बाबा रामदेव द्वारा भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन की घोषणा करने के तुंरत बाद ही केंद्र सरकार हरकत में आ गई थी। आंदोलन की शुरुआत से पहले ही सरकार ने इस मामले की गंभीरता को समझते हुए बाबा रामदेव के साथ अपनी बातचीत भी शुरु कर दी थी। अपनी इसी नीति के तहत दिल्ली हवाई अड्डे पर भारत सरकार के चार मंत्रियों और कुछ वरिष्ठ नौकरशाहों ने बाबा रामदेव द्वारा उठाए गए मुद्दों पर लंबी बात की। सरकार ने बाबा के साथ उनका सत्याग्रह शुरु होने के बाद भी दूसरे दौर की बात की थी। बाबा और सरकार के बीच हुई बातचीत में दोनों तरफ से यह दावा किया गया कि 90 प्रतिशत से ज्यादा मुद्दों पर उनकी सहमति बन गई है और इस बारे में दोनों ही पक्षों द्वारा मीडिया को भी तत्काल ही सूचित कर दिया गया। सहमति के करीब-करीब पहुंचे आंदोलन के संयोजकों और सरकार के बीच अचानक तनाव इस कदर बढ़ा कि सरकार ने शांतिपूर्वक चलने वाले इस आंदोलन को दमनचक्र चलाकर कुचल दिया। इस दमन के विरुद्व जनहित को देखते हुए तत्काल संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सरकार और संबंधित विभागों से जवाब मांगा है। अन्ना हजारे और उसके बाद बाबा रामदेव द्वारा भ्रष्टाचार के विरुद्व छेड़े गए इस आदोलन के चलते देश में भ्रष्टाचार विरोधी महौल बनने लगा था। इसी से ध्यान हटाने के मकसद से कांग्रेस पार्टी और सरकार से जुड़े कुछ लोगों ने एक गैर-राजनीतिक जनता के आंदोलन को राजनीतिक रंग देने में कोई कसर नही छोड़ी। सरकार ने अपनी गलती को छिपाने के लिए कभी इसे भाजपा तसे कभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ जोड़ने की कोशिश की। यहां समझने वाली बात यह है कि अगर यह संघ का आंदोलन होता तो क्या दिल्ली का कैथोलिक चर्च रामदेव के साथ मंच साझा करता? दिल्ली कैथोलिक चर्च के प्रवक्ता फादर डोमनिक इमैनुएल, दिल्ल्ी कैथोलिक आर्च डायसिस के आर्च बिशप विंसेंट कांसिसियों के बेहद करीबी और सरकार द्वारा सांप्रदायिकता विरोधी पुरस्कार से नवाजे गए यह पादरी ऐसे मंच पर कभी नहीं जाते जिस पर संघ की परछाई भी नजर आती। यहां यदि यह मान भी लिया जाए कि बाबा रामदेव को संघ का समर्थन है तो क्या हुआ? आखिर संघ भी तो एक सामाजिक संगठन ही है और अगर वह इस तरह के किसी अभियान को अपना समर्थन देता है तो उसमें सरकार के लिए परेशानी वाली क्या बात हो सकती है। संघ जयप्रकाश नारायण की संर्पूण क्रांति और वीपी सिंह के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों को भी पूर्व में समर्थन दे चुका है। सरकार ने तब क्यों नहीं विरोध किया जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने समाजसेवी अन्ना हजारे के आंदोलन को अपना समर्थन दिया था। इसका मतलब यह तो नहीं है कि इन आंदोलनों का नेतृत्व करने वाले लोग संघ के स्वयंसेवक हो गए। सरकारी डंडे की ताकत से दिल्ली से खदेड़ दिए गए बाबा रामदेव हरिद्वार में भी अपना अनशन जारी रखे हुए है तो क्या सरकार उन्हें देश से बाहर फेंक देगी। सरकार और बाबा के बीच तनाव बना हुआ है और बातचीत का सिलसिला रुक गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने बाबा रामदेव और केंद्र सरकार के बीच बातचीत दोबारा शुरू करने की मांग की है। सरकार भी बार बार यह कह रही है कि वह भ्रष्टाचार पर गंभीर है और अन्ना हजारे के साथ वह लोकपाल बिल बनाने को संकल्पबद्ध है। काले धन को वापस