Showing posts with label अमर उजाला. Show all posts
Showing posts with label अमर उजाला. Show all posts

Saturday, February 19, 2011

दलितों का दर्द


हाशिये के लोगों को कानून के जरिये आत्मनिर्भर नहीं बना सकते
उत्तर प्रदेश में दलित उत्पीड़न की घटनाएं चर्चा का विषय हैं। बहन मायावती के मुख्यमंत्री काल में इन घटनाओं का होना ज्यादा चिंताजनक है। राहुल गांधी का कहना है कि कांग्रेस के सत्ता में आने पर दलित समस्या का समाधान हो जाएगा। सपा और भाजपा भी दलित समुदाय की बेहतरी के लिए अपनी-अपनी पार्टी का सत्ता में आना जरूरी बता रहे हैं। पर जनता क्या करे? इनमें से कौन-सी पार्टी है, जिसका शासन दलितों ने नहीं देखा?
आजादी के बाद पहली दो पंचवर्षीय योजनाआें में कांग्रेस ने दलितों की हालत में सुधार लाकर सामाजिक समानता स्थापित करने का आश्वासन दिया था। पर हकीकत में ऐसा कुछ नहीं हुआ। भाजपा और सपा के प्रयोग भी राज्य में देखे गए। फिर बहुजन समाज पार्टी ने देश के इस सबसे बड़े राज्य में अपनी मजबूत पैठ बनाई। बसपा एक ओर तो काडर आधारित जमीन से जुड़ी पार्टी है, फिर यह बाबा साहब अंबेडकर के लोकतांत्रिक दर्शन को लेकर आगे बढ़ी है। संविधान के प्रति आस्था के कारण कानून-व्यवस्था का राज कायम करने वाली इस पार्टी का नेतृत्व जमीनी सचाइयों से सर्वाधिक परिचित था। पर आखिरकार वे कौन-सी खामियां हैं, जो इसे कमजोर बना रही हैं? राज्य भर में दलित महिलाएं भला क्यों असुरक्षित हो उठी हैं?
यह कहना गलत होगा कि बसपा काम नहीं कर रही। काम हो रहे हैं। उनकी समीक्षाएं भी हो रही हैं। मौके पर मुख्यमंत्री खुद पहुंच रही हैं। औचक निरीक्षण हो रहे हैं। मुख्यमंत्री के दौरे के दबाव से कामकाज एकाएक निपटते जा रहे हैं। पर दबाव से नहीं, दिल से दायित्व निर्वाह करने की जरूरत है। सरकार ने हाल ही में अपना बजट विज्ञापित किया है। हर क्षेत्र में बजट बढ़ा है। राज्य में 1,126 नए प्राथमिक विद्यालयों के निर्माण के आदेश दिए जा चुके हैं। लेकिन हकीकत यह है कि प्रदेश के नगरों-महानगरों में आवास विकास कॉलोनियों के लाखों लोगों के बीच से सरकारी स्कूल, जिनमें दलित और कम आय वर्ग के बच्चे शिक्षा पा सकते थे, गायब हो गए हैं। दलितों को केवल कानून के जरिये आत्मनिर्भर नहीं बनाया जा सकता। शिक्षा ही किसी भी व्यक्ति के आत्मबल का साधन है।
पर विडंबना यह है कि बसपा के राज में भी शिक्षा का व्यावसायीकरण पूरे शोषण चक्र की तरह चल रहा है। लाखों एकड़ सरकारी जमीनें स्कूल-कॉलेज खोलने के नाम पर कौड़ियों में कब्जा ली गई हैं। इन स्कूलों-संस्थानों का शुल्क इतना ज्यादा है कि दलित और अति पिछड़े वर्ग के बच्चे इनमें दाखिला लेने की कल्पना भी नहीं कर सकते। इतना ही नहीं, जब निजी स्कूल-कॉलेजों के लिए जमीन दी गई, तो दलितों के लिए उनके प्रतिनिधित्व के अनुसार स्वामित्व दिलाने के कारगर उपाय नहीं हुए। अनपढ़ और गरीब रहकर बहुजन का राज नहीं चल सकता।
दलित समाज की दूसरी बड़ी कमजोरी है, स्तरहीन और दोयम दरजे की शिक्षा से पैदा हुई बेरोजगारी। यह दलित दासता का बेहद शर्मनाक रूप है। पिछले महीने शाहजहांपुर के पास ट्रेन की छत से गिरकर दर्जनों बेरोजगार युवकों की मौत क्या संदेश छोड़कर गई है? जहां तक अपराध के ग्राफ का सवाल है, तो बसपा के राज में इसमें भी कमी नहीं है। अगर ऐसा नहीं होता, तो राहुल गांधी से लेकर मुलायम सिंह तक को इस सरकार के खिलाफ आवाज उठाने का अवसर कैसे मिल रहा है?
