Sunday, January 30, 2011

नए लोकपाल की तैयारी


लेखक लोकपाल के नए मसौदे को भ्रष्टाचार से ध्यान हटाने का घटिया उपाय बता रहे हैं...
पहरेदार का चोर हो जाना दुर्भाग्यपूर्ण होता है। आखिरकार पहरेदार पर कौन पहरा दे? प्रधानमंत्री देश के सार्वजनिक धन का न्यासी है, मंत्रिपरिषद उसी का विस्तार है। मुख्य सतर्कता आयुक्त पर अतिरिक्त सतर्कता की जिम्मेदारी है। सरकार को जवाबदेह बनाने की संसदीय शक्ति बड़ी है बावजूद इसके भ्रष्टाचार संस्थागत हो गया। राष्ट्रमंडल खेलों में अरबों का खेल हुआ। 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले से देश भौचक हुआ। आदर्श सोसाइटी भी घोटाला का पर्याय बनी। चावल निर्यात घोटाला, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, एलआईसी हाउसिंग सहित हर तरफ घोटालों की ही बाढ़ है। महंगाई घोटालों के पंख लगाकर ही आसमान पहुंची है। देश घोटालों के दलदल में है। सत्ताधीश छोड़ सब लुट रहे हैं। भ्रष्टाचार ही सत्यम है। आम जन हलकान हैं। यहां हर चीज बिकाऊ है। राजनीति एक विचित्र उद्योग है। थोड़ी पूंजी बड़ा व्यापार, कहीं भी, कभी भी। विधायकी सांसदी के पार्टी टिकट के रेट हैं, मनमाफिक मंत्री बनाने के रेट हैं। सरकार गिराने बचाने, सदन में वोट देने, सदन त्याग करने के पुरुस्कार हैं। केंद्र सरकार तमाम घोटालों के घेरे में है। स्पष्टीकरण काम नहीं आते। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से सरकार की नींद हराम है। जनता में थू-थू हो रही है। सो सरकार एक नए लोकपाल विधेयक की तैयारी कर रही है। विद्वान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कई अंतर्विरोधों के शिकार हैं। वह सरल हृदय गैरराजनीतिक व्यक्ति हैं, लेकिन देश के राजप्रमुख हैं। वह संवैधानिक दृष्टि से संसद के प्रति जवाबदेह हैं, लेकिन वस्तुत: वह सोनिया गांधी के प्रति उत्तरदायी हैं। वह मंत्रिपरिषद के प्रधान हैं, लेकिन मंत्रिगण उनकी बात नहीं सुनते। वह स्वयं ईमानदार हैं, लेकिन सरकारी भ्रष्टाचार पर कोई कार्रवाई नहीं कर सकते। वह अंतरराष्ट्रीय ख्याति के अर्थशास्त्री हैं, लेकिन महंगाई जैसी आर्थिक समस्या के सामने ही उन्होंने हथियार डाले हैं। भ्रष्टाचार ने सरकार की छवि को बट्टा लगाया है। लोकपाल विधेयक का मंसूबा सरकार की छवि को दुरुस्त करने का नया शिगूफा है। सरकार भ्रष्टाचार से लड़ते हुए दिखाई पड़ना चाहती है। सरकारी मसौदे में लोकपाल की कोई खास भूमिका नहीं है। प्रस्तावित लोकपाल अपनी ओर से कोई जांच शुरू नहीं कर सकेगा। वह सीधे शिकायतें भी नहीं लेगा। पीडि़त व्यक्ति लोकसभाध्यक्ष के पास शिकायत भेजेगा। वह लोकसभाध्यक्ष द्वारा अग्रसारित शिकायतों का संज्ञान लेगा। इसके लिए लोकसभाध्यक्ष को एक शिकायती प्रकोष्ठ बनाना होगा। शिकायतों का प्रारंभिक परीक्षण करना होगा। लोकपाल की रिपोर्ट लोकसभाध्यक्ष के पास जाएगी। मंत्री की शिकायत पर फैसला प्रधानमंत्री करेंगे। यानी नया लोकपाल मसौदा भ्रष्टाचार की चर्चा की दिशा को बदलने वाला भोथरा हथियार है। लोकपाल का आधार स्कैंडनिवियाई देशों की ओम्बड्समैन नामक संस्था है। सबसे पहले स्वीडन ने यह संस्था बनाई थी। इसकी नियुक्ति संसद करती है, वह संसद को अपनी रिपोर्ट देता है। यह संस्था नार्वे (1963) फिनलैंड (1909) और डेनमार्क में भी है। न्यूजीलैंड ने 1962 और ब्रिटेन ने 1966 में यही प्रणाली अपनाई। लोकपाल विधेयक का मनमोहन-प्रस्ताव पहला नहीं है। जनता सरकार के विधेयक 1977, राष्ट्रीय मोर्चा