लाने के प्रयास हो रहे है। सरकार यह भी कह रही है कि बाबा रामदेव के साथ उनकी मांगों पर लगभग सहमति बन गई थी तो फिर सवाल है कि आखिर समस्या क्या है और क्यों बाबा को अपना अनशन जारी रखना पड़ रहा है। आंदोलनकारी निर्दोष लोगों पर हुई दमनत्मक कार्यवाही पर सुप्रीम कोर्ट ने जो संज्ञान लिया है उम्मीद की चाहिए कि उसका सरकार पर कुछ न कुछ असर अवश्य पड़ेगा। बाबा रामदेव ने अपनी तरफ से पहल करते हुए व्यक्तिगत रूप से सरकार को क्षमा करने की बात कहकर सकारात्मक संकेत दिए हैं। मेरा मानना है कि इस पहल का लाभ उठाते हुए सरकार को बातचीत दोबारा शुरू करने के लिए फिर से विचार करना चाहिए। सिविल सोसाइटी के लोगों के साथ बातचीत का सिलसिला किसी भी हाल में रुकना नहीं चाहिए, क्योंकि इस मुद्दे का समाधान बातचीत से ही निकलेगा। इसलिए बेहतर यही होगा कि नए सिरे से बातचीत शुरू की जाए।
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Wednesday, June 15, 2011
बातचीत नहीं रुकनी चाहिए
बाबा रामदेव द्वारा भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन की घोषणा करने के तुंरत बाद ही केंद्र सरकार हरकत में आ गई थी। आंदोलन की शुरुआत से पहले ही सरकार ने इस मामले की गंभीरता को समझते हुए बाबा रामदेव के साथ अपनी बातचीत भी शुरु कर दी थी। अपनी इसी नीति के तहत दिल्ली हवाई अड्डे पर भारत सरकार के चार मंत्रियों और कुछ वरिष्ठ नौकरशाहों ने बाबा रामदेव द्वारा उठाए गए मुद्दों पर लंबी बात की। सरकार ने बाबा के साथ उनका सत्याग्रह शुरु होने के बाद भी दूसरे दौर की बात की थी। बाबा और सरकार के बीच हुई बातचीत में दोनों तरफ से यह दावा किया गया कि 90 प्रतिशत से ज्यादा मुद्दों पर उनकी सहमति बन गई है और इस बारे में दोनों ही पक्षों द्वारा मीडिया को भी तत्काल ही सूचित कर दिया गया। सहमति के करीब-करीब पहुंचे आंदोलन के संयोजकों और सरकार के बीच अचानक तनाव इस कदर बढ़ा कि सरकार ने शांतिपूर्वक चलने वाले इस आंदोलन को दमनचक्र चलाकर कुचल दिया। इस दमन के विरुद्व जनहित को देखते हुए तत्काल संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सरकार और संबंधित विभागों से जवाब मांगा है। अन्ना हजारे और उसके बाद बाबा रामदेव द्वारा भ्रष्टाचार के विरुद्व छेड़े गए इस आदोलन के चलते देश में भ्रष्टाचार विरोधी महौल बनने लगा था। इसी से ध्यान हटाने के मकसद से कांग्रेस पार्टी और सरकार से जुड़े कुछ लोगों ने एक गैर-राजनीतिक जनता के आंदोलन को राजनीतिक रंग देने में कोई कसर नही छोड़ी। सरकार ने अपनी गलती को छिपाने के लिए कभी इसे भाजपा तसे कभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ जोड़ने की कोशिश की। यहां समझने वाली बात यह है कि अगर यह संघ का आंदोलन होता तो क्या दिल्ली का कैथोलिक चर्च रामदेव के साथ मंच साझा करता? दिल्ली कैथोलिक चर्च के प्रवक्ता फादर डोमनिक इमैनुएल, दिल्ल्ी कैथोलिक आर्च डायसिस के आर्च बिशप विंसेंट कांसिसियों के बेहद करीबी और सरकार द्वारा सांप्रदायिकता विरोधी पुरस्कार से नवाजे गए यह पादरी ऐसे मंच पर कभी नहीं जाते जिस पर संघ की परछाई भी नजर आती। यहां यदि यह मान भी लिया जाए कि बाबा रामदेव को संघ का समर्थन है तो क्या हुआ? आखिर संघ भी तो एक सामाजिक संगठन ही है और अगर वह इस तरह के किसी अभियान को अपना समर्थन देता है तो उसमें सरकार के लिए परेशानी वाली क्या बात हो सकती