Tuesday, November 22, 2011

यह माया सरकार का विदाई प्रस्ताव : भाजपा

भाजपा ने उत्तर प्रदेश को चार हिस्सों में बांटने के प्रस्ताव को लोगों का ध्यान मूल मुद्दों से हटाने के लिए कांग्रेस द्वारा लिखी गई पटकथा पर बहुजन समाज पार्टी का चुनावी हथकंडा करार दिया है। भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी ने सोमवार को यहां संवाददाताओं से कहा कि यह राज्य के बटवारे का नहीं बल्कि भ्रष्टाचार और घोटालों से डोल रही मायावती सरकार का विदाई प्रस्ताव है। उन्होंने कहा कि यह एक ड्रामा है जिसकी पटकथा कांग्रेस ने लिखी है और इसका मंचन बसपा और समाजवादी पार्टी कर रही हैं। उन्होंने कहा कि मायावती ने यह प्रस्ताव पारित कर सरकार के ताबूत में खुद आखिरी कील ठोंक दी है। उन्होंने कहा कि माया सरकार ने अपने भ्रष्टाचार,अपराध और घोटालों पर पर्दा डालने के लिए यह प्रस्ताव पारित किया है। इस प्रस्ताव को जनभावना के खिलाफ बताते हुए उन्होंने कहा कि लोग इस सरकार से त्रस्त हैं और इससे मुक्ति चाहते हैं। यह मुक्ति राज्य के बंटवारे से नहीं बल्कि स्वच्छ सरकार और सुशासन से मिलेगी। नकवी ने आरोप लगाया कि कांग्रेस, बसपा और सपा राज्य में बेशक इस तरह का नाटक करें लेकिन केंद्र में ये कंधे से कंधा मिलाकर चलते हैं। मायावती पर जब-जब संकट आता है तो कांग्रेस उन्हें मदद देती है इसके एवज में कांग्रेस नीत केंद्र सरकार जब-जब घोटालों और भ्रष्टाचार के चक्रव्यूह में फंसने लगती है तो बसपा और सपा उसकी नैया पार लगाती हैं। राज्यों के बंटवारे पर भाजपा के रुख के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि भाजपा हमेशा से छोटे राज्यों की पक्षधर रही है लेकिन उसने इसे लेकर कभी राजनीति नहीं की। अभी जो हो रहा है वह जनभावना नहीं, चुनावी चकल्लस है। इस तरह के प्रस्तावों में नीति और नीयत बहुत महत्वपूर्ण होती है। एक सवाले के जवाब में उन्होंने कहा कि अब मायावती कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को 2007 में लिखी चिट्ठी का हवाला देकर कह रही हैं कि विभाजन का मामला पुराना है। उन्होंने कहा कि साढ़े चार साल तक विभाजन का कोई जिक्र नहीं और चुनाव के मौके पर इस तरह का प्रस्ताव लाना उनकी मंशा पर अपने आप सवाल उठाता है।

