स्वामी रामदेव को संतों और अन्य समर्थकों के दबाव में बिना परिणाम अनशन तोड़ देना पड़ा। उनके अनशन के प्रति कांग्रेस के नेता चाहे जितना उपहास करें, अटपटे बयान दें, सार्वजनिक तौर पर असभ्य बेरुखी प्रकट करें इससे पूरे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ माहौल तो बना ही है। रामदेव के समर्थक एवं विरोधी दोनों ही कांग्रेस पार्टी एवं सरकार के रवैये से क्षुब्ध हैं। बाबा के आंदोलन की ऐसी परिणति की किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। वस्तुत: देश की दशा बदलने की दिशा में सक्रिय लोगों के लिए रामदेव के आंदोलन की ऐसी दारुण परिणति एक सीख है। रामलीला मैदान का घटनाक्रम सत्ता की हिंसक शक्ति का एक क्रूर आचरण था। भारत ही नहीं, दुनिया के सभी आंदोलनकारियों व सत्याग्रहियों को इनका सामना करना पड़ता है। जब आप सत्ता के विरुद्ध सीना तानकर खड़े होंगे और उसके फुसलावे में नहीं आएंगे तो फिर आपको हिंसक शक्ति का प्रहार झेलना होगा। संसदीय लोकतंत्र की मजबूरी शासन को आरंभ में ऐसा प्रदर्शन करने को विवश करती है जिसमें वह विरोध के समाधान के लिए बातचीत की कोशिश करती है, किंतु उसके अंदर का शासक लंबे समय तक मान-मनौव्वल की इजाजत नहीं देता और उसके बाद वह विरोध को हर तरीके से कुचलने पर आमादा हो जाता है। किसी भी आंदोलन की पहचान उस समय बिना घबराए अहिंसक प्रतिरोध में है। देश इस समय भ्रष्टाचार, अपराध, महंगाई, पूंजीपतियों और सरकार की मिलीभगत से किसानों की जमीने हड़पने और धीरे-धीरे गांवों का अस्तित्व समाप्त करने की घृणित नीतियों का शिकार है और इन नीतियों के परिणामस्वरुप प्रकृति प्रदत्त विरासत यानी नदियां, जंगल और पहाड़ तक नष्ट हो रहे हैं। सच कहा जाए तो पूरा माहौल समग्र परिवर्तन के लिए व्यापक आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार कर चुका है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो भारत को इस समय एक नए आजादी के आंदोलन की आवश्यकता है। आज देशभर में छोटे-बड़े आंदोलन अनेक जगहों पर अलग-अलग तरीकों से हो रहे हंै। यह बात अलग है कि उनमें किसी को प्रचार मिलता है एवं किसी को नहीं। एक बड़े वर्ग के अंदर असंतोष इतना ज्यादा है कि जहां भी कोई व्यवस्था के विरुद्ध आवाज उठाता है, लोगों को उसमें उम्मीद नजर आने लगती है और वह उसी ओर खिंच जाता है। केवल लोकपाल कानून बनाने के लिए किए गए अन्ना हजारे के अनशन को मिले जनसमर्थन से इस बात को समझा जा सकता है। हालांकि बाबा रामदेव ने सत्याग्रह से पूर्व यात्राएं करके देश के साढ़े तीन सौ से ज्यादा जिलों में लोगों को अपने स्वाभिमान ट्रस्ट से सीधे जोड़ने की कोशिश की। हालांकि उनके आंदोलन का समर्थन करने वाले लोगों की संख्या इस अभियान के कारण भले ही कई गुना हो गई, लेकिन इतना व्यापक समर्थन भी दिल्ली पुलिस की कार्रवाई के सामने नहीं टिक पाई तो इसके कारणों की गहराई से पड़ताल करनी पड़ेगी। अन्ना के अनशन पर गहराई से नजर रखने वाले मानते हैं कि जिस तरह के लोग उनमें शिरकत कर रहे थे उसमें यदि वहां भी पुलिस कार्रवाई होती तो अन्ना सहित कुछ लोगों को छोड़कर उसकी अंतिम परिणति भी ऐसी ही हो सकती थी। यह प्रचारित किया जा रहा है कि पुलिस बाबा को मुठभेड़ में मार देती, लेकिन ऐसा कोई पागल और उन्मादियों की सरकार ही कर सकती थी। बाबा तो छोडि़ए, सुनियोजित तरीके से एक भी आंदोलनकारी की हत्या तक पुलिस नहीं कर सकती, क्योंकि इसके राजनीतिक परिणाम को कांग्रेस एवं सरकार दोनों समझती हैं। मान लीजिए पुलिस हत्या करने ही आई हो तो भी देश में बदलाव लाने के संकल्प से संघर्ष करने वालों को ऐसी किसी स्थिति से निपटने के लिए तैयार होना चाहिए। एक सत्याग्रही को विनम्रता से पुलिस अत्याचार के सामने भी निर्भीक होकर खड़ा होना चाहिए। अगर आपकी इतनी तैयारी नहीं है तो आप किसी आंदोलन को उसके निश्चित परिणाम तक नहीं ले जा सकते। वास्तव में इस समय कुशासन तथा राजनीतिक प्रतिष्ठानों में क्षरण से कहीं ज्यादा बड़ी त्रासदी इनके विरुद्ध चलने वाले आंदोलनों के पीछे लंबी दूरगामी सोच और इसके अनुरुप तैयारी का अभाव है। इस समय देश में जो भी आंदोलन, धरना, भूख हड़ताल, विरोध प्रदर्शन आदि हो रहे हैं उनकी आवश्यकता-उपयोगिता तो है, लेकिन दूरगामी सोच और उसके अनुसार लंबे संघर्ष की तैयारी न होने के कारण इनमें से ज्यादातर असफल हो रहे हैं। इन आंदोलनों में शामिल लोगों की वाणी में सरकार के विरुद्ध गुस्सा भले हो पर ऐसे अभियानों की सफलता को लेकर हताशा भी बढ़ रही है। आंदोलनकारी के रूप में चिह्नित और प्रसिद्धि प्राप्त लोगों की ओर ही नजर उठा लीजिए। इनमें से अधिकतर परिवर्तन के व्यापक लक्ष्य एवं उसके लिए लंबे संघर्ष की तैयारी के बारे में सोचते तक नहीं। किसी एक नीति, एक समस्या, अन्याय, प्राकृतिक आपदा से निपटने में सरकारी विफलता के विरुद्ध स्वाभाविक आक्रोश को ये तात्कालिक आंदोलन का रूप तो दे देते हैं, लेकिन उसे समग्र बदलाव के व्यापक लक्ष्य से जोड़ने एवं इच्छित परिणाम लाने तक डटे रहने का संकल्प पैदा नहीं कर पाते। इन आंदोलनों में विचार से ज्यादा भावावेश का आग्रह दिखता है। शासन की एक हिसंक कार्रवाई पूरे आंदोलन की रीढ़ तोड़ देती है। भट्टा पारसौल का उदाहरण लीजिए। मैंने खुद उस गांव की यात्रा के दौरान पाया कि पुलिस से डरे-सहमे ग्रामीण बार-बार यह कह रहे थे कि उनका तो आंदोलन से कोई लेना-देना ही नहीं था। इसका एकमात्र कारण आंदोलन के स्पष्ट लक्ष्य और उसके अनुरुप पूरी तैयारी का न होना है। सत्याग्रह के रूप में उपनिवेशवाद एवं साम्राज्यवाद की हिंसक शक्ति के सामने सशक्त प्रतिरोध का अहिंसक हथियार देने वाले महात्मा गांधी ने भी साफ कहा था कि सत्याग्रह के पूर्व