है। संघ जयप्रकाश नारायण की संर्पूण क्रांति और वीपी सिंह के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों को भी पूर्व में समर्थन दे चुका है। सरकार ने तब क्यों नहीं विरोध किया जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने समाजसेवी अन्ना हजारे के आंदोलन को अपना समर्थन दिया था। इसका मतलब यह तो नहीं है कि इन आंदोलनों का नेतृत्व करने वाले लोग संघ के स्वयंसेवक हो गए। सरकारी डंडे की ताकत से दिल्ली से खदेड़ दिए गए बाबा रामदेव हरिद्वार में भी अपना अनशन जारी रखे हुए है तो क्या सरकार उन्हें देश से बाहर फेंक देगी। सरकार और बाबा के बीच तनाव बना हुआ है और बातचीत का सिलसिला रुक गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने बाबा रामदेव और केंद्र सरकार के बीच बातचीत दोबारा शुरू करने की मांग की है। सरकार भी बार बार यह कह रही है कि वह भ्रष्टाचार पर गंभीर है और अन्ना हजारे के साथ वह लोकपाल बिल बनाने को संकल्पबद्ध है। काले धन को वापस लाने के प्रयास हो रहे है। सरकार यह भी कह रही है कि बाबा रामदेव के साथ उनकी मांगों पर लगभग सहमति बन गई थी तो फिर सवाल है कि आखिर समस्या क्या है और क्यों बाबा को अपना अनशन जारी रखना पड़ रहा है। आंदोलनकारी निर्दोष लोगों पर हुई दमनत्मक कार्यवाही पर सुप्रीम कोर्ट ने जो संज्ञान लिया है उम्मीद की चाहिए कि उसका सरकार पर कुछ न कुछ असर अवश्य पड़ेगा। बाबा रामदेव ने अपनी तरफ से पहल करते हुए व्यक्तिगत रूप से सरकार को क्षमा करने की बात कहकर सकारात्मक संकेत दिए हैं। मेरा मानना है कि इस पहल का लाभ उठाते हुए सरकार को बातचीत दोबारा शुरू करने के लिए फिर से विचार करना चाहिए। सिविल सोसाइटी के लोगों के साथ बातचीत का सिलसिला किसी भी हाल में रुकना नहीं चाहिए, क्योंकि इस मुद्दे का समाधान बातचीत से ही निकलेगा। इसलिए बेहतर यही होगा कि नए सिरे से बातचीत शुरू की जाए।
बाबा के खिलाफ दिग्विजय की जुबानी हिंसा
दिल्ली के रामलीला मैदान में सत्याग्रहियों पर ढ़ाए गए जुल्म की हर तरफ हो रही आलोचना से बेपरवाह केंद्र की संप्रग सरकार देश से माफी मांगने के बजाए अपने भोथरे तर्क से यह सिद्ध करने में जुटी है कि उसने सत्याग्रहियों के साथ जैसा भी सलूक किया वह अनुचित नहीं था और वे इसी के हकदार थे। दूसरी ओर दस जनपथ के अत्यंत करीबी कांग्रेसी महासचिव दिग्विजय सिंह सत्याग्रहियों पर हुई बर्बरता पर संवेदना जताने की बजाय लोगों का मानमर्दन और पगड़ी उछालने का काम कर रहे हैं। अपने राजनीतिक विरोधियों को नीचा दिखाने के लिए वह जिस भाषा का प्रयोग कर रहे हैं उसे लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता है। दिग्विजय सिंह के सियासी आचरण और फिसलती जुबान को देखकर नहीं लगता है कि उनमें देश की सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी के एक जिम्मेदार महासचिव होने की तनिक भी मर्यादा बची है। विश्व के सर्वाधिक वांछित आतंकवादी ओसामा-बिन-लादेन को ओसामाजी कहकर पुण्य लाभ बटोरने वाले दिग्विजय सिंह से पूछा जा सकता है कि आखिर उन्हें देश का हर भगवाधारी संत और समाज सुधारक ठग और आतंकी ही क्यों नजर आता है और हर आतंकवादी अपना भाई-बंधु क्यों? दिग्विजय सिंह की देशभक्ति और राजनीतिक गंभीरता किसी से छिपी नहीं है। वह चाहे जितना ढिंढोरा पीटें, लेकिन उनकी असलियत देश के सामने आ ही चुकी है। बात चाहे दिल्ली के बाटला