Saturday, February 18, 2012

यहां का मुद्दा आलू-पानी


एत्मादपुर विस क्षेत्र के मतदाता इस पसोपेश में हैं कि अपना प्रतिनिधि मुद्दों के आधार पर चुने या जाति का ख्याल रखें। बहरहाल यहां सबसे बड़ा मुद्दा आलू और पानी का है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आलू की पैदावार सबसे अधिक इसी इलाके में होती है, लेकिन समस्याओं की जमीन पर हो रही यह खेती खतरे में है। दूसरी तरफ नए परिसीमन ने इस क्षेत्र का गणित बदल दिया है। अब यह सीट सुरक्षित नहीं है। जातीय समीकरण बदल गए हैं और अधिकतर प्रत्याशी जातीय भावना को भुनाकर मतदाताओं का मत हड़पने की फिराक में हैं। फिलहाल मतदाताओं के के लिए आलू और पानी अहम है या जाति, यह जानना मुश्किल है। वैसे जाति पर आलू भारी दिख रहा है। इन दिनों एत्मादपुर क्षेत्र में जो चुनावी माहौल है, उसमें आलू और पानी गूंज रहा है। तमाम प्रत्याशी चुनावी सभाओं में आलू और पानी का मुद्दा उठाते हैं और इसी आधार पर वोट मांगते हैं। इलाके में आलू का पानी से गहरा संबंध है। यहां की छोटी नहरों की सफाई व मरमम्त 10-12 सालों से नहीं हुई है। सिंचाई विभाग गर्मी में जब पानी की ज्यादा जरूरत होती है तब नहरों में पानी नहीं छोड़ता लेकिन बीते दिसम्बर में तो विभाग ने हद कर दी और नहरों में पानी छोड़ दिया। जिससे करीब ढाई सौ बीघे में आलू की फसल डूब गई थी। ऐसे में क्षेत्र में सिंचाई के लिए बोरिंग एक मात्र विकल्प है और यहां करीब दो सौ फीट पर बोरिंग होती है। इससे भविष्य में भूजल स्रेत के भी प्रभावित होने का खतरा भी बढ़ गया है। जहां तक पेयजल की बात है तो अधिकतर इलाके में लोग पानी खरीद कर पीते हैं। पानी की सबसे अधिक किल्लत यमुनापार इलाके में है। मतदाताओं का कहना है कि आलू से जुड़ी समस्याओं के मामले में बीते कई चुनावों में सिर्फ आासनों की घुट्टी पिलाई गई। इस क्षेत्र में आलू मंडी और पोटैटो प्लांट लगाने का वादे चुनाव के दौरान किये जाते रहे हैं। इस बार भी ये वादे किए जा रहे हैं। मतदाताओं का कहना है कि आलू निर्यात न होने से भी बेहद नुकसान हो रहा है। इसलिए वे चाहते है कि इस आलू बेल्ट को कर्मठ प्रतिनिधि मिले। जहां तक प्रत्याशियों की बात हैं तो परिसीमन में सामान्य हुई इस सीट पर भाजपा के रामप्रताप सिंह चौहान, कांग्रेस-रालोद गठबंधन के बाबा हरदेव सिंह और सपा के प्रेम सिंह बघेल पहली बार चुनाव लड़ रहे है। बसपा से धर्मपाल सिंह मैदान में हैं। चुनावी चर्चाओं में जातीय हिसाब-किताब भी खूब लगाया जा रहा है। ठाकुर बाहुल्य इस क्षेत्र में तीन प्रमुख उम्मीदवार ठाकुर हैं। वैसे जब प्रमुख दलों के प्रत्याशियों से बात की गई तो उन्होंने जातीय समीकरण को खारिज करते हुए कहा कि वे सिर्फ विकास के आधार पर वोट मांग रहे हैं। गौरतलब है कि इस क्षेत्र का शहरी इलाका काफी बड़ा है। जो शहर की तीनों विधानसभा क्षेत्रों की हवा से प्रभावित हो सकता है। इस कारण सभी प्रत्याशियों की नजर यमुना पार के शहरी इलाकों पर भी है। क्षेत्र में किसी एक प्रत्याशी का बोलबाला नहीं रहा है और प्रमुख दलों में बराबर की टक्कर कही जा रही है। कु ल मतदाता ..................3,51,736 पुरुष मतदाता ..................1,98,854 महिला मदताता.................1,52,878 पुराने परिसीमन पर वर्ष 2007 तक हुए विधानसभा चुनाव में कभी किसी एक दल का आधिपत्य लंबे समय तक नहीं रहा है। 1989 से अब तक प्रतिनिधित्व करने वाले विधायक इस प्रकार हैं : 1989 ......चंद्रभान मौर्य .........जनतादल 1991 ......चंद्रभान मौर्य ........जनता दल 1993 ......चंद्रभान मौर्य.............सपा 1996 ......गंगा प्रसाद पुष्कर ........बसपा 2002 ......गंगा प्रसाद पुष्कर ........रालोद 2007 ......नारायण सिंह सुमन.......बसपा 2009 लोकसभा चुनाव में स्थिति बसपा..........................49533 कांग्रेस .........................13288 सपा ...........................33210 भाजपा .........................47671 एत्मादपुर सीट