यूपी बांटने का प्रस्ताव पास


उत्तर प्रदेश विधान मण्डल के दोनों सदनों में विपक्ष के भारी शोरशराबे और हंगामे के बीच सरकार ने न केवल वर्ष 2012-2013 के लिए एक लाख 91 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा के अंतरिम बजट व 70733 करोड़ रूपये से ज्यादा के लेखानुदान विधेयक को पारित करा लिया बल्कि प्रदेश के चार भागों में बांटे जाने के महत्पूर्ण प्रस्ताव को भी सदन की मंजूरी दिलाने में कामयाबी पा ली। बिखराव के चलते एक बार फिर विधानसभा में विपक्ष की रणनीति जमींदोज हो गयी और मात्र 16 मिनट चली कार्यवाही में विधायी कायरे को अंजाम दे सदन की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गयी। इतना ही नहीं मात्र एक दिन का सत्र इतिहास में भी दर्ज हो गया । दो दिवसीय सत्र का सोमवार को पहला दिन था जिसकी शुरुआत भारी शोर-शराबे, हंगामे और सरकार विरोधी नारों की गूंज से हुई। वन्देमातरम गान के तुरंत बाद विपक्षी सदस्यों ने पहले अपने स्थानों, फिर सपा और भाजपा के सदस्यों ने सदन के फर्श पर आकर अल्पमत की सरकार को बर्खास्त करने की पुरजोर तरीके से मांग उठायी। अपनी घोषित रणनीति के तहत मुख्य विरोधी दल समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी सदन में सरकार के खिलाफ अविास प्रस्ताव लाना चाहती थी पर विधानसभा अध्यक्ष सुखदेव राजभर ने इसकी मंजूरी नहीं दी। सपा और भाजपा के सदस्य पीठ से अनुमति न मिलने पर आक्रोशित हो उठे और पीठ की ओर बढ़ने लगे पर गार्ड के सख्त सुरक्षा घेरे को वे लांघ नहीं पाये। कुछ सदस्यों ने मेजों पर चढ़ कर पोस्टर भी लहराये जिन पर सरकार विरोधी नारे और अल्पमत की सरकार को बर्खास्त करने की मांग लिखी थी। हंगामे के बीच विधानसभा अध्यक्ष ने सदन की कार्यवाही पूरे प्रश्नकाल के लिए स्थगित कर दी। तकरीबन एक घंटा 16 मिनट के स्थगन के बाद सदन की कार्यवाही दोबारा शुरू हुई तो विपक्ष के सदस्य फिर अपने स्थानों पर खड़े हो हंगामा करने लगे। विधानसभा अध्यक्ष ने कार्यसूची के अनुरूप कार्यवाही चलने देने की अपील करते हुए सदस्यों से शांत होने कर्ी
अपील की पर जब शोर शराबा और हंगामा कम नहीं हुआ तो उन्होंने संसदीय कार्य मंत्री लालजी वर्मा से तय समय पर अनुपूरक बजट प्रस्तुत करने के निर्देश दिये। हंगामे के बीच वित्तीय वर्ष 2012-2013 का एक लाख 91 हजार 825 करोड़ 70,733 करोड़ रूपये अनुपूरक बजट व लेखानुदान पारित करा लिये गये। इस बीच स्थगन के बाद दोबारा कार्यवाही शुरू हुई तो सदन में मुख्यमंत्री सुश्री मायावती भी मौजूद थीं जिन्होंने अनुपूरक बजट और लेखानुदान के पारित होने के तुरंत बाद राज्य को चार भागों बांटने संबंधी प्रस्ताव अचानक सदन के पटल पर रख दिया जिसे हंगामे और शराबे के इसी माहौल में ध्वनिमत से मंजूरी दे दी गयी। संसदीय कार्य मंत्री ने अध्यक्ष की अनुमति से सदन की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करने संबंधी प्रस्ताव पेश किया जिसे भी ध्वनिमत से मंजूरी दे दी गयी। सदन में सरकार को घेरने की भारी तैयारी करके आये विपक्ष के बिखराव का सत्ता पक्ष ने एक बार फिर लाभ उठाया। सपा और भाजपा जहां सरकार के खिलाफ अपने अपने अविास प्रस्ताव को पेश करने में नाकाम रहीं तो कांग्रेस भी प्रदेश को विभाजन कर छोटे-छोटे राज्यों के गठन के प्रस्ताव को पटल पर नहीं रख सकी। दूसरी ओर भोजनावकाश के बाद विधान परिषद की कार्यवाही शुरू होने पर अनुपूरक बजट और प्रदेश के विभाजन का प्रस्ताव पास कराने का जैसे ही प्रयास हुआ विपक्षी सदस्य हंगामा करने लगे और इस हंगामे के दौरान ही दोनों मामले पास कराने के साथ ही सदन की कार्रवाई अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गयी। सदन की बैठक भी मात्र 10-12 मिनट ही चल सकी।
     
