर लगा दी है और उसे पांच मुख्य साजिशकर्ताओं में माना है। तीन अभियुक्तों द्वारा पीपे से पेट्रोल का छिड़काव तथा कपड़ों के गट्ठर में आग लगाकर अंदर फेंकने की बात भी न्यायालय ने स्वीकार की। राज्य फोरेंसिक विज्ञान निदेशालय ने कोच को जलाने के लिए पेट्रोल के प्रयोग की बात स्वीकार की थी। न्यायालय ने 253 गवाहों के बयान, 1500 दस्तावेजी सबूतों के अध्ययन, परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के गहरे विश्लेषण तथा आठ अभियुक्तों द्वारा अपराध की स्वीकारोक्ति के आधार पर फैसला दिया है। इस फैसले के बाद गोधरा मामले पर जारी गंदी राजनीति बंद होनी चाहिए, किंतु राजनीति बंद हो जाएगी, ऐसा लगता नहीं। बहुत से ऐसे राजनेता और संगठन हैं, जिनके पास पिछले नौ सालों से मोदी विरोध सबसे बड़ा मुद्दा रहा है। पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव द्वारा गठित न्यायमूर्ति बनर्जी आयोग ने किसी षड्यंत्र को नकारते हुए गोधरा कांड को न केवल दुर्घटना करार दिया था, बल्कि कारसेवकों पर ही इसकी जिम्मेदारी डालने की कोशिश की थी। बिहार चुनाव में इस रिपोर्ट का खूब इस्तेमाल किया गया। इसके विपरीत नानावती आयोग (सेवानिवृत्त न्यायाधीश जीटी नानावती एवं केजी शाह) ने भी इसे सुनियोजित आपराधिक षड्यंत्र का नतीजा करार दिया। अब न्यायालय ने न्यायमूर्ति बनर्जी रिपोर्ट को झूठ करार दे दिया है। बनर्जी और लालू प्रसाद यादव की प्रतिक्रिया तो फैसले को शिरोधार्य करने की नहीं हो सकती। इस श्रेणी के लोग फैसले के उन पहलुओं को सामने लाने की कोशिश कर रहे हैं, जिनसे यह साबित हो सके कि उन्होंने कुछ गलत नहीं कहा था। वे 63 लोगों के बरी होने का मामला उठा रहे हैं। मौलवी उमरजी को दोषमुक्त करार देने की बात रेखांकित कर रहे हैं। इसके आधार पर वे मोदी और गुजरात पुलिस को इनका अपराधी साबित कर रहे हैं। वे पूछ रहे हैं कि इन लोगों का क्या कसूर था कि इन्हें नौ साल जेल में रहना पड़ा? जिन 94 लोगों के खिलाफ मामला चल रहा था, उनमें से 80 तो साबरमती जेल में हैं और 14 जमानत पर बाहर हैं। जिन 134 लोगों को अभियुक्त बनाया गया उनमें 14 पहले ही बरी हो गए, पांच की मृत्यु हो गई, पांच अवयस्क थे एवं 16 फरार हैं। अभियुक्तों में से 63 यानी करीब दो-तिहाई का बरी होना साधारण बात नहीं है, किंतु न्यायालय के फैसले में इन सभी को निर्दोष नहीं माना गया है। न्यायालय ने कहा है कि इनके खिलाफ प्रत्यक्ष सबूतों का अभाव है। मौलवी हुसैन उमरजी के बारे में भी न्यायालय ने यही कहा है कि उनके विरुद्ध प्रत्यक्ष सबूत नहीं हैं। न घटना के समय उनकी उपस्थिति के प्रमाण हैं और न ही अमन गेस्ट हाउस की बैठक में। प्रत्यक्ष सबूत न होने के आधार पर बरी होने का अर्थ किसी का बिल्कुल निर्दोष होना नहीं है। वैसे भी, अभियुक्तों की तरह ही गुजरात पुलिस के सामने भी उच्च एवं उच्चतम न्यायालय में जाने का विकल्प खुला है। अफसोस की बात है कि फैसला आने के बाद भी बहुत से राजनेताओं और संगठनों की प्रतिक्रिया रेल कोच में मारे गए कारसेवकों के प्रति उतनी ही क्रूर है। यही वह भाव है जिसके विरुद्ध