प्रदेश में होगा रामराज और बनेगा राम मंदिर : आडवाणी


भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने गुरुवार को यहाँ केंद्र में सरकार बनने पर पृथक बुंदेलखंड व तेलंगाना राज्य बनाने के संकेत दिए। उन्होंने उत्तर प्रदेश को बीमारू के विश्लेषण से मुक्त कराने व रामराज की स्थापना के लिए भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनाने का आह्वान किया। वह यहां भाजपा प्रत्याशी के समर्थन में जनसभा को संबोधित कर रहे थे। भाजपा नेता ने खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी की पंक्तियां सुनाते हुए वीरांगना की नगरी झाँसी से आत्मीय संबंध जोड़े और प्रत्याशी रवि शर्मा को विधानसभा चुनाव की बेला में यहां बुलाने का धन्यवाद किया। उन्होंने जनसंघ के समय से की जा रही छोटे राज्यों की हिमायत का जिक्र किया और याद दिलाया कि भाजपा ने चुनावी घोषणा पत्र में मध्य प्रदेश में छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश में उत्तरांचल, बिहार में झारखंड राज्य बनने की बात थी। पहली बार 1998 में सरकार बनाने का अवसर मिला, तब सर्वसम्मति से इन तीनों राज्यों का गठन कर दिया। तेलंगाना पर कहा कि यूपीए की सरकार के समय में ही तेलंगाना राज्य बन जाता, यदि यूपीए सहयोगी चंद्रबाबू नायडू की तेलगू देशम पार्टी कह देती। आडवाणी ने कहा कि हिंदुस्तान में बिहार का बी, मध्य प्रदेश का एमए, राजस्थान का आर, उत्तर प्रदेश का यू शब्द मिलकर ही बीमारू बन गया। इन चारों प्रांतों में गरीबी, अशिक्षा व पिछड़ापन देख कर तकलीफ होती थी, लेकिन कई प्रदेशों में बदलाव आया, लेकिन उत्तर प्रदेश की स्थिति नहीं बदली। भाजपा की सरकार बनाने का आह्वान करते हुए कहा कि प्रदेश के विकास का रास्ता झाँसी से होकर गुजरता है। उन्होंने जनता से भाजपा प्रत्याशी को जिताकर विकास का मार्ग प्रशस्त करने का आह्वान किया।