सरकार के विधेयक 1989, देवेगौड़ा सरकार के विधेयक 1996 और अटल सरकार के विधेयक 1998 में प्रधानमंत्री भी लोकपाल की जांच के दायरे में लाए गए, लेकिन राजीव गांधी सरकार के विधेयक 1985 में प्रधानमंत्री को जांच से बाहर रखा गया था। अटल सरकार के विधेयक में सर्वोच्च न्यायालय के कार्यरत या सेवानिवृत्त न्यायाधीश को ही लोकपाल बनाए जाने की व्यवस्था थी। इस विधेयक में इसी पद पर दोबारा नियुक्ति का निषेध था। साथ में लोकपाल रह चुके व्यक्ति को भविष्य में केंद्र या राज्य सरकार में लाभ के किसी पद पर नियुक्त न किए जाने के भी प्रावधान थे। जैसे राजीव गांधी सरकार द्वारा 1985 में लाए गए विधेयक में लोकपाल द्वारा की गई जांचों को प्रधानमंत्री को भेजे जाने के प्रावधान थे, प्रधानमंत्री से ही कार्रवाई की अपेक्षा थी, ठीक वैसे ही ताजा मसौदे में भी प्रधानमंत्री से ही अपेक्षाएं की गई हैं। मूलभूत प्रश्न यह है कि प्रधानमंत्री ही अपने दायित्व का निर्धारण ठीक से कर रहे होते तो क्या 2-जी घोटाला होता? तो क्या राष्ट्रमंडल खेल घोटाले के चलते भारत की अंतरराष्ट्रीय बदनामी होती? अमेरिकी संस्था ग्लोबल फाइनेंशियल इंटीग्रिटी के अनुसार भारत के 22.5 लाख करोड़ रुपये अवैध रूप से विदेशी बैंकों में जमा हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इसे देश के धन की लूट कहा है। भारत के भीतर भी लगभग इसका आधा काला धन है। राष्ट्रमंडल 2-जी आदि चर्चित घोटालों को जोड़कर भी बात पूरी नही होती। सरकारी तंत्र के हर हिस्से में महालूट है। कई मुख्यमंत्री लूट रहे हैं, अनेक केंद्रीय मंत्री, राज्यों के मंत्री, प्रशासनिक अधिकारी इसी तरह की लूट में शामिल बताए जाते हैं। उत्तर प्रदेश व बिहार के पूर्व मुख्यमंत्रियों पर आय से अधिक संपदा के आरोप रहे हैं। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री भी जांच के लपेटे में हैं। भ्रष्टाचार के प्रति उदारीकरण की नीति ने आम जन को कंगाल बनाया है। रोग काफी पुराना है। आजादी के बाद पं. नेहरू के समय कृष्णमेनन जीप घोटाला हुआ। उड़ीसा के मुख्यमंत्री बीजू पटनायक, जम्मू-कश्मीर के बख्शी गुलाम मोहम्मद, बिहार के कृष्ण बल्लभ सहाय, पंजाब के प्रताप सिंह कैरों, महाराष्ट्र के एआर अंतुले आदि मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार के आरोपी रहे हैं। भ्रष्टाचार की कथा अनंत है। केवल छवि सुधार से ही बात नहीं बनेगी। ठोस कार्रवाई जरूरी है। मनमोहन सिंह सरकार अटल बिहारी सरकार के लोकपाल विधेयक से प्रेरणा क्यों नहीं लेती? वह जनता सरकार द्वारा 1977 में प्रस्तुत लोकपाल विधेयक को आधार क्यों नहीं बनाती? वह एक दर्जन से ज्यादा राज्यों में कार्यरत लोकपाल जैसी संस्था लोकायुक्तों की कार्यपणाली, अच्छाई, कमजोरी के अनुभवों का संज्ञान क्यों नहीं लेती? उत्तर प्रदेश सरकार के लोकायुक्त की जांचों ने मंत्रियों की नींद हराम की है। एक मंत्री हाल में ही हटे हैं। कई विदाई से डरे अपना कामकाज जल्दी-जल्दी निपटा रहे हैं। सवाल यह है कि छोटे-छोटे देशों और भारत के अनेक राज्यों ने ऐसी ही निगरानी संस्था का विकास स्वत:स्फूर्त ढंग से कर लिया है तो केंद्रीय स्तर पर लोकपाल जैसी निगरानी संस्था का अधिनियम अतिशीघ्र क्यों नहीं पारित हो सकता? देश भ्रष्टाचार से तबाह है। संसदीय जनतंत्र में राजनीतिक तंत्र की खास भूमिका होती है। भ्रष्टाचार की राजनीतिक संस्कृति का विकास कांग्रेस ने किया। उसने जैसा बोया था वही फसल आज काट खाने दौड़ रही है। (लेखक उप्र विधान परिषद के सदस्य हैं)