गंगा, यमुना, मथुरा, काशी, अयोध्या, उत्तर प्रदेश की पहचान, खत्म हो जाएगी और प्रदेश बर्बादी के कगार पर पहुंच जाएगा - मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश को चार राज्यों में विभाजित करने का प्रस्ताव विधानसभा में पारित होना स्वागत योग्य है। इससे राज्य की जनता को काफी राहत मिली है। -अमर सिंह बिना चर्चा के प्रस्ताव पास कराना हास्यास्पद है। ऐसे मुद्दे पर भाजपा, सपा और बसपा ने जो भूमिका अदा की, वह उनकी वास्तविक गंभीरता को दर्शाता है - मनीष तिवारी

Monday, November 21, 2011

विदेशों में खाते न होने का एलान करेंगे राजग सांसद


यात्रा पूरी, लेकिन जंग अधूरी... कहकर भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने संसद सत्र के लिए संप्रग सरकार के खिलाफ एजेंडा तय कर दिया है। सरकार पर दबाव बढ़ाने के लिए सत्र के पहले सप्ताह में राजग के सभी सांसद विदेश में अवैध खाता व अवैध संपत्ति न होने के घोषणा पत्र लोकसभा अध्यक्ष व राज्यसभा सभापति को सौंपेंगे। जनचेतना यात्रा की समापन रैली में राजग तो जुटा, लेकिन घर के घमासान के चलते पार्टी के मुख्यमंत्री शुभारंभ के बाद इससे भी दूर रहे। भ्रष्टाचार व कालेधन के मुद्दे पर सरकार के खिलाफ जिद के साथ जंग छेड़ने के लिए लालकृष्ण आडवाणी ने देश भर की यात्रा पूरी कर पार्टी व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अपना दमखम दिखाने की कोशिश की है। यात्रा ने पार्टी के काडर को तो सक्रिय किया, लेकिन आडवाणी की अपनी सक्रियता ने पार्टी में उनके विरोधियों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। इससे भाजपा में प्रधानमंत्री पद का विवाद और उभर सकता है। आडवाणी ने इस यात्रा के शुरू से अंत तक राजग को जोड़कर नए संकेत भी दिए हैं। समापन रैली में भी राजग के पुराने सहयोगी दलों के साथ नई जुड़ी रिपब्लिकन पार्टी के रामदास आठवले के साथ अन्नाद्रमुक की उपस्थिति काफी अहम रही। दो दिन बाद 22 नवंबर से संसद सत्र शुरू हो रहा है और भाजपा यात्रा के मुद्दे से संसद को भी गरमाने की तैयारी में है इसीलिए सरकार पर दबाव बढ़ाने के लिए राजग के सांसदों की तरफ से विदेश में अवैध खाता व अवैध संपत्ति न होने का घोषणा पत्र देने का एलान कर दिया। समापन सभा में आडवाणी के तेवर तो तीखे थे ही, उनके साथ भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी, लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली व राजग संयोजक शरद यादव ने भी सरकार पर हल्ला बोला। आडवाणी ने जनचेतना व जनमत बनाने के साथ सरकार बदलने का भी आह्वान किया। गडकरी ने मनमोहन सिंह को मजबूर व लाचार बताकर उनपर तरस जताया। उन्होंने सोनिया गांधी पर कटाक्ष करते हुए कहा कि सरकार में सिर्फ लक्ष्मी दर्शन चल रहा है। एक नारा सा बन गया है कि जात पर न पात पर सोनिया जी की बात पर देश को लूटो। उन्होंने चिदंबरम को जेल न भेजने व नोट के बदले वोट मामले में व्हिसिल ब्लोअर को जेल भेजे जाने पर सोनिया से माफी की मांग भी की। अरुण जेटली ने कहा इस सरकार की साख तो बची ही नहीं है, नेतृत्व का संकट भी खड़ा हो गया है। सुषमा स्वराज ने कहा उन्होंने संसद में प्रधानमंत्री से एक शेर के जरिये सवाल किया था, जिसका जवाब उन्होंने एक बेतुके शेर से दिया था। अब वह प्रधानमंत्री पर एक और शेर पढ़ रही हैं कि मैं बताऊं तेरा काफिला क्यों लुटा, क्योंकि तेरा रहजनों (लुटेरों ) से वास्ता था। (संबंधित खबरें पेज-3 पर)