Wednesday, February 15, 2012

यूपी में अपना दल ने बढ़ाई बड़े दलों की उलझन


इलाहाबाद की बारा विधानसभा सीट पिछली बार भाजपा के कब्जे में थी लेकिन इस बार कुछ भी हो सकता है। यहां बड़े दलों के उम्मीदवारों की मेहनत पर अपना दल भारी है। पिछले चुनाव में इस दल ने यहां के चुनावी समीकरण पलटे थे। इस बार भी ऐसी ही आशंकाएं जताई जा रही हैं। सिर्फ बारा ही नहीं, इलाहाबाद से लेकर वाराणसी तक दो दर्जन से अधिक सीटों पर यही स्थिति है जिसमें इस अपना दल के प्रत्याशियों ने बड़े नेताओं की बेचैनी बढ़ा दी है। कुछ तो अपने प्रतिबद्ध पटेल मतों से और कुछ इनके साथ अन्य जातियों के समीकरण बनाकर। संदेश साफ है-जीते तो जीते नहीं तो खेल बिगाड़ेंगे। यही अपना दल की विशिष्टता है। अपने मतों को बिखरने न देना और इसके बूते दूसरों के समीकरण को छिन्न-भिन्न कर देना। पिछले चुनाव यानि 2007 में इस दल को एक भी सीट हासिल नहीं हुई थी लेकिन 39 सीटों पर चुनाव लड़कर उसने दस फीसदी से अधिक वोट हासिल किए थे। इनमें जहां भी कम मतों से हार-जीत का फैसला हुआ, उसमें उलटफेर का कारण अपना दल उम्मीदवार ही रहे। पार्टी के वरिष्ठ नेता जवाहर लाल पटेल दावा करते हैं-इस बार हम सिर्फ उलटफेर ही नहीं करने जा रहे हैं। हम कई सीटों पर जीतेंगे भी। उनका इशारा रोहनियां से चुनाव लड़ रहीं अनुप्रिया पटेल, इलाहाबाद पश्चिम सीट पर चुनाव लड़ रहे अतीक अहमद, मंडि़याहू से चुनाव लड़ रहे मुन्ना बजरंगी की ओर है। रोहनिया पटेल बाहुल्य क्षेत्र है तो अतीक अहमद के इलाके में इस बार परिसीमन के बाद कई ऐसे क्षेत्र आ गए हैं, जिनमें पटेलों की संख्या अधिक है। पार्टी के लोगों की मानें तो बांदा, इलाहाबाद, प्रतापगढ़, जौनपुर, फतेहपुर वाराणसी, चंदौली आदि कई जिलों में 45 सीटें ऐसी हैं जिनमें यह पार्टी वोटों का गणित बिगाड़ने में सक्षम है। 2002 में अपना दल गंगापुर की सीट जीतने में भी सफल रहा था। कमेरा समाज को न्याय दिलाने के लिए बना यह दल सोने लाल पटेल के जीवन काल से ही अपना मत प्रतिशत बढ़ाने की कोशिशों में जुटा हुआ है। 1996 के चुनाव में 155 सीटों पर लड़ने वाले इस दल के प्रत्याशियों में 154 की जमानत जब्त हो गई थी। मत भी मात्र दो फीसदी ही हासिल हो सके थे। 2002 में यह दल अवश्य चर्चा में आ गया जबकि इसने 223 उम्मीदवार उतारे लेकिन इसके तीन उम्मीदवार जीतने में सफल रहे। इस बार मतों का प्रतिशत 3.78 प्रतिशत रहा। 2007 में इस दल ने सिर्फ चुनिंदा सीटों यानी 39 सीटों पर ही प्रत्याशी उतारे और 10.49 फीसदी वोट हासिल कर लिए। सोने लाल पटेल की मौत के बाद संगठन बिखरने का खतरा था राष्ट्रीय महासचिव के रूप में उनकी पुत्री अनुप्रिया पटेल ने किसी भी तरीके से जीत या फिर अपनी हैसियत जताने का फलसफा अपनाया। इसलिए जहां दल ने बाहुबली और माफिया को टिकट देने से परहेज नहीं किया, वहीं अन्य दलों के नेताओं के लिए भी दरवाजे खोलकर रखे। दल ने बसपा से क्षुब्ध आधा दर्जन उम्मीदवारों को टिकट दिया है तो सपा से आये प्रत्याशियों की संख्या भी काफी है। इसके पीछे का उद्देश्य भी साफ है कि किसी भी तरह से मतों का प्रतिशत बढ़े। पार्टी के लचीलेपन को इस तरीके से भी समझा जा सकता है कि रोहनिया में अनुप्रिया पटेल का परचा भरते समय उनके साथ अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के अध्यक्ष हरिवंश सिंह भी मौजूद थे। पार्टी के एक नेता कहते हैं-हमने जहां दूसरी जातियों के लोगों को टिकट दिए हैं, वहां यदि थोड़ा-बहुत भी वोट हमारे पाले में बढ़ा तो परिणाम चौंकाने वाले होंगे।