बसपा सरकार ने शिक्षा, बाल और महिला कल्याण पर भी बजट राशि बढ़ाई है, पर देखना यह है कि यह राशि जरूरतमंदों तक पहुंचती कितनी है और फतेहपुर जैसे कांडों की आग बुझती है या नहीं। उत्तर प्रदेश में दलित महिलाओं के साथ बलात्कार के मामले अचानक बढ़ गए हैं। मामला केवल उत्तर प्रदेश का या केवल दलित स्त्री का नहीं है। पीड़ित दलित नारी की प्रतिनिधि के रूप में राहुल गांधी को एक कलावती मिली थी, जिसकी व्यथा-कथा को वह संसद में ले गए थे। कितनी ही कलावतियों की कथाएं आज अनकही पड़ी हैं।
ऐसी ही एक कलावती बुलंदशहर के डिबाई क्षेत्र में भीमपुर नगला की रहने वाली है। उनके पास जमीन नहीं है, आय का कोई जरिया नहीं है और घर अधबना पड़ा है, क्योंकि इंदिरा आवास योजना से इसे आधा पैसा भी नहीं मिला। हाल ही में उनके दूसरे बेटे को गांव के दबंगों ने मार डाला। बड़ा बेटा दो साल पहले मर चुका है। कलावती पहले ही विधवा हैं और अब दो बहुएं भी विधवा हो गई हैं। घर में दो पिताओं के छोड़े हुए करीब डेढ़ दर्जन बच्चे हैं। ये सब के सब नाबालिग और स्कूल में पढ़ने के बजाय बाल श्रम शोषण में फंसने को अभिशप्त हैं। फिर भी इस दलित कलावती को मायावती से न जाने कितनी उम्मीदें हैं। मायावती सरकार ने प्रदेश में बाल और महिला कल्याण के लिए 587 करोड़ रुपये खर्च करने का लक्ष्य रखा है। क्या उसमें से थोड़ा-सा पैसा इस कलावती तक पहुंचेगा? क्या कलावती का घर बन पाएगा?