लाल चौक से उभरे सवाल


आखिरकार जम्मू-कश्मीर की उमर अब्दुल्ला सरकार गणतंत्र दिवस पर श्रीनगर के लाल चौक पर भाजपा को तिरंगा फहराने से रोकने में सफल रही, लेकिन यह कोई ऐसा कार्य नहीं जिस पर वह गर्व कर सके। यह एक जिद थी जो वह येन-केन-प्रकारेण पूरी करने में सफल रही। उसके लिए यह बताना मुश्किल होगा कि इससे उसे हासिल क्या हुआ? नि:संदेह इससे अलगाववादी मुख्यधारा में आने से रहे। सच तो यह है कि उनका दुस्साहस और बढ़ सकता है। इस मामले में जम्मू-कश्मीर सरकार के साथ खुलकर खड़ी होने वाली केंद्र सरकार के पास भी इस सवाल का जवाब शायद ही हो कि लाल चौक को ऐसे स्थल के रूप में उभारने से किसे लाभ मिला जहां भारत का राष्ट्रीय ध्वज नहीं फहराया जा सकता? इसमें संदेह नहीं कि लाल चौक पर तिरंगा फहराकर भाजपा अपने राजनीतिक हित साधना चाह रही थी, लेकिन यदि वह अपने इस उद्देश्य में सफल हो जाती तो क्या इससे कोई राष्ट्रीय क्षति होने वाली थी? भाजपा के इस आयोजन से यदि किसी को एतराज था तो वे थे कश्मीर घाटी के चंद अलगाववादी। यह विचित्र है कि उमर अब्दुल्ला ने न केवल अलगाववादियों की आपत्ति को आवश्यकता से अधिक महत्व दिया, बल्कि उनके सुर में सुर भी मिलाने लगे। यह सही है कि उनकी सरकार ने भाजपा के आयोजन के साथ-साथ अलगाववादियों के लाल चौक चलो अभियान को भी नाकाम कर दिया, लेकिन आखिर इन दोनों कार्यो की तुलना कैसे की जा सकती है? क्या जो काम अलगाववादियों को पसंद नहीं वे राजनीतिक दलों के लिए भी निषेध हैं? भाजपा का आयोजन विफल होने से यदि कोई अपने मकसद में कामयाब हुआ तो वह जम्मू-कश्मीर अथवा केंद्र सरकार नहीं, बल्कि अलगाववादी हैं। स्पष्ट है कि उमर अब्दुल्ला ने जाने-अनजाने खुद को एक ऐसे राजनेता के रूप में उभारा जिसे अलगाववादियों की भावनाओं की अधिक फिक्र है। उन्होंने भाजपा को यह कहने-प्रचारित करने का अवसर दिया कि अलगाववादियों के साथ उमर अब्दुल्ला की हमदर्दी इस हद तक है कि वह तिरंगा फहराने से भी रोक सकते हैं। भाजपा उन्हें अलगाववादियों का समर्थक ठहराए या नहीं, इतिहास में यह दर्ज होना शुभ नहीं कि उनकी सरकार ने अलगाववादियों के कारण भाजपा को लाल चौक पर तिरंगा नहीं फहराने दिया। यह निराशाजनक है कि केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर सरकार को यह समझाने की जरूरत नहीं समझी कि लाल चौक पर तिरंगा फहराने के भाजपा के आयोजन से असहमत होना अलग बात है और उस आयोजन को विफल करने में जुट जाना अलग बात। इस पर बहस हो सकती है कि राष्ट्रीय प्रतीकों का राजनीतिक इस्तेमाल किया जाना चाहिए या नहीं, लेकिन क्या कोई ऐसा राजनीतिक दल है जो किसी न किसी स्तर पर ऐसे प्रतीकों के जरिये राजनीति न करता हो? भाजपा की तिरंगा यात्रा से असहमत होने के पक्ष में तरह-तरह के तर्क दिए जा सकते हैं, लेकिन इस आधार पर उसकी यात्रा रोकना हास्यास्पद है कि लाल चौक में तिरंगा फहराने से घाटी की शांति में खलल पड़ता। क्या उसे शांति कहा जा सकता है जो राष्ट्रीय ध्वज फहराने से भंग हो जाए? इससे भी महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि क्या अब कश्मीर समस्या का समाधान अलगाववादियों का इसी तरह तुष्टीकरण करके किया जाएगा? ये वे सवाल हैं जिनके जवाब सामने आने ही चाहिए।

जिम्मेदारी से विमुख


लेखक बेलगाम महंगाई और भ्रष्टाचार के लिए लाचार-कमजोर प्रधानमंत्री को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं...
संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार अधिकारयुक्त किंतु दायित्वमुक्त और अधिकारमुक्त पर दायित्वयुक्त का सटीक उदाहरण पेश कर रही है। संप्रग की अध्यक्ष सोनिया गांधी संपूर्ण अधिकारयुक्त हैं, लेकिन उनकी कोई जवाबदेही नहीं है। जिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जवाबदेही है उन्हें एक तिनका भी इधर से उधर करने का अधिकार नहीं है। इसलिए जहां आजकल सोनिया गांधी समस्त परिस्थितियों के लिए जिम्मेदार होते हुए भी उनसे पूरी तरह मुक्त हैं, वहीं मनमोहन सिंह आदेश पालन की जिम्मेदारी उठाते हुए अपनी स्वच्छ और ईमानदार छवि से बाहर इसलिए निकलते जा रहे हैं क्योंकि उनके पास कोई अधिकार नहीं है। उनके वरिष्ठ मंत्रियों में चल रही तनातनी से अब परदा उठ चुका है। कृषि और खाद्य मंत्री शरद पवार का यह बयान की वह खाद्यान्न के लिए जिम्मेदार हैं मूल्य के लिए नहीं, सीधे-सीधे वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी पर हमला है। महंगाई रोकने के लिए मनमोहन सिंह द्वारा बुलाई गई बैठक के बीच से शरद पवार और प्रणब मुखर्जी का उठकर चले जाना और फिर महंगाई के मुद्दे पर आत्मसमर्पण जैसी स्थिति में मंत्रियों का हाथ उठा देना इस बात का सबूत है कि सरकार के पास आम आदमी की समस्या पर विचार करने के लिए न तो समय है और न ही सोच। यदि ऐसा न होता तो तत्कालीन पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा के इस बयान के दो दिन बाद ही पेट्रोल के मूल्यों में वृद्धि न हो जाती कि अब दाम नहीं बढ़ेंगे। पिछले तीन महीनों के भीतर चौथी बार पेट्रोल के दाम बढ़े हैं। भले ही प्याज आम आदमियों को रुला रही हो, लेकिन एक महीने पहले 15 रुपये किलो बिकने वाली प्याज को 35 रुपये किलो उपलब्ध कराकर सरकार उसके सस्ते होने का ढिंढोरा अवश्य पीट रही है। प्याज की फसल खराब होने का हवाला देकर उसके महंगे होने की बात की जा रही है लेकिन सरकार के पास इसका कोई जवाब नहीं है कि फसल खराब होने और प्याज के दाम बढ़ने तक इसका निर्यात क्यों किया जाता रहा। खाद्यान्न और जीवन की रोजमर्रा की जरूरतों के लिए उपभोक्ता वस्तुओं के दाम बढ़ने के संबंध में सरकार अजीबोगरीब तर्क पेश कर रही है। इसके लिए कभी प्रधानमंत्री गरीबों की आय बढ़ने और साथ ही उनके द्वारा अधिक खाने को जिम्मेदार ठहरा देते हैं तो कभी यह कहकर समस्या से मुंह चुराने लगते हैं कि वह कोई ज्योतिषी नहीं हैं, जो यह बता सकें कि महंगाई कब कम होगी। महंगाई पर अंकुश लगाने में राज्यों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है, लेकिन मूल्य बढ़ने का असली कारण केंद्रीय सरकार की नीतियां ही होती है। जो सामान थोक-व्यापारी उत्पादक से 10 रुपये किलो खरीदता है, वह उपभोक्ता के पास पहुंचते-पहुंचते 50 रुपये किलो कैसे हो जाता है। जब शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व में ही नैतिक मूल्यों का Oास हो रहा हो तो व्यापारियों से इसकी अपेक्षा करना बेमानी है। यदि प्रधानमंत्री अपने सहयोगियों के साथ सामंजस्य नहीं बैठा पा रहे हैं तो उनसे यह उम्मीद करना कि संसद के गतिरोध को समाप्त करने के लिए वह विरोधी दलों से सामंजस्य बैठा पाएंगे, कल्पना से अधिक कुछ नहीं। इस समय भारत सरकार के दो स्वरूप उभरकर सामने आ रहे हैं। एक स्वरूप तो महंगाई