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Wednesday, June 15, 2011

भटकी हुई रणनीति


लेखक भ्रष्टाचार के खिलाफ सिविल सोसायटी के आंदोलन के प्रति केंद्र के रवैये में खामी देख रहे हैं...
अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के अनशन-आंदोलन के चलते केंद्र सरकार भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ कमर कसती अवश्य दिख रही है, लेकिन उसके द्वारा उठाए गए कदमों से अभी न तो अन्ना संतुष्ट दिख रहे हैं, न बाबा और न ही आम जनता। यही कारण है कि जहां बाबा रामदेव अनशन जारी रखे हुए हैं वहीं अन्ना हजारे भी इस अल्टीमेटम पर कायम है कि यदि 15 अगस्त तक लोकपाल विधेयक पारित नहीं हुआ तो वह 16 अगस्त से फिर अनशन पर बैठेंगे। अब केंद्र सरकार यह भी संकेत दे रही है कि वह इन दोनों अनशनकारियों के दबाव में नहीं आएगी। बाबा रामदेव द्वारा संचालित ट्रस्टों की जांच कराने के साथ ही केंद्र सरकार यह भी संकेत दे रही है कि वह अन्ना हजारे और उनके साथियों के प्रति कठोर रवैया अपनाएगी। केंद्र सरकार से यह गुहार लगाई जा रही है कि वह बाबा रामदेव का अनशन समाप्त कराए, लेकिन वह मौन साधे हुए है। नि:संदेह भारतीय संविधान इसकी इजाजत नहीं देता कि सिविल सोयायटी सरकार को अपने मनमाफिक कानून बनाने के लिए बाध्य करे। यह काम तो संसद का है। यह बात बाबा रामदेव ओर अन्ना हजारे, दोनों ही समझते हैं, लेकिन इस समय वे केंद्र सरकार पर दबाव बनाए रखना चाहते हैं। शायद दोनों यह मानकर चल रहे हैं कि पहले की भांति या तो सोनिया गांधी या फिर मनमोहन सिंह कोई ऐसा आश्र्वासन देने के लिए तैयार हो जाएंगे जिससे पलटना उनके लिए आसान न हो और यदि वे ऐसा करेंगे तो उनकी साख पर बन आएगी। अन्ना हजारे ने इस वर्ष अप्रैल में जब पहली बार दिल्ली में जंतर-मंतर पर अनशन किया था तो सोनिया गांधी ने एक हद तक उनका समर्थन किया था। अब वह चुप्पी साधे हुए हैं तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आक्रामक रूख प्रदर्शित किए हुए हैं। प्रधानमंत्री के अनुसार रामलीला मैदान में मध्य रात्रि को दिल्ली पुलिस की ओर से रामदेव और उनके समर्थकों के खिलाफ कार्रवाई जरूरी हो गई थी, जबकि इसी कार्रवाई के चलते केंद्र सरकार आम जनता और विपक्षी दलों के निशाने पर है। सच तो यह है कि केंद्र सरकार के लिए इस कार्रवाई को जायज ठहराना महंगा पड़ रहा है, लेकिन वह अपने रवैये पर अड़ी है। बेहतर हो कि वह अडि़यल रवैया छोड़कर इस पर विचार करे कि अन्ना हजारे या रामदेव को अनशन करने की जरूरत क्यों पड़ी? अन्ना हजारे का पिछला अनशन जब समाप्त हुआ था तब केंद्र सरकार की किरकिरी जरूर हुई थी, लेकिन आम जनता को इससे संतुष्टि मिली थी कि सरकार सिविल सोसायटी से मिलकर लोकपाल विधेयक का मसौदा बनाने के लिए तैयारहो गई। जब बाबा रामदेव ने काले धन के मुद्दे पर अनशन करने की ठानी तो केंद्र सरकार ने उन्हें मनाने के लिए चार वरिष्ठ मंत्रियों को एयरपोर्ट भेज दिया। सरकार चाहती तो उन्हें इतना महत्व दिए बगैर उनसे वार्ता कर सकती थी। बाद में इसी सरकार ने रामदेव और उनके समर्थकों को रामलीला मैदान से खदेड़ने के लिए रात