तीसरे चरण में दस जिलों की 56 सीटों पर मतदान आज


लोकतंत्र को मजबूत करने का एक और मौका आ गया। इस बार इसकी जिम्मेदारी तीसरे चरण के मतदाताओं की उठानी है। उन्हें बुधवार को वोट डालने के लिए घरों से निकलना है। इस चरण में पहले दो चरणों के मुकाबले ज्यादा वोट पड़ने की संभावना है। इसकी वजह इस चरण में उन जिलों का शामिल होना है जिसने देश को कई प्रधानमंत्री दिये हैं। जाहिर है कि ऐसे में यहां के मतदाताओं से जागरूकता की ज्यादा उम्मीद की जा रही है। विधानसभा चुनाव के तीसरे चरण में दस जिलों की 56 सीटों पर मतदान होना है। ये जिले हैं- छत्रपति शाहूजी महराज नगर (अमेठी), सुल्तानपुर, कौशाम्बी, इलाहाबाद, जौनपुर, चंदौली, वाराणसी, संत रविदासनगर, मिर्जापुर और सोनभद्र। मतदान सुबह सात बजे से शुरू होगा। चंदौली जिले के चकिया और सोनभद्र जिले के राबर्टसगंज व दुद्धी निर्वाचन क्षेत्रों में सायं चार बजे तक मतदान होगा। बाकी सभी स्थानों पर शाम पांच बजे तक वोट पड़ेंगे। तीसरे चरण में 77 महिलाओं सहित कुल 1018 प्रत्याशी मैदान में हैं। करीब 1.77 करोड़ से अधिक मतदाता उनकी तकदीर का फैसला करेंगे। इनमें 97.50 लाख पुरुष और 80.30 महिलाएं शामिल हैं। इस चरण में 11607 मतदान केन्द्रों के कुल 18374 पोलिंग स्टेशनों पर मतदान होगा। मंगलवार को ज्यादातर उम्मीदवारों ने जहां बूथ मैनेजमेंट में अपनी ताकत झोंकी वहीं जनसम्पर्क के जरिये मतदाताओं को भी लुभाने का प्रयास किया। इससे पहले चुनाव प्रचार के दौरान भी सभी दलों के दिग्गज नेता जनता के बीच अपनी-अपनी बातें रख चुके हैं। प्रत्याशी भी अपने वादे-इरादे जाहिर कर चुके हैं। अब फैसला मतदाताओं को करना है कि वह अपना कैसा जनप्रतिनिधि चाहते हैं। ये दिग्गज हैं मैदान में इस चरण में पूर्व विधानसभा अध्यक्ष केशरी नाथ त्रिपाठी और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ओमप्रकाश सिंह भाजपा से, मायावती सरकार के मंत्री नंद गोपाल गुप्ता नंदी, इन्द्रजीत सरोज, विनोद सिंह व मंत्री पद से हटाये गये रंगनाथ मिश्र बसपा से, बसपा सरकार में मंत्री रहे राकेश धर त्रिपाठी निर्दलीय, पूर्व मंत्री अमिता सिंह कांग्रेस से और पूर्व मंत्री उज्जवल रमण सिंह सपा से चुनाव मैदान में हैं। दांव पर दलों की प्रतिष्ठा परिसीमन से पहले सन 2007 के विधानसभा चुनाव में इन दस जिलों की कुल 53 सीटों पर बसपा ने 31, सपा ने 11, भाजपा ने छह, कांग्रेस ने तीन व जदयू ने एक पर जीत दर्ज की थी। ऐसे में बसपा पर जहां पूंजी बचाने का सर्वाधिक दबाव है वहीं सपा की कोशिश अपना दबदबा कायम करने की है। राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र के कारण यह चरण कांग्रेस की प्रतिष्ठा से भी जुड़ा है। दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर होने के कारण भाजपा भी इस चरण को लेकर खासी फ्रिकमंद है। पिछली बार हुआ था 42.63 प्रतिशत मतदान तीसरे चरण के इन जिलों में पिछले विधानसभा चुनाव में 42.63 प्रतिशत मतदान हुआ था। सबसे अधिक मतदान इलाहाबाद जिले के बारा निर्वाचन क्षेत्र में 53.33 प्रतिशत और सबसे कम इलाहाबाद के ही उत्तरी निर्वाचन क्षेत्र में 24.01 प्रतिशत