उसकी पूरी तैयारी होनी चाहिए। उन्होंने तो यहां तक कहा है कि सत्याग्रह का नेतृत्व करने वालों को एक-एक सत्याग्रही के चरित्र, उसके संस्कार, उसकी पृष्ठभूमि, क्षमता आदि बातों की जानकारी होनी चाहिए और उसी अनुरूप उसकी भूमिका निर्धारित की जानी चाहिए। यानी जब पूरी तैयारी हो जाए तब आंदोलन का शंखनाद कीजिए। स्वामी रामदेव ने देशभर में भ्रष्टाचार, शासन की औपनिवेशिक नीति के विरुद्ध लोकजागरण में अहम भूमिका निभाई। हालांकि लंबे समय से स्थानीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर अनेक लोग एवं संगठन ऐसा कर रहे हैं, किंतु बाबा की लोकप्रियता के कारण इस समस्या की ओर ध्यान ज्यादा गया। व्यवस्था से असंतुष्ट एवं बदलाव की इच्छा रखने वालों के व्यापक समर्थन से कोई भी उत्साहित हो सकता था, किंतु इन समर्थकों को आंदोलनकारी-सत्याग्रही मान लेना व्यावहारिक नहीं होगा। वस्तुत: लोकजागरण के समानांतर संघर्ष की तैयारी का अभियान जरूरी है। इसमें अहिंसक संघर्ष करने वालों को शासन के प्रलोभन से लेकर दमन तक अपने रुख पर कायम रहने का संकल्प पैदा करने की आवश्यकता होती है। इसके लिए उचित प्रशिक्षण अनिवार्य है। आतंरिक रूप से तैयार आंदोलनकारी के सामने पूरे देश की फौज भी उतार दी जाए तो वह घबराएगा नहीं। वह शांति से अपनी गिरफ्तारी देगा और रिहा होने के बाद फिर आंदोलन में शामिल हो जाएगा। ऐसे आंदोलनकारियों का समूह ही किसी आंदोलन को सफलता की मुकाम पर ले जा सकेगा। देश की दुर्दशा एवं आंदोलनों के ऐसे हश्र को देखते हुए कुछ लोग कह रहे हैं कि भारत में अब लोकजागरण, देशनिर्माण एवं संघर्ष तीनों मोर्चे पर एक साथ काम करना होगा। लोगों को बताया जाए कि भारत की ऐसी दुर्दशा क्यों है और इससे निकलने का रास्ता क्या है? इसके सत्ता के अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा भरनी होगी। संघर्ष के पूर्व उसकी पूरी तैयारी जरूरी है ताकि किसी भी परिस्थिति में आंदोलनकारी न भयभीत न हों, धैर्य न खोएं और हिंसक न हों। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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Friday, June 17, 2011
अलग प्रकृति के दो अनशन
लेखक बाबा रामदेव को भ्रष्टाचार विरोधी अपने आंदोलन की पैठ हिंदी पट्टी में पहुंचाने का श्रेय दे रहे हैं …
4 मई को एक अंग्रेजी न्यूज चैनल ने अपने नाजुकमिजाज रिपोर्टरों को बाबा रामदेव के योग शिविर की रिपोर्टिग के लिए दिल्ली के रामलीला मैदान में भेजा। बॉलीवुड स्टारों की रिपोर्टिग करने वाली एक रिपोर्टर ने आम जनजीवन का यह रूप नहीं देखा था। वह योगा के रॉक स्टार के समर्थन में देश के कोने-कोने से आए लोगों की विशाल संख्या और उनके उत्साह को आंखें फाड़-फाड़कर देख रही थीं। वह इतनी बड़ी संख्या में मीडियाकर्मियों की उपस्थिति से भी अचंभित थीं। उन्होंने एक सांस में कहा-यहां इतने चैनल हैं, जिनके बारे में मैंने सुना तक नहीं है। उनके लिए जिनके टीवी सेट टॉप बॉक्स के जरिये मनोरंजन और समाचार चैनल चलते हैं, यह अनभिज्ञता समझ में आती है। जमीन से कटे ये पत्रकार रहस्यमयी भारत की तस्वीरें दिखाने में ही संतुष्ट रहते हैं, जिनमें जीने की कला सिखाने वाले श्री श्री रविशंकर का दर्शन अहम स्थान हासिल करता है। ये ग्रामीण जीवन को भी रूमानियत के साथ प्रदर्शित करते हैं और खाप पंचायतों के तालिबान सरीखे फैसलों को देख कर ये खौफजदा हो जाते हैं। इस प्रकार के रूमानी पत्रकार इस तथ्य से अनभिज्ञ हैं कि भारत का बहुआयामी स्वरूप एक सच्चाई है। यह भी स्वयंसिद्ध है कि भारत के जनमानस और जटिल हालात चुनाव के समय ही राष्ट्रीय या क्षेत्रीय मीडिया में कुछ हद तक प्रतिबिंबित होते हैं। यह मीडिया की वरीयता में ही नहीं है कि वह समाज में सौंदर्यपरक और सामाजिक आवेगों में दृष्टिगोचर परिवर्तनों की पड़ताल करे। पिछले तीन-चार साल से रामदेव के स्वास्थ्य मेले और राष्ट्रभक्ति के निहितार्थो की चर्चा है। मुझे लगता है कि रामदेव का अपने अभियान के विस्तार का फैसला और सरकार से काले धन व भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई की मांग महत्वपूर्ण हैं। इसके लिए उन्हें गैरमहानगरीय लोगों से संपर्को से शक्ति मिली है। अन्ना हजारे और रामदेव के सिविल सोसायटी आंदोलनों की प्रकृति में तीखे वर्ग भेद हैं। पुराने गांधीवादी और उनकी टीम आधुनिक शिक्षा से लैस और वैश्विक पहुंच वाली है। इनमें मैगसेसे पुरस्कार से पुरस्कृत व्यक्ति और प्रख्यात कानूनविद शामिल हैं। ये विकास और राजनीति के आधुनिक मुहावरों से परिचित हैं। इस भाषा से मुख्यधारा का मीडिया सहजता और जुड़ाव महसूस करता है और इसका सम्मान करता है। अन्ना आंदोलन के तीन महत्वपूर्ण घटक हैं। ये समूह हैं-पेशेवर एक्टिविस्टों का ऐसा समूह जो संगठित राजनीति से घृणा करता है, वरिष्ठ नागरिक, जो विश्व के नैतिक पतन से भयाक्रांत हैं और आदर्शवादी युवा, जो मानते हैं कि सोशल मीडिया नेटवर्किग के जरिए बदलाव संभव है। अन्ना आंदोलन मेड इन इंडिया अभियान है। पिछले दिनों दिल्ली के जंतर मंतर पर उनके अनशन में बिना किसी प्रलोभन या सांगठनिक प्रयास के ही भीड़ उमड़ी थी। हालांकि इसमें टीवी चैनलों का भी बड़ा हाथ था। इसी कारण सरकार को नए लोकपाल बिल के मसौदे को तैयार करने वाली संयुक्त कमेटी की अन्ना की मांग के आगे झुकना पड़ा। इसमें संदेह नहीं कि इसमें अन्ना हजारे के मनमोहिनी व्यक्तित्व का भी बड़ा हाथ रहा, जो सादगी और संजीदगी के प्रतिरूप हैं। हालांकि यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि क्या अन्ना के अनशन की सफलता में अनशन स्थल जंतर मंतर की भी भूमिका है? अन्ना हजारे के अनशन में पांच हजार लोगों से ही जंतर मंतर पूरा भर