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Wednesday, June 15, 2011

भेदभाव का कानून बनाने की तैयारी


पता नहीं यह वक्त और नेतृत्व का बदलाव है या सामाजिक विद्वेष को ही अपनी सत्ता की बुनियाद बनाने का फार्मूला कि अंग्रेजों के जिन सांप्रदायिक कानूनों का कभी कांग्रेस ने विरोध किया था, अब वही कांग्रेस कुछ शब्दावलियों का हेरफेर करके एक ऐसा कानून बनाने जा रही है, जो समाज में परस्पर नफरत और बहुसंख्यक समाज के दमन का हथियार बन सकता है। भारत के इतिहास में दो नमूने मिलते हैं। एक कानून अंग्रेजों ने 1888 में उत्तर प्रदेश में बनाया था और दूसरा कानून 1922 में तत्कालीन नवाब बेगम ने अपनी रियासत भोपाल में बनाया था। अंतर केवल इतना है कि तब अंग्रेजों और भोपाल की नवाब बेगम ने खुलकर इस्लाम और मुसलमान शब्दों का इस्तेमाल पूरी ताकत से किया था, जबकि ताजा कानून में वही विशिष्ट अधिकार अल्पसंख्यकों को दिए गए हैं। अंग्रेजों और भोपाल की नवाब बेगम द्वारा मुसलमानों के संरक्षण को लेकर कानून बनाने के पीछे उनके मकसद थे। अंग्रेज 1857 के कटु अनुभव से निकले थे। वे भारत में सांप्रदायिक विभाजन करके मुसलमानों को अपने पक्ष में करना चाहते थे। इसीलिए लार्ड मिंटो के जमाने में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन गर्वनर जनरल आसलेन ने म्युनिसपल और लोकल वार्डो में चुनाव के लिए मुसलमानों को विशिष्ट दर्जा देने का कानून बनाया तो भोपाल रियासत के गैर-मुस्लिमों (जो बहुमत में थे) पर दबाव बनाने के लिए तत्कालीन नवाब बेगम ने भी ऐसे ही कानून की नींव रखी। इन दोनों ही कानूनों का कांग्रेस ने डटकर विरोध किया था। 1911 में संपन्न कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन और 1913 के कराची अधिवेशन में कांग्रेस ने अंग्रेजों से कानून बदलने की मांग की और आंदोलन की घोषणा की, जबकि भोपाल के मामले पर गांधी जी ने पहले पत्र लिखकर फिर व्यक्तिगत संदेश भेजकर कहा कि वह कानून राष्ट्रीय एकता में बाधक है। इतिहास गवाह है कि कांग्रेस की पहल पर वे दोनों कानून बदले गए। यह बात अलग है कि कानून भले ही बदल गए हों, लेकिन वे देश में कुछ ऐसा विष छोड़ गए थे, जिसके आधार पर भारत ने विभाजन की त्रासदी झेली और पाकिस्तान का अस्तित्व सामने आया। समाज में वह कड़वाहट आज भी है, जो यदा-कदा दंगों के रूप में सामने आती है। त्रासदी का इतना कठोर अनुभव झेलने के बावजूद भारत सरकार फिर एक ऐसा कानून बनाने जा रही है, जो धूमिल होती सांप्रदायिक और सामाजिक विद्वेष की भावनाओं को और तीखा करेगा। सच्चर कमेटी की सिफारिशों के आधार पर केंद्र सरकार ने एक ऐसे कानून का मसौदा तैयार किया है, जो भारत में अल्पसंख्यकों को अति विशिष्ट दर्जा तो देगा ही, साथ ही उन्हें यह विशेषाधिकार भी देगा, जिससे वे किसी भी गैर-अल्पसंख्यक को बिना किसी सबूत उपलब्ध कराए केवल शिकायत और सूचना के आधार पर गिरफ्तार करा सकेंगे और जमानत भी नहीं होगी। संयोग से इस कानून का मसौदा उसी कांग्रेस के नेतृत्व में काम करने वाली सरकार ने तैयार किया है, जिसने आजादी के पहले किसी भी सांप्रदायिक विभाजन के कदम का विरोध किया और जो किसी सांप्रदायिक सीमा से ऊपर उठकर सोचने का दंभ किया करती थी। विधेयक के मसौदे में व्यक्तिगत