झारखंड के 17 जिलों में नक्सलियों की समानांतर सरकार


नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई न करने पर गृह मंत्री पी.चिदंबरम से मिली फटकार के बाद अब केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने झारखंड की मुंडा सरकार को आइना दिखाया है। रमेश ने परोक्ष रूप से राज्य सरकार व नक्सलियों में समझौते का आरोप लगाते हुए यहां तक कह डाला कि 24 में से 17 जिलों में नक्सलियों की समानांतर सरकार है। जयराम ने मंगलवार को उपमुख्यमंत्री व झामुमो नेता हेमंत सोरेन की मौजूदगी में एक कार्यक्रम में कहा, झारखंड में राजनीति कहां खत्म होती है और माओवाद कहां से शुरू होता है, इसका पता ही नहीं चलता। अर्जुन मुंडा सरकार को घेरते हुए कहा, हम माओवादियों का सहयोग अपने राजनीतिक लाभ के लिए कर रहे हैं। इससे फायदा होने वाला नहीं है। हम किसी भी हाल में माओवादियों से समझौता नहीं करेंगे। केंद्रीय मंत्री ने कहा, वे छह माह में पांच बार झारखंड का दौरा कर चुके हैं। सारंडा के घने जंगलों में गया तो स्थिति देखकर आंखों में आंसू आ गए। जयराम रमेश ने कहा, झारखंड सरकार मनरेगा के क्रियान्वयन में सुस्ती बरत रही है। आदिवासी मामलों के मंत्री ने भी राज्य सरकार को पत्र लिखकर कहा है कि वे असंतुष्ट हैं। ग्राम पंचायत अगर मजबूत नहीं हुईं तो मनरेगा का काम नहीं होगा। पंचायतों को अधिकार की वकालत करते हुए उन्होंने कहा, राज्य सरकार केंद्र से सत्ता के विकेंद्रीकरण की मांग उठाती है लेकिन राज्य में अधिकार देने से परहेज करती है।

