दिन रात मेहनत कर महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, दिल्ली को अमीर बनाने वालों से कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव राहुल गांधी ने अब यूपी की तस्वीर बदलने का आह्वान किया है। राहुल ने सोमवार को प्रतापगढ़ और फतेहपुर में चुनावी सभाओं में कहा कि बहुत नाटक हो गया। गैर कांग्रेसी सरकारों को दिया गया 22 साल कम नहीं है। जब तक यूपी अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो जाता, मैं यहां से हटने वाला नहीं हूं। राजग पर निशाना साधते हुए राहुल ने कहा कि गांवों में रोजगार नहीं था और 2004 के लोकसभा चुनाव में इंडिया शाइनिंग का नारा दिया जा रहा था। कांग्रेस की सरकार बनने पर मनरेगा के तहत गांव में 100 दिन के रोजगार दिया गया। हजारों करोड़ रुपया भेजे गए, लेकिन यूपी की मुख्यमंत्री मायावती ने इसको नाटक बताया। मुलायम सिंह रोजगार नहीं बेरोजगारी भत्ता देने की बात करते हैं। उन्होंने वादा नहीं काम करने में विश्वास रखने की बात करते हुए कहा कि राजग समेत विपक्ष भले ही विरोध कर रहा है, लेकिन भोजन के अधिकार की योजना को पास कराकर ही रहेंगे। इसके तहत हर गरीब परिवार को 33 किलो राशन मिलेगा। पूरे हिंदुस्तान में कोई भूखा नहीं रहने पाएगा। मुलायम पर निशाना साधते हुए कहा कि वे मुफ्त में बिजली देने की बात कर रहे हैं, जबकि हर कोई जानता है कि सपा की सरकार में बिजली नहीं मिली, बिल जरूर मुफ्त में आया।
Tuesday, February 14, 2012
मायावती के इशारे पर हुए यूपी में सभी घोटाले : कुशवाहा
कभी बसपा सुप्रीमो के बेहद करीबी रहे और एनआरएचएम घोटाले के घेरे में आने के बाद मंत्रिपद और पार्टी से निकाले गए उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा ने रविवार को प्रदेश के सभी घोटालों का सारा ठीकरा मुख्यमंत्री मायावती पर ही फोड़ दिया। उन्होंने यहां एक जनसभा में कहा कि यूपी में जो भी घोटाले हुए वे सब मायावती के इशारे पर हुए हैं। कुशवाहा के अनुसार उन्हें तो केवल ढाल की तरह उपयोग किया गया। जब फंसने लगीं तो उन पर कार्रवाई कर दी। उन पर जो आरोप लग रहे हैं वे निराधार हैं। सीबीआइ जांच में दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा। प्रशासन से सभा की अनुमति न मिलने पर कुशवाहा लोगों से घूम घूमकर मिले। बाद में पत्रकारों से कहा, मेरे सीने में बसपा शासनकाल के बहुत से राज छिपे हैं, जिन्हें समय आने पर उजागर करूंगा। बसपा को पिछड़ी जातियों की विरोधी बताते हुए कुशवाहा ने कहा कि केंद्र से साठगांठ करके पिछड़ों के 27 फीसदी आरक्षण में कटौती कराकर मुस्लिमों को दे दिया गया। भाजपा में शामिल होने पर बोले, मैंने भाजपा से खुद को अलग कर सवालों का जवाब दे दिया है।
सिर्फ वोट भुनाने का हथियार
पिछले दिनों सरकार ने पिछड़ा वर्ग के लिए निर्धारित 27 प्रतिशत कोटे में से 4.5 प्रतिशत आरक्षण अल्पसंख्यक समुदाय के पिछड़े वर्ग को आरक्षित करने की बात कही। हालांकि विधानसभा चुनावों के मद्देनजर निर्वाचन आयोग ने चुनाव संपन्न होने तक सरकार की मंशा पर पानी फेर दिया है। मगर सवाल यह है कि इस तरह का जाल फेंकना क्या रेखांकित क्या करता है? तमाम विपक्षी पार्टियों की नजर में सरकार का यह पैंतरा सीधे-सीधे कांग्रेस को चुनावी फायदा पहुंचाता नजर आ रहा है, लेकिन इस बारे में अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगा। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इससे मुस्लिम समाज को फायदा होगा? अगर मंडल आयोग की संस्तुतियों को देखा जाए तो पिछड़ी जातियों की कुल संख्या संपूर्ण आबादी की 52 प्रतिशत है। इसमें हिंदू, मुसलमान, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन सभी वर्गो की पिछड़ी जातियां शामिल हैं। इन सभी वर्गो के पिछड़ों को आरक्षण की परिधि में लाकर 27 प्रतिशत आरक्षण देने की बात कही गई थी। अब उसी आरक्षण में से 4.5 प्रतिशत आरक्षण अल्पसंख्यक समाज को दे देना समझ से परे है। इस आरक्षण का लाभ अत्यधिक पिछड़े मुस्लिम समाज के लोग कैसे उठा पाएंगे? इसका अधिकांश लाभ तो ईसाइयों और बौद्ध समुदाय को मिलता नजर आ रहा है। दरअसल, सरकार ने बड़ी ही चालाकी से विधानसभा चुनावों से पहले मुस्लिम समाज को ठगने का काम किया है ताकि मुस्लिम समाज का एकमुश्त वोट-बैंक कांग्रेस की झोली में आ गिरे, जबकि हकीकत यह है कि पंजाब में सिख समुदाय पर आरक्षण का लाभ मिलने का वादा किया गया तो गोवा में ईसाइयों पर दांव लगाया जाएगा। वहीं उत्तर प्रदेश में इसका केंद्र मुस्लिम बन गए हैं। हमेशा की ही तरह इस बार भी कांग्रेस की बाजीगरी मुस्लिमों को ठगने का काम कर रही है। ऐसे में मुस्लिमों के बीच यह सवाल प्रमुखता से उठ रहा है कि क्या उन्हें मात्र आरक्षण का झुनझुना चाहिए या वास्तव में उनके हितों तथा उनके सर्वागीण विकास के लिए ठोस और कारगर कदम उठाने होंगे? फिर देश में यह बहस भी शुरू हो गई है कि आरक्षण जब आजादी के 65 वर्षो बाद भी मुस्लिमों का भला नहीं कर पाया तो राजनीतिक शून्यता के इस दौर में आरक्षण से किसे और क्या फायदा होगा? एक और बड़ा मुद्दा यह कि क्या मजहब के आधार पर आरक्षण देना सही है? आजाद भारत में संविधान निर्माताओं ने हाशिए पर खड़े समाज के संरक्षण और उत्थान के लिए प्रावधान बनाए, मगर संविधान सभा में जब मजहब के आधार पर आरक्षण की मांग उठी तो सात में से पांच मुस्लिम सदस्यों मौलाना अबुल कलाम आजाद, मौलाना हिफजुर रहमान, बेगम एजाज रसूल, हुसैन भाई लालजी तथा तजामुल हुसैन ने इसका कड़ा विरोध करते हुए इसे राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए खतरा बताया था। वहीं 26 मई 1949 को संविधान सभा में जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, अगर आप अल्पसंख्यकों को ढाल देना चाहते हैं तो वास्तव में आप उन्हें अलग-थलग करते हैं..। हो सकता है कि आप उनकी रक्षा कर रहे हों, पर किस कीमत पर? ऐसा आप उन्हें मुख्यधारा से काटने की कीमत पर करेंगे। आज जब राहुल गांधी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आरक्षण की मांग उठाते हैं या सच्चर कमेटी की सिफारिशों को लागू कराने की बात करते हैं तो दुख होता है कि एक ऐसे नेता का प्रपौत्र मजहबी आरक्षण का हिमायती है, जो उसका हर स्थिति में विरोध करते थे। नेहरू ही क्यों, 1990 में जब वीपी सिंह की सरकार ने सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्गो के लिए 27 फीसदी आरक्षण का आदेश निकाला था, तब राजीव गांधी ने इसका जोरदार विरोध किया था। विपक्ष के नेता की हैसियत से 6 सितंबर 1990 को राजीव गांधी ने संसद में अपने भाषण में मंडल आयोग की संस्तुतियों को खत्म करने