शिकायत में किसी गवाह या किसी प्रमाण के बिना पुलिस कार्रवाई करने के लिए बाध्य होगी। व्यक्तिगत शिकायत नहीं है, फिर भी कोई व्यक्ति यदि सूचना देता है कि अमुक व्यक्ति या समूह की बातचीत अल्पसंख्यकों की भावना को आघात पहुंचाने वाली है या अमुक व्यक्ति या समूह अल्पसंख्यकों की भावनाओं को आघात पहुंचाने या किसी भी प्रकार का नुकसान पहुंचाने का षड्यंत्र कर रहा है, तब भी अमुक व्यक्ति और उससे जुड़े समूह की गिरफ्तारी होगी। जमानत नहीं होगी और शिकायतकर्ता को कोई सुबूत या गवाह पेश करने की जरूरत होगी। शिकायतकर्ता यदि चाहे तो अपना नाम भी गुप्त रख सकता है। इसके अलावा इस मसौदे में प्रत्येक स्तर पर एक अभिकरण बनाने का भी प्रावधान है, जिसमें अल्पसंख्यक और जनजाति समूहों के सदस्यों की संख्या निर्धारित है। कई बार कानून के प्रावधान इतने महत्वपूर्ण नहीं होते, जितने कानून बनाने के पीछे की नीयत और उसे लागू करने की परिस्थितियां और मानसिकता होती है। इस कानून के मसौदे के पीछे भी यही दोनों बातें एक प्रश्न बनकर आ खड़ी हुई हैं। हाल में ही दक्षिणी और पूर्वी भारत के पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम सामने आए हैं। परिणामों के विश्लेषण से यह बात साफ हुई है कि सभी प्रांतों में उन राजनैतिक दलों ने अपनी सरकारें बना ली है, जिन्हें उन प्रांतों में अल्पसंख्यक मतदाताओं ने समर्थन दिया था। अब उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं। उत्तर प्रदेश में कभी अखंड राज करने वाली कांग्रेस से केवल इसी प्रदेश में नहीं, बल्कि पूरे उत्तर, पश्चिम और मध्य भारत में अल्पसंख्यक वोट कांग्रेस से रूठा हुआ है। कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अपने पैर दोबारा जमाने की कोशिश कर रही है। खबरें हैं कि उत्तर प्रदेश के अल्पसंख्यक मुलायम सिंह और मायावती दोनों से दूरियां बना रहे हैं। ऐसे में केवल कांग्रेस है, जिसे वे एक बार फिर अपनी पसंद का दल बना सकते हैं। यदि कांग्रेस इसमें कामयाब रही तो वह पहले या दूसरे क्रम पर आ सकती है। यह माना जा रहा है कि अल्पसंख्यकों को विशिष्ट अधिकार और कानूनी हथियार देने वाला यह कानून इसी रणनीति का हिस्सा है। केंद्र सरकार का यह कदम उसे अंग्रेजों के ठीक उसी सोच के समीप लाकर खड़ा कर देता है, जिसमें सामाजिक विभेद पैदा करके या सांप्रदायिक वैमनस्य की कीमत पर भी सत्ता को मजबूत करने का उपाय शामिल किया गया था। दूसरी महत्वपूर्ण बात माहौल और मानसिकता की है। भारत में अधिकार कानूनों का इस्तेमाल लोग अपने हित संरक्षण के लिए कम और दूसरे को नीचा दिखाने, नेस्तनाबूद करने या अहंकार की तुष्टि के लिए अधिक करते हैं। दहेज प्रताड़ना, बलात्कार, अनुसूचित जाति से संबंधित कानूनों में अब यह बात साफ हो गई है कि अपने केस को मजबूत करने और आरोपी को बेहद मुश्किल में डालने के लिए इन धाराओं का इस्तेमाल होता है। इनमें 60 से 65 प्रतिशत तक मामले झूठे होते हैं। कानून के जितने सख्त प्रावधान महिला या अनुसूचित जाति के लिए हैं, ताजा कानून उससे कई गुना सख्त और एकतरफा है। स्वाभाविक है कि इनका इस्तेमाल भी उन्हीं कानूनों की तरह होगा, जैसा दूसरे कानूनों का हो रहा है। आजादी के पहले भी ऐसे कानून कभी पसंद नहीं किए गए। फिर भी