के रूप में है और दूसरा भ्रष्टाचार के रूप में। राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली के इस बयान की सत्यता से इनकार नहीं किया जा सकता कि वर्तमान सरकार देश की सबसे भ्रष्ट सरकार है। यह भी सही है कि राजनेताओं और नौकरशाही के भ्रष्टाचार के मामले जिस तरह प्याज की परत के समान खुलते जा रहे हैं, उससे तो ईमानदार लोगों की छवि भी प्रभावित हो रही है। यदि महंगाई के बारे में जिम्मेदारी से भागने के लिए केंद्र के वरिष्ठ मंत्री परस्पर विरोधी बयान दे रहे हैं तो नीतियों के संबंध में अस्पष्टता कम नहीं है। संप्रग की नियंत्रक संस्था राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने सरकार को दो परामर्श दिए थे। एक यह कि मनरेगा की मजदूरी को न्यूनतम वेतनमान के साथ जोड़ दिया जाए और दूसरा खाद्यान्न सुरक्षा गारंटी कानून बनाया जाए, लेकिन सरकार ने दोनों को अस्वीकार कर दिया। चर्चा है कि मनमोहन सिंह पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश तथा कुछ अन्य लोगों से मुक्ति पाना चाहते हैं, लेकिन ये नाम ऐसे हैं जिनकी गिनती सोनिया गांधी की किचेन कैबिनेट के सदस्य के रूप में होती है। इसलिए प्रधानमंत्री इन्हें हटाने में और अपनी पसंद के कुछ लोगों को लाने में सफल हो सकेंगे, यह कहना कठिन है। मानवाधिकार समिति के अध्यक्ष और मुख्य सतर्कता आयुक्त को नियुक्त करने में तथा भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद उन्हें हटाने में जिस अक्षमता का उन्होंने प्रदर्शन किया है, उससे साफ जाहिर है कि यदि उन्हें पद पर बने रहना है तो आदेश पालक की भूमिका ही निभाते रहना होगा। वैसे सत्ता के नजदीक रहने वाले कुछ कांग्रेसियों ने यह प्रयास अवश्य शुरू कर दिए हैं कि राहुल गांधी को उप प्रधानमंत्री बनाकर मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया जाए। लेकिन सवाल यह है कि उस परिस्थिति में आजकल विक्षुब्ध नजर आ रहे लोकसभा में सदन के नेता और वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी क्या करेंगे। (लेखक राज्यसभा के पूर्व सदस्य हैं)


कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र बनाम आंतरिक कलह


यूपी में सियासी वर्चस्व की जंग ने कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र बहाली की कवायद को पलीता लगा दिया है। नतीजतन कांग्रेस को यह खासा महंगा पड़ रहा है। स्थिति यह है कि विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं वैसे-वैस संगठन चुनाव को लेकर पार्टी नेताओं में पैदा हुई खटास नासूर बनती जा रही है। राज्य में करीब एक दर्जन से ज्यादा ऐसे जिले हैं जहां अभी तक पार्टी जिलाध्यक्षों की घोषणा नहीं कर सकी है। इसमें कानपुर और मेरठ जैसे महत्वपूर्ण जिले भी शामिल हैं। सबसे दयनीय हालत गोरखपुर की हैं, जहां पार्टी पूरी तरह न केवल दो गुटों में बंट गई हैं बल्कि संगठन का विवाद अब सड़कों पर पहुंच गया है। मंगलवार को कांग्रेस के एक गुट ने प्रदेश मुख्यालय आकर धरना-प्रदर्शन तक किया। उत्तर प्रदेश में संगठनात्मक चुनाव की घोषणा के साथ ही कांग्रेस नेताओं में वर्चस्व की जंग शुरू हो गई। कई जिलों में स्थिति विस्फोटक होने पर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को हस्तक्षेप कर मामला शांत कराना पड़ा। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने शुरू में इसे काफी हल्के से लिया। इसके पीछे पार्टी के कद्दावर नेताओं की यह सोच थी कि विधानसभा चुनाव आने के साथ ही सभी विवाद पृष्ठभूमि में चले जाएंगे, लेकिन एक दर्जन से ज्यादा जिले ऐसे हैं जहां यह विवाद थमने के जगह नासूर बन गया है। हालत यह है कि पार्टी को अब यह न तो निगलते बन रहा है और न ही उगलते। पार्टी नेतृत्व किंकर्तव्यविमूढ़ है। उसकी समझ में नहीं आ रहा कि किसे खुश करे और किसे नाराज,क्योंकि नेताओं की नाराजगी विधानसभा चुनावों में पार्टी को भारी पड़ सकती है। मसलन, वाराणसी में चुनाव को लेकर इतना अधिक विवाद हुआ कि एक पक्ष सोनिया गांधी के दरबार तक पहुंच गया और अंतत: आलाकमान को यहां के संगठन चुनाव स्थगित करने का फरमान जारी करना पड़ गया। इससे भी बदतर हालत गोरखपुर की है। यहां कांग्रेस के नेता दो खेमों में बंट गए हैं और खुलकर एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं। संगठन चुनाव परिणाम की घोषणा के बाद भी विवाद खत्म नहीं हुआ और अब इसकी लपटें प्रदेश मुख्यालय तक आ पहुंच गई हैं। चुनाव में मात खाया खेमा पार्टी नेतृत्व पर चुनाव नतीजों में फेरबदल करने के लिए लगातार दबाव बनाए हुए है। इससे पार्टी के स्थिति सांप छंछूदर जैसी हो गई है। वैसे प्रदेश इकाई के लिए इसमें चाहकर भी कुछ करना संभव नहीं है, क्योंकि एक बार परिणाम घोषित हो जाने के बाद इसमें फेरबदल का अधिकार केवल आलाकमान में ही निहित है। इसके अलावा राज्य के 13 जिले ऐसे हैं जहां अभी तक जिलाध्यक्षों की घोषणा नहीं हो सकी है। इसमें रायबरेली व सुलतानपुर भी शामिल है, जिनके लिए कहा जाता है कि इन पर फैसला राहुल गांधी व सोनिया गांधी करेंगी। इसके अलावा मेरठ, कानपुर, आजमगढ़, सीतापुर, जेपी नगर, औरेया व अलीगढ़ हैं। इनमें अधिकांश में जिलाध्यक्ष पर ही पेंच फंसे हुए हैं। कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता सुबोध श्रीवास्तव कहते हैं कि गोरखपुर में क्षुब्ध कार्यकर्ताओं की भावनाओं से वरिष्ठ नेताओं को अवगत करा दिया गया है। उनके अनुसार संगठन के फोरम पर अपनी बात कहने का सबको अधिकार है।


Friday, January 28, 2011

काले धन पर सरकार का काला आचरण


ऐसा प्रतीत हो रहा है कि संप्रग सरकार को न्यायालय में लताड़ सुनने और सहने की आदत सी हो गई है। अन्यथा वह न्यायालय के आदेशों को न तो ठेंगे पर रखती और न ही बार-बार अदालत से इस तरह अपमानित होती। देखने में आ रहा है कि हर संवेदनशील मामले में संप्रग सरकार और उसके नियंत्रण में काम करने वाली संवैधानिक संस्थाओं को न्यायालय का कोपभाजन बनना पड़ रहा है। बावजूद इसके सरकार और संस्थाएं न्यायालय के साथ सकारात्मक रुख अपनाने को तैयार नहीं दिख रही हैं। पिछले काफी दिनों से देखा जा रहा है कि भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे सीवीसी की नियुक्ति के मामले में सरकार का रुख अडि़यल बना हुआ है। सीएजी के रिपोर्ट पर भी उसके मंत्रियों द्वारा लगातार सवाल दागे जा रहे हैं। मंत्रियों को न तो संसदीय विशेषाधिकारों के हनन का गम है और न ही सरकार को न्यायालय की अवज्ञा का। विदेशी बैंकों में भारतीयों द्वारा जमा काले धन की वापसी के मामले में भी सरकार का आचरण अव्यावहारिक और अतार्किक दिख रहा है। विदेशी