अगर दलितों के सिर पर छत नहीं है, तो सामाजिक सुरक्षा योजना का भी कोई औचित्य नहीं है। सबसे बड़ा काम है प्रदेश में ऐसा वातावरण निर्मित करना, जिससे दलितों पर अत्याचार करने को शान समझने वाले खुद पर शर्म करें। यह तभी होगा, जब दूसरी जाति को अपनी जाति जैसी समझने की समाज में समझ बढ़ेगी। आखिर दो सौ साल बाद अमेरिकी संसद ने रंगभेद और नस्लभेद के लिए क्षमा मांगी। करीब चार हजार साल बाद अब हमारे सर्वोच्च न्यायालय ने यह रेखांकित किया है कि द्रोणाचार्य ने गुरु का फर्ज पूरा न कर एकलव्य से गुरु दक्षिणा में अंगूठा लेकर अन्याय किया। डिस्कवरी ऑफ इंडिया में एक कहानी शंबूक की जवाहरलाल नेहरू भी लिख गए। इतने सारे सकारात्मक संदेश इस बिगड़ती समाज व्यवस्था में सुधार की आखिर कुछ उम्मीद तो जगाते ही हैं।

Saturday, February 12, 2011

दक्षिण में कांग्रेस


पार्टी के हाथ से निकल रहा यह क्षेत्र
लोकप्रिय फिल्म स्टार चिरंजीवी पिछले दिनों अपनी प्रजा राज्यम पार्टी के कांग्रेस में विलय की मंजूरी के उद्देश्य से ही सोनिया गांधी से मिलने 10, जनपथ गए थे। चिरंजीवी को कांग्रेस में लाने की बातचीत पिछले कई महीनों से चल रही थी। अहमद पटेल आंध्र के इस अभिनेता के संपर्क में तो थे ही; हाल में कांग्रेस अध्यक्ष ने एके एंटनी को, जो उनके करीबी हैं और पार्टी में जिनका दबदबा उत्तरोत्तर दिखने लगा है, इस मुहिम पर लगाया था।
दरअसल हाल के महीनों में चुनावी नुकसान से परेशान कांग्रेस के लिए यह गठबंधन तात्कालिक जरूरत बन गया था। कांग्रेस को न सिर्फ एक के बाद एक सामने आ रहे घोटाले से अपनी खराब होती छवि को उबारने के लिए जूझना था, बल्कि 2 जी स्पेक्ट्रम मामले की परिणति, ए राजा की गिरफ्तारी और सीबीआई द्वारा किसी भी समय करुणानिधि और कणिमोझी से पूछताछ की आशंकाओं को देखते हुए, जिसका तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के नतीजे पर असर पड़ना तय है, कदम उठाना ही था।
दक्षिण के चिंतित कांग्रेसी ये सारी बातें अकेले में स्वीकारते हैं। अलबत्ता पार्टी नेतृत्व ने द्रमुक और पीएमके के साथ गठजोड़ का निर्णय लिया है, और कांग्रेस की नवगठित चुनाव समिति ने इस सप्ताह बैठक में इस पर विचार भी किया कि कैसे द्रमुक से ज्यादा सीटें ली जा सकती हैं।
हालांकि जयललिता ने भी आगे बढ़कर कांग्रेस के साथ गठजोड़ की पेशकश की थी, लेकिन कांग्रेस यह जोखिम नहीं उठा सकती। इसकी एक वजह तो यही है कि लोकसभा में अन्नाद्रमुक के उतने सांसद नहीं हैं, जितने द्रमुक के हैं। फिर जयललिता के साथ मिलकर कांग्रेस ऐसा कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहती, जो केंद्र की उसकी सरकार के लिए मुश्किल खड़ी करे। कांग्रेस ने शायद इसका भी हिसाब लगाया होगा कि अगर द्रमुक तमिलनाडु में हार जाती है, तब भी वह केंद्र में कांग्रेस पर ज्यादा निर्भर रहेगी और समर्थन वापस नहीं लेगी। इसलिए तमिलनाडु में द्रमुक से गठजोड़ बनाए रखना कांग्रेस की मजबूरी है।
कांग्रेस बिहार में अपनी हार और आंध्र प्रदेश के ताजा घटनाक्रम के कारण मुश्किल में पड़ गई है। आंध्र प्रदेश एक ऐसा राज्य है, जिसे हाल तक कांग्रेस की जागीर समझा जाता था और जिसने पार्टी को 2004 और फिर 2009 में केंद्र की सत्ता तक पहुंचाया था। लेकिन उसी आंध्र का हाल आज यह है कि न सिर्फ जगन मोहन रेड्डी ने कांग्रेस से नाता तोड़ लिया है, बल्कि 24 अन्य विधायक भी उनके पाले में चले गए हैं। इससे कांग्रेस में डर तो फैल ही गया है, आंध्र के 294 सदस्यों वाले सदन में उसके पास 155 सदस्यों का मामूली बहुमत रह गया है।