पीएम ने युवाओं को दिया नौकरी का भरोसा

प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने कहा है कि युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराना सरकार के एजेंडे में सबसे ऊपर है। भारतीय श्रम सम्मेलन में उन्होंने कहा कि युवाओं को अधिकाधिक रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के लिए उनके कौशल को भी बढ़ाने की जरूरत है। प्रधानमंत्री ने माना कि युवाओं का कौशल बढ़ाने का काम धीमी गति से चल रहा है और इस गति को तेज करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि युवाओं के लिए हर साल रोजगार के अधिक और अच्छे अवसर सुलभ कराना हमारी जिम्मेदारी है। प्रधानमंत्री ने कहा कि यह संभव है कि जब हम अपने युवाओं को उन क्षेत्रों में दक्ष बनाएंगे जो देश की बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अल्पकालिक श्रमिकों को भी पूर्णकालिक श्रमिकों जैसी सुविधाएं दिलाने के लिए भी सरकार काम कर रही है। डा. मनमोहन सिंह ने कहा कि वर्ष 2004 से अर्थव्यवस्था की तेज रफ्तार की वजह से देश में कौशल विकास प्रक्रि याओं की खामियां भी सामने आई हैं। उन्होंने कहा कि तेज आर्थिक वृद्धि की राह में कौशल विकास एक बड़ी बाधा है और इससे उबरना भी बेहद जरूरी है। प्रधानमंत्री ने कहा कि देश में कौशल रफ्तार को तेज करने के लिए निजी क्षेत्र को ज्यादा दिलचस्पी लेनी होगी। गरीब छात्रों को सीखने के लिए आर्थिक मदद की वकालत करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि वह इसे उचित नहीं समझते कि कौशल निखारे बिना ही युवा रोजी-रोटी के जुगत में लग जाएं। उन्होंने कहा कि इसके लिए उद्योग और सरकार दोनों को मिलकर काम करना होगा। प्रधानमंत्री ने इस बात का अध्ययन करने की भी जरूरत बताई कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि देश का नियामक तंत्र श्रम कल्याण में वास्तविक योगदान देने की बजाय हमारे विकास, रोजगार के अवसर और उद्योग के बढ़ने में आड़े आ रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार सभी श्रमिकों के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध है और ऐसे प्रावधान लाने पर विचार कर रही है जिससे अल्पकालिक श्रमिकों को पूर्णकालिक श्रमिकों के सभी लाभ मिलें। प्रधानमंत्री ने कहा कि इसके लिए अगर विधायी संशोधनों की आवश्यकता होगी तो हम उसके लिए भी तैयार हैं। उन्होंने बताया कि इसे वास्तविकता में बदलने के लिए इसके प्रारूप पर काम चल रहा है। उन्होंने इस पर खुशी जताई कि अब राज्य सरकारें श्रम संबंधी कानूनों को लेकर लचीला रुख अपना रही हैं जिससे श्रमिकों के हितों को अच्छा संरक्षण हो रहा है। प्रधानमंत्री डा. सिंह ने कहा कि सरकार श्रम कानूनों को मजबूत बनाने और उन्हें लागू करवाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि फैक्ट्री अधिनियम-1948 में संशोधन किए जाने की प्रक्रि या जारी है। देश की वृद्धि दर 9प्रतिशत तक ले जाने की अपनी इच्छा को जाहिर करते हुए उन्होंने कहा कि इस लक्ष्य को तभी पाया जा सकता है जब नियोक्ता और श्रमिक मिलकर काम करें। उन्होंने एक आधुनिक एवं औद्योगिक होती अर्थव्यवस्था के निर्माण और इसके त्वरित एवं समावेशी विकास के लिए देश में बेहतर औद्योगिक संबंधों को जरू री बताते हुए उद्योग, श्रमिक और सरकार से परस्पर साझेदारी की भावना से काम करने की अपील की। प्रधानमंत्री ने श्रमिकों के कल्याण के लिए चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं का भी जिक्र किया और कहा कि अब न्यूनतम 10 कर्मचारी रखने वाले प्रतिष्ठानों में भी ईएसआईसी की सेवाओं का लाभ देना अनिवार्य कर दिया गया है।