हाउस कांड की हो या मुंबई पर आतंकी हमले की, दिग्विजय सिंह का बयान देश के लोगों को कभी रास नहीं आया, बल्कि तकलीफदेह ही रहा। इंस्पेक्टर एमसी शर्मा और हेमंत करकरे जैसे वीर जवानों की शहादत पर भी वह राजनीति करने से बाज नहीं आए। सियासी फायदे के लिए आजमगढ़ के संजरपुर गांव जाकर आतंकियों के आगे घडि़याली आंसू बहाना उनकी फरेबी सियासत की महज एक बानगी भर है। देश में होने वाली हर आतंकी घटना का रिश्ता-नाता हिंदू संगठनों से जोड़ने की उनकी कुप्रवृत्ति यह बताने के लिए काफी है कि हिंदू जनमानस और भारतीय संस्कृति को लेकर उनके मन में कितना जहर भरा हुआ है। समझ में नहीं आता है कि हिंदू संगठनों को बदनाम करने का ठेका उठा रखे दिग्विजय सिंह की जुबान उस वक्त क्यों खामोश हो जाती है जब नई दिल्ली में कश्मीरी अलगाववादियों के नेता गिलानी और नक्सलियों की पैरोकार अरुंधती राय जैसे लोग सरकार की बांह मरोड़कर निकल जाते हैं। देखा यही जा रहा है कि दिग्विजय सिंह सत्ता के अहंकार में हिंदू संगठनों, समाजसेवियों और विपक्षी दलों के खिलाफ लगातार जहर उगल रहे हैं। हाल ही में उन्होंने सारी राजनीतिक मर्यादाओं को ताक पर रखकर देश के मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी को एक नचैया पार्टी कह दिया। सवाल उठता है कि क्या इस तरह का शर्मिंदगी भरा बयान एक जिम्मेदार राजनीतिक व्यक्ति का हो सकता है? उनके जैसे व्यक्ति इस तरह की उम्मीद तो नहीं ही की जा सकती। वैसे सुषमा स्वराज ने दिग्विजय सिंह को गुलामी की मानसिकता से ग्रस्त व्यक्ति बताकर अपना हिसाब-किताब बराबर कर लिया है। इसी तरह दिग्विजय सिंह ने बाबा रामदेव के सहयोगी आचार्य बालकृष्ण के बारे में भी अनाप-शनाप आरोप लगाए। उन्होंने यहां तक कह डाला कि बालकृष्ण नेपाल भाग गया है। वह भारतीय नागरिक नहीं है। वह नेपाल से जुर्म करके भारत आया है। उसके पास फर्जी पासपोर्ट है और न जाने क्या-क्या? दिग्विजय सिंह को अपने अंतर्मन में झांककर देखना चाहिए कि कौन भारतीय है और कौन विदेशी, लेकिन एक बड़ा सवाल यह है कि दिग्विजय सिंह को इस तरह की बयानबाजी करने का अधिकार आखिर किसने दे रखा है? अब जब बालकृष्ण देश के सामने आ गए हैं और अपनी आपबीती भी सुना दिए हैं तो क्या ऐसे में यह सवाल नहीं उठता है कि दिग्विजय सिंह देश में बिना वजह भ्रम फैलाकर समाज को अराजकता की ओर ले जाने का प्रयास कर रहे हैं? दिग्विजय सिंह राजनीतिक और सामाजिक मर्यादा का कितना खयाल रख रहे हैं यह इसी से समझा जा सकता है कि वह बाबा रामदेव पर एक अरसे से अनर्गल बयानबाजी करते देखे जा रहे हैं। कभी उन्हें आरएसएस का एजेंट बता रहे हैं तो कभी भाजपा का मुखौटा और कभी महाठग। क्या आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद या अन्य कोई भी हिंदू संगठन का सदस्य होना या उसकी विचारधारा से सहमत होना गुनाह है? दिग्विजय सिंह को यह हक किसने दे रखा है कि वह किसी संगठन को यह प्रमाण देते फिरें कि कौन राष्ट्रभक्त है और कौन देशद्रोही? दिग्विजय सिंह को खुद अपनी सरकार के शर्मिदगी भरे आचरण पर ध्यान टिकाना चाहिए कि संसद का हमलावर अफजल गुरु जिसे उच्चतम न्यायालय फांसी की सजा सुना चुका है वह सरकार के संरक्षण में मौज काट रहा है। कसाब की सुरक्षा पर सरकार पानी की तरह पैसा बहा रही है। दिग्विजय सिंह इस बात से अनभिज्ञ नहीं होंगे कि उनकी सरकार ने नक्सलियों के पैरोकार विनायक सेन