कांग्रेस नेतृत्व हैदराबाद में अपनी सरकार के गिरने का जोखिम नहीं लेना चाहती। उससे ऐसा दबाव बनेगा, जिसका दिल्ली की उसकी सरकार पर भी असर पड़ेगा। इसलिए चिरंजीवी की पार्टी के कांग्रेस में विलय में इतनी जल्दबाजी की गई। उल्लेखनीय है कि प्रजा राज्यम पार्टी के 18 विधायक हैं, जिनमें से दो जगन रेड्डी के समर्थक हैं।
कोई पूछ सकता है कि चिरंजीवी ने ऐसा कदम क्यों उठाया। वर्ष 2008 में प्रजा राज्यम का गठन कर उन्होंने बड़ी उम्मीदें जगाई थीं। उन्हें दिवंगत लेकिन चर्चित फिल्म स्टार एनटीआर की तर्ज पर वाईएसआर का विकल्प बनने की उम्मीदें थीं। एनटीआर ने एक वर्ष के भीतर तेलगु देशम पार्टी को उस स्थिति में पहुंचा दिया था कि उसने कांग्रेस को सत्ता से हटा दिया था। लेकिन चिरंजीवी एनटीआर की तरह कमाल नहीं कर सके। बावजूद इसके कि न सिर्फ अपने कापू समुदाय में उनका समर्थन है, बल्कि कांग्रेस और तेदेपा से नाउम्मीद हुए लोगों के भी उनके साथ आने की उम्मीद थी।
पिछले चुनाव में पीआरपी केवल 18 सीटें जीत पाने में सफल हुई, हालांकि उसने 15 प्रतिशत से ज्यादा वोट बटोरे। लेकिन विपक्ष के वोट बंट जाने का कांग्रेस को लाभ मिला। चिरंजीवी को जल्दी ही अपनी विफलता दिखने लगी। उन्हें एहसास हो गया कि वह पार्टी को एकजुट रखने में सक्षम नहीं हो सकते। इसलिए उन्होंने कांग्रेस में विलय का रास्ता अपनाया। इस विलय से हैदराबाद में कांग्रेस बेशक स्थिर दिखाई देती है, पर तेलंगाना का मुद्दा अभी जिंदा है। यह आंदोलन जनमानस में गहरे पैठ गया है। कुछ दिनों पहले जब तेलंगाना के कांग्रेसी सांसद प्रणब मुखर्जी से मिले थे, तो उन्होंने लिखकर दे दिया था कि अगर सरकार अलग तेलंगाना राज्य बनाने का निर्णय नहीं लेती, तो वे इस्तीफा दे देंगे।
चूंकि प्रजा राज्यम स्वतंत्र तेलंगाना के खिलाफ मानी जाती है, इसलिए इसके कांग्रेस में विलय ने अब तेलंगाना के मुद्दे पर केंद्र सरकार के नजरिये पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। उल्लेखनीय है कि गृह मंत्री ने दिसंबर, 2009 में पृथक तेलंगाना राज्य के गठन का वायदा किया था।
लोगों का मानना है कि एक बार जगन मोहन की चुनौतियों से निपट लेने के बाद कांग्रेस तेलंगाना पर श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट की उस छठी सिफारिश को स्वीकार कर लेगी, जिसमें तेलंगाना को स्वतंत्र राज्य बनाए बिना व्यापक अधिकार देने का प्रस्ताव है। अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह कैसे होगा, पर अगर ऐसा होता है, तो इसका राज्य और कांग्रेस पर असर पड़ेगा।
लेकिन दिक्कत यह है कि गणित के विपरीत राजनीति में कांग्रेस के 35 और प्रजा राज्यम के 15 प्रतिशत वोट का जोड़ 50 प्रतिशत नहीं होता। प्रजा राज्यम के विलय से राज्य में कांग्रेस सरकार संख्या बल के हिसाब से भले ही बेहतर स्थिति में आ गई हो, लेकिन उसके लिए राज्य में हालात विस्फोटक बन गए हैं। और केरल को छोड़ दें, तो कभी कांग्रेस का मजबूत गढ़ माना जाने वाला दक्षिण अब उसके लिए खतरनाक बनता जा रहा है।

Monday, February 7, 2011

थॉमस का सच


सीवीसी पर इतना शोर, लेकिन हवाला मामले में चुप्पी क्यों  ?