गया, जबकि रामदेव ने अपने प्रदर्शन की शुरुआत ही करीब 40 हजार लोगों से की थी। अन्ना हजारे के अधिकांश समर्थक राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से संबद्ध थे, जबकि योगगुरु ने पूरे देश भर से लोगों को इकट्ठा किया था। इसके बावजूद सरकार ने दंगे की आशंका का खतरा उठाते हुए भी आधी रात को रामदेव और उनके समर्थकों पर धावा बोल दिया। इन दोहरे मापदंडों की व्याख्या किस प्रकार की जा सकती है? जवाब स्पष्ट है। अन्ना हजारे जिस सिविल समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, वह महानगरीय मध्यम वर्ग की श्रेणी में आता है। रामदेव का समर्थन आधार मुख्यत: छोटे शहरों और गांवों से संबद्ध था और वह चमक-दमक से कोसों दूर था। अंग्रेजी भाषी मीडिया इस अभियान के विरोध में था और इसे आरएसएस के एक और गोरक्षा प्रदर्शन की तर्ज पर पेश कर रहा था। रामदेव के समर्थन में एक भी बॉलीवुड स्टार आगे नहीं आया। यहां तक कि अन्ना हजारे भी स्टेज पर आने को लेकर दुविधाग्रस्त रहे। यह उस तरह का शक्ति प्रदर्शन नहीं था, जिससे दिल्ली की जनता परिचित है। उनके लिए यह रूढि़वादी लोगों का एक जमावड़ा भर था। अंग्रेजी चैनलों के संशय के विपरीत हिंदी चैनलों ने रामदेव प्रकरण को गंभीरता और ईमानदारी से दिखाया। उनके दर्शकों के लिए रामदेव श्रद्धेय हैं, न कि ऐसा व्यक्ति जिसका अर्थशास्त्र के अधकचरे ज्ञान पर उपहास उड़ाया जाए। दोनों आंदोलनों में तीखे वर्ग विभेद के बारे में कोई संदेह नहीं है। पिछली दफा मैंने अयोध्या आंदोलन के दौरान इसे अनुभव किया था। 1990 में भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा से पहले तक महानगरीय भारत रामजन्मभूमि विवाद महत्व नहीं देता था। यह देश के अंतर में मचल रहे भावनाओं के ज्वार को महसूस नहीं कर पाया और मिथ्या चेतना बताकर इसका तिरस्कार करता रहा। यह कारोबारी योगी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की पैठ हिंदी पट्टी में करने में सफल रहा है। बाबा रामदेव ने भ्रष्ट शासन के खिलाफ बढ़ते जनाक्रोश को अभिव्यक्ति दी। यह देखना दिलचस्प है कि विदेशों में काले धन को वापस लाने की रामदेव की प्रमुख मांग के स्थान पर बड़ी चतुराई से अंग्रेजी पर क्षेत्रीय भाषाओं को वरीयता देने की उनकी एक अन्य छोटी मांग को प्रमुखता दी गई। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि रामदेव ने विदेशियों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंक दिया है। हिंदू आस्था परंपरागत रूप से जातीय और क्षेत्रीय रही है। फिर भी, कुछ सामुदायिक अंतरधाराओं ने इन विभाजनों को खुद में सम्मलित किया है। पिछले दो दशकों के दौरान एक नए सामुदायिक विश्वास ने हिंदू जगत में नई ऊर्जा का संचार किया है। इसमें ब्राह्मणवाद को हाशिये पर धकेला जाना प्रमुख है। जाति से यादव रामदेव इस अवधारणा का मूर्त रूप हैं। उनके साथ खुला युद्ध छेड़कर कांग्रेस ने गलत आकलन किया है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)
भट्टा पारसौल से 2420 लोग गायब : कलराज
यमुना एक्सप्रेस वे प्रभावित क्षेत्रों में किसान बचाओं यात्रा समाप्त कर लौटे भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कलराज मिश्र ने किसानों के उत्पीड़न पर रिपोर्ट जारी करते हुए आरोप लगाया कि भट्टा पारसौल में हुए पुलिसिया अत्याचार के बाद 2420 लोग अभी गायब है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश से घटना की जांच कराने की मांग की। भाजपा सरकार आने पर बसपा शासन काल में भूमि अधिग्रहण के मामलों की आयोग से जांच कराने की बात कही। मिश्र रविवार को पार्टी मुख्यालय में पत्रकारों से बात कर रहे थे। उन्होंने किसान यात्रा को कामयाब बताते हुए आरोप लगाया कि सात मई को भट्टा पारसौल के किसानों पर हुए बर्बर अत्याचार का आतंक क्षेत्र में आज भी कायम है। उन्होंने सरकार की भूमि अधिग्रहण की नई नीति को धोखा बताया। बोले, जिन किसानों की पुश्तैनी जमीनें लूटी जा चुकी है। उन्हें सरकार ने कोई राहत नहीं दी। प्राइवेट बिल्डर्स आज भी मजे में है। उन्होंने बताया कि भाजपा के दबाव में प्रशासन ने भट्टा पारसौल से धारा 144 हटा ली। इसके बाद वहां शनिवार को पंचायत हुई, जिसमें ग्रामीणों ने पुलिस के अत्याचारों के बारे में जानकारी दी। कहा कि वीभत्स कांड की सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश से जांच कराने के बाद ही सच्चाई सामने आ सकेगी। पत्रकारों को रिपोर्ट जारी करते हुए मिश्र ने बताया कि 22 किसान आज भी जेल में है। करीब 12 हजार की आबादी में से लगभग 2420 लोग आज भी गायब है, हालांकि गायब किसानों की सूची देने से उन्होंने आनाकानी की। उनका कहना था कि नब्बे प्रतिशत भूसे का स्टाक जला देने के कारण पशुओं के भूखे मरने की नौबत है। खाद्यान्न की व्यवस्था न होने से खाने पीने की किल्लत हो रही है। लोगों को कई कई दिन भूखा रहना पड़ता है। किसानों के कृषि यंत्र भी आग के हवाले कर दिए, घरों में तोड़फोड़ हुई। गांवों में ईधन का संकट भी पैदा हो गया है। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार आई तो बसपा शासन में हुए भूमि अधिग्रहण के मामलों की जांच होगी। गड़बड़ी मिली तो अधिग्रहण निरस्त होगा। किसानों की कानूनी लड़ाई भाजपा लड़ेगी। आंदोलन में मरे किसानों को शहीद का दर्जा दिलाएंगे। दोषी अधिकारी दंडित होंगे। किसानों की मर्जी बिना भूमि अधिग्रहण नहीं होने देंगे। प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में भी किसान यात्राएं जुलाई माह से निकाली जाएगी। यात्रा में साध्वी उमा भारती के शामिल होने के सवाल पर उन्होंने कोई टिप्पणी नहीं की।
अब केंद्र के निशाने पर अन्ना