बैंकों में जमा काले धन की संपूर्ण जानकारी देने में सरकार की आनाकानी और हिचकिचाहट से साफ जाहिर हो रहा है कि काले धन की वापसी को लेकर उसकी मंशा और नीयत कतई साफ नहीं है। विपक्षी दलों द्वारा एक अरसे से मांग की जा रही है कि विदेशों में जमा काले धन की वापसी के लिए सरकार ठोस पहल करे, लेकिन सरकार संख्या बल के जोर से विपक्षी मांग को लगातार अनसुना करती जा रही है। अब जब मामला अदालत की चौखट तक जा पहुंचा है और सरकार पर दबाव बढ़ने लगा है कि वह काले धन की वापसी की दिशा में सकारात्मक कदम उठाए तो ऐसे में सरकार की कोशिश अपने बचाव तक ही सीमित नजर आ रही है। पिछले दिनों विदेशी बैंकों में जमा काले धन के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जब सरकार से पूछा गया कि आखिर वह विदेशी बैंकों में भारतीय खातेदारों के नाम को क्यों नहीं उजागर करना चाहती है तो सरकार का जवाब हैरान कर देने वाला रहा। कोई ठोस उत्तर देने की बजाय वह ज्ञान बांटती नजर आई कि अगर नामों का खुलासा हुआ तो अंतरराष्ट्रीय संधि का उल्लंघन होगा और इससे भारत की छवि को भी धक्का पहुंचेगा। सरकार द्वारा न्यायालय में हलफनामा दाखिल करते हुए कहा गया कि जर्मनी के लिचटेंस्टीन बैंक में जिन 26 लोगों द्वारा पैसा जमा किया गया है उनसे जुड़ी जानकारी का उल्लेख करना उचित नहीं है। सरकार के इस कदम से न्यायालय का नाराज होना स्वाभाविक है। न्यायमूर्ति बी. सुदर्शन रेड्डी और न्यायमूर्ति एसएस निज्जर की पीठ ने देश के जाने-माने वकील रामजेठमलानी की काले धन से जुड़ी यााचिका पर सुनवाई करते हुए यहां तक कह डाला कि राष्ट्रीय संपत्ति को विदेशों में रखना देश को लूटने के समान है और यह शुद्ध रूप से राष्ट्रीय संपत्ति की चोरी है, लेकिन लग नहीं रहा है कि अदालत के इस कथन से सरकार की सेहत पर कुछ असर पड़ने वाला है। सरकार अपने कुतर्कों के दम पर न्यायालय और देश की जनता को पाठ पढ़ाने पर तुली है। सरकार द्वारा लगातार रट लगाया जा रहा है कि काला धन जमा करने वालों के नाम के खुलासे से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की साख कमजोर होगी और उसकी विश्वसनीयता को धक्का पहुंचेगा। क्या सरकार की यह दलील हास्यापद नहीं लगती है? अगर वाकई में सरकार को अपनी साख की चिंता होती तो वह भ्रष्टाचारियों के प्रति उदारता नहीं बरतती और न ही भ्रष्टाचारियों को बचाने के लिए मोर्चा बांधती। क्या यह विचित्र नहीं लगता है कि साख की बात करने वाली संप्रग सरकार न्यायालय में उन भ्रष्टाचारियों को बचाने का लगातार प्रयास कर रही है जिनके हाथ घोटाले में सने हैं। साख की बात करने वाली संप्रग सरकार से पूछा जाना चाहिए कि उच्चतम न्यायालय के फटकार के बाद भी पॉमोलिन तेल आयात घोटाले के आरोपी पीजे थॉमस सीवीसी जैसे महत्वपूर्ण पद पर अभी तक क्यों बैठे हैं? सरकार बार-बार न्यायालय में यह बताने की कोशिश क्यों कर रही है कि मौजूदा सीवीसी पीजे थॉमस सत्यनिष्ठ और ईमानदार हैं? क्या ऐसे अमर्यादित आचरण से सरकार की साख कमजोर नहीं होती है? देखा जाए तो संप्रग सरकार का भ्रष्टाचार से लड़ने का रवैया आंख में धूल झोंकने वाला है। भ्रष्टाचार पर शुतुरमुर्गी रवैया अपनाने का ही नतीजा है कि उसकी नाक के नीचे एक लाख छिहत्तर हजार करोड़ रुपये का घोटाला हुआ और सरकार अपनी आंख पर पट्टी