जब से सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्रीय सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई शुरू की है, तब से यह पद लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। मामला काफी पेचीदा है। केंद्रीय सतर्कता आयुक्त पीजे थॉमस का कहना है कि केरल की दो सरकारों ने आपसी राजनीति के कारण पाम ऑयल घोटाले की जांच प्रक्रिया को न तो आगे चलने दिया और न ही खत्म किया। इस तरह दो दलों की राजनीति का वह नाहक शिकार बने। वह खुद को इस कांड में दोषी नहीं मानते। केरल कैडर के आईएएस अधिकारियों के संगठन ने भी थॉमस को बेदाग बताते हुए उनके प्रति खुला समर्थन व्यक्त किया है।
थॉमस का तर्क यह भी है कि दोनों ही दलों की सरकारों ने उनकी प्रगति में रुकावट नहीं डाली और उन्हें राज्य के मुख्य सचिव के पद तक पहुंचने दिया। यदि उनकी छवि खराब थी, तो इन सरकारों ने ऐसा क्यों किया? इसके बाद उन्हें केंद्र सरकार में सचिव बनने से भी किसी ने नहीं रोका। तत्कालीन केंद्रीय सतर्कता आयुक्त प्रत्यूष सिन्हा ने भी थॉमस की फाइल बिना किसी आपत्ति के केंद्र सरकार को भेज दी थी। ऐसे में, कानूनी प्रक्रिया की देरी के लिए वह अपना जीवन बरबाद नहीं करना चाहते। इसलिए वह सीवीसी का पद छोड़ने को भी तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि उन्होंने कोई आवेदन कर और साक्षात्कार का सामना कर किसी चयन प्रक्रिया के तहत इस पद की प्राप्ति के लिए कोई प्रयास नहीं किया। केंद्र सरकार ने खुद उन्हें इस पद के योग्य समझकर सीवीसी की कुरसी पर बिठाया है, तो वह इस्तीफा क्यों दें? केरल के आईएएस अधिकारियों का कहना है कि पाम ऑयल घोटाले में दो दलों की लड़ाई ने कई अधिकारियों का जीवन तबाह कर दिया, जिससे उनके कैडर में भारी निराशा है।
यह भी रोचक तथ्य है कि पीजे थॉमस की नियुक्ति को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देनेवाले पूर्व अधिकारियों के दल के प्रमुख और देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंग्दोह ने एक सार्वजनिक वक्तव्य के जरिये पीजे थॉमस के ईमानदार होने की पुष्टि की है। फिर भी वह अपनी जनहित याचिका को सही ठहराते हुए कहते हैं कि चूंकि सीवीसी की नियुक्ति में सर्वोच्च न्यायालय के ‘विनीत नारायण केस’ के निर्देशों की अवहेलना करनेता प्रतिपक्ष की सहमति नहीं ली गई, इसलिए यह नियुक्ति वैध नहीं है। लिंग्दोह का यह भी कहना है कि पाम ऑयल घोटाले में आरोपित होने के कारण थॉमस को यह पद खुद ही स्वीकार नहीं करना चाहिए था।