बाबा रामदेव के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाने के बाद अब केंद्र सरकार ने लोकपाल बिल पर आंदोलन की अगुवाई कर रहे समाजसेवी अन्ना हजारे को आंखें दिखानीं शुरू कर दी हैं। लोकपाल पर मसौदा समिति के अध्यक्ष एवं केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने टीम अन्ना की मांगों को असंवैधानिक करार देते हुए कहा कि सरकार लोकपाल विधेयक संसद के मानसून सत्र में जरूर पेश करेगी। हालांकि उन्होंने इसे पारित कराने की समय-सीमा बताने से साफ इंकार कर दिया। यही नहीं प्रणब ने धमकाने वाले अंदाज में यहां तक कह दिया कि हम (सरकार) सिविल सोसाइटी के आंदोलनों के सच से जनता को अवगत कराएंगे। मुखर्जी ने रविवार को यहां संवाददाताओं से बातचीत में सिविल सोसाइटी की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा, प्रस्तावित लोकपाल विधेयक के बारे में सिविल सोसाइटी का प्रतिवाद संवैधानिक है, लेकिन उनकी मांगें असंवैधानिक हैं। आखिर इस मांग में क्या दम है कि जो सरकार मानसून सत्र में लोकपाल विधेयक लाने के लिए प्रयासरत है, उसे अन्ना हजारे 15 अगस्त तक सीमाबद्ध करने पर तुले हैं। क्या इस तरह की मांग को भी जायज ठहराया जा सकता है? उसी तरह से कुछ सदस्य संयुक्त बैठक की वीडियोग्राफी की मांग कर रहे हैं, जैसे कि कोई सर्कस हो। रिकार्ड के लिए सरकार की तरफ से यथासंभव रिकार्डिग की जा रही है, फिर अलग से व्यवस्था क्यों? विरोध का मतलब यह कतई नहीं है कि कोई संविधान से ऊपर हो जाए। लोकतंत्र में संसद का फैसला अंतिम है, और उसे सभी मानने को बाध्य हैं। संविधान ने कानून बनाने का अधिकार संसद और राज्य विधानसभाओं को दिया है। अगर पांच-छह हजार लोग संसद के बाहर से अपनी बात मनवाना चाहेंगे तो इससे लोकतंत्र कमजोर होगा। उन्होंने सोसाइटी के लोगों पर निशाना साधते हुए कहा, कि यदि उन्हें इतना जनसमर्थन है, तो वे चुनाव क्यों नहीं लड़ते हैं? प्रणब ने कहा, पिछले चुनावों में हार से चिंतित भाजपा अब सोसायटी के सदस्यों को उकसा कर राजनीति कर रही है, जिसे हम कभी सफल नहीं होने देंगे। यह लड़ाई सिविल सोसाइटी बनाम सरकार नहीं, बल्कि सरकार बनाम विपक्ष की है। यह कांग्रेस के लिए राजनीतिक चुनौती है, जिससे निबटने की तैयारी की जा रही है। भाजपा को निशाने पर लेते हुए कहा, भ्रष्टाचार पर नैतिकता की बात करने वाले भाजपा नेताओं को पहले अपने गिरेबां में झांक कर देखना चाहिए। मुखर्जी ने कहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सिविल सोसाइटी के आंदोलनों के सच पर से पर्दा उठाने को कांग्रेस पुस्तिका जारी करेगी। उसके बारे में देश की जनता को जानकारी दी जाएगी। उन्होंने कहा कि जब यह सभी को पता चल ही गया है कि इन आंदोलनों के पीछे भाजपा व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हाथ है, तो फिर हमारा यह दायित्व बनता है कि सच से लोगों को अवगत कराएं। जेपी आंदोलन का नाम लिए बगैर प्रणब ने कहा कि भ्रष्टाचार को लेकर पहले भी आंदोलन हुए हैं, और जो इसमें शामिल थे, बाद में वही मंत्रिमंडल में शामिल हुए।
बाबा ने अनशन तोड़ा, आंदोलन जारी रहेगा
भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ कार्रवाई को लेकर पिछले नौ दिनों से आंदोलित योगगुरु बाबा रामदेव और उनके निकट सहयोगी बालकृष्ण ने रविवार को आध्यामिक गुरु श्रीश्री रविशंकर और संत समाज के आग्रह पर आमरण अनशन समाप्त कर दिया। हालांकि बाबा ने श्रीश्री रविशंकर के हाथों मौसमी का जूस पिलाकर अनशन तो तोड़ दिया लेकिन आंदोलन और सत्याग्रह जारी रखने का ऐलान किया है। बाबा रामदेव को स्वास्थ्य बिगड़ जाने के कारण तीन दिन पहले जौलीग्रांट स्थित हिमालयन अस्पताल में भर्ती कराया गया था। शुक्रवार को आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर ने उसने भेंट कर अनशन समाप्त करने का अनुरोध किया था। शनिवार को उन्होंने बाबा के मान जाने के संकेत देते हुए कहा था कि हम भी बाबा की लड़ाई में पूर्ण सहयोग का संकल्प लेते हैं। रविवार को रविवार सुबह पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला बाबा रामदेव से मिलने पहुंचे। इस मुलाकात के खत्म होने के बाद आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर, प्रख्यात कथावाचक मोरारी बापू, जगतगुरू कृपालुजी महाराज, जनता पार्टी सुप्रीमो सुब्रह्ममण्यम स्वामी रामदेव से मिलने गहन चिकित्सा कक्ष में पहुंचे। उन्होंने बाबा से अनशन खत्म करने का आग्रह किया। करीब एक घंटे तक चली मुलाकात के बाद श्रीश्री रविशंकर ने मीडिया को बाबा रामदेव का अनशन टूटने की जानकारी दी। रविशंकर ने बाबा को मौसमी का जूस पिलाकर अनशन तुड़वाया। हालांकि बाबा ने अनशन तोड़ दिया है लेकिन अनियमित रक्तचाप (बीपी) और बोलने में दिक्कत के कारण वे दो दिन अस्पताल में ही रहेंगे। स्थिति सामान्य होने के कारण देर रात तक उन्हें आईसीयू से प्राइवेट रूम में शिफ्ट कर दिया जाएगा। आचार्य बालकृष्ण ने अनशन तोड़ने के बाद रामदेव की ओर से लिखित वक्तव्य जारी किया, जिसमें उन्होंने सभी अनुयायियों से अनशन तोड़ने का आग्रह किया है। बाबा रामदेव ने कहा है कि कालेधन व भ्रष्टाचार के खिलाफ सत्याग्रह को एक संकल्प के रूप में आगे बढ़ाया जाएगा। भारत स्वाभिमान यात्रा जारी रहेगी। आंदोलन का पहला चरण अनशन खत्म होने के बाद पूर्ण हो गया है। भ्रष्टाचार के खिलाफ देश एकजुट हुआ है और इस अभियान ने देश को जोड़ा है। बालकृष्ण ने कहा कि पिछली गलतियों से सबक लेकर इस बार पुख्ता रणनीति के साथ बिना बिना किसी परहेज सभी को साथ लेकर आंदोलन किया जाएगा। हालांकि भावी रणनीति और इसमें शामिल होने वाले लोगों के बारे में बालकृष्ण संतोषजनक जवाब नहीं दे सके।
Thursday, June 16, 2011
