पश्चिमी उप्र में चुनावी समीकरणों को अपने पक्ष में करने को अगर बसपा सरकार ने तीन नये जिलों के गठन की घोषणा की तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं। दरअसल वोटों की जुगत में सूबे में नये जिलों के गठन का खेल अब पुराना हो चुका है। इसे सूबे की सियासत में गठबंधन युग की देन माना जाता है। शायद यही वजह है 1994 से अब तक राज्य में 20 जिले बढ़ चुके हैं। यह सिलसिला थमने वाला भी नहीं है। अलग-अलग इलाकों से नये जिलों के गठन की मांग उठ रही और राजनीतिक दल उन्हें अपनी सरकार आने पर अमली जामा पहनाने का वादा कर रहे हैं। वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत से सत्ता हासिल के करीब एक वर्ष बाद मुख्यमंत्री मायावती ने एटा जिले के एक हिस्से को अलग कर 15 अप्रैल 2008 को बसपा के संस्थापक कांशीराम के नाम पर कांशीराम नगर बनाया था। इस पर प्रमुख विपक्षी दल सपा ने यह कह कर आपत्ति जताई थी कि कांशीराम का उस क्षेत्र से कोई लेना देना नहीं रहा है। मायावती ने दलित राजनीति में उनके योगदान का जिक्र करते हुए इस कदम के जरिए वोट बैंक को पुख्ता करने की कोशिश की थी। बीते वर्ष एक जुलाई को छत्रपति साहूजी महराज नगर नाम से बने सूबे के 72वें जिले का मामला भी खासा विवादित रहा। मायावती जब 2003 में मुख्यमंत्री थीं, तब उन्होंने यह जिला बनाया था और उस समय विपक्ष ने यह कहकर इसका विरोध किया था कि अमेठी का एतिहासिक महत्व है। इसे देखते हुए जिले का नाम अमेठी ही रखा जाए। उसी साल सत्ता बदल गई। मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बन गए और उन्होंने नवम्बर 2003 में छत्रपति शाहू जी महाराज के नाम से जिले के गठन की अधिसूचना को निरस्त कर दिया। इस मामले में कोर्ट के फैसले के आधार पर पिछले साल नये सिरे से छत्रपति शाहूजी महाराज जिले का गठन किया गया। मायावती ने पहले मुख्यमंत्रित्वकाल में वर्ष 1995 में उधम सिंह नगर और अंबेडकरनगर को नया जिला बनाया था। उधम सिंह नगर अब उत्तराखंड में है। फैजाबाद से काट कर बनाए गए अंबेडकरनगर जिले पर भी सपा ने खासा एतराज जताया था। सपा की मांग थी कि समाजवादी चिंतक डा. राममनोहर लोहिया की जन्मस्थली होने के कारण उसका नाम लोहिया पर होना चाहिए। वैसे मुलायम सिंह यादव ने अपने मुख्यमंत्रित्वकाल में 1994 में कुशीनगर व संत रविदास नगर और 1995 में महोबा के नाम से नया जिला बनाया था। संत रविदास नगर के मुख्यालय को लेकर खासा विवाद छिड़ा था। मायावती ने सर्वाधिक जिले दूसरे शासनकाल में बनावाए। वर्ष 97 में उन्होंने कौशाम्बी, ज्योतिबा फूलेनगर, महामायानगर (हाथरस), चंदौली, गौतमबुद्धनगर, श्रावस्ती, संतकबीरनगर, औरैया, बागपत व कन्नौज को जिला बनावाया। यही नहीं उन्होंने सहारनपुर, मिर्जापुर व बस्ती मंडल का सृजन भी किया था। बाद में मुलायम सरकार ने बागपत व कन्नौज को छोड़कर बाकी सभी को समाप्त कर दिया। मामला कोर्ट में पहुंचा। उसने इसे विभेदकारी करार देते हुए बसपा सरकार के फैसले पर मुहर लगाई। मजबूरन सपा सरकार को इन जिलों और मंडलों को बहाल करना पड़ा।
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Friday, September 30, 2011
Wednesday, June 15, 2011
बसपा के विकल्प की जिद्दोजहद