जिन्हें न्यायालय द्वारा सजा सुनाया गया है को योजना आयोग में सदस्य बनाया गया है। दिग्विजय सिंह की सरकार को तनिक भी सुध नहीं है कि कश्मीर के पांच लाख पंडित समुदाय आज दिल्ली की सड़कों पर खानाबदोशी का जीवन गुजार रहा है। दिग्विजय सिंह जैसे व्यक्ति ने आज तक इस मसले पर एक शब्द तक नहीं कहा आखिर इसकी वजह क्या है? अगर दिग्विजय सिंह और उनकी सरकार के लिए ओसामा और अफजल गुरु महत्वपूर्ण हो सकते हैं तो फिर कश्मीरी पंडित क्यों नहीं जो अपने ही राज्य से बेदखल किए गए हैं? सच तो यह है कि दिग्विजय सिंह राजनीति और समाज दोनों की नैतिकता को भूल रहे हैं, अन्यथा संत जैसा आचरण व्यवहार रखने वाले और लाखों-लाख लोगों को निरोग बनाने वाले बाबा रामदेव को वह ठग नहीं कहते। अगर बाबा रामदेव ठग होते तो उनके पीछे लाखों का हुजूम नहीं होता और न ही उनके एक आह्वान पर लोग दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशन करने आते। दिग्विजय सिंह के गैर-जिम्मेदराना बयान को लेकर देश भर में कड़ी प्रतिक्रिया देखी गई। स्वयं केंद्र सरकार को समर्थन दे रहे मुलायम सिंह यादव ने कांग्रेस को ही देश का सबसे बड़ा ठग बता डाला। भारतीय जनता पार्टी के अलावा सिविल सोसाइटी ने भी दिग्विजय की निंदा की। बिहार के मुजफ्फरपुर में बाबा के एक भक्त ने आहत होकर दिग्विजय सिंह पर मुकदमा भी ठोंक दिया है, लेकिन ताज्जुब होता है कि कांग्रेस पार्टी दिग्विजय सिंह के इस तरह के बयानों के प्रति तनिक भी विचलित नहीं है। फिर क्यों न माना जाए कि दिग्विजय सिंह की इस तरह की बयानबाजी के पीछे कांग्रेस पार्टी है और उन्हें ऐसा कहने के लिए उकसा रही है। विपक्षी दल तो दिग्विजय सिंह की मानसिक दृढ़ता को लेकर ही अब सवाल उठाने लगे हैं। सभी को आश्चर्य हो रहा है कि दिग्विजय सिंह परिस्थितियों को समझे बगैर देश में हर घटने वाली घटनाओं को आएएसएस, विहिप और भाजपा से जोड़कर बयानबाजी क्यों कर रहे हैं? हाल ही देखने को मिला कि दिल्ली के कांग्रेस मुख्यालय में प्रेस कांफे्रंस के दौरान पार्टी महासचिव जनार्दन द्विवेदी को जूता दिखाने वाले फर्जी पत्रकार सुनील कुमार को दिग्विजय सिंह ने तत्काल आरएसएस और विहिप का आदमी बता डाला। डर इस बात का भी है कि कहीं उनके ऐसे बयानों से देश का माहौल न खराब हो जाए। आरएसएस ने दिग्विजय सिंह के इस अनुचित बयान पर गहरी आपत्ति व्यक्त की है और कानूनी कार्रवाई करने की बात भी कही है। देखने वाली बात यह होगी कि अपनी जुबानी जंग से अपने विरोधियों को मात देने में जुटे दिग्विजय सिंह और उनकी सरकार के गृहमंत्री पी. चिदंबरम कब तक देशवासियों की आंख में धूल झोंकते रहेंगे। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
बंगाल में बदलाव की बानगी
आज की राजनीति में जहां आश्वासन पूरा करने से ज्यादा उसे भूल जाने का चलन ज्यादा है, वहीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपने चुनावी घोषणा पत्र में किए गए वादों को पूरा करने में गहरी संलग्नता से जुटी हुई हैं। बीते सात जून को राज्य प्रशासन के साथ गोरखा जनमुक्ति मोर्चा की बैठक के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पिछले दो दशकों से जारी दार्जिलिंग समस्या को सुलझाने का एलान किया। दोनों पक्षों के बीच एक समझौता हुआ है, जिसके तहत अलग राज्य के बजाय स्वायत्त परिषद का गठन कर उसे और ज्यादा अधिकार देने की बात कही गई है। यह