विकास के लिए विभाजन जरूरी


उत्तर प्रदेश में चुनावी बिगुल बज चुका है। तलवारें खिंच चुकी हैं। नित नए मुद्दे उठाए जा रहे हैं और हर राजनीतिक दल जनता का ध्यान आकृष्ट करने की कोशिश में हैं। इसी कड़ी में सूबे की मुख्यमंत्री मायवती उत्तर प्रदेश को पूर्वाचल, बुंदेलखंड, अवध प्रदेश और पश्चिमी प्रदेश नाम से चार भागों में विभाजित करना चाहती हैं। विभाजन की बात करने वालों का तर्क यह भी है कि विकास के लिए राज्यों का छोटा होना मायने रखता है। क्या हकीकत की कसौटी पर क्या यह तर्क सही है? उत्तर प्रदेश का अल्प विकास किसी से छिपा नहीं है। बीमारू कहे जाने वाले राज्यों में उत्तर प्रदेश का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। जबकि देश में औसत प्रति व्यक्ति आय वर्ष 2009-10 में 33,731 रुपये थी। उत्तर प्रदेश में यह मात्र 16,182 रुपये ही थी। विकसित प्रदेशों मसलन, गुजरात में यह 49,030, हरियाणा में 55,214, महाराष्ट्र में 57,458 और दिल्ली में प्रति व्यक्ति आय 89,037 रुपये थी। स्वाभाविक तौर पर उत्तर प्रदेश के लोगों में विकास की आकांक्षा है। दुर्भाग्य का विषय है कि उत्तर प्रदेश में आमदनी तो कम है ही, आर्थिक वृद्धि दर भी बहुत कम है। जहां गुजरात में पिछले पांच वर्षो में आर्थिक वृद्धि की दर 12.4 प्रतिशत की रही, वहीं अत्यंत अल्प विकसित बिहार की भी आर्थिक वृद्धि दर 11 प्रतिशत को पार कर गई। उत्तर प्रदेश की आर्थिक संवृद्धि दर अब भी औसत 6.5 प्रतिशत ही हो पाई। ऊपर से सरकारों की विकास के प्रति उदासीनता परिस्थितियों को और अधिक भयंकर बना रही है। हालांकि मायावती के इस प्रस्ताव को चुनावी स्टंट बताया जा रहा है। फिर भी इस विषय पर सही परिप्रेक्ष्य में चिंतन जरूरी है। देश में राज्यों के विभाजन, पुनर्गठन और इस प्रकार से छोटे राज्यों के गठन का अपना एक इतिहास है। वर्ष 1956 में राज्य पुनर्गठन अधिनियम के तहत भाषाई आधार पर कई राज्यों का पुनर्गठन किया गया। पूर्व में बने पृथक राज्यों का विकास के संदर्भ में हमेशा ही अच्छा अनुभव रहा है। हम जानते हैं कि पूर्व में पंजाब को तीन हिस्सों में बांटा गया। पंजाब अन्य प्रांतों की तुलना में हमेशा ही देश का एक विकसित राज्य रहा है, लेकिन पंजाब के बंटवारे के बाद तीनों प्रांतों में अभूतपूर्व विकास देखने को मिलता है। हरियाणा का क्षेत्र जो पहले बहुत अधिक विकसित नहीं था, उसमें तेजी से विकास हुआ और आज हरियाणा किसी भी दृष्टि से पंजाब से पीछे नहीं है। आज