आंदोलन के लिए लंबे संघर्ष की जरूरत
स्वामी रामदेव को संतों और अन्य समर्थकों के दबाव में बिना परिणाम अनशन तोड़ देना पड़ा। उनके अनशन के प्रति कांग्रेस के नेता चाहे जितना उपहास करें, अटपटे बयान दें, सार्वजनिक तौर पर असभ्य बेरुखी प्रकट करें इससे पूरे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ माहौल तो बना ही है। रामदेव के समर्थक एवं विरोधी दोनों ही कांग्रेस पार्टी एवं सरकार के रवैये से क्षुब्ध हैं। बाबा के आंदोलन की ऐसी परिणति की किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। वस्तुत: देश की दशा बदलने की दिशा में सक्रिय लोगों के लिए रामदेव के आंदोलन की ऐसी दारुण परिणति एक सीख है। रामलीला मैदान का घटनाक्रम सत्ता की हिंसक शक्ति का एक क्रूर आचरण था। भारत ही नहीं, दुनिया के सभी आंदोलनकारियों व सत्याग्रहियों को इनका सामना करना पड़ता है। जब आप सत्ता के विरुद्ध सीना तानकर खड़े होंगे और उसके फुसलावे में नहीं आएंगे तो फिर आपको हिंसक शक्ति का प्रहार झेलना होगा। संसदीय लोकतंत्र की मजबूरी शासन को आरंभ में ऐसा प्रदर्शन करने को विवश करती है जिसमें वह विरोध के समाधान के लिए बातचीत की कोशिश करती है, किंतु उसके अंदर का शासक लंबे समय तक मान-मनौव्वल की इजाजत नहीं देता और उसके बाद वह विरोध को हर तरीके से कुचलने पर आमादा हो जाता है। किसी भी आंदोलन की पहचान उस समय बिना घबराए अहिंसक प्रतिरोध में है। देश इस समय भ्रष्टाचार, अपराध, महंगाई, पूंजीपतियों और सरकार की मिलीभगत से किसानों की जमीने हड़पने और धीरे-धीरे गांवों का अस्तित्व समाप्त करने की घृणित नीतियों का शिकार है और इन नीतियों के परिणामस्वरुप प्रकृति प्रदत्त विरासत यानी नदियां, जंगल और पहाड़ तक नष्ट हो रहे हैं। सच कहा जाए तो पूरा माहौल समग्र परिवर्तन के लिए व्यापक आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार कर चुका है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो भारत को इस समय एक नए आजादी के आंदोलन की आवश्यकता है। आज देशभर में छोटे-बड़े आंदोलन अनेक जगहों पर अलग-अलग तरीकों से हो रहे हंै। यह बात अलग है कि उनमें किसी को प्रचार मिलता है एवं किसी को नहीं। एक बड़े वर्ग के अंदर असंतोष इतना ज्यादा है कि जहां भी कोई व्यवस्था के विरुद्ध आवाज उठाता है, लोगों को उसमें उम्मीद नजर आने लगती है और वह उसी ओर खिंच जाता है। केवल लोकपाल कानून बनाने के लिए किए गए अन्ना हजारे के अनशन को मिले जनसमर्थन से इस बात को समझा जा सकता है। हालांकि बाबा रामदेव ने सत्याग्रह से पूर्व यात्राएं करके देश के साढ़े तीन सौ से ज्यादा जिलों में लोगों को अपने स्वाभिमान ट्रस्ट से सीधे जोड़ने की कोशिश की। हालांकि उनके आंदोलन का समर्थन करने वाले लोगों की संख्या इस अभियान के कारण भले ही कई गुना हो गई, लेकिन इतना व्यापक समर्थन भी दिल्ली पुलिस की कार्रवाई के सामने नहीं टिक पाई तो इसके कारणों की गहराई से पड़ताल करनी पड़ेगी। अन्ना के अनशन पर गहराई से नजर रखने वाले मानते हैं कि जिस तरह के लोग उनमें शिरकत कर रहे थे उसमें यदि वहां भी पुलिस कार्रवाई होती तो अन्ना सहित कुछ लोगों को छोड़कर उसकी अंतिम परिणति भी ऐसी ही हो सकती थी। यह प्रचारित किया जा रहा है कि पुलिस बाबा को मुठभेड़ में मार देती, लेकिन ऐसा कोई पागल और उन्मादियों की सरकार ही कर सकती थी। बाबा तो छोडि़ए, सुनियोजित तरीके से एक भी आंदोलनकारी की हत्या तक पुलिस नहीं कर सकती, क्योंकि इसके राजनीतिक परिणाम को कांग्रेस एवं सरकार दोनों समझती हैं। मान लीजिए पुलिस हत्या करने ही आई हो तो भी देश में बदलाव लाने के संकल्प से संघर्ष करने वालों को ऐसी किसी स्थिति से निपटने के लिए तैयार होना चाहिए। एक सत्याग्रही को विनम्रता से पुलिस अत्याचार के सामने भी निर्भीक होकर खड़ा होना चाहिए। अगर आपकी इतनी तैयारी नहीं है तो आप किसी आंदोलन को उसके निश्चित परिणाम तक नहीं ले जा सकते। वास्तव में इस समय कुशासन तथा राजनीतिक प्रतिष्ठानों में क्षरण से कहीं ज्यादा बड़ी त्रासदी इनके विरुद्ध चलने वाले आंदोलनों के पीछे लंबी दूरगामी सोच और इसके अनुरुप तैयारी का अभाव है। इस समय देश में जो भी आंदोलन, धरना, भूख हड़ताल, विरोध प्रदर्शन आदि हो रहे हैं उनकी आवश्यकता-उपयोगिता तो है, लेकिन दूरगामी सोच और उसके अनुसार लंबे संघर्ष की तैयारी न होने के कारण इनमें से ज्यादातर असफल हो रहे हैं। इन आंदोलनों में शामिल लोगों की वाणी में सरकार के विरुद्ध गुस्सा भले हो पर ऐसे अभियानों की सफलता को लेकर हताशा भी बढ़ रही है। आंदोलनकारी के रूप में चिह्नित और प्रसिद्धि प्राप्त लोगों की ओर ही नजर उठा लीजिए। इनमें से अधिकतर परिवर्तन के व्यापक लक्ष्य एवं उसके लिए लंबे संघर्ष की तैयारी के बारे में सोचते तक नहीं। किसी एक नीति, एक समस्या, अन्याय, प्राकृतिक आपदा से निपटने में सरकारी विफलता के विरुद्ध स्वाभाविक आक्रोश को ये तात्कालिक आंदोलन का रूप तो दे देते हैं, लेकिन उसे समग्र बदलाव के व्यापक लक्ष्य से जोड़ने एवं इच्छित परिणाम लाने तक डटे रहने का संकल्प पैदा नहीं कर पाते। इन आंदोलनों में विचार से ज्यादा भावावेश का आग्रह दिखता है। शासन की एक हिसंक कार्रवाई पूरे आंदोलन की रीढ़ तोड़ देती है। भट्टा पारसौल का उदाहरण लीजिए। मैंने खुद उस गांव की यात्रा के दौरान पाया कि पुलिस से डरे-सहमे ग्रामीण बार-बार यह कह रहे थे कि उनका तो आंदोलन से कोई लेना-देना ही नहीं था। इसका एकमात्र कारण आंदोलन के स्पष्ट लक्ष्य और उसके अनुरुप पूरी तैयारी का न होना है। सत्याग्रह के रूप में उपनिवेशवाद एवं साम्राज्यवाद की हिंसक शक्ति के सामने सशक्त प्रतिरोध का अहिंसक हथियार देने वाले महात्मा