प्रतिक्रियाएं होती हैं। बरी हुए 63 लोगों के प्रति सहानुभूति रखने वालों की नजर में क्या जला कर मारे गए 59 लोग मनुष्य नहीं थे? वस्तुत: यह रवैया दुर्भाग्यपूर्ण, अमानवीय और शर्मनाक है। इन्हें नहीं भूलना चाहिए कि गोधरा कांड से लेकर गुजरात दंगों के प्रमुख नौ मामलों की कानूनी कार्रवाई उच्चतम न्यायालय की निगरानी में चल रही है। इसमें यह पहला फैसला उच्चतम न्यायालय द्वारा हरी झंडी मिलने के बाद आया है। इसलिए देश हित में यही है कि न्यायालय के निष्कषरें को स्वीकार कर भविष्य की ओर कदम बढ़ाए जाएं। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
राजनीतिक चोला ओढ़ने की तैयारी में पूर्व आतंकी
अलगाववादियों और मुख्यधारा के खेमों में बंटे जम्मू कश्मीर के सियासी मंच पर जल्द ही दो नए राजनीतिक दलों का उदय होने वाला है। खासबात यह है कि दोनों ही दलों की कमान बरसों पहले हिंसा का खूनी खेल खेलने वाले पूर्व आतंकियों के हाथों में है। एक दल हिजबुल के पूर्व आप्रेशनल कमांडर इमरान राही और जुबैर-उल-इस्लाम तैयार करने में लगे हैं, जबकि दूसरा संगठन पूर्व इख्वान कमांडर लियाकत अली खान बना रहे हैं। कश्मीर को भारत का हिस्सा बताने के साथ ही उनका दावा है कि वे राज्य में तीसरे फं्रट की भूमिका निभाने के साथ ही जनता को हुर्रियत, नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी समेत का प्रभावशाली विकल्प देंगे। उल्लेखनीय है कि राही और लियाकत पहले भी सियासी संगठन बना चुके हैं,लेकिन मुख्यधारा की सियासत में किसी तरह की जमीन तैयार करने में नाकाम रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, पूर्व आतंकी कमांडरों की पार्टी खड़ा करने में कई राजनीतिक संगठन शामिल हैं। इनमें वह दल प्रमुख हैं जो अलगाववादियों व आतंकियों के प्रति उदार रवैया रखते हैं। इनमें अवामी नेशनल कांफ्रेंस का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। अवामी नेशनल कांफ्रेंस के संस्थापक जीएम शाह राज्य के मुख्यमंत्री भी रहे हैं और वह अलगाववादियों के करीब माने जाते रहे हैं। हालांकि इन दोनों संगठनों के गठन की अभी तैयारी ही चल रही है, लेकिन वादी में चर्चा है कि इनका गठन केंद्र सरकार और सेना आतंकियों व हुर्रियत के सफाए के लिए करा रही है। इमरान राही को जहां केंद्र समर्थन दे रही है, वहीं लियाकत अली को सेना। लियाकत अली का कहना है कि घाटी के कई मुख्यधारा के सियासी नेताओं के साथ-साथ हुर्रियत का कैडर भी हमारे साथ संपर्क में है। सही समय आने पर हम इन सभी का खुलासा करेंगे। उन्होंने कहा, जो लोग कह रहे हैं कि हमारे संगठनों को केंद्र सरकार या सेना द्वारा तैयार किया जा रहा है, वह हुर्रियत और आतंकियों का प्रापोगंडा कर रहे हैं, ताकि आम लोग हमसे दूर रहें, लेकिन असलियत सभी को पता है। भारतीय सेना कोई पाक फौज नहीं है जो यहां सियासी संगठनों को चलाए या बनाए। यह हिंदुस्तान है और कश्मीर हिंदुस्तान का हिस्सा। वहीं, इमरान राही ने भी कयासों को बेबुनियाद बताते हुए कहा,हमारा केंद्र या सेना से कोई तालमेल नहीं है। कश्मीर में अमन बहाली और कश्मीर समस्या के सही समाधान के प्रति गंभीर लोग हमारा पूरा समर्थन कर रहे हैं। यह लोग हमसे जुड़ रहे हैं। मेरा पहले भी सियासी संगठन रहा है। जुबैर भी सियासत में रहे हैं। अवामी नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष मुजफ्फर शाह ने भी इस मामले में सफाई देते हुए कहा, हम किसी एजेंसी के पिट्ठू नहीं हैं।