हरियाणा की प्रति व्यक्ति आय पंजाब से भी 30 प्रतिशत अधिक है। पंजाब से कटकर बने हिमाचल प्रदेश में भी पहले से कहीं ज्यादा तेजी से विकास हुआ। हिमाचल प्रदेश में आज लगभग शत्-प्रतिशत साक्षरता है। पुरानी बातें छोड़ भी दें तो नव गठित राज्य जैसे छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड आदि ने अपने पुनर्गठन के बाद तेजी से विकास किया है। ये सभी राज्य पहले से ही पिछड़े प्रांतों में से उनके अधिक पिछड़े इलाकों को अलग करके बनाए गए थे, लेकिन फिर भी उन्होंने विकास के नए कीर्तिमान स्थापित किए। उदाहरण के लिए मध्य प्रदेश से कटकर बने छत्तीसगढ़ के पृथक राज्य गठन से पूर्व 1993-94 से 1999-2000 के बीच उस क्षेत्र की प्रति व्यक्ति आय बढ़ने की वार्षिक दर 1 प्रतिशत से भी कम थी। गठन के बाद वर्ष 1999- 2000 से 2009-10 के बीच उसकी विकास दर 6.23 प्रतिशत तक पहुंच गई। जबकि शेष मध्य प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय की विकास दर 1 प्रतिशत से कम ही रह गई। लगभग यही स्थिति उत्तराखंड में देखने को मिलती है। जहां की प्रति व्यक्ति आय की वृद्धि दर गठन से पूर्व 1 प्रतिशत से कम थी। नए राज्य के गठन के बाद यह वर्ष 1999-2000 से 2008-09 के बीच बढ़कर 7.14 प्रतिशत तक पहुंच गई। जबकि शेष बचे उत्तर प्रदेश की विकास दर में पहले से थोड़ी बेहतरी तो हुई, लेकिन उत्तराखंड से यह काफी कम मात्र 3.0 प्रतिशत ही रही। हां, झारखंड की स्थिति थोड़ी अलग दिखाई देती है, जहां गठन के बाद की विकास दर बढ़ी तो जरूर, लेकिन अन्य नए राज्यों से यह काफी कम दर्ज की गई। जबकि शेष बचे बिहार में नीतीश कुमार की सरकार के गठन के बाद प्रति व्यक्ति आय बढ़ने की दर में तेजी आई, जबकि उतनी तेजी झारखंड में महसूस नहीं की गई। मोटे तौर पर छोटे राज्यों का गठन मंगलकारी रहा है। वहां के नागरिकों का जीवन स्तर विकास के मापदंडों के आधार पर बेहतर हुआ है। ऐसा इसलिए, क्योंकि जब भी नया राज्य गठित होता है तो हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोगों की अपेक्षाएं और इस कारण से नई सरकारों की स्पंदनशील सोच उस राज्य के विकास की वाहक बनती है, जबकि उन्हीं राज्यों के शेष हिस्से में ठहरी सोच उन्हें अल्पविकसित रखने में भूमिका निभाती है। चुनावी स्टंट ही सही, मुख्यमंत्री मायावती द्वारा उत्तर प्रदेश के चार भागों में विभाजन का प्रस्ताव सही दिशा में एक कदम है। (लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं)