गांधी ने भी साफ कहा था कि सत्याग्रह के पूर्व उसकी पूरी तैयारी होनी चाहिए। उन्होंने तो यहां तक कहा है कि सत्याग्रह का नेतृत्व करने वालों को एक-एक सत्याग्रही के चरित्र, उसके संस्कार, उसकी पृष्ठभूमि, क्षमता आदि बातों की जानकारी होनी चाहिए और उसी अनुरूप उसकी भूमिका निर्धारित की जानी चाहिए। यानी जब पूरी तैयारी हो जाए तब आंदोलन का शंखनाद कीजिए। स्वामी रामदेव ने देशभर में भ्रष्टाचार, शासन की औपनिवेशिक नीति के विरुद्ध लोकजागरण में अहम भूमिका निभाई। हालांकि लंबे समय से स्थानीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर अनेक लोग एवं संगठन ऐसा कर रहे हैं, किंतु बाबा की लोकप्रियता के कारण इस समस्या की ओर ध्यान ज्यादा गया। व्यवस्था से असंतुष्ट एवं बदलाव की इच्छा रखने वालों के व्यापक समर्थन से कोई भी उत्साहित हो सकता था, किंतु इन समर्थकों को आंदोलनकारी-सत्याग्रही मान लेना व्यावहारिक नहीं होगा। वस्तुत: लोकजागरण के समानांतर संघर्ष की तैयारी का अभियान जरूरी है। इसमें अहिंसक संघर्ष करने वालों को शासन के प्रलोभन से लेकर दमन तक अपने रुख पर कायम रहने का संकल्प पैदा करने की आवश्यकता होती है। इसके लिए उचित प्रशिक्षण अनिवार्य है। आतंरिक रूप से तैयार आंदोलनकारी के सामने पूरे देश की फौज भी उतार दी जाए तो वह घबराएगा नहीं। वह शांति से अपनी गिरफ्तारी देगा और रिहा होने के बाद फिर आंदोलन में शामिल हो जाएगा। ऐसे आंदोलनकारियों का समूह ही किसी आंदोलन को सफलता की मुकाम पर ले जा सकेगा। देश की दुर्दशा एवं आंदोलनों के ऐसे हश्र को देखते हुए कुछ लोग कह रहे हैं कि भारत में अब लोकजागरण, देशनिर्माण एवं संघर्ष तीनों मोर्चे पर एक साथ काम करना होगा। लोगों को बताया जाए कि भारत की ऐसी दुर्दशा क्यों है और इससे निकलने का रास्ता क्या है? इसके सत्ता के अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा भरनी होगी। संघर्ष के पूर्व उसकी पूरी तैयारी जरूरी है ताकि किसी भी परिस्थिति में आंदोलनकारी न भयभीत न हों, धैर्य न खोएं और हिंसक न हों। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
अलग प्रकृति के दो अनशन
लेखक बाबा रामदेव को भ्रष्टाचार विरोधी अपने आंदोलन की पैठ हिंदी पट्टी में पहुंचाने का श्रेय दे रहे हैं …
4 मई को एक अंग्रेजी न्यूज चैनल ने अपने नाजुकमिजाज रिपोर्टरों को बाबा रामदेव के योग शिविर की रिपोर्टिग के लिए दिल्ली के रामलीला मैदान में भेजा। बॉलीवुड स्टारों की रिपोर्टिग करने वाली एक रिपोर्टर ने आम जनजीवन का यह रूप नहीं देखा था। वह योगा के रॉक स्टार के समर्थन में देश के कोने-कोने से आए लोगों की विशाल संख्या और उनके उत्साह को आंखें फाड़-फाड़कर देख रही थीं। वह इतनी बड़ी संख्या में मीडियाकर्मियों की उपस्थिति से भी अचंभित थीं। उन्होंने एक सांस में कहा-यहां इतने चैनल हैं, जिनके बारे में मैंने सुना तक नहीं है। उनके लिए जिनके टीवी सेट टॉप बॉक्स के जरिये मनोरंजन और समाचार चैनल चलते हैं, यह अनभिज्ञता समझ में आती है। जमीन से कटे ये पत्रकार रहस्यमयी भारत की तस्वीरें दिखाने में ही संतुष्ट रहते हैं, जिनमें जीने की कला सिखाने वाले श्री श्री रविशंकर का दर्शन अहम स्थान हासिल करता है। ये ग्रामीण जीवन को भी रूमानियत के साथ प्रदर्शित करते हैं और खाप पंचायतों के तालिबान सरीखे फैसलों को देख कर ये खौफजदा हो जाते हैं। इस प्रकार के रूमानी पत्रकार इस तथ्य से अनभिज्ञ हैं कि भारत का बहुआयामी स्वरूप एक सच्चाई है। यह भी स्वयंसिद्ध है कि भारत के जनमानस और जटिल हालात चुनाव के समय ही राष्ट्रीय या क्षेत्रीय मीडिया में कुछ हद तक प्रतिबिंबित होते हैं। यह मीडिया की वरीयता में ही नहीं है कि वह समाज में सौंदर्यपरक और सामाजिक आवेगों में दृष्टिगोचर परिवर्तनों की पड़ताल करे। पिछले तीन-चार साल से रामदेव के स्वास्थ्य मेले और राष्ट्रभक्ति के निहितार्थो की चर्चा है। मुझे लगता है कि रामदेव का अपने अभियान के विस्तार का फैसला और सरकार से काले धन व भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई की मांग महत्वपूर्ण हैं। इसके लिए उन्हें गैरमहानगरीय लोगों से संपर्को से शक्ति मिली है। अन्ना हजारे और रामदेव के सिविल सोसायटी आंदोलनों की प्रकृति में तीखे वर्ग भेद हैं। पुराने गांधीवादी और उनकी टीम आधुनिक शिक्षा से लैस और वैश्विक पहुंच वाली है। इनमें मैगसेसे पुरस्कार से पुरस्कृत व्यक्ति और प्रख्यात कानूनविद शामिल हैं। ये विकास और राजनीति के आधुनिक मुहावरों से परिचित हैं। इस भाषा से मुख्यधारा का मीडिया सहजता और जुड़ाव महसूस करता है और इसका सम्मान करता है। अन्ना आंदोलन के तीन महत्वपूर्ण घटक हैं। ये समूह हैं-पेशेवर एक्टिविस्टों का ऐसा समूह जो संगठित राजनीति से घृणा करता है, वरिष्ठ नागरिक, जो विश्व के नैतिक पतन से भयाक्रांत हैं और आदर्शवादी युवा, जो मानते हैं कि सोशल मीडिया नेटवर्किग के जरिए बदलाव संभव है। अन्ना आंदोलन मेड इन इंडिया अभियान है। पिछले दिनों दिल्ली के जंतर मंतर पर उनके अनशन में बिना किसी प्रलोभन या सांगठनिक प्रयास के ही भीड़ उमड़ी थी। हालांकि इसमें टीवी चैनलों का भी बड़ा हाथ था। इसी कारण सरकार को नए लोकपाल बिल के मसौदे को तैयार करने वाली संयुक्त कमेटी की अन्ना की मांग के आगे झुकना पड़ा। इसमें संदेह नहीं कि इसमें अन्ना हजारे के मनमोहिनी व्यक्तित्व का भी बड़ा हाथ रहा, जो सादगी और संजीदगी के प्रतिरूप हैं। हालांकि यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि क्या अन्ना के अनशन की सफलता में अनशन स्थल जंतर मंतर की भी भूमिका है? अन्ना हजारे के अनशन में पांच हजार लोगों से ही जंतर मंतर पूरा भर गया, जबकि रामदेव ने अपने प्रदर्शन