की मांग की थी। आज जब कांग्रेस सत्ता में है तो उसे अपनी ही पार्टी के नेता का आरक्षण विरोधी रवैया याद नहीं रहा। जिस मंडल आयोग की संस्तुतियों को खत्म करने की वकालत राजीव गांधी ने की थी, कांग्रेसी नेता आज उसी मंडल आयोग की संस्तुतियों का इस्तेमाल अल्पसंख्यक समाज खासकर मुस्लिम समाज को ठगने के लिए कर रहे हैं। वैसे भी मजहब के नाम पर आरक्षण का दुष्परिणाम यह रहा है कि आरक्षण का लाभ मुस्लिम समुदाय के क्रीमीलेयर ही उठा ले गए। अगर कांग्रेस वास्तव में मुस्लिम समाज की बेहतरी चाहती है तो सच्चर कमेटी तथा मिश्र आयोग की संस्तुतियों को पूर्णत: लागू करे तथा उनके प्रावधानों के अनुकूल मुस्लिमों को उचित लाभ दिलवाए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
बड़े चुनावी मुद्दे की आहट
चुनाव जनतंत्री महोत्सव हैं। चुनाव में जनगणमन अपने भाग्य विधाता चुनते हैं। भारत के 5 राज्य पंजाब, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर व उत्तर प्रदेश अपनी नई विधानसभाएं चुन रहे हैं। पंजाब में अकाली-भाजपा गठबंधन की प्रतिष्ठा को चुनौती है। उत्तराखण्ड में कांग्रेस व भाजपा के बीच सीधा टकराव है। गोवा की भी स्थिति कमोवेश ऐसी ही है। मणिपुर की स्थिति स्पष्ट नहीं है, लेकिन असली महाभारत है उत्तर प्रदेश में। कांग्रेस व भाजपा ने उत्तर प्रदेश को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया है और सपा, बसपा ने जीवनमरण का। राहुल गांधी ने चुनाव बाद भी यहीं काम करने का वायदा किया है। सोनिया परिवार के अन्य सदस्य प्रियंका व उनके पति भी यहीं डेरा डाले हैं। दिग्विजय सिंह तो खैर पहले से ही यहीं जमे हैं। पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, भाजपा प्रमुख नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती आदि नेता लगातार अभियान में हैं। दोनों राष्ट्रीय दलों ने सपा व बसपा से कोई गठबंधन न करने का ऐलान किया है। राहुल की ऐसी घोषणा का मजाक बना है। केंद्र में कांग्रेस, सपा व बसपा साथ-साथ हैं तो उत्तर प्रदेश में क्यों नहीं? भाजपा ने मायावती के साथ सरकार बनाई थी। भाजपा ने भविष्य में ऐसे किसी गठजोड़ से इंकार किया है, लेकिन बुनियादी सवाल दूसरे हैं। संविधान की उद्देशिका में सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक न्याय के संकल्प हैं। यहां पंथ, मजहब, आस्था और विचार स्वतंत्रता की गारंटी है, मजहबी आरक्षण की नहीं। केंद्र ने पिछड़े वर्गो के आरक्षण कोटे में से मुसलमानों के 4.5 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की है। कानून मंत्री ने इसे 9 प्रतिशत किए जाने का बयान दिया है। पिछड़ों का आरक्षण संविधान की उद्देश्यिका के सामाजिक आर्थिक व राजनीतिक न्याय के संकल्प की ही प्रतिभूति है। मुलायम सिंह पिछड़े वर्ग के हितैषी होने के दावेदार रहे हैं। कांशीराम का बहुजन समाज दलित और पिछड़ों से मिलकर ही बना था। सामाजिक न्याय मंत्री ने 2007 में राज्यसभा को बताया था कि कि राज्य पंचायतीराज की गणना 2001 के अनुसार यूपी में पिछड़े वर्गो के 7,02,54,083 लोग थे। आज 11 वर्ष बाद यह आबादी काफी बढ़ गई है, लेकिन पिछड़े वर्गो की हकतल्फी के इस सवाल पर सपा-बसपा की चुप्पी से राज्य की आधी आबादी गुस्से में है। भाजपा खुलकर इस वर्ग के साथ आ गई है। यूपी में पिछड़े वर्गो के मत निर्णायक हो गए हैं। उनकी भारी संख्या कोई भी गुल खिला सकती है। सामाजिक और आर्थिक न्याय बड़ा चुनावी मुद्दा है। भारत में जन्मना जातियां हैं। जाति आधारित आर्थिक व सामाजिक पिछड़ेपन भी हैं। संविधान निर्माताओं ने अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण के सीधे प्रावधान बनाए और पिछड़े वर्गो के लिए राष्ट्र-राज्य को अधिकार (अनु. 