यह माना जाता था कि वे सरकारें भारतीय जन के अनुरूप नहीं थीं। उन्हें भारत की भावनाओं से कोई लेना देना नहीं था, बल्कि वे भारत को खंडित देखना चाहती थीं, कमजोर देखना चाहती थीं। आजादी के बाद इस विचार में बदलाव की उम्मीद थी, लेकिन दुर्भाग्य है कि आजादी के कोई 64 साल बाद भी भारत की सरकारें बिल्कुल अंग्रेजों की तरह सोचती हैं और उन्हीं जैसे विभाजनवादी कानून बनाने की तैयारी करती हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


उमा भारती से सधेंगे कई निशाने


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मंशा के मुताबिक उमा भारती को भाजपा में एडजस्ट कराने में राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी को भले ही छह महीने मशक्कत करनी पड़ी हो, लेकिन पार्टी साध्वी के सहारे कई निशाने साधने की उम्मीद लगाए है। उमा ही मिशन उप्र में पार्टी का चेहरा होंगी और भाजपा का सत्ता वनवास खत्म कराना पहला टारगेट रहेगा। छह साल पूर्व निष्कासित हुई उमा भारती को यूपी में सक्रिय करने की रणनीति कुछ बड़े नेताओं का विरोध होने के बावजूद यूं ही नहीं बनी है। मिशन दिल्ली विजय के लिए नेतृत्व हर दांव लगाने को तैयार है। फ्रिक, पिछड़े वर्ग की वोटों को लौटाने और ग्रामीण इलाकों में लगातार घट रहे जनाधार को बढ़ाने की भी है। कल्याण सिंह की विदाई के बाद से गड़बड़ाई सोशल इंजीनियरिंग दुरुस्त नहीं हो पाई। खासकर लोध बाहुल्य इलाकों में आउट हो चुकी पार्टी की जड़ें फिर से जमाने का जिम्मा भी उमा पर होगा। मंदिर आंदोलन में भाजपा की रीढ़ रही अतिपिछड़ी जातियों पर बसपा प्रेम हावी है। असली चिंता प्रदेश में कई चेहरे बदलने का प्रयोग करने के बाद भी भाजपा 90 के दशक वाले तेवरों में नहीं लौट पा रही है। गुटबाजी के चलते विधायकों की संख्या घटकर 50 से नीचे पहुंच गई, तो सांसदों की गिनती दस से आगे नहीं बढ़ पा रही है। पिछले कुछ माह से प्रदेशीय नेता और कार्यकर्ता सड़कों पर भले ही जूझ रहे हो, लेकिन जनता साथ नहीं मिल पा रहा है। इस करिश्मे की आस भी पार्टी उमा भारती से लगाए है। राम मंदिर आंदोलन में अग्रणी रही उमा भारती इस बार गंगा मैया की जयकार करती दिखे, तो अजरज न होगा। पार्टी में वापसी के समय राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने गंगा अभियान संयोजक की जिम्मेदारी उमा को सौंपी। मंदिर के बजाए रामराज (सुशासन) लाने की मुहिम जोरों से चलेगी। भ्रष्टाचार और महिला अत्याचार जैसे मुद्दों पर सरकार विरोधी माहौल को भाजपा के पक्ष में लाने का जिम्मा भी उमा पर होगा। प्रदेश प्रवक्ता हृदयनारायण दीक्षित का मानना है कि सपा व बसपा के भ्रष्टाचार और कुशासन को उजागर करना अब अधिक आसान होगा। बसपा, सपा और दिग्गी राजा : भाजपाइयों को भरोसा है कि मप्र से दिग्गी राजा की सल्तनत उखाड़ने का श्रेय लेने वाली उमा को अब यूपी में कांग्रेस की वापसी के लिए दिग्विजय सिंह द्वारा तैयार चक्रव्यूह ध्वस्त करना होगा। उमा के जरिए ही भाजपा और संघ पर बढ़ते दिग्गी राजा के हमलों का माकूल जवाब मिल सकेगा। बसपा और कांग्रेस के महिला नेतृत्व पर जवाबी हमले कराने में साध्वी अधिक असरदार साबित होगी। महामंत्री विंध्यवासिनी का कहना है कि विपक्ष पर भाजपा के वार अधिक धारदार और असरदार होंगे।