की शुरुआत ही करीब 40 हजार लोगों से की थी। अन्ना हजारे के अधिकांश समर्थक राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से संबद्ध थे, जबकि योगगुरु ने पूरे देश भर से लोगों को इकट्ठा किया था। इसके बावजूद सरकार ने दंगे की आशंका का खतरा उठाते हुए भी आधी रात को रामदेव और उनके समर्थकों पर धावा बोल दिया। इन दोहरे मापदंडों की व्याख्या किस प्रकार की जा सकती है? जवाब स्पष्ट है। अन्ना हजारे जिस सिविल समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, वह महानगरीय मध्यम वर्ग की श्रेणी में आता है। रामदेव का समर्थन आधार मुख्यत: छोटे शहरों और गांवों से संबद्ध था और वह चमक-दमक से कोसों दूर था। अंग्रेजी भाषी मीडिया इस अभियान के विरोध में था और इसे आरएसएस के एक और गोरक्षा प्रदर्शन की तर्ज पर पेश कर रहा था। रामदेव के समर्थन में एक भी बॉलीवुड स्टार आगे नहीं आया। यहां तक कि अन्ना हजारे भी स्टेज पर आने को लेकर दुविधाग्रस्त रहे। यह उस तरह का शक्ति प्रदर्शन नहीं था, जिससे दिल्ली की जनता परिचित है। उनके लिए यह रूढि़वादी लोगों का एक जमावड़ा भर था। अंग्रेजी चैनलों के संशय के विपरीत हिंदी चैनलों ने रामदेव प्रकरण को गंभीरता और ईमानदारी से दिखाया। उनके दर्शकों के लिए रामदेव श्रद्धेय हैं, न कि ऐसा व्यक्ति जिसका अर्थशास्त्र के अधकचरे ज्ञान पर उपहास उड़ाया जाए। दोनों आंदोलनों में तीखे वर्ग विभेद के बारे में कोई संदेह नहीं है। पिछली दफा मैंने अयोध्या आंदोलन के दौरान इसे अनुभव किया था। 1990 में भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा से पहले तक महानगरीय भारत रामजन्मभूमि विवाद महत्व नहीं देता था। यह देश के अंतर में मचल रहे भावनाओं के ज्वार को महसूस नहीं कर पाया और मिथ्या चेतना बताकर इसका तिरस्कार करता रहा। यह कारोबारी योगी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की पैठ हिंदी पट्टी में करने में सफल रहा है। बाबा रामदेव ने भ्रष्ट शासन के खिलाफ बढ़ते जनाक्रोश को अभिव्यक्ति दी। यह देखना दिलचस्प है कि विदेशों में काले धन को वापस लाने की रामदेव की प्रमुख मांग के स्थान पर बड़ी चतुराई से अंग्रेजी पर क्षेत्रीय भाषाओं को वरीयता देने की उनकी एक अन्य छोटी मांग को प्रमुखता दी गई। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि रामदेव ने विदेशियों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंक दिया है। हिंदू आस्था परंपरागत रूप से जातीय और क्षेत्रीय रही है। फिर भी, कुछ सामुदायिक अंतरधाराओं ने इन विभाजनों को खुद में सम्मलित किया है। पिछले दो दशकों के दौरान एक नए सामुदायिक विश्वास ने हिंदू जगत में नई ऊर्जा का संचार किया है। इसमें ब्राह्मणवाद को हाशिये पर धकेला जाना प्रमुख है। जाति से यादव रामदेव इस अवधारणा का मूर्त रूप हैं। उनके साथ खुला युद्ध छेड़कर कांग्रेस ने गलत आकलन किया है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)
भट्टा पारसौल से 2420 लोग गायब : कलराज
यमुना एक्सप्रेस वे प्रभावित क्षेत्रों में किसान बचाओं यात्रा समाप्त कर लौटे भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कलराज मिश्र ने किसानों के उत्पीड़न पर रिपोर्ट जारी करते हुए आरोप लगाया कि भट्टा पारसौल में हुए पुलिसिया अत्याचार के बाद 2420 लोग अभी गायब है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश से घटना की जांच कराने की मांग की। भाजपा सरकार आने पर बसपा शासन काल में भूमि अधिग्रहण के मामलों की आयोग से जांच कराने की बात कही। मिश्र रविवार को पार्टी मुख्यालय में पत्रकारों से बात कर रहे थे। उन्होंने किसान यात्रा को कामयाब बताते हुए आरोप लगाया कि सात मई को भट्टा पारसौल के किसानों पर हुए बर्बर अत्याचार का आतंक क्षेत्र में आज भी कायम है। उन्होंने सरकार की भूमि अधिग्रहण की नई नीति को धोखा बताया। बोले, जिन किसानों की पुश्तैनी जमीनें लूटी जा चुकी है। उन्हें सरकार ने कोई राहत नहीं दी। प्राइवेट बिल्डर्स आज भी मजे में है। उन्होंने बताया कि भाजपा के दबाव में प्रशासन ने भट्टा पारसौल से धारा 144 हटा ली। इसके बाद वहां शनिवार को पंचायत हुई, जिसमें ग्रामीणों ने पुलिस के अत्याचारों के बारे में जानकारी दी। कहा कि वीभत्स कांड की सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश से जांच कराने के बाद ही सच्चाई सामने आ सकेगी। पत्रकारों को रिपोर्ट जारी करते हुए मिश्र ने बताया कि 22 किसान आज भी जेल में है। करीब 12 हजार की आबादी में से लगभग 2420 लोग आज भी गायब है, हालांकि गायब किसानों की सूची देने से उन्होंने आनाकानी की। उनका कहना था कि नब्बे प्रतिशत भूसे का स्टाक जला देने के कारण पशुओं के भूखे मरने की नौबत है। खाद्यान्न की व्यवस्था न होने से खाने पीने की किल्लत हो रही है। लोगों को कई कई दिन भूखा रहना पड़ता है। किसानों के कृषि यंत्र भी आग के हवाले कर दिए, घरों में तोड़फोड़ हुई। गांवों में ईधन का संकट भी पैदा हो गया है। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार आई तो बसपा शासन में हुए भूमि अधिग्रहण के मामलों की जांच होगी। गड़बड़ी मिली तो अधिग्रहण निरस्त होगा। किसानों की कानूनी लड़ाई भाजपा लड़ेगी। आंदोलन में मरे किसानों को शहीद का दर्जा दिलाएंगे। दोषी अधिकारी दंडित होंगे। किसानों की मर्जी बिना भूमि अधिग्रहण नहीं होने देंगे। प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में भी किसान यात्राएं जुलाई माह से निकाली जाएगी। यात्रा में साध्वी उमा भारती के शामिल होने के सवाल पर उन्होंने कोई टिप्पणी नहीं की।
अब केंद्र के निशाने पर अन्ना