बुनकरों की सुध


मौसम चुनावी हो और उसकी रंगत न दिखे, यह तो मुमकिन ही नहीं है। उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव का रंग अभी से दिखने लगा है। पिछले कुछ दशकों से प्रदेश की सत्ता से बाहर रही कांग्रेस पार्टी ने इस चुनाव के लिए खास तैयारियां की है। वह चूंकि अभी केंद्र में सत्ता में है, इसलिए अभी उसके पास एक मौका है कि वह राज्य के मतदाताओं को अपनी सदाशयता से भरोसे में ले। केंद्र सरकार की तरफ से ऐसी ही एक बड़ी पहल है बुनकरों के लिए आकषर्क पैकेज की घोषणा। देश में बुनकरों की सबसे ज्यादा संख्या वाला सूबा ऐतिहासिक तौर पर उत्तर प्रदेश ही है। सूरत और मुंबई के मिल के कपड़ों का दौर शुरू होने से काफी पहले से यहां खेती के बाद रोजगार का दूसरा पारंपरिक जरिया करघा ही रहा है। यह और बात है कि पिछले कम से कम तीन दशकों में देश-विदेश में चर्चा और खपत के लिए जाना जाने वाला उत्तर प्रदेश का करघा उद्योग जबरदस्त बदहाली का शिकार रहा है। वाराणसी से मिर्जापुर और तमाम दूसरे हिस्सों में अब भी जो बुनकर परिवार अपने पुश्तैनी हुनर का साथ तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद निभा रहे हैं, उनके लिए केंद्र सरकार ने अपना खजाना खोलने की घोषणा की है। सरकार ने तीन लाख हथकरघा बुनकरों और 15 हजार सहकारी समितियों के 3884 करोड़ रुपए के कर्ज माफी की घोषणा की है। इसके अलावा बुनकरों की आर्थिक मदद के लिए 2350 करोड़ रुपए दिए जाएंगे। दिलचस्प है कि बुनकरों की मदद के लिए बढ़े सरकारी हाथ के पीछे मुख्य प्रेरणास्रेत कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी हैं। यह बात कोई और नहीं बल्कि केंद्रीय वाणिज्य, उद्योग और कपड़ा मंत्री आनंद शर्मा कह रहे हैं। असल में बड़ा मुद्दा यह नहीं है कि इस पहल का श्रेय किसे दिया जाए। निजी व केंद्रीकृत मेगा प्रोजेक्टों के दौर में कुटीर और मझोले उद्योगों की मदद तो दूर, आर्थिक विकास में इनकी भूमिका और दरकार तक पर सवाल उठने शुरू हो गए थे। सरकार की नजर में यह बात अगर चुनावी तात्कालिकता से ज्यादा गंभीर है तो फिर उसकी पहल का असर चुनाव से ज्यादा उसके बाद के महीनों-सालों में दिखना चाहिए। खुले बाजार के दौर में करघा बुनकरों की साख को आर्थिक हिफाजत के साथ बचाना कोई आसान कम नहीं है। आपूर्ति से लेकर खपत तक का पूरा अर्थशास्त्र आज इन बुनकरों के खिलाफ है। उन्हें सरकारी मददसे ज्यादा असरकारी मदद
की दरकार है। उम्मीद करनी चाहिए कि केंद्र सरकार ने बुनकरों की सुध लेने के लिए जो बड़ी पहल की है, वह कारगर और दूरदर्शी भी साबित होगी। उत्तर प्रदेश के बुनकर न सिर्फ आगामी विधानसभा चुनाव में बल्कि आगे भी इस घोषणा की सफलता-असफलता पर नजर रखेंगे।