340) दिए। पिछड़े वर्गो के लिए पहला आयोग 1953 में बना। काका कालेकर आयोग ने 1955 में 2399 पिछड़ी जातियां चिह्नित कीं। उन्होंने इनमें 837 को वास्तविक पिछड़ा बताया। मंडल आयोग (1980) ने पिछड़ों की संख्या 52 प्रतिशत बताई। 2007 के राष्ट्रीय सैंपल सर्वेक्षण ने पिछड़ों की आबादी 40.94 प्रतिशत व अनुसूचित जातियों की 30.80 प्रतिशत आंकी, पर इससे मूल मुद्दे पर कोई फर्क नहीं पड़ता। सैंपल सर्वेक्षण के अनुसार 78 प्रतिशत पिछड़े व 79.8 प्रतिशत अनुसूचित जाति के लोग गांव में रहते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के पिछड़े 556.72 रुपये प्रतिमाह पर गुजारा करते हैं, वही अनुसूचित जाति के लोग 474.72 पर। पिछड़ों का 60.7 प्रतिशत कृषि कार्य से ही जुड़ा हुआ है। 30 प्रतिशत आबादी गावों में मजदूरी करती है। पिछड़े वर्गो की विशाल आबादी राष्ट्रीय उत्पादन में जमकर योगदान करती है, बावजूद इसके अल्पसंख्यकवादी राजनीति श्रमशील अभावग्रस्त विशाल पिछड़े समूह की उपेक्षा कर रही है। उत्तर प्रदेश के चुनावों से उठा यह सवाल भविष्य की राष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित करने वाला है। उत्तर प्रदेश में पिछड़े वर्गो की 79 जातियां हैं। आर्थिक आधार पर पिछड़े वर्गो की खोज और उन्हें विशेष सहायता देने की आवश्यकता है। नेशनल सैंपल सर्वेक्षण के अनुसार उत्तर प्रदेश में पिछड़ों की 54.64 प्रतिशत आबादी ग्रामीण है। यहां लगभग चालीस वर्ष तक कांग्रेस का ही राज रहा। मायावती ने सात वर्ष, मुलायम सिंह ने लगभग साढ़े पांच वर्ष राज किया। बसपा राज का भ्रष्टाचार संवैधानिक संस्थाओं के लिए भी आश्चर्यजनक रहा। सपा सरकार ने भी मनमानी की। राजनाथ सिंह ने अतिपिछड़ों व अतिदलितों को आरक्षण का वास्तविक लाभ दिलाने के लिए 2000 में कानून बनाया। सपा ने विरोध किया। बसपा ने उलट दिया। कांग्रेस ने पिछड़ों के ही कोटे में मुस्लिम आरक्षण की घोषणा की। सो चुनाव में पिछड़े वर्गो का मुद्दा ही ऊपर है। उत्तर प्रदेश का चुनाव राष्ट्रीय राजनीति के लिए महत्वपूर्ण हो गया है। मूलभूत मुद्दे अल्पकालिक ही नहीं होते। सामाजिक न्याय व मजहबी सांप्रदायिकता के प्रश्न अंग्रेजीराज से भी पुराने हैं। अंग्रेजों ने 1871 में हंटर कमेटी से ऐसे ही निष्कर्ष निकलवाए थे। मजहबी आरक्षण बनाम सामाजिक न्याय का प्रश्न संविधान सभा के सामने भी था। सभा ने सरदार पटेल की अध्यक्षता में अल्पसंख्यकों, मूलाधिकारों संबंधी समिति बनाई थी। समिति ने रिपोर्ट में कहा कि स्थितियां बदल चुकी हैं, अब यह उचित नहीं है कि मुस्लिमों या किसी भी धार्मिक अल्पसंख्यक के लिए कोई स्थान रक्षण रहे। संविधान सभा व नेहरू कांग्रेस ने ही मजहबी अल्पसंख्यक आरक्षण की समाप्ति व दलितों-पिछड़ों को विशेष अवसर का निर्णय लिया था, लेकिन सोनिया कांग्रेस ने अल्पसंख्यकवाद चलाया। प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय संसाधनों पर मुसलमानों का पहला हक बताया है। सच्चर कमेटी से कहलवाया कि मुसलमानों की हालत अनुसूचित जातियों से भी बदतर है। रंगनाथ मिश्र आयोग ने कांग्रेसी इच्छा के अनुरूप पिछड़ों के कोटे से ही मुसलमानों को 10 प्रतिशत आरक्षण की संस्तुति की थी। केंद्र ने वही कर दिखाया। पिछड़े वर्ग की हकतल्फी का प्रश्न यूपी की सीमा लांघकर अखिल भारतीय मुद्दा बने तो आश्चर्य क्या है? जाति अपमान या वर्ग भेद से राष्ट्र नहीं बनते। सैंपल सर्वे के अनुसार देश में अनुसूचित जाति-जनजाति व पिछड़े वर्गो की आबादी 70 प्रतिशत है। सर्वेक्षण में तमिलनाडु, बिहार, केरल व यूपी में 50 प्रतिशत आबादी पिछड़े वर्गो की है। यह तमिलनाडु में 74.4, बिहार में 59.39 व केरल में 62.88 प्रतिशत आंकी गई है और उत्तर प्रदेश में लगभग आधी। राष्ट्र बहुमत आबादी वाली महाशक्ति की उपेक्षा और अल्पसंख्यक तुष्टीकरण से महाशक्ति नहीं बन सकता। उत्तर प्रदेश के चुनाव से उठा यह मुद्दा लोकसभा चुनाव में और बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बनेगा। सोनिया-राहुल को इसका उत्तर देना है। (लेखक उप्र विधान परिषद के सदस्य हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे
Tuesday, January 24, 2012
यूपी में सपा की सरकार बनी तो मुलायम गुंडों की नकेल कसेंगे
सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने यहां कहा कि पार्टी जो कहती है, करती है। प्रदेश में उनकी सरकार बनी तो गुंडई पर नकेल कसी जाएगी। इस दौरान उन्होंने राज्य की माया सरकार पर जमकर हमला बोला। उन्होंने कहा कि पांच साल की बसपा सरकार के पास कुछ यादगार नहीं है। इसके पहले सपा की सरकार थी। हमारी उपलब्धियां इतनी है कि गिनाने में वक्त कम पड़ जाए। हमारा नारा रहा लाठी गोली की सरकार नहीं चलेगी। यादव रविवार को यहां जनसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि बसपा सरकार में एक लाख सपाइयों पर गंभीर धाराओं में फर्जी मुकदमे लिखे गए। बसपा के निशाने पर सिर्फ सपा के लोग रहे। बेगुनाहों को परेशान किया गया। ये मुकदमे वापस लिए जाएंगे। उन्होंने कहा कि सपा सरकार ने चीनी मिलें लगवाई, बसपा ने उन्हें बंद करा दिया, उनकी संपत्ति व जमीन दाम पर बेच दी। हमने गन्ने की वाजिब कीमत दी, अब किसान बेहाल हैं। हमने जिन 25 हजार नौजवानों को पुलिस में रोजगार दिया, सत्ता में आते ही बसपा ने उन्हें बेरोजगार कर दिया। दलित हितैषी बनने वाली इस सरकार को शायद नहीं मालूम इनमें 25 फीसदी दलित थे। उन्होंने बसपा का पूरी तरह सफाया कर सपा को पूर्ण बहुमत से सरकार में लाने की वकालत की। कहा कि सपा सत्ता में आई तो न सिर्फ इलाज मुफ्त होगा, बल्कि गंभीर रोगों के इलाज का खर्च भी सरकार उठाएगी। बीए तक लड़का हो या लड़की, सभी को मुफ्त शिक्षा की व्यवस्था होगी। प्रयास होगा कि लड़कियों की पूरी शिक्षा मुफ्त हो। गरीब छात्रों को वजीफा और बेरोजगार को बेरोजगारी भत्ता छह से बढ़ाकर 12 हजार किया जाएगा। नलकूप से सिंचाई मुफ्त होगी। गरीब किसानों को बिजली मुफ्त दी जाएगी। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि सभी वोट अवश्य डालें। कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि दूसरे प्रदेश में कांग्रेस की सरकार समाप्त कर वे सिर्फ बयानबाजी कर रहे हैं।