समझौता ममता सरकार की बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि इससे पहाड़ में शांति कायम होने व वहां विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में मदद मिलने की आस बढ़ी है। मुख्यमंत्री ने उत्तर बंगाल के जिलेवार विकास के लिए दो सौ करोड़ रुपये आवंटित किए हैं और उत्तर बंगाल में भी मुख्यमंत्री का एक सचिवालय बनाने की घोषणा की है। यह सर्वविदित है कि उत्तर बंगाल के छह जिलों के पिछड़े होने के कारण ही वहां कभी अलग गोरखालैंड तो कभी अलग कामतापुर राज्य की मांग उठती रही है। वहां के पिछड़ेपन की एक वजह प्रशासनिक अनुपस्थिति भी रही है। उत्तर बंगाल में मुख्यमंत्री बैठेंगी तो वहां के लोग भी उनसे मिलकर अपनी बात रख सकेंगे और मुख्यमंत्री भी वस्तुस्थिति का जायजा ले सकेंगी। ममता ने माओवाद प्रभावित इलाकों के विकास के लिए भी अलग मॉडल बनाया है और वहां उनकी सरकार ने दो रुपये किलो चावल देना शुरू कर दिया है। समझा जाता है कि इससे माओवाद के मुद्दे को हल करने की राह निकल सकती है। ममता ने वादे के अनुरूप राजनीतिक कैदियों की समीक्षा के लिए भी रिव्यू कमेटी बना दी है। कुल मिलाकर ममता बनर्जी द्वारा पश्चिम बंगाल की बागडोर थामने के साथ ही विभिन्न क्षेत्रों में बदलाव की बानगी दिखने लगी है। नई मुख्यमंत्री द्वारा अब तक छह सरकारी अस्पतालों का दौरा किए जाने व भविष्य में कभी भी औचक निरीक्षण का एलान करने का असर यह हुआ है कि डाक्टर व कर्मचारी अब समय पर अस्पताल पहुंचने लगे हैं। राज्य सरकार के दूसरे विभागों में भी इसका असर पड़ा है। ममता ने मुख्यमंत्री बनते ही नौकरशाहों के सामंती रवैये पर जिस तरह नकेल कसी है उस तरह की कार्रवाई वाम राज में कभी नहीं होने के कारण ही बंगाल में कार्य संस्कृति क्रमश: नष्ट होती गई। वाम राज में कोई कार्रवाई नहीं होने की सबसे बड़ी वजह यह थी कि नीचे के कर्मचारी से लेकर ऊपर के अफसर तक सभी पार्टी कैडर या समर्थक थे। ममता के सामने यह चुनौती भी है कि वाम राज में दो लाख करोड़ रुपये के कर्ज में डूबे बंगाल को कैसे उबारा जाए। राज्य के आर्थिक हालात को देखते हुए ममता ने अपने मुख्यमंत्री कक्ष की साज-सज्जा पर खर्च हुए दो लाख रुपये का भुगतान खुद किया। दूसरे मंत्री व अफसर भी इससे प्रेरणा लेंगे, यह उम्मीद लाजिमी है। जबर्दस्त आर्थिक संकट से गुजर रहे बंगाल को आर्थिक पटरी पर लाने के लिए ममता ने देश के वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के कोलकाता आवास में जाकर जरूरी बैठक की। प्रणब ने ममता को हर संभव सहयोग का आश्वासन भी दिया है। राज्य की आर्थिक चुनौती से जूझने के साथ ही ममता बंगाल को एक नया बंगाल बनाने के लिए आकुल-व्याकुल हैं। उनमें तरक्की की कितनी तड़प है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने रतन टाटा को पत्र लिखकर राज्य में निवेश करने का न्यौता दिया है। सिंगुर में भी अनिच्छुक किसानों की 400 एकड़ जमीन को छोड़कर बाकी 600 एकड़ जमीन टाटा को देने को वे सहमत हो गई हैं। अमेरिका के अप्रवासी उद्योगपतियों से बातचीत के बाद ममता ने अपनी देख-रेख में एनआरआई सेल बनाया है। चटर्जी समूह के प्रमुख पूणर्ेंदु चटर्जी ने ममता सरकार में उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी और मुख्य सचिव समर घोष से मिलने के बाद बंगाल में आठ परियोजनाएं शुरू करने का एलान किया। अगले तीन वर्षो में इन