में पुलिस भेज दी। वैसे बाबा रामदेव का अनशनतमाम देशवासियों के गले नहीं उतर रहा है। अगर उनके समर्थकों और अनुयायियों को छोड़ दिया जाए तो तमाम लोग ऐसे हैं जो उन्हें केवल योगाचार्य के रूप में देखते हैं। वे यह सवाल उठा रहे हैं कि आखिर एक योगगुरु भ्रष्टाचार के विरुद्ध अनशन क्यों कर रहा है? कुछ लोग उनकी अकूत संपदा का भी राज जानना चाहते हैं। जहां रामदेव की साख सवालों के घेरे में आ गई है वहीं गांधीवादी समाजेसवी अन्ना हजारे की छवि साफ-सुथरी है। सरल-सादगीपूर्ण जीवन बिताने के कारण जब वह भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन पर बैठे तो जो हुजूम उनके समर्थन में आया उसमें सभी तबके के लोगों के अलावा बड़ी संख्या में बुद्धिजीवी वर्ग भी था। बाबा रामदेव के समर्थकों में भी बुद्धिजीवी हैं, लेकिन उनके ज्यादातार समर्थक उनके वे अनुयायी हैं जो उनकी विशेष जीवनशैली से प्रभावित हैं। चूंकि वह संन्यासी हंै लिहाजा तमाम हिंदू संत भी उनके साथ है। भाजपा और संघ के नेता भी उनका समर्थन कर रहे हैं। अब तो संघ और भाजपा के नेता बाबा रामदेव के समर्थन में खुलकर सामने भी आ गए हैं। बाबा की संघ और भाजपा नेताओं से करीबी के चलते सरकार को यह प्रचारित करने में आसानी हो रही है कि उनके अनशन-आंदोलन के पीछे आरएसएस का हाथ है। कांग्रेस की नजर में बाबा अनशन के जरिये संघ-भाजपा की राजनीति कर रहे हैं। अशोक सिंघल और सुषमा स्वराज जिस तरह बाबा रामदेव से मिलने हरिद्वार गए और वहां जाकर उन्होंने उनकी वकालत की उससे इसमें संदेह नहीं रह गया कि उनके अनशन-आंदोलन के पीछे संघ और भाजपा का हाथ है। जनता के बीच यह भी संदेश गया है कि बाबा रामदेव भ्रष्टाचार विरोधी अपने अनशन के जरिये कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करना चाहते हैं। वैसे केवल कांग्रेसी ही भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं है और न ही सिर्फ कांग्रेस भ्रष्टाचार की अनदेखी कर रही है। यही काम भाजपा नेता भी कर रहे हैं और वे भी भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हैं। भाजपा बाबा रामदेव का साथ तो खुलकर दे रही है, लेकिन वह अन्ना हजारे का समर्थन नहीं कर रही है। चूंकि अन्ना हजारे का आंदोलन गैर राजनीतिक है इसलिए आम जनता के बीच उनकी साख अधिक है। केंद्र सरकार बाबा रामदेव के दबाव से तो मुक्त होती दिख रही है, लेकिन वह अन्ना हजारे के दबाव का सामना शायद ही कर पाए। अन्ना हजारे द्वारा सरकार पर जो दबाव बनाया जा रहा है उसे गैर जरूरी नहीं कहा जा सकता। यह अन्ना हजारे के दबाव का ही नतीजा है कि सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ सक्रिय दिख रही है। इस पर बहस हो सकती है कि 15 अगस्त तक लोकपाल विधेयक पारित करने के लिए अल्टीमेटम देना कितना सही है, लेकिन इससे इंकार नहीं कि केंद्र सरकार पर मजबूत लोकपाल के निर्माण के लिए दबाव बनाना जरूरी है। यदि केंद्र सरकार अपने अहं की खातिर अन्ना की अनदेखी करती है और उनके खिलाफ बाबा रामदेव की तरह आक्रामक रवैया अपनाती है तो न उसका भला होने वाला है और न ही देश का। इस मामले में उसे दंभ भरे रवैये का प्रदर्शन करने से बचना चाहिए। उसे यह अहसास हो जाए तो अच्छा है कि रामदेव के भक्तों को जिस तरह रामलीला मैदान से खदेड़ा गया वह शर्मनाक था। इस समय केंद्र के जो रणनीतिकार उसे सिविल सोसायटी से कड़ाई बरतने और रामदेव की अनदेखी करने का सुझाव दे रहे हैं वे गलती कर रहे हैं। ऐसा करने से आम जनता को सही संदेश नहीं जाएगा। केंद्र का अहंकारी रवैया विपक्षी दलों को आग में घी डालने का मौका देगा। केंद्र का दमनकारी रवैया उसकी लुटिया डुबो सकता है। उसे यह बात समझ लेनी चाहिए कि भ्रष्टाचार इस समय देश की विकराल समस्या है। कुछ ही दिनों में संसद का मानसून सत्र शुरू होने जा रहा है। सरकार को इस सत्र में तमाम काम निपटाने हैं। ऐसे में बेहतर होगा कि वह कम से कम अन्ना हजारे के साथ जो बातचीत चल रही है उसे पटरी पर बनाए रखे, जिससे आम जनता को यह आभास हो कि वह भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए वास्तव में गंभीर है।


Sunday, May 15, 2011

कांग्रेस के लिए चुनावी नसीहत


लेखक पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के नतीजों में निहित संदेश को रेखांकित कर रहे हैं…


पश्चिम बंगाल, केरल, असम, तमिलनाडु एवं केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी के विधानसभा चुनावों के अप्रत्याशित नतीजे सामने आए हैं। जिस भारी अंतर से ममता बनर्जी की पश्चिम बंगाल में और जयललिता की तमिलनाडु में जीत हुई उसकी उम्मीद शायद उन्हें भी न रही हो। असम में भी किसी को यह उम्मीद नहीं थी कि यहां कांग्रेस तीसरी बार दो तिहाई बहुमत से सत्ता में लौट आएगी। वैसे तो कांग्रेस इन चुनाव नतीजों से खुशी जाहिर कर रही है, लेकिन कांग्रेस के रणनीतिकारों ने तमिलनाडु में जिस तरह डीएमके का दामन पकड़े रखा उसकी कीमत उन्हें चुकानी पड़ी। कांग्रेस ने यूपीए के दूसरे कार्यकाल में डीएमके के साथ गठबंधन कर सरकार चलाना शुरू ही किया था कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला सामने आ गया। यही घोटाला तमिलनाडु में कांग्रेस के लिए खराब नतीजे लेकर सामने आया। कांग्रेस न जाने क्योंडीएमके का साथ छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुई, जबकि सपा जैसे राजनीतिक दल, जिनके पास पर्याप्त सांसद भी थे, उसे समर्थन देने के लिए तैयार बैठे थे। वैसे तो तमिलनाडु में पिछले कुछ दशक से लगभग हर चुनाव में अन्नाद्रमुक और द्रमुक के बीच सत्ता परिवर्तन होता आया है, लेकिन इस बार वहां की जनता ने स्पेक्ट्रम घोटाले के कारण करुणानिधि के परिवार को धूल चटा दी। नतीजे बता रहे हैं कि तमिलनाडु की जनता भ्रष्टाचार में लिप्त करुणानिधि परिवार को किसी कीमत पर स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी। ये चुनाव नतीजे करुणानिधि के राजनीतिक कॅरियर को समाप्त करने वाले साबित हो सकते हैं, क्योंकि उनके परिवार के झगड़े सतह पर आने की प्रबल आशंका है। चूंकि कांग्रेस डीएमके के कुशासन के बावजूद उससे रिश्ते बनाए रही इसलिए जब यह लग रहा था कि तमिलनाडु में उसका उदय हो सकता है तब उसे दस सीटें भी नहीं मिल सकीं। तमिलनाडु में प्रचार करने गए कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी अपनी युवा ब्रिगेड के किसी भी प्रत्याशी को जीत नहीं दिलवा पाए। यह उनके लिए एक बड़ा धक्का है। उन्हें ऐसा ही धक्का केरल में भी लगा, जहां उनकी युवा टीम के 18 में से सिर्फ आठ प्रत्याशी ही चुनाव जीत सके। इसकी एक वजह रही पूर्व मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन की लोकप्रियता। राहुल गांधी ने इन्हीं अच्युतानंदन की बढ़ती उम्र को लेकर कटाक्ष किया था, जिस पर उन्हें अमूल बेबी का जुमला सुनना पड़ा। केरल में कांग्रेस सरकार बनाने में अवश्य सफल रही, लेकिन तमिलनाडु और पुडुचेरी में उसकी दुर्गति छिपी नहीं और न ही यह छिपा है कि इसकी एक बड़ी वजह डीएमके का साथ देना रहा। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने वामपंथी दलों के 34 वर्षो के शासन को ध्वस्त कर दिया। एक समय पश्चिम बंगाल के बारे में कहा जाता था कि वामदलों ने यहां के गली कूचों तक में अपने कार्यकर्ताओं का बैठा रखा हुआ है और वे अपने मतदाताओं को छिटकने नहीं देते, लेकिन ममता बनर्जी के जुझारूपन के आगे वामदल नतमस्तक हो गए। मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य अपने अनेक मंत्रियों और विशेष रूप से वित्तमंत्री, उद्योगमंत्री समेत जिस तरह चुनाव हारे उससे वाम दलों की करारी हार का पता चलता है। वाम दलों का नेतृत्व करने वाली माकपा अब तीसरे स्थान पर है। वामपंथियों के लिए यह पीड़ादायक होगा कि जिस राज्य में वह 34 वर्षो तक सत्ता भोगते रहे वहां अब उन्हें सड़कों पर उतरना होगा। वामपंथियों ने बंगाल की सत्ता तब संभाली थी जब आपातकाल के कारण इंदिरा गांधी के विरोध में पूरे देश में लहर चल रही थी। अब खुद वामपंथियों के खिलाफ लहर चल रही है। वाम दलों ने जिस तरह बंगाल में विकास ठप किया वह किसी से छिपा नहीं। आज बंगाल को न केवल विकास की आवश्यकता है, बल्कि वामपंथी विचारधारा से दूर हटने की भी जरूरत है। जिस विचारधारा का अंत खुद सोवियत संघ में हो गया उसे भारतीय वामपंथी बंगाल के दम पर जिंदा रखे हुए थे। बंगाल की अधिकांश जनता के लिए यह पहला अवसर होगा जब उसे एक नए तरीके का शासन देखने को मिलेगा। स्पष्ट है कि तृणमूल कांग्रेस पर जनता की अपेक्षाओं का भारी बोझ होगा। ममता बनर्जी ने चुनाव जीतने के लिए कुछ हद तक माओवादियों का भी समर्थन लिया है। ऐसे में वह माआोवादियों के विरुद्ध चलाए जा रहे केंद्र के अभियान को कंुद करने के लिए दबाव बढ़ा सकती हैं। ममता केंद्र में कई बार मंत्री रही हैं, लेकिन राज्य की बागडोर पहली बार उनके हाथों में आई है। वामपंथी विचारधारा से जकड़ी रही बंगाल की नौकरशाही को वह कितने दिनों में बदल पाएंगी, इस पर पूरे देश की निगाह रहेगी। वह तेज-तर्रार हैं तो तुनकमिजाज भी। सिंगुर में भूमि अधिग्रहण के विरोध में उनके रवैये के कारण टाटा को जिस तरह नैनो कारखाना गुजरात ले जाना पड़ा उससे भले ही किसानों को फर्क न पड़ा हो, लेकिन उसके कारण बंगाल में औद्योगिक निवेश के बहुत से रास्ते बंद भी हो गए हैं। अगर असम में कांग्रेस को अप्रत्याशित सफलता मिली है तो तरुण गोगोई के कारण। असम की जनता ने एक बार फिर उन लोगों को सत्ता से दूर रखा जो एक समय अपने हिंसक आंदोलन के बाद भारी बहुमत से सत्ता में आए थे। वहां के लोग शांति चाहते हैं और यह शांति पिछले 15 वर्षाे से कांग्रेस देती आ रही है। पांच राज्यों में भाजपा ने बड़ी संख्या में अपने प्रत्याशी उतारे थे, लेकिन दक्षिण के राज्यों और पश्चिम बंगाल में उसका खाता भी नहीं खुला तथा असम में पांच सीटों पर संतोष करना पड़ा।प्रणब मुखर्जी ने भाजपा की इस पराजय पर चुटकी भी ली और भाजपा ने उसका जवाब भी दिया, लेकिन यह समय उसके लिए आत्ममंथन का है। आखिर वह 20 वर्षो में अपने तमाम प्रयासों के बावजूद इन राज्यों में अपनी पहचान क्यों नहीं स्थापित कर सकी? भाजपा एक राष्ट्रीय दल है और आगामी लोकसभा चुनाव में उसका भविष्य काफी कुछ इस पर निर्भर करेगा कि वह गैर हिंदी भाषी प्रदेशों में कैसा प्रदर्शन करती है? भले ही केंद्र सरकार यह मान रही हो कि इन चुनावों के बाद उसकी राजनीतिक मुश्किलें कम हो जाएंगी, लेकिन ऐसा फिलहाल होता हुआ दिख नहीं रहा। माना जाता है कि अगर वामपंथियों ने यूपीए-एक को दबा कर रखा तो तृणमूल कांग्रेस के कारण यूपीए-दो सरकार आर्थिक सुधारों को आगे नहीं बढ़ा सकी। रेल मंत्री की हैसियत से ममता ने देश का भला नहीं किया। उन्होंने रेल मंत्रालय को चुनावी लाभ केलिए इस्तेमाल किया। अब जब तृणमूल कांग्रेस को बंगाल में सरकार बनाने के लिए कांग्रेस की जरूरत नहीं पड़ेगी तो केंद्र में कांग्रेस को उनके और अधिक नखरे सहने पड़ सकते हैं। बड़ी बात नहीं कि वह बंगाल के विकास के लिए केंद्र में एक-दो और मंत्रालय अपने अधीन ले लें। इस सबसे आने वाले दिनों में केंद्र की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। कांग्रेस जिन नीतियों पर केंद्र सरकार को चलाना चाह रही है उनमें तृणमूल कांग्रेस की दखलंदाजी और बढ़ सकती है। यदि ऐसा हुआ तो इसके दुष्परिणाम कांग्रेस को ही सबसे अधिक भोगने पड़ेंगे।


Sunday, May 1, 2011

संसदीय परंपरा का उपहास


लेखक लोक लेखा समिति की बैठक में हुए हंगामे को संसदीय परंपरा में एक अप्रिय प्रसंग के रूप में देख रहे हैं…

स्पेक्ट्रम घोटाले में डॉ. मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता में लोक लेखा समिति की ओर से तैयार मसौदा रपट को लेकर इस समिति में शामिल सत्तापक्ष के सांसदों ने जिस तरह हंगामा किया उससे लोकतांत्रिक मूल्यों और मर्यादाओं को गहरा आघात लगा है। स्पेक्ट्रम घोटाले में यह पहले से स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री कार्यालय से गंभीर चूक हुई और उसके चलते दूरसंचार मंत्री ए.राजा को मनमानी करने का मौका मिला। बावजूद इसके कांग्रेस इस कोशिश में लगी रही कि इस मामले में प्रधानमंत्री या उनके कार्यालय का नाम न आने पाए। घोटाला उजागर होने पर पहले कांग्रेसी नेताओं के साथ-साथ खुद प्रधानमंत्री ने यह बताने की कोशिश की कि स्पेक्ट्रम आवंटन में कोई गड़बड़ी नहीं हुई और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) का यह आकलन सही नहीं कि राजा की मनमानी के कारण पौने दो लाख करोड़ रुपये की राजस्व हानि हुई है। सत्तापक्ष के नेताओं की ओर से सीएजी के इस आकलन को मनगढ़ंत साबित करने के साथ ही यह भी कहा गया कि स्पेक्ट्रम आवंटन में हुई राजस्व हानि तो शून्य है। इस आशय का बयान किसी और ने नहीं, राजा का स्थान लेने वाले नए दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल ने दिया। इस सबके बाद भी सच्चाई छिप नहीं सकी। खुद सीबीआइ ने राजस्व क्षति से सहमति जताई। इसके बाद विपक्ष ने भी सत्तापक्ष पर दबाव बनाया और उच्चतम न्यायालय ने भी सीबीआइ जांच की निगरानी शुरू कर दी। इसके अतिरिक्त कारपोरेट लाबिस्ट नीरा राडिया के टेपों के खुलासे ने भी यह जाहिर किया कि 2जी स्पेक्ट्रम के आवंटन को लेकर दूरसंचार कंपनियों और दूरसंचार मंत्रालय के बीच किसी न किसी स्तर पर साठगांठ थी। बाकी कसर उच्चतम न्यायालय की इस टिप्पणी ने पूरी कर दी कि राजा के खिलाफ कार्रवाई करने के मामले में प्रधानमंत्री की निष्कि्रयता विचलित करने वाली है। हालांकि कांग्रेस ने राजा का इस्तीफा लेकर अपनी और केंद्र सरकार की छवि को सुधारने की कोशिश की, लेकिन बात बनी नहीं, क्योंकि सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका की सुनवाई करते समय उच्चतम न्यायालय इस नतीजे पर पहुंचा कि स्पेक्ट्रम आवंटन में गड़बड़ी से अवगत होने के बाद भी प्रधानमंत्री कार्यालय राजा पर लगाम नहीं लगा सका। कांग्रेस अपने बचाव में चाहे जैसे तर्क दे, इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि गठबंधन राजनीति की मजबूरियों के चलते वह न तो राजा को दूरसंचार मंत्री बनने से रोक सकी और न ही उन्हें मनमानी करने से। अब तो यह किसी से छिपा ही नहीं कि 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में किस तरह तमिलनाडु के मुख्यमंत्री की पत्नी और बेटी के स्वामित्व वाले टीवी चैनल को डीबी रिएल्टी से पैसा मिला, जिसकी एक कंपनी स्वान टेलीकॉम को स्पेक्ट्रम आवंटित किए गए थे। आमतौर पर बड़े घपले-घोटालों की सीबीआइ जांच नतीजे पर नहीं पहुंच पाती, लेकिन स्पेक्ट्रम घोटाले की पूरी कहानी परत-दर-परत सामने आती दिख रही है। इसका मुख्य कारण यह है कि उसके काम की निगरानी खुद उच्चतम न्यायालय कर रहा है। सत्तापक्ष ने स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच को लेकर विपक्ष के दबाव में न आने की पूरी कोशिश की थी, लेकिन उसे तब हथियार डालने पड़े जब संयुक्त संसदीय समिति के गठन की विपक्ष की मांग के चलते संसद का शीतकालीन सत्र बाधित हो गया। जब सत्तापक्ष को लगा कि विपक्ष बजट सत्र भी नहीं चलने देगा तो वह जेपीसी के गठन के लिए राजी हो गया। इसी के साथ उसने यह कोशिश शुरू कर दी कि लोक लेखा समिति स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच बंद कर दे, लेकिन इस समिति के अध्यक्ष डॉ. जोशी ने किसी दबाव में आने से इंकार किया। डॉ. जोशी दबाव में आने के लिए जाने भी नहीं जाते और शायद यही कारण है कि वह उस समय भी तेजी दिखा रहे थे जब भाजपा संयुक्त संसदीय समिति की मांग कर रही थी और यह चाह रही थी कि लोक लेखा समिति का काम गति न पकड़े। लोक लेखा समिति का कामकाज 14 अप्रैल तक सामान्य तरीके से हो रहा था लेकिन जब डॉ.जोशी ने गवाही के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय के शीर्ष अधिकारियों को बुलाया तो विरोध शुरू हो गया। अंतत: ऐसी स्थिति बनी कि यह समिति दो हिस्सों में बंट गई। जहां सत्तापक्ष के सांसद इस कोशिश में थे कि यह समिति अपने कार्यकाल में रिपोर्ट ही न दे सके वहीं डॉ. जोशी तमाम विरोध के बावजूद 30 अप्रैल के पहले अपनी रिपोर्ट तैयार करने के लिए अडिग बने रहे। अंतत: वह इसमें सफल भी रहे और उन्होंने जांच रपट लोकसभा अध्यक्ष को सौंप दी। समिति की बैठक में सत्तापक्ष के सांसदों ने सपा और बसपा के सदस्यों से मिलकर बहुमत का हवाला देते हुए न केवल डॉ. जोशी की मसौदा रपट खारिज कर दी, बल्कि अपना अध्यक्ष भी चुन लिया। हालांकि यह सारी कार्यवाही अवैधानिक रही, क्योंकि अध्यक्ष चुनने और रपट खारिज करने का काम बैठक की कार्यवाही स्थगित करने के बाद हुआ। यदि सत्तापक्ष और विपक्ष आम सहमति के आधार पर काम करने के लिए राजी होते तो इस अप्रिय प्रसंग से बचा जा सकता था। इस अप्रिय प्रसंग के लिए सत्तापक्ष के सांसद तो जिम्मेदार हैं ही, समिति के अध्यक्ष डॉ. जोशी भी जल्दबाजी के आरोपों से बच नहीं सकते। उन्होंने जो तेजी दिखाई वह बहस का मुद्दा है, लेकिन इसके आधार पर सत्तापक्ष के सांसदों को अवैधानिक काम करने की छूट नहीं मिल जाती। लोक लेखा समिति में जो कुछ हुआ उससे संसदीय परंपराओं को गहरा धक्का लगा है, क्योंकि समिति में वोटिंग निषेध होने के बावजूद अनुचित तरीके से इसका सहारा लिया गया और यहां तक कि सत्तापक्ष के राज्यसभा सांसद को कथित तौर पर अध्यक्ष भी चुन लिया गया। यह आचरण तो संसदीय परंपराओं की खिल्ली उड़ाने वाला है। यह पहला अवसर है जब लोक लेखा समिति की किसी रपट को खारिज करने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाए गए। इस समिति में हुए हंगामे से संसदीय प्रक्रिया को जो क्षति पहुंची उसके लिए सत्तापक्ष के सांसद इसलिए कठघरे में खड़े किए जाने चाहिए, क्योंकि वे सारी सीमाएं लांघ गए। ऐसा लगता है कि उन्होंने ऐसा इसलिए किया, क्योंकि वे समिति की रिपोर्ट में प्रधानमंत्री का नाम किसी भी सूरत में नहीं आने देना चाहते थे। वे चाहते तो इस पर अपनी आपत्ति को रपट का हिस्सा बनवा सकते थे, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। लोक लेखा समिति में हुआ हंगामा संसद की एक मजबूत समिति की गरिमा को गिराने वाला है। कांग्रेस का बेचैन होना स्वाभाविक है, लेकिन उसे मनमानी करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। लोक लेखा समिति में जो कुछ हुआ उसे देखते हुए इसका अनुमान लगाया जा सकता है कि संयुक्त संसदीय समिति के लिए आम सहमति से काम करना कितना कठिन होगा? सत्तापक्ष को यह समझना होगा कि 2 जी स्पेक्ट्रम आवंटन में हुआ घोटाला एक यथार्थ है और उससे मुंह मोड़ना व्यर्थ है। यदि पक्ष-विपक्ष के नेता इस घोटाले के दोषियों को दंडित करने पर अपना ध्यान केंद्रित नहीं करते तो वे देश को निराश ही करेंगे। यदि कांग्रेस को इस घोटाले से पीछा छुड़ाना है तो उसे आगे की ओर देखना होगा। यदि वह इसलिए विपक्ष से झगड़ती रहेगी कि स्पेक्ट्रम घोटाले में उसका दामन साफ है तो उसकी प्रतिष्ठा को और आघात ही लगेगा।