वायदों के भंवरजाल में राजनीति
कभी उत्तर प्रदेश में कंप्यूटर और अंग्रेजी शिक्षा का विरोध करने वाली समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश के मौजूदा विधानसभा चुनाव में अपने घोषणा पत्र में दसवीं पास छात्रों को टैबलेट और बारहवीं पास छात्रों को मुफ्त लैपटॉप देने का वादा किया है। वायदों की झड़ी यहीं आकर नहीं रूकी, समाजवादी पार्टी ने दसवीं पास मुस्लिम छात्राओं को 30 हजार रुपये, छात्रों को मुफ्त चिकित्सा, एक हजार रुपये, बेरोजगारी भत्ता और किसानों को मुफ्त पानी और बिजली देने का भी ऐलान कर दिया। मुफ्त लैपटाप देने की घोषणा उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने की तो पंजाब में अकालियों ने भी अपने चुनावी घोषणा पत्र में मुफ्त लैपटॉप देने का वादा कर दिया। मुफ्त लैपटॉप, मुफ्त टैबलेट, मुफ्त बिजली और पानी जैसी चुनावी घोषणाएं अब तक तमिलनाडु जैसे राज्यों में सुनने को मिलती थी, लेकिन दक्षिण भारतीय राजनीति के लोक लुभावन प्रलोभन ने अब उत्तर भारत की राजनीति में भी दस्तक दे दी है। सवाल उठता है कि मुफ्त लैपटॉप और मुफ्त टैबलेट देकर क्या हम किसी राज्य की शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त कर सकते हैं? क्या इस तरह की घोषणाओं से उत्तर प्रदेश या पंजाब में छात्र सूचना प्रौद्योगिकी में महारत हासिल कर लेंगे? क्या बेरोजगारी भत्ता देकर किसी प्रदेश में बेरोजगारी की समस्या का हल निकाला जा सकता है, इत्यादि। हालात ये हैं कि देश में पैसा देकर भी किसानों को बिजली हासिल नहीं हो रही है तो ऐसे में किसानों को मुफ्त बिजली और पानी देने जैसे वायदों का क्या औचित्य है। पिछले साल तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों ने कुछ ऐसे ही वायदों की बौछार कर दी थी। चुनाव जीतने पर कोई लैपटाप देने की बात कर रहा था तो कोई विवाहित महिलाओं के गले में सोने के मंगलसूत्र देने का ऐलान कर रहा था। भले ही ऐसे राज्यों में गरीबों को दो जून की रोटी भी नहीं मिले, लेकिन इन राज्यों में गरीबों को मुफ्त अनाज देने का वादा पिछले कई चुनावों से किया जा रहा है। चुनावी राजनीति के इन खोखले वादों की असलियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दक्षिण भारत के इस राज्य में किसानों को मुफ्त मिनरल वाटर दिए जाने का भी ऐलान किया गया था। दक्षिण भारत के इन राज्यों में नेताओं का राजनीति के साथ-साथ कारोबार का सिलसिला जमकर चलता है, लेकिन आम आदमी आज भी गरीबी और भुखमरी की मार से पीडि़त है। आम जनता से वायदा करने में कोई एक दल नहीं बल्कि सभी राजनीतिक दल शामिल हैं जबकि हकीकत में आम लोगों की मुश्किलों को दूर करने में जमीनी स्तर पर कोई प्रयास नहीं किए जाते। आखिर कब तक राजनीतिक दल चाशनी में लिपटी योजनाओं को अपने चुनावी घोषणा पत्र में शामिल करके आम जनता को धोखा देते रहेंगे? देश की आधी आबादी को अब भी भरपेट भोजन या पौष्टिक आहार नहीं मिलता, लेकिन राजनीतिक दलों को चुनावी घोषणाओं से किसी तरह का कोई परहेज नहीं है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अभी कुछ दिनों पहले कुपोषण पर नाराजगी जताते हुए इसे राष्ट्रीय शर्म करार दिया था। इससे संबंधित रिपोर्ट जारी करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि देश में 42 फीसदी बच्चे कम वजन के