समाजवादी पार्टी का दो दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन मंगलवार को आगरा में शुरू हो गया। इसमें पार्टी का पूरा फोकस सूबे में खुद को बसपा का असली विकल्प साबित करने पर केंद्रित रहा। उसने इसे साबित करने करने के लिए यह दलील भी दी कि बसपा भी सपा को ही अपना दुश्मन नंबर एक मानती है। कांग्रेस के उभार और भाजपा के उमा भारती को आगे कर पिछड़ा वर्ग कार्ड खेलने की कोशिश को लेकर पार्टी खासी चिंतित नजर आई। पार्टी का पूरा जोर विधानसभा चुनाव में वोटों के विभाजन को रोकने पर रहा। पार्टी का मानना है कि चुनावों में वोटों का बिखराव हो गया तो सूबे में सत्ता हासिल करने का उसका ख्वाब-ख्वाब ही रह जाएगा। मुस्लिम वोट बैंक की चिंता : अधिवेशन में सपा मुस्लिम मतों के बिखराव और विशेषकर कांग्रेस के प्रति उनके झुकाव को लेकर वह खासी चिंतित नजर आई। पार्टी को यह डर है कि लोकसभा की तर्ज पर यदि विधानसभा चुनावों में भी मुसलमानों का झुकाव कांग्रेस की ओर हो गया तो उसे खासी दुश्वारियां हो सकती हैं। यही वजह रही कि पार्टी ने अधिवेशन में सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्र आयोग की रिफारिशों को लागू न करने पर कांग्रेस को निशाना बनाया। सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने साफ किया कि जब तक केंद्र, सरकारी नौकरियों में मुसलमानों को आरक्षण नहीं देता, तब तक इस कौम का भला नहीं होगा।
लक्ष्य यूपी, निगाह केंद्र पर : अधिवेशन में सपा का सतही लक्ष्य तो सूबे की सत्ता रहा,लेकिन उसकी निगाह केंद्र के मौजूदा हालात पर भी लगी है। मुलायम ने इसे छिपाया भी नहीं। उन्होंने कहा कि पार्टी का लक्ष्य 2012 में राज्य में सरकार बनाना तो है ही साथ में 2014 के लोकसभा चुनाव में इतनी सीटें जीतना है कि उसके बिना सहयोग के केंद्र में सरकार न बन सके। उन्होंने केंद्र और प्रदेश दोनों ही सरकारों को भ्रष्टाचारी करार देते हुए तीखा हमला बोला। हालांकि उन्होने सीधे तौर पर बाबा रामदेव का जिक्र तो नहीं किया, लेकिन विदेशों में जमा कालेधन का मुद्दा उठाकर बाबा के आंदोलन का समर्थन कर इरादे जाहिर कर दिए।
सीमाओं पर बढ़ता खतरा : सपा मुखिया सीमाओं के प्रति केंद्र की उदासीनता का मुद्दा अर्से से उठा रहे हैं। विशेषकर चीन की सीमा पर सक्रियता का मामला। इसका जिक्र अधिवेशन में भी कर केंद्र को निशाना बनाया। सीमा पर पाक प्रायोजित आतंवाद के मुद्दे को उठाकर उन्होंने अपनी चिंताएं जाहिर की। आतंकी ओसामा बिन लादेन की मौत के साथ पाकिस्तान की स्वायत्तता पर अमेरिकी हस्तक्षेप को अफगानिस्तान और इराक पर हमला जैसा ही गंभीर मामला बताया। इसके अलावा 2 जी स्पेक्ट्रम, राष्ट्रमंडल खेल घोटालों का जिक्र करते हुए कहा कि यूपीए सरकार में भ्रष्टाचार से लड़ने का हौसला नहीं है। महंगाई का जिक्र कर आम जनता की नब्ज छूने की कोशिश की। साथ पार्टी कार्यकर्ताओं को इन मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाने और सरकार को बेनकाब करने को कहा।
आजम रहे गैरहाजिर : अधिवेशन के पहले दिन फायरब्रांड नेता मोहम्मद आजम खां की गैर मौजूदगी भी आश्चर्यजनक रही। वैसे पार्टी का कहना रहा कि वह बुधवार को अधिवेशन में शामिल होंगे।
Sunday, May 15, 2011
सपा ने किया बसपा के विकल्प का दावा और मजबूत