परियोजनाओं के शुरू होने पर दो लाख लोगों को रोजगार मिलेगा। गेल ने भी बंगाल में बड़ा निवेश करने का एलान किया है। ममता बनर्जी सरकार को जापान सरकार से लेकर लार्सन एंड टुब्रो तक से निवेश के प्रस्ताव भी मिले हैं। इस सबसे स्पष्ट है कि ममता भी बंगाल में निवेश ला सकती हैं और उद्योगों की स्थापना करवा सकती हैं। ममता को पता है कि बंगाल में शिक्षा का प्रसार तो है, नौकरियों की कमी है। कदाचित इसीलिए वे नए उद्योग लाने में जुट गई हैं ताकि निजी क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़ें। ममता ने निवेशकों को लुभाने के लिए दो ठोस कदम उठाए हैं। पहला कदम है-कोलकाता का सुंदरीकरण। ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री बनते ही ग्रीन कोलकाता, क्लीन कोलकाता की मुहिम तेजी से चलाई जा रही है। नई सरकार का दूसरा कदम राज्य की कानून एवं व्यवस्था की स्थिति को सुधारने से संबंधित है। बंगाल बदल रहा है। ममता भी बदल रही हैं। वे अब राजनीतिक तौर पर ज्यादा परिपक्वता का परिचय दे रही हैं। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
किसानों को गुलाम बनाना चाहता है केंद्र
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बीज विधेयक को काला विधेयक करार देते हुए कहा है कि इसके माध्यम से केंद्र सरकार किसानों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों का गुलाम बनाने की साजिश रच रही है। उन्होंने सभी दलों के सांसदों का आह्वान किया है कि वे किसी भी कीमत पर संसद में इस विधेयक को पास न होने दें। उन्होंने कहा,इस मामले में भाजपा उनके साथ है। वाम दलों समेत अन्य दलों से वे बात करेंगे। नीतीश कुमार ने गुरुवार को पटना के श्रीकृष्ण मेमोरियल हाल में जदयू किसान प्रकोष्ठ द्वारा आयोजित किसान महासभा का उद्घाटन करते हुए विधेयक की खामियां गिनाईं और कहा, कृषि राज्यों का विषय है, लेकिन विधेयक में राज्यों को कोई अधिकार नहीं मिला है। किसानों को बीज की आपस में अदला-बदली करने का अधिकार नहीं रहेगा, कंपनी से ही उन्हें बीज मिलेगा। पूरी तरह से बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मोनोपोली रहेगी। अच्छी गुणवत्ता वाले बीज मुहैया कराने की बात हो रही है,दाम पर कोई चर्चा नहीं है। कीमत तय करने का तंत्र बने और राज्यों की सहमति से दाम तय किये जाएं। विधेयक में बीज के फेल होने पर मुआवजा का कोई प्रावधान नहीं है। मुआवजा बीज की कीमत पर नहीं किसानों की फसल नुकसान के आधार पर दिया जाए। नकली बीज के लिए दंड का प्रावधान नहीं है। बीज बेचने के लिए दिल्ली में रजिस्ट्रेशन होगा। ऐसे में प्रदेश के किसानों को बीज के लिए दिल्ली जाना होगा? राज्यों में भी निबंधन की व्यवस्था हो। बहुराष्ट्रीय कंपनियों को व्यापार के लिए राज्यों से इजाजत लेने का भी प्रावधान किया जाए। किसानों की परिभाषा स्वामीनाथन आयोग द्वारा निर्धारित परिभाषा के अनुसार ही तय हो। बीज के पैकेट पर स्थानीय भाषाओं में भी जानकारी लिखी जाए। उन्होंने कहा, दो साल पहले प्रदेश में 61,000 हेक्टेयर में मक्के के बीज फेल हुए तो उल्टा किसानों पर ही कंपनी ने तोहमत लगा दी कि बीज ढंग से नहीं बोए। राज्य सरकार ने प्रति हेक्टेयर दस हजार रुपये के हिसाब से किसानों को मुआवजा दिया। नीतीश ने कहा, आप सभी जाग जाएं, आपके जागने भर की देर है.
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