बाबा रामदेव के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाने के बाद अब केंद्र सरकार ने लोकपाल बिल पर आंदोलन की अगुवाई कर रहे समाजसेवी अन्ना हजारे को आंखें दिखानीं शुरू कर दी हैं। लोकपाल पर मसौदा समिति के अध्यक्ष एवं केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने टीम अन्ना की मांगों को असंवैधानिक करार देते हुए कहा कि सरकार लोकपाल विधेयक संसद के मानसून सत्र में जरूर पेश करेगी। हालांकि उन्होंने इसे पारित कराने की समय-सीमा बताने से साफ इंकार कर दिया। यही नहीं प्रणब ने धमकाने वाले अंदाज में यहां तक कह दिया कि हम (सरकार) सिविल सोसाइटी के आंदोलनों के सच से जनता को अवगत कराएंगे। मुखर्जी ने रविवार को यहां संवाददाताओं से बातचीत में सिविल सोसाइटी की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा, प्रस्तावित लोकपाल विधेयक के बारे में सिविल सोसाइटी का प्रतिवाद संवैधानिक है, लेकिन उनकी मांगें असंवैधानिक हैं। आखिर इस मांग में क्या दम है कि जो सरकार मानसून सत्र में लोकपाल विधेयक लाने के लिए प्रयासरत है, उसे अन्ना हजारे 15 अगस्त तक सीमाबद्ध करने पर तुले हैं। क्या इस तरह की मांग को भी जायज ठहराया जा सकता है? उसी तरह से कुछ सदस्य संयुक्त बैठक की वीडियोग्राफी की मांग कर रहे हैं, जैसे कि कोई सर्कस हो। रिकार्ड के लिए सरकार की तरफ से यथासंभव रिकार्डिग की जा रही है, फिर अलग से व्यवस्था क्यों? विरोध का मतलब यह कतई नहीं है कि कोई संविधान से ऊपर हो जाए। लोकतंत्र में संसद का फैसला अंतिम है, और उसे सभी मानने को बाध्य हैं। संविधान ने कानून बनाने का अधिकार संसद और राज्य विधानसभाओं को दिया है। अगर पांच-छह हजार लोग संसद के बाहर से अपनी बात मनवाना चाहेंगे तो इससे लोकतंत्र कमजोर होगा। उन्होंने सोसाइटी के लोगों पर निशाना साधते हुए कहा, कि यदि उन्हें इतना जनसमर्थन है, तो वे चुनाव क्यों नहीं लड़ते हैं? प्रणब ने कहा, पिछले चुनावों में हार से चिंतित भाजपा अब सोसायटी के सदस्यों को उकसा कर राजनीति कर रही है, जिसे हम कभी सफल नहीं होने देंगे। यह लड़ाई सिविल सोसाइटी बनाम सरकार नहीं, बल्कि सरकार बनाम विपक्ष की है। यह कांग्रेस के लिए राजनीतिक चुनौती है, जिससे निबटने की तैयारी की जा रही है। भाजपा को निशाने पर लेते हुए कहा, भ्रष्टाचार पर नैतिकता की बात करने वाले भाजपा नेताओं को पहले अपने गिरेबां में झांक कर देखना चाहिए। मुखर्जी ने कहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सिविल सोसाइटी के आंदोलनों के सच पर से पर्दा उठाने को कांग्रेस पुस्तिका जारी करेगी। उसके बारे में देश की जनता को जानकारी दी जाएगी। उन्होंने कहा कि जब यह सभी को पता चल ही गया है कि इन आंदोलनों के पीछे भाजपा व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हाथ है, तो फिर हमारा यह दायित्व बनता है कि सच से लोगों को अवगत कराएं। जेपी आंदोलन का नाम लिए बगैर प्रणब ने कहा कि भ्रष्टाचार को लेकर पहले भी आंदोलन हुए हैं, और जो इसमें शामिल थे, बाद में वही मंत्रिमंडल में शामिल हुए।
बाबा ने अनशन तोड़ा, आंदोलन जारी रहेगा
भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ कार्रवाई को लेकर पिछले नौ दिनों से आंदोलित योगगुरु बाबा रामदेव और उनके निकट सहयोगी बालकृष्ण ने रविवार को आध्यामिक गुरु श्रीश्री रविशंकर और संत समाज के आग्रह पर आमरण अनशन समाप्त कर दिया। हालांकि बाबा ने श्रीश्री रविशंकर के हाथों मौसमी का जूस पिलाकर अनशन तो तोड़ दिया लेकिन आंदोलन और सत्याग्रह जारी रखने का ऐलान किया है। बाबा रामदेव को स्वास्थ्य बिगड़ जाने के कारण तीन दिन पहले जौलीग्रांट स्थित हिमालयन अस्पताल में भर्ती कराया गया था। शुक्रवार को आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर ने उसने भेंट कर अनशन समाप्त करने का अनुरोध किया था। शनिवार को उन्होंने बाबा के मान जाने के संकेत देते हुए कहा था कि हम भी बाबा की लड़ाई में पूर्ण सहयोग का संकल्प लेते हैं। रविवार को रविवार सुबह पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला बाबा रामदेव से मिलने पहुंचे। इस मुलाकात के खत्म होने के बाद आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर, प्रख्यात कथावाचक मोरारी बापू, जगतगुरू कृपालुजी महाराज, जनता पार्टी सुप्रीमो सुब्रह्ममण्यम स्वामी रामदेव से मिलने गहन चिकित्सा कक्ष में पहुंचे। उन्होंने बाबा से अनशन खत्म करने का आग्रह किया। करीब एक घंटे तक चली मुलाकात के बाद श्रीश्री रविशंकर ने मीडिया को बाबा रामदेव का अनशन टूटने की जानकारी दी। रविशंकर ने बाबा को मौसमी का जूस पिलाकर अनशन तुड़वाया। हालांकि बाबा ने अनशन तोड़ दिया है लेकिन अनियमित रक्तचाप (बीपी) और बोलने में दिक्कत के कारण वे दो दिन अस्पताल में ही रहेंगे। स्थिति सामान्य होने के कारण देर रात तक उन्हें आईसीयू से प्राइवेट रूम में शिफ्ट कर दिया जाएगा। आचार्य बालकृष्ण ने अनशन तोड़ने के बाद रामदेव की ओर से लिखित वक्तव्य जारी किया, जिसमें उन्होंने सभी अनुयायियों से अनशन तोड़ने का आग्रह किया है। बाबा रामदेव ने कहा है कि कालेधन व भ्रष्टाचार के खिलाफ सत्याग्रह को एक संकल्प के रूप में आगे बढ़ाया जाएगा। भारत स्वाभिमान यात्रा जारी रहेगी। आंदोलन का पहला चरण अनशन खत्म होने के बाद पूर्ण हो गया है। भ्रष्टाचार के खिलाफ देश एकजुट हुआ है और इस अभियान ने देश को जोड़ा है। बालकृष्ण ने कहा कि पिछली गलतियों से सबक लेकर इस बार पुख्ता रणनीति के साथ बिना बिना किसी परहेज सभी को साथ लेकर आंदोलन किया जाएगा। हालांकि भावी रणनीति और इसमें शामिल होने वाले लोगों के बारे में बालकृष्ण संतोषजनक जवाब नहीं दे सके।
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