Saturday, November 12, 2011

विकास के लिए जरूरी


उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों में सत्ता बचाने और पाने के लिए राजनीतिक जोड़-तोड़ शुरू हो चुकी है। इसी के तहत राज्य को चार हिस्सों में बांटने की सियासत अब उफान मार रही है। यह संभावना है कि मुख्यमंत्री मायावती विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर उत्तर प्रदेश को पूर्वी, मध्य, पश्चिम और बुंदेलखंड में बांटने का प्रस्ताव ला सकती हैं। इस दांव की काट के लिए कांग्रेस भी प्रदेश के बंटवारे की पैरवी कर मायावती को विधानसभा में प्रस्ताव लाने की चुनौती दे दी है। देखा जाए तो उत्तराखंड के अलग होने के बाद भी उत्तर प्रदेश एक बहुत बड़ा राज्य है। इसलिए इसके विभाजन की बात पहले भी कई बार उठी है। इस मामले में सबसे मुखर राष्ट्रीय लोकदल है, क्योंकि यही उसके जनाधार का प्रमुख कारण है। लेकिन तेलंगाना जैसा कोई जनांदोलन न होने पर भी उत्तर प्रदेश के विभाजन का मुद्दा उछाला जा रहा है तो इसका कारण कांग्रेस की यह सोच है कि वह उत्तर प्रदेश में तभी राजनीतिक मजबूती पाएगी, जब राज्य को कई हिस्सों में विभाजित कर दिया जाए। देखा जाए तो 1956 में भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन कर 14 राज्यों और छह केंद्र शासित प्रदेशों के गठन के बाद भी नए राज्यों की मांग कभी थमी नहीं। वर्ष 1960 में मुंबई प्रांत को विभाजित कर गुजरात और महाराष्ट्र का गठन हुआ। वर्ष 1962 में नगालैंड बना तो 1966 में पंजाब को विभाजित कर हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और पंजाब राज्यों का गठन किया गया। वर्ष 1972 में मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा का निर्माण हुआ। 1987 में मिजोरम और अरुणाचल का उदय हुआ। वर्ष 2000 में राजग सरकार ने पिछड़ेपन के आधार पर झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड राज्य का गठन किया। इसके बावजूद नए राज्यों के गठन की मांग करने और फिर उसके लिए संघर्ष करने का सिलसिला निरंतर कायम रहा है। इस समय आंध्र प्रदेश में तेलंगाना राज्य के गठन की मांग सबसे उग्र है, लेकिन इसके साथ ही बंगाल में गोरखालैंड, महाराष्ट्र में विदर्भ, असम में बोडोलैंड, कर्नाटक में कुर्ग, बिहार में मिथिलांचल, गुजरात में सौराष्ट्र, उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड, पूर्वाचल और हरित प्रदेश को राज्य के तौर पर गठित करने की मांग जब-तब जोर पकड़ती रहती है। नए राज्यों की मांग का सरलीकरण करना आसान नहीं है। आमतौर पर ये सभी मांगें क्षेत्र के विकास को मुद्दा बनाते हुए अलग राज्य के निर्माण के लिए जोर दे रही हैं, लेकिन गहराई से देखा जाए तो विकास के बहाने दबंग जातियां और वर्ग अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहते हैं। जैसे हरित प्रदेश की मांग के पीछे जाट जाति का प्रभुत्व है। भले ही नए राज्यों के पीछे राजनेताओं के छुद्र स्वार्थ हों, लेकिन यदि इस विषय को समग्रता में देखा जाए तो छोटे राज्यों का गठन किसी भी दृष्टि से अनुचित नहीं है। क्या छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, झारखंड आदि विफल राज्य कहे जा सकते हैं? नए राज्यों में यदि कहीं भ्रष्टाचार या नक्सलवाद है तो ये समस्याएं कई पुराने राज्यों में भी हैं। देखा जाए तो आज भी देश में कई राज्य इतने बड़े हैं कि दुनिया के 80-90 देश उनसे छोटे हैं। ऐसे में जनता को शासन-प्रशासन के नजदीक लाने के उपाय हैं छोटे राज्य। यदि मतदाताओं की संख्या कम होगी तो विधायकों और सांसदों का प्रतिनिधित्व भी अधिक घनिष्ट होगा। राज्यों की संख्या बढ़ने पर शक्ति का विकेंद्रीकरण भी बढ़ेगा। छोटे राज्यों के नेता अपने राज्यों के आर्थिक विकास पर ज्यादा ध्यान दे सकेंगे। नए संवैधानिक संशोधन के कारण मंत्रिमंडल भी छोटे ही होंगे। ज्यादा राज्यों के निर्माण से केंद्र के कमजोर होने का तर्क भी ठोस नहीं है। उदाहरण के लिए अमेरिका में शुरू में 13 राज्य थे, जो आज 50 हो गए हैं। क्या इससे अमेरिका कमजोर हो गया? व्यावहारिक दृष्टि से देखें तो बड़े राज्य न प्रशासनिक दक्षता की दृष्टि से उपयुक्त होते हैं और न ही प्रशासन तक जनता की पहुंच की दृष्टि से। फिर अधिकतर छोटे राज्यों का विकास अपेक्षाकृत तेजी से हुआ है। उदाहरण के लिए हरियाणा, पंजाब, मिजोरम, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड जैसे राज्यों ने अपने गठन के बाद तेजी से विकास किया है। छत्तीसगढ़ ने तो नक्सलवाद की गिरफ्त में रहने के बावजूद तेजी से प्रगति की है। दरअसल, नए राज्यों को लेकर समस्या तब खड़ी होती है, जब बिना किसी ठोस आधार के केवल राजनीतिक कारणों से राज्य की मांग उठाई जाती है। ऐसे में छोटे राज्यों की मांग को सियासी स्वार्थ के चश्मे से नहीं, क्षेत्रीय विकास, प्रशासनिक सुविधा, विकेंद्रीकरण, सांस्कृतिक चेतना आदि के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