पिपराइच विधानसभा उप चुनाव में सपा उम्मीदवार राजमती देवी ने रिकार्ड मतों से जीत हासिल की। उनको कुल 56019 वोट मिले। निकटतम प्रतिद्वंदी निर्दलीय जितेंद्र जायसवाल को कुल 29961 मत मिले। इस तरह जीत का अंतर कुल 26058 मतों का रहा। तीसरे नंबर पर रहे भाजपा उम्मीदवार राधेश्याम सिंह 23719 मतों पर ही सिमट गए। इस चुनाव में कुल 124723 मत पड़े थे। मैदान से बाहर होने के कारण गोरखपुर की पिपराइच विधानसभा उपचुनाव के नतीजे भले ही सत्तारुढ़ बसपा के लिए मायने न रखे पर कहीं न कहीं सपा की भारी अंतर से हुई जीत यह संदेश देने के लिए काफी रही कि बसपा के विकल्प के रूप में उसका ही दावा मजबूत है। भाजपा यहां एक निर्दलीय उम्मीदवार से भी पीछे चली गई। शायद यही वजह है कि सपा इतरा कर कह रही है कि यह शानदार जीत 2012 के विधानसभा चुनाव की शक्ल-सूरत बताने के लिए काफी है। कांग्रेस यह बता कर खुश है कि उसके समर्थन के चलते ही सपा उम्मीदवार को भारी मतों से जीत मिली। भले ही बसपा यह कह कर उपचुनाव के नतीजे से अपने को अलग कर ले कि वह चुनाव ही नहीं लड़ी थी, लेकिन सपा उम्मीदवार राजमती निषाद की 26 हजार से अधिक मतों से जीत, बसपा का दर्द बढ़ाने वाली रही। एक तो सपा का जीतना और उस पर भी उन राजमती का, जिसे चुनाव लड़ने के कारण बसपा ने पार्टी से निष्कासित कर दिया था। राजमती ने बसपा के दोहरे चरित्र को ही अपना चुनावी मुद्दा भी बनाया। वास्तव में अपने पति और पूर्व मंत्री जमुना निषाद के निधन से रिक्त इस सीट पर जब राजमती ने निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा की तो बसपा ने उन्हें निष्कासित कर दिया था, जबकि यहीं काम पूर्व मंत्री जितेन्द्र जायसवाल उर्फ पप्पू ने किया तो बसपा ने न केवल उन्हें पार्टी में बनाए रखा, बल्कि उसके नेताओं ने अंदरखाने सहयोग देने का भी काम किया। राजमती के साथ बसपा का रवैया स्वजातीय निषाद बिरादरी को उनके लिए एकजुट बनाने में तो सहायक रहा ही, लोगों में उनके प्रति सहानुभूति को बढ़ाने वाला भी रहा। दरअसल, 2012 के विधानसभा चुनाव के पहले होने वाले इस उपचुनाव में विजय हासिल कर खुद को सत्ता का विकल्प साबित करने की चाहत ने इस चुनाव को सपा और भाजपा के लिए खासा महत्वपूर्ण बनाया। तीन बार निर्दलीय चुनाव जीत चुके जितेन्द्र जायसवाल क्षेत्र में अच्छी पकड़ के मद्देनजर सपा के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव एवं नेता विरोधी दल शिवपाल सिंह यादव ने भी क्षेत्र को मथा। भाजपा उम्मीदवार राधेश्याम सिंह की जीत-हार स्थानीय सांसद योगी आदित्यनाथ की प्रतिष्ठा से सीधे तौर पर जुड़ी हुई थी, पर उनकी तमाम कोशिशें परवान न चढ़ सकीं। सपा में मना जश्न गोरखपुर के पिपराइच विधानसभा उपचुनाव में पार्टी प्रत्याशी राजमती निषाद की जीत पर शुक्रवार को सपा में जश्न मना। उपचुनाव जीतने की खबर मिलते ही सपा नेताओं-कार्यकर्ताओं में उत्साह की लहर दौड़ गई। नौजवानों की टोलियां ढोल-नगाड़े के साथ विक्रमादित्य मार्ग स्थित सपा मुख्यालय पर जुटती गई। सबने आपस में एक-दूसरे को जीत की बधाई देते हुए मुंह मीठा कराया। पटाखे दगा कर और लड्डू बांटकर भी खुशी का इजहार किया गया।
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