Tuesday, February 14, 2012

कांग्रेस के खोखले दावे


उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री राहुल गांधी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। जहां एक तरफ वह स्वयं, उनकी बहन और उनके बच्चे कांग्रेस के लिए वोट मांग रहे हैं वहीं कांग्रेस के अन्य नेता गांधी परिवार के प्रति अपनी स्वामिभक्ति व्यक्त करने के लिए एक-दूसरे से होड़ लेने में लगे हैं। प्रतिस्पद्र्धा में लगे इन नेताओं के ऐसे बयान सामने आ रहे हैं जो न केवल संवैधानिक मर्यादाओं को तोड़ते हैं, बल्कि लोकतंत्र के लिए भी खतरे की घंटी हैं। विधि एवं अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री सलमान खुर्शीद द्वारा पिछड़े वर्ग के लिए निर्धारित 27 प्रतिशत कोटे में से मुसलमानों के लिए 9 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा को चुनाव आयोग ने गंभीरता से लिया। आयोग ने खुर्शीद को आचार संहिता का पालन करने का निर्देश देते हुए सावधानी बरतने के लिए चेताया था, किंतु पिछले दिनों उन्होंने एक और चुनाव रैली को संबोधित करते हुए कहा, चुनाव आयोग भले ही मुझे फांसी पर चढ़ा दे, मैं मुसलमानों के अधिकारों के लिए लड़ता रहूंगा। खुर्शीद केंद्रीय विधि मंत्री हैं, इसलिए स्वाभाविक तौर पर उनसे संवैधानिक निकायों के प्रति सम्मान प्रकट करने की अपेक्षा की जाती है। उन्हें चुनाव आयोग की मर्यादा और प्रतिष्ठा की रक्षा करनी चाहिए। इससे पूर्व जब आयोग ने भारतीय जनता पार्टी की शिकायत पर आचार संहिता उल्लंघन करने का संज्ञान लिया था तब भी उन्होंने अमर्यादित टिप्पणी करते हुए कहा था कि आयोग को चुनाव के बेसिक फंडे की जानकारी ही नहीं है। चुनाव आयोग का बार-बार इस तरह उपहास उड़ाए जाने पर भी प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का मौन रहना यह दर्शाता है कि खुर्शीद को उनका समर्थन प्राप्त है। कांग्रेस में चाटुकारिता का बहुत महत्व है। केंद्रीय कोयला एवं खान मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल का हालिया बयान इसे रेखांकित करता है। पिछले दिनों पत्रकारों से बात करते हुए जायसवाल ने कहा, राहुल जब चाहें, देश के प्रधानमंत्री बन सकते हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने का सवाल कहां खड़ा होता है। वह इस राज्य में जो भी शासन देंगे उसके रिमोट कंट्रोल का सेंसर बहुत मजबूत होगा। केंद्र में स्थापित रिमोट कंट्रोल वाली व्यवस्था के कारण देश जिस बदहाली के दौर से गुजर रहा है उसको देखते हुए उत्तर प्रदेश का भविष्य सहज ही समझा जा सकता है। संविधान में रिमोट की कोई व्यवस्था नहीं है। 2004 के जनादेश के बाद संवैधानिक अड़चनों के कारण जब सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा टूटी तो पिछवाड़े से सत्ता की कमान थामे रखने के लिए इस तरह की अलोकतांत्रिक बुनियाद डाली गई। सोनिया के विदेशी मूल के कारण 2004 में कांग्रेस को समझौता करना पड़ा और एक नौकरशाह प्रधानमंत्री बने। लोकतंत्र के साथ किए गए इस नए प्रयोग का दुष्परिणाम यह हुआ कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पास पद तो है, पर शक्तियां नहीं। सोनिया गांधी संप्रग समन्वय समिति का अध्यक्ष बन सत्ता का रिमोट अपने पास रखे हुए हैं। इस विरोधाभास के कारण ही आज हमारे चारो ओर अव्यवस्था-कुशासन फैला है। सरकार में कायम नेतृत्वहीनता के कारण अर्थव्यवस्था दिशाहीन हो गई है। महंगाई बेलगाम है। नामचीन उद्योगपति सरकारी स्तर पर व्याप्त नेतृत्वहीनता को दूरकर अर्थव्यवस्था को संभालने की