बसपा के विकल्प की जिद्दोजहद


समाजवादी पार्टी का दो दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन मंगलवार को आगरा में शुरू हो गया। इसमें पार्टी का पूरा फोकस सूबे में खुद को बसपा का असली विकल्प साबित करने पर केंद्रित रहा। उसने इसे साबित करने करने के लिए यह दलील भी दी कि बसपा भी सपा को ही अपना दुश्मन नंबर एक मानती है। कांग्रेस के उभार और भाजपा के उमा भारती को आगे कर पिछड़ा वर्ग कार्ड खेलने की कोशिश को लेकर पार्टी खासी चिंतित नजर आई। पार्टी का पूरा जोर विधानसभा चुनाव में वोटों के विभाजन को रोकने पर रहा। पार्टी का मानना है कि चुनावों में वोटों का बिखराव हो गया तो सूबे में सत्ता हासिल करने का उसका ख्वाब-ख्वाब ही रह जाएगा। मुस्लिम वोट बैंक की चिंता : अधिवेशन में सपा मुस्लिम मतों के बिखराव और विशेषकर कांग्रेस के प्रति उनके झुकाव को लेकर वह खासी चिंतित नजर आई। पार्टी को यह डर है कि लोकसभा की तर्ज पर यदि विधानसभा चुनावों में भी मुसलमानों का झुकाव कांग्रेस की ओर हो गया तो उसे खासी दुश्वारियां हो सकती हैं। यही वजह रही कि पार्टी ने अधिवेशन में सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्र आयोग की रिफारिशों को लागू न करने पर कांग्रेस को निशाना बनाया। सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने साफ किया कि जब तक केंद्र, सरकारी नौकरियों में मुसलमानों को आरक्षण नहीं देता, तब तक इस कौम का भला नहीं होगा।
लक्ष्य यूपी, निगाह केंद्र पर : अधिवेशन में सपा का सतही लक्ष्य तो सूबे की सत्ता रहा,लेकिन उसकी निगाह केंद्र के मौजूदा हालात पर भी लगी है। मुलायम ने इसे छिपाया भी नहीं। उन्होंने कहा कि पार्टी का लक्ष्य 2012 में राज्य में सरकार बनाना तो है ही साथ में 2014 के लोकसभा चुनाव में इतनी सीटें जीतना है कि उसके बिना सहयोग के केंद्र में सरकार न बन सके। उन्होंने केंद्र और प्रदेश दोनों ही सरकारों को भ्रष्टाचारी करार देते हुए तीखा हमला बोला। हालांकि उन्होने सीधे तौर पर बाबा रामदेव का जिक्र तो नहीं किया, लेकिन विदेशों में जमा कालेधन का मुद्दा उठाकर बाबा के आंदोलन का समर्थन कर इरादे जाहिर कर दिए।
सीमाओं पर बढ़ता खतरा : सपा मुखिया सीमाओं के प्रति केंद्र की उदासीनता का मुद्दा अर्से से उठा रहे हैं। विशेषकर चीन की सीमा पर सक्रियता का मामला। इसका जिक्र अधिवेशन में भी कर केंद्र को निशाना बनाया। सीमा पर पाक प्रायोजित आतंवाद के मुद्दे को उठाकर उन्होंने अपनी चिंताएं जाहिर की। आतंकी ओसामा बिन लादेन की मौत के साथ पाकिस्तान की स्वायत्तता पर अमेरिकी हस्तक्षेप को अफगानिस्तान और इराक पर हमला जैसा ही गंभीर मामला बताया। इसके अलावा 2 जी स्पेक्ट्रम, राष्ट्रमंडल खेल घोटालों का जिक्र करते हुए कहा कि यूपीए सरकार में भ्रष्टाचार से लड़ने का हौसला नहीं है। महंगाई का जिक्र कर आम जनता की नब्ज छूने की कोशिश की। साथ पार्टी कार्यकर्ताओं को इन मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाने और सरकार को बेनकाब करने को कहा।
आजम रहे गैरहाजिर : अधिवेशन के पहले दिन फायरब्रांड नेता मोहम्मद आजम खां की गैर मौजूदगी भी आश्चर्यजनक रही। वैसे पार्टी का कहना रहा कि वह बुधवार को अधिवेशन में शामिल होंगे।