पैदा होते हैं। विश्व बैंक के 1998 के आंकड़ों के मुताबिक भारत कुपोषण के मामले में बांग्लादेश के बाद दूसरे नंबर पर आता है और जन्म के समय कम वजन के बच्चे सबसे ज्यादा भारत में ही पैदा होते हैं। तमाम साक्षरता मिशन लागू करने के बाद अब भी हम लोग सौ फीसदी साक्षरता के लक्ष्य को हासिल नहीं कर सके हैं। कांग्रेस पार्टी के सभी बड़े नेता इन दिनों उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड जैसे राज्यों में जाकर भ्रष्टाचार पर लंबी-चौड़ी बातें कर रहे हैं। प्रदेश में सरकार बन जाने पर बड़े-बड़े वादे और प्रदेश की पूरी तस्वीर बदलने की बात कर रहे हैं, लेकिन जनता जानना चाहती है कि आखिर केंद्र में इतने लंबे समय तक शासन करने के बाद देश के हालात में सकारात्मक सुधार क्यों नहीं हुआ? आजादी के इतने वर्षो के बाद भी अगर देश में लोग कुपोषण के शिकार हो रहे हैं तो इसके लिए किसकी जिम्मेदारी बनती है? लोगों को दो जून की रोटी और घर का चौका-चूल्हा जलाने के लिए काम की तलाश है और समाजवादी पार्टी और अकाली दल जैसे राजनीतिक दल राज्य के विकास के लिए कुछ ठोस योजनाओं की बात करने की बजाय मुफ्त लैपटाप और मुफ्त टैबलेट देने का वायदा कर रहे हैं। इसमें कोई दो मत नहीं कि पंचायती राज से गांवों के हालात में कुछ सुधार हुआ है, लेकिन इन पंचायत चुनावों में झूठे वायदों के साथ ही लोग मतदाताओं को नकली सामान देकर भी वोट हासिल करने की कोशिश करते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनावों में दलित बस्ती के कुछ लोगों का कहना था कि किसी प्रत्याशी ने इन इलाकों में सोने की पॉलिश लगे जेवरों को असली बताकर मतदाताओं के बीच में बांट दिया और चुनाव के बाद इन लोगों को पता चला कि ये जेवर सोने के नही हैं। दरअसल, चुनाव चाहे पंचायत या नगरीय निकायों के हों अथवा फिर लोकसभा या विधानसभा के ज्यादातर राजनीतिक दल सतही चुनावी घोषणाओं के जरिये जनता का भरोसा हासिल करने की कोशिश करते हैं। कुछ ऐसा ही हाल इन दिनों राज्य विधानसभा चुनावों में भी देखने को मिल रहा है। यही वजह है कि तमाम राजनीतिक दल आम जनता को यह यकीन दिलाने में लगे हैं कि अगर प्रदेश में उनकी सरकार बन जाए तो राज्य में हालात पूरी तरह बदल जाएंगे। पिछड़े और अल्पसंख्यकों की समस्याओं से भले ही इन राजनीतिक दलों को कोई सरोकार नहीं हो, लेकिन चुनाव आते ही हर दल अपने-अपने हिसाब से आरक्षण का राग अलापना शुरू कर देता है। किसी को सच्चर कमेटी की रिपोर्ट याद आती है तो कोई रंगनाथ मिश्र आयोग की बात करता है। कुल मिलाकर सभी का मकसद एक ही रहता है, समाज के एक खास तबके का वोट उसके ही खाते में जाएं। राजनीतिक दलों को यह बात समझनी होगी कि काठ की हांडी को बार बार चुनावी चूल्हे पर नहीं चढ़ाया जा सकता। चुनावी वायदों की हकीकत को जनता समझने लगी है। समाज के कमजोर और पिछड़े तबकों को आरक्षण के झुनझुने की नहीं अवसर की तलाश है। राज्य के युवाओं को बेरोजगारी भत्ते की नहीं, बल्कि स्थाई रोजगार की जरूरत है। युवाओं के भविष्य के लिए यह जरूरी है कि उन्हें कंप्यूटर और आधुनिक संचार से जुड़े माध्यमों की जानकारी हो, लेकिन मुफ्त लैपटाप और मुफ्त टैबलेट देने से पहले हमें सरकारी स्कूल और कॉलेजों में पढ़ाई-लिखाई के स्तर को सुधारने की ज़रूरत है। किसानों के लिए बड़े-बड़े वायदों को