अपील कर रहे हैं। सरकार भ्रष्टाचार में डूबी है। यदि न्यायपालिका ने हस्तक्षेप नहीं किया होता तो न तो 2जी घोटाले के आरोपी तत्कालीन संचार मंत्री ए. राजा और न ही राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में लूट के कसूरवार कलमाड़ी सलाखों के पीछे पहंुचते। सीएजी की रिपोर्ट में दिल्ली की मुख्यमंत्री पर भी अनियमितता बरतने के आरोप हैं, किंतु सरकार ने उन्हें संरक्षण प्रदान कर रखा है। नेता प्रतिपक्ष के विरोध के बावजूद सरकार ने एक दागदार व्यक्ति को केंद्रीय सतर्कता आयुक्त बनाया था, जिसे अदालत के आदेश के बाद हटाना पड़ा। कैसी सरकार है यह और इसकी प्राथमिकताएं क्या हैं? आर्थिक, औद्योगिक और कृषि, तीनों क्षेत्रों में विकास की दर मंद है। राहुल गांधी पांच साल में उत्तर प्रदेश की सूरत बदल देने का दावा कर रहे हैं। वह विकास की आंधी से रोजगार के अवसरों की बाढ़ लाएंगे ताकि उत्तर प्रदेश के युवाओं को उनके बयान के अनुसार मुंबई और अन्य महानगरों में भीख मांगने के लिए नहीं जाना पड़े। जरा, केंद्रीय परियोजनाओं पर नजर डालें। आधारभूत संरचनाओं का विकास किए बिना किसी भी क्षेत्र में प्रगति करना संभव नहीं है। सरकार ने प्रतिदिन बीस किलोमीटर हाईवे बनाने का लक्ष्य रखा था, जबकि जमीनी वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। चालू केंद्रीय परियोजनाओं में से 65 प्रतिशत योजनाओं में इतनी देरी हो चुकी है कि तय लक्ष्य प्राप्त कर पाना सरकार के लिए असंभव हो गया है। देरी के कारण निर्माण सामग्री के दाम बढ़ जाने से सरकारी खजाने को 1800 करोड़ रुपये का चूना अलग लगा है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के प्रचार अभियान में आक्रामक तेवर लिए घूम रहे कांग्रेस के प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री राहुल गांधी उत्तर प्रदेश की बदहाली के लिए गैर-कांग्रेसी दलों को भले ही कोस रहे हों, किंतु क्या इसके लिए कांग्रेस की जवाबदेही अन्य दलों से बड़ी नहीं है? प्राय: समूचे देश में आजादी के बाद के चार दशक तक कांग्रेस का एकछत्र राज रहा है। व्यवस्था क्यों नहीं बदली? आज कांग्रेस मुसलमानों का मसीहा बनने का स्वांग कर रही है। पिछड़े वर्ग के लिए निर्धारित 27 प्रतिशत कोटे में से 4.5 प्रतिशत अल्पसंख्यक वर्ग के लिए तय करने की घोषणा कर कांग्रेस एक बार फिर मुसलमानों को ठगना चाहती है। मुसलमानों के कल्याण के लिए सच्चर कमेटी के बाद रंगनाथ मिश्र आयोग ने जो संस्तुतियां की थीं उनमें से कितनों को सरकार पूरा कर पाई? राहुल और सोनिया गांधी ने दावा किया है कि चुनाव बाद किसी भी दल से गठबंधन नहीं करेंगे, किंतु केंद्र में गठबंधन करने से परहेज क्यों नहीं किया? प्रधानमंत्री सरकार की अक्षमता के पीछे गठबंधन दलों का दबाव बताते आए हैं। एक जनहितैषी पार्टी होने का दावा करने वाली कांग्रेस राजनीतिक अवसरवाद को ज्यादा प्राथमिकता क्यों देती है? वस्तुत: जैसा कि स्वयं राहुल गांधी ने भी पिछले दिनों कहा, कांग्रेस की नजर इन दिनों धनुर्धर अर्जुन की तरह सिर्फ सत्ता पर केंद्रित है। पिछले 22 सालों से यूपी ने कांग्रेस को हाशिए पर डाल रखा है। उस खोए जन विश्वास को वापस पाने के लिए कांग्रेस जिस तरह संवैधानिक निकायों पर हमला कर रही है और संविधान की मूल भावना के खिलाफ जाकर वोट बैंक की राजनीति कर रही है उससे चुनावों में लाभ होना तो शायद संभव न हो, किंतु राष्ट्रहितों को क्षति पहुंचने का खतरा अवश्य है। (लेखक राज्यसभा सदस्य हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे