तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे. जयललिता ने द्रमुक शासन की तुलना हिटलर और ईदी अमीन जैसे तानाशाहों के शासन से करते हुए कहा कि जनता ने द्रमुक के खिलाफ इसीलिए मतदान किया क्योंकि उसे लगता था कि एक तानाशाह के शासनकाल में रह रहे हैं। अन्नाद्रमुक सुप्रीमो ने कहा, हालांकि वह द्रमुक नेताओं के खिलाफ मामले दर्ज कराने के मौकों की तलाश नहीं कर रही हैं, लेकिन इस पार्टी के कई और नेता जेल जाएंगे। जया ने मंगलवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ बैठक के बाद संवाददाताओं से बातचीत में कहा, तमिलनाडु की पूर्ववर्ती द्रमुक सरकार ने तानाशाही चला रखी थी। मीडिया तक की स्वतंत्रता को बंधक बना लिया गया था। द्रमुक शासनकाल में लोग महसूस करने लगे थे कि वह हिटलर या ईदी अमीन के तहत हैं। लोग दंडित करने के लिए सही अवसर की तलाश कर रहे थे। इसीलिए उन्होंने विधानसभा चुनाव में द्रमुक के खिलाफ वोट किया और उसे सत्ता से बाहर कर दिया। जयललिता ने आरोप लगाया कि कामकाज का खर्चीला अंदाज, भ्रष्टाचार, भाई भतीजावाद, प्रशासन की विफलता और प्रत्येक कारोबार में एक ही परिवार का प्रभुत्व द्रमुक सरकार के गिरने के लिए जिम्मेदार है। उन्होंने कहा, पूर्ववर्ती सरकार ने पूरे सूबे को बड़ा कूड़ाघर बना कर रख दिया था। राज्य में बिजली नहीं, ज्यादातर जगहों पर लोगों को पेयजल मयस्सर नहीं। सत्ता में काबिज लोगों ने सिर्फ धन बटोरने पर ध्यान दिया। मुख्यमंत्री ने कहा, वह किसी (द्रमुक नेताओं) के खिलाफ मामले दर्ज कराने के लिए मौके नहीं तलाश रही हैं। इससे प्रदेश के विकास में मदद नहीं मिलेगी। उन्होंने कहा,जिन मामलों में डीएमके के नेता ए. राजा और पार्टी प्रमुख एम. करुणानिधि की बेटी कनीमोरी जेल गई हैं। वह उन्होंने या उनकी सरकार ने दर्ज नहीं कराए हैं। ये मामले केंद्र सरकार ने दर्ज कराए हैं। द्रमुक के कुछ नेता और उनके परिवार के सदस्य जेल में हैं, और भी कुछ नेता जेल जाएंगे।
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Wednesday, June 15, 2011
केंद्र व यूपी में आगे रहने की होड़
भूमि अधिग्रहण के खिलाफ और मुआवजे को लेकर आंदोलन के चलते सुर्खियों में आये भट्टा-पारसौल गांव के किसानों के मामले में केंद्र व उत्तर प्रदेश सरकार एक-दूसरे से कतई पीछे नहीं रहना चाहतीं। यही वजह है कि पीडि़त किसानों को लेकर दोनों सरकारों ने सक्रियता बढ़ा दी है। केंद्रीय मंत्री बुधवार को जहां पीडि़त किसानों को प्रधानमंत्री की ओर से घोषित सहायता राशि बांटने पहंुच रहे हैं, वहीं राज्य सरकार भी जल्द ही फिर से किसानों का दुख-दर्द बांटने जा रही है। सूत्रों के मुताबिक भट्टा-पारसौल आंदोलन के चलते पुलिस कार्रवाई में घायल किसानों के लिए प्रधानमंत्री की ओर से घोषित सहायता राशि वितरण के मसले पर केंद्र सरकार ने मंगलवार को फिर से पड़ताल की। प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री नारायण सामी ने केंद्रीय सहायता से अब तक वंचित किसानों को आर्थिक सहायता राशि उपलब्ध कराने के मामले में संबंधित अधिकारियों व ग्रामीण विकास राज्यमंत्री प्रदीप जैन आदित्य से चर्चा की। बताते हैं कि भट्टा, पारसौल और आछेपुर के 65 किसान अभी तक प्रधानमंत्री की ओर से घोषित आर्थिक सहायता से वंचित हैं। लिहाजा प्रदीप जैन उन्हें बुधवार को ही धनराशि उपलब्ध कराने जा रहे हैं। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री ने भट्टा-पारसौल आंदोलन के दौरान गंभीर रूप से घायलों में प्रत्येक को 50 हजार रुपये और मामूली रूप से घायलों में प्रत्येक को दस हजार रुपये की आर्थिक मदद का एलान किया था। बुधवार को भट्टा, पारसौल और आछेपुर के जिन किसानों को आर्थिक सहायता दी जानी है, आंदोलन के दौरान उनमें से 39 लोग मामूली रूप से और बाकी 26 लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। बताते हैं कि घायलों का बैंक खाता खुलवाकर सहायता राशि उनके खाते में जमा कर दी गई है। जैन उन्हें उनकी पासबुक सौंपने जा रहे हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री नारायण सामी इन गांवों के पीडि़त 110 किसानों को पहले ही केंद्रीय सहायता राशि बांट आए हैं। उल्लेखनीय है कि आंदोलन के दौरान मारे गए दो किसानों को राज्य सरकार अपनी तरफ से पांच-पांच लाख रुपये और स्थानीय बसपा सांसद सुरेंद्र नागर की ओर से भी पांच-पांच लाख रुपये की मदद पहले ही दी जा चुकी है। राज्य सरकार गंभीर रूप से घायलों को ढाई-ढाई लाख रुपए भी दे चुकी है। सूत्रों ने बताया कि राज्य सरकार जल्द ही इन गांवों के पीडि़त किसानों का फिर से दुख-दर्द सुनने जा रही है। आला अधिकारी इस बाबत किसानों की शिकायतों को फिर से सुनेंगे।
जयललिता ने मांगा चिदंबरम से इस्तीफा
तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनने के बाद दिल्ली आईं अन्नाद्रमुक सुप्रीमो जयललिता ने तमाम आवभगत के बावजूद कांग्रेस और केंद्र सरकार को न केवल आइना दिखाया, बल्कि असहज भी किया। प्रधानमंत्री से मिलने पहुंचीं जयललिता का सात रेसकोर्स में गर्मजोशी से स्वागत हुआ- यहां तक कि परंपरा के विपरीत पीएमओ ने उनको लेने के लिए अपनी गाड़ी भेजी, लेकिन प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद उन्होंने द्रमुक कोटे के मंत्री दयानिधि मारन को मंत्री पद से हटाने की मांग करने के साथ गृह मंत्री चिदंबरम से इस आधार पर इस्तीफा मांग लिया कि उन्होंने 2009 का लोकसभा चुनाव धोखाधड़ी से जीता था। 2 जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले में नाम घसीटे जाने के कारण पहले ही परेशानी में पड़े चिदंबरम ने जयललिता के अप्रत्याशित वार का बचाव यह कहकर किया कि उन्हें अदालत की अवमानना करने की आदत है। इसलिए उनका आज का बयान बिलकुल भी चौंकाने वाला नहीं है। जयललिता ने मंगलवार को प्रधानमंत्री से मुलाकात के दौरान राज्य के विकास के लिए कई मांगें रखी। हालांकि वह केंद्र सरकार के मुखिया से मिले जवाब से संतुष्ट दिखीं, लेकिन उन्होंने कांग्रेस या यूपीए सरकार पर कोई मुरव्वत नहीं की। जया ने चिदंबरम पर बेईमानी व धोखाधड़ी से चुनाव जीतने का आरोप लगाते हुए कहा, वह 2009 में संसद के लिए कभी निर्वाचित नहीं हुए। उन्होंने देश के साथ धोखा किया है। हमारी पार्टी का उम्मीदवार चुनाव में जीता था। चिदंबरम ने धोखाधड़ी कर जीत हासिल की, लिहाजा उनका मंत्रिमंडल में रहना गैरवाजिब है। ध्यान रहे कि 2009 में शिवगंगा से चुनाव लड़े चिदंबरम मतों की दोबारा गिनती के बाद विजयी हुए थे। पहले उन्हें पराजित घोषित कर दिया गया था। सोनिया गांधी से भेंट के सवाल को जया ने यह कहकर नकार दिया कि द्रमुक और कांग्रेस केंद्र में मिलकर काम कर रहे हैं, ऐसे में मेरा मिलना उचित नहीं। कांग्रेस से गठजोड़ के सवाल पर उनका जवाब था,समर्थन जिन्हें चाहिए उन्हें बात करनी होगी। कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने जया के बयान को अनियंत्रित बताकर चिदंबरम पर ही बचाव की जिम्मेदारी डाल दी। उन्होंने कहा, इस तरह के बयान पर कोई पार्टी प्रतिक्रिया कैसे दे सकती है। संबंधित व्यक्ति इसका जवाब देंगे। जया के तेवर कांग्रेस और केंद्र सरकार को इसलिए असहज करने वाले हैं, क्योंकि पार्टी और सरकार, दोनों ने उनके दिल्ली आगमन को खास तवज्जो दी थी। जया सोमवार को राजधानी पहुंचीं तो दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित उनसे मिलने गईं। मंगलवार को प्रधानमंत्री ने भी जया के लिए सात रेसकोर्स में आने के लिए विशेष व्यवस्था की। प्रधानमंत्री आवास पर सभी मुख्यमंत्रियों को सात रेसकोर्स पर अपनी कार छोड़कर पीएमओ की कार पर बैठना होता है। जया को इस जहमत से बचाने के लिए पीएमओ ने उन्हें लेने के लिए अपनी गाड़ी भेजी, ताकि वह बिना रुके प्रधानमंत्री से मिलने जा सकें।
मीरा ने खारिज की डॉ. जोशी की रिपोर्ट
2जी स्पेक्ट्रम घोटाले पर डा. मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता वाली संसद की लोकलेखा समिति (पीएसी) की विवादित रिपोर्ट आखिरकार धराशायी हो गई। लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने जोशी को रिपोर्ट वापस कर दी है। इसका मतलब है कि स्पेक्ट्रम आवंटन मामले में प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) पर उंगली उठाने वाली पीएसी रिपोर्ट संसद में पेश नहीं होगी। 2जी मामले में संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के गठन के बाद से पीएसी और जेपीसी में गरमाई राजनीति में पीएसी को झटका लगा है। पीएसी की बैठक में जहां बड़े नाटकीय ढंग से 21 में 11 सदस्यों ने रिपोर्ट से अपनी असहमति जता दी थी, वहीं जेपीसी अध्यक्ष पीसी चाको ने भी अपने बयानों में परोक्ष रूप से यह संकेत दे दिया था कि जेपीसी बनने के बाद उसकी रिपोर्ट ही ज्यादा प्रमाणिक मानी जानी चाहिए। दोनों समितियों के दायरे का हवाला देते हुए उन्होंने कहा था कि जेपीसी विस्तृत रूप से हर पहलू पर विचार करेगी। वहीं, अपना कार्यकाल खत्म होने से ठीक पहले जोशी ने रिपोर्ट तैयार कर मीरा कुमार को सौंप दी थी। उस रिपोर्ट में प्रधानमंत्री, पीएमओ और चिदंबरम की भूमिका पर भी उंगली उठाई गई थी। रिपोर्ट विवादित रही थी और पीएसी के अंदर इसका विरोध भी हुआ था। सरकारी व कुछ दूसरे सदस्यों ने बहुमत से इसे खारिज कर दिया था। उसके बाद कांग्रेस और मुख्य विपक्षी दल भाजपा में तीखी तकरार हुई थी, लेकिन बतौर अध्यक्ष जोशी का मानना था कि सदस्य सिर्फ असहमति जता सकते हैं। इसके बाद उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार को रिपोर्ट सौंपकर इसे संसद में पेश करने का आग्रह किया था। जोशी का आरोप था कि विवाद तब उठा जब समिति ने पीएमओ के वरिष्ठ अधिकारियों, कैबिनेट सचिव व कुछ दूसरे लोगों से सवाल जवाब करने का निर्णय लिया था। लगभग डेढ़ माह बाद लोकसभा अध्यक्ष ने रिपोर्ट वापस कर जोशी को झटका दे दिया है तो यह भी स्पष्ट हो गया है कि अब चर्चा चाको की अध्यक्षता वाली जेपीसी रिपोर्ट पर ही होगी जिसमें राजग कार्यकाल के समय में दूर संचार मंत्रालय के कामकाज और स्पेक्ट्रम आवंटन पर चर्चा हो रही है।
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