अन्ना का फायदा उठा रहे कोर समिति के कुछ सदस्य : पारूलेकर


गांधीवादी कार्यकर्ता को खुद निर्णय नहीं लेने दिए जाते। उन्हें खुद के दम पर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का नेतृत्व नहीं करने दिया जा रहा है। अन्ना हजारे के ब्लॉगर रहे राजू पारूलेकर ने आरोप लगाया है कि कोर समिति के कुछ सदस्य हजारे का फायदा उठा रहे हैं। हजारे ने जनलोकपाल आंदोलन की कोर समिति का पुनर्गठन करने संबंधी बयानों पर खुद को पारूलेकर से अलग कर लिया था। इसके बाद ब्लॉगर ने सार्वजनिक रूप से टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी और प्रशांत भूषण पर आरोप लगाए थे। एक पत्रिका को दिए साक्षात्कार में पारूलेकर ने कहा कि आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी कारणों के चलते हजारे केजरीवाल, किरण और भूषण के साथ हैं। पारूलेकर ने कहा कि अन्नाजी ने यह महसूस करना शुरू कर दिया है कि यह गैंग (केजरीवाल, बेदी और भूषण) उनका फायदा उठा रहा है। वह जानते हैं कि जब तक ये लोग रहेंगे, तब तक आंदोलन से निस्वार्थ काम करने वाले लोग नहीं जुड़ेंगे। यह समूह अपने वित्तीय लाभ, शोहरत और पहचान कायम करने के लिए भ्रष्टाचार के खिलाफ जनभावनाओं का फायदा उठा रहा है। पारूलेकर को नहीं लगता कि अन्ना हजारे स्वतंत्र तरीके से फैसले करते हैं। हजारे कमजोर हैं और उन्हें कई बीमारियां हैं, लेकिन ये सभी लोग चाहते हैं कि वह अनशन पर बैठें। इन लोगों को आंदोलन से बाहर कर दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब तक हजारे आंदोलन का नेतृत्व करेंगे, बाकी तीन सदस्यों की पहचान बनी रहेगी, लेकिन केजरीवाल, बेदी और भूषण की योजनाएं अलग हैं। ये तीनों ही अवसरवादी हैं। पारूलेकर ने यह भी दावा किया कि आंदोलन की कोर समिति के लिए संविधान बनाने का फैसला एक तरह का समझौता था, जो इस गैंग ने कोर समिति में बने रहने के लिए हजारे के साथ किया था।