उल्लेखनीय है कि सीवीसी की नियुक्ति पर इतना बवंडर मचाने वाला मीडिया पिछले साल भर से सोया पड़ा था। नवंबर, 2009 में सीवीसी के तीन में से दो सदस्य सुधीर कुमार और रंजना कुमार अपना कार्यकाल पूरा कर चुके थे। नियमानुसार इन दोनों पुलिस और बैंक अधिकारियों की जगह नए अधिकारियों की नियुक्ति इनकाकार्यकाल पूरा होने से पहले ही हो जानी चाहिए थी। पर सरकार ने एक वर्ष तक इसकी कोई परवाह नहीं की। मजबूरन अकेले प्रत्यूष सिन्हा के सहारे सीवीसी चलता रहा। एक अगस्त, 2010 को अपने साप्ताहिक कॉलम में जब मैंने यह सवाल उठाया (सतर्कता आयोग की दुर्गति क्यों?) तब कहीं जाकर तत्कालीन गृह राज्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण की नींद टूटी और उन्होंने सीवीसी के रिक्त पदों को भरने की कवायद शुरू की। इतनी महत्वपूर्ण संस्था के प्रति सरकार की इस कोताही पर याचिकाकर्ता साल भर तक क्यों सोए रहे?
इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि थॉमस के खिलाफ शोर मचाने वाले उस वक्त कहां थे, जब संसदीय समिति ने केंद्रीय सतर्कता आयोग के पुनर्गठन का विधेयक बनाते समय सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की अवहेलना करते हुए उसे एक पंगु संस्था बनाकर छोड़ दिया था? चिंता की बात तो यह भी है कि दिसंबर, 1997 में हवाला मामले में निर्णय देते समय सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति जेएस वर्मा ने इस जनहित याचिका की प्रमुख प्रार्थनाओं की अनदेखी कर एक अलग ही फैसला दे डाला, जिसे बिना समझे ही मीडिया ने ‘ऐतिहासिक फैसला’ माना। इस तरह राजनीतिक क्षेत्रों में व्याप्त भारी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ी जा रही आजादी के बाद की इस सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण लड़ाई को कुचल दिया गया।
साफ जाहिर है कि संसद हो या मीडिया, सभी ने हवाला कांड पर एक खतरनाक चुप्पी साधी थी और आज भी उसी मानसिकता से ‘जैन हवाला घोटाले’ की चर्चा तक करने से हिचकते हैं। इसलिए थॉमस की नियुक्ति पर विवाद कोई महत्वपूर्ण सवाल नहीं है। अगर वास्तव में याचिकाकर्ता भ्रष्टाचार के मुद्दे से कड़ाई से निपटना चाहते हैं, तो उन्हें जैन हवाला कांड यानी ‘विनीत नारायण केस’ को फिर से खोलकर जांच की मांग करनी चाहिए। पर ऐसा वे नहीं करेंगे। क्योंकि ये वही लोग हैं, जिन्होंने हवाला संघर्ष के दौरान भाजपा के एक वरिष्ठ नेता को बचाने कापुरजोर प्रयास किया।
जाहिर है, नैतिकता के दो मानदंड कदापि नहीं हो सकते। जबकि हवाला केस में भी कुछ लोगों के अनैतिक आचरण पर मैंने तभी कई सवाल खड़े किये थे, जिनका जवाब आज तक नहीं दिए गए और सीवीसी के गठन का अधकचरा फैसला देकर हवाला केस मामले को फिर रफा-दफा कर दिया गया। इस सारे इतिहास को देखते हुए यह जरूरी है कि पीजे थॉमस के मामले में सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय मेरी मूल याचिका के तथ्यों की ओर भी ध्यान दे। ऐसा किए बिना भ्रष्टाचार के खिलाफ उसका कोई भी कदम कारगर सिद्ध नहीं होगा। इसलिए मैंने भी सर्वोच्च न्यायालय में फिर से सक्रिय होने का मन बनाया है.