जो लोग हम पर सेना या केंद्र सरकार के साथ मिलीभगत का आरोप लगा रहे हैं, वह खुद ही इनके या फिर किसी और संगठन के एजेंट हैं।इमरान राही हिजबुल मुजाहिद्दीन के उन चार कमांडरों में शामिल है जिन्होंने आठ फरवरी 1996 को केंद्र सरकार से कश्मीर में अमन बहाली के लिए पहली बार वार्ता प्रक्रिया शुरू की थी। इसी बातचीत के चलते सूबे में लगभग 16 साल बाद राष्ट्रपति शासन समाप्त हुआ था और एक निर्वाचित सरकार ने सत्ता संभाली थी।
अब जेपीसी में घुसने के लिए खींचतान
सरकार जेपीसी बनाने पर राजी हो गई है तो अब उसके स्वरूप और आकार को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच खींचतान शुरू हो गई है। 2जी स्पेक्ट्रम पर जांच के लिए संयुक्त संसदीय दल को प्रधानमंत्री की हरी झंडी के बाद अब विपक्षी दलों में जेपीसी में शामिल होने के लिए खींचतान मच गई है। सरकार चेयरमैन समेत 21 सदस्यीय जेपीसी गठित करने के मूड में है, वहीं विपक्ष यह संख्या 31 कराने के लिए दबाव बना रहा है। विपक्ष की इस मांग में यूपीए के सहयोगी दल एनसीपी ने भी सुर मिला दिया है कि सभी दलों का जेपीसी में प्रतिनिधित्व हो। हालांकि, 31 सदस्य होने पर भी सभी दलों का प्रतिनिधित्व नहीं हो सकता क्योंकि, राजनीतिक दलों की संख्या ही 37 है। कांग्रेस के उच्चपदस्थ सूत्र फिलहाल 21 सदस्यीय समिति गठित करने की तैयारी कर रहे हैं। इसमें 14 सदस्य लोकसभा और सात सदस्य राज्यसभा से होंगे। इस लिहाज से सभी दल तो दूर वामपंथियों, सपा, बसपा, तृणमूल, एनसीपी, एआइडीएमके जैसे दलों के लिए भी अनुपात के हिसाब से जगह मिलना मुश्किल होगा। सूत्रों के मुताबिक, इसके लिए वाम दलों ने तो एक ब्लाक बनाया है और सरकार ने दोनों सदनों से उनका एक-एक सदस्य लाने के संकेत दिए हैं। मुख्य विपक्षी दल भाजपा से चार सदस्यों के इसमें शामिल होने की उम्मीद है। इस पूरी स्थिति से सबसे ज्यादा परेशान तमिलनाडु की मुख्य विपक्षी पार्टी अन्नाद्रमुक है। नौ सीटों वाली अन्नाद्रमुक के थंबीदुरई किसी भी तरह जेपीसी में शामिल होने के लिए तीसरे मोर्चे का ब्लाक बनाने से लेकर भाजपा से मदद मांगने तक सभी उपक्रम कर रहे हैं। उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष और प्रधानमंत्री से सभी दलों के प्रतिनिधित्व की मांग रखी है, जिसका यूपीए के सहयोगी एनसीपी ने भी समर्थन किया है। इसीलिए, सरकार पर 31 सदस्यीय जेपीसी का दबाव बनाकर विपक्ष मुख्य दलों के प्रतिनिधित्व की जुगत भिड़ा रहा है। उधर, सरकार इस मसले पर विपक्ष के बीच की खींचतान को बढ़ाकर दूर से मजे लेने का कोई मौका नहीं छोड़ेगा। बुधवार शाम तक इसकी तस्वीर काफी हद तक स्पष्ट होने की उम्मीद है।
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