करने के बजाय जरूरत इस बात की है कि बिचौलियों का खात्मा हो और किसानों को उनकी फसलों के वाजिब दाम मिले। आज आवश्यकता इस बात की है कि राष्ट्रीय राजनीतिक दल हों या क्षेत्रीय पार्टियां, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में सभी राजनीतिक दलों को अपनी जिम्मेदारियों का अहसास होना चाहिए। बेशक राजनीतिक दल समाज में कमजोर और पिछड़े तबकों की मदद के लिए नई घोषणाओं का ऐलान करें, लेकिन मदद का मकसद समाज के इस तबके को आजीवन बैसाखी थमाना नहीं होना चाहिए। जरूरत इस बात की है कि गरीबी रेखा के नीचे जीवन गुजर-बसर कर रहे समाज के कमजोर और पिछड़े लोगों को अपने पैरों पर खड़े होने का अवसर मिलना चाहिए ताकि वह भी पूरे आत्मसम्मान के साथ समाज और देश के विकास में भागीदार बने सकें। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Saturday, January 7, 2012
यूपी में आपराधिक प्रवृत्ति के 77 उम्मीदवार
जरायम की दुनिया के बाद 77 लोग खादी पहनने की तैयारी में हैं। यूपी में इन उम्मीदवारों ने ताल ठोंक दी है। इनमें विभिन्न पार्टियों के 38 ऐसे उम्मीदवार हैं, जो गंभीर आपराधिक मामलों में आरोपित हैं। यूपी में प्रमुख राजनीतिक पार्टियों ने अभी तक 617 उम्मीदवारों की सूची जारी की है। एडीआर (एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफार्मस) ने सर्वे किया तो यह हकीकत सामने आई। गंभीर आरोप वाले उम्मीदवारों की सूची में भाजपा व कांग्रेस के 13-13 और सपा के 12 उम्मीदवार हैं। एडीआर का दावा है कि इन पर हत्या, हत्या के प्रयास, डकैती, चोरी व अपहरण जैसे संगीन आरोप हैं। भाजपा ने अब तक 220 उम्मीदवारों की सूची जारी की है। इनमें 26 अपराधिक पृष्ठभूमि के हैं। कांग्रेस के 215 उम्मीदवारों की सूची में 26 पर अपराधिक मामले हैं और 13 के खिलाफ गंभीर आरोप लंबित हैं। सपा के 165 उम्मीदवारों में से 24 पर अपराध की छाया है। अपराधियों को टिकट देने के सवाल पर सभी दलों का यही तर्क है कि जब तक अदालत से अपराध सिद्ध न हो जाए, किसी को अपराधी कहना उचित नहीं है। इन पर लंबित हैं सर्वाधिक मामले यूपी में 403 विधायकों में से 143 पर अपराधिक मामले लंबित हैं। यानी 35 फीसदी विधायक अपराधिक प्रवृत्ति के हैं। बीएसपी में सर्वाधिक 17 और सपा के 16 विधायकों पर गंभीर अपराधिक मामले लंबित हैं। इनमें धीरेंद्र प्रताप सिंह पर 29, सुशील कुमार पर 14, राम प्रकाश यादव पर 11, जितेंद्र सिंह उर्फ बबलू पर 12 तथा मुख्तार अंसारी पर 13 मामले लंबित हैं। करोड़पति हैं 127 विधायक एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक मौजूदा समय में 127 विधायक करोड़पति हैं। इनमें सबसे ज्यादा बीएसपी के 51, सपा के 38, बीजेपी के 16 और बाकी अन्य पार्टियों के हैं। सर्वाधिक संपत्ति वाले विधायकों में गोंडा के अजय प्रताप सिंह उर्फ लल्ला भइया, इलाहाबाद के नंद गोपाल गुप्ता उर्फ नंदी, बदायूं में बिसौली के उमलेश यादव, बदायूं में सहसवां के विधायक डीपी यादव, उन्नाव के दीपक कुमार, रामपुर के नवाब काजिम अली खान उर्फ नावेद मियां, मेरठ के लाखीराम नागर, संत रविदास नगर के विजय कुमार, सुल्तानपुर में अमेठी की अमिता सिंह और बागपत से विधायक कौकब हमीद खान अमीर विधायकों की सूची में शामिल हैं।
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