डाले रही। बेशर्मी की हद तो तब और बढ़ जाती है जब पूरी सरकार अपने वर्तमान दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल के इस कुतर्क पर सहमति देती नजर आती है कि सीएजी की रिपोर्ट सच्चाई से परे है और सरकार को स्पेक्ट्रम आवंटन में किसी प्रकार की राजस्व हानि नहीं हुई है। अब जब न्यायालय द्वारा कपिल सिब्बल को लताड़ लगाई गई है तो कांग्रेस पार्टी उनका निजी वक्तव्य बता अपना पल्ल झाड़ रही है। आखिर भ्रष्टाचार से लड़ने का यह कौन सा नायाब तरीका है? सरकार अगर सचमुच में भ्रष्टाचार पर संजीदगी दिखाती तो न्यायालय द्वारा आदर्श हाउसिंग और कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाले की जांच कर रही सीबीआइ को बार-बार हिदायत देने की नौबत ही नहीं आती। क्या यह अटपटा नहीं लगता है कि आरोपियों के खिलाफ एफआइआर दायर करने तक का आदेश न्यायालय को देना पड़ रहा है। इसका मतलब तो यही हुआ कि सरकार अपने उत्तरदायित्वों का भली प्रकार से निर्वहन नहीं कर रही है। भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकारों की कमजोर लड़ाई का ही नतीजा रहा है कि भ्रष्ट भारतीय राजनीतिज्ञों, नौकरशाहों और उद्योगपतियों द्वारा देश को लूटा गया और लूटी गई काली संपत्ति को विदेशी बैंकों में जमा किया गया। सरकारें भ्रष्टाचाारियों के काले कारनामों पर मौन रही। आज की तारीख में तकरीबन 70 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की धनराशि केवल स्विस बैंक में ही जमा है, बाकी विदेशी बैंकों में कितना धन जमा होगा भगवान ही जानता है। अब जब काले धन को वापस लाने का माहौल बनने लगा है तो सरकार अंतरराष्ट्रीय संधि का हवाला दे रही है। संप्रग सरकार को अमेरिका से सबक लेना चाहिए कि आज से तीन साल पहले वह किस तरह अपने देश के भ्रष्ट लोगों द्वारा जमा किए गए 280 अरब डॉलर का हिसाब स्विस बैंक से लिया और बैंक पर जुर्माना अलग से लगाया। जिन भ्रष्ट अमेरिकी नागरिकों का हिसाब-किताब स्विस बैंक में पकड़ा गया उनसे भी टैक्स वसूल किया गया। क्या इससे अमेरिका की कोई अंतरराष्ट्रीय संधि प्रभावित हुई अथवा क्या काले धन की वापसी से अमेरिका की साख और विश्वसनीयता खतरे में पड़ी। आखिर भारत सरकार अंतरराष्ट्रीय संधि की जुगाली क्यों कर रही है? अगर भ्रष्ट तरीके से जमा काले धन की वापसी हो जाती है तो न केवल देश के माथे पर लदा कर्ज उतर जाएगा, बल्कि देश की कई बुनियादी समस्याओं से भी निजात मिलेगी। देश की एक बड़ी आबादी जो भुखमरी की शिकार है उसको भरपेट भोजन मिलेगा। हजारों कल-कारखानें लगने से बेरोजगारी की समस्या हल होगी। आज की तारीख में भारत के आठ राज्य भयंकर गरीबी से जूझ रहे हैं। इनमें उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, झारखंड, उड़ीसा, राजस्थान और पश्चिम बंगाल प्रमुख हैं। देखा जाए तो इन आठों राज्यों की 41 करोड़ की आबादी 26 निर्धन अफ्रीकी देशों के बराबर है, लेकिन दुर्भाग्य है कि काले धन की वापसी में सरकार की नियत ही आड़े आ रही है। महंगाई और भ्रष्टाचार पर अपनी साख गंवा चुकी सरकार से पूछा जाना चाहिए कि देश के भ्रष्ट लोगों द्वारा विदेशों में जमा किया गया लूट का धन अपने देश में वापस लाना आखिर किस तरह देश की साख को धक्का पहंुचाने वाला है? कहीं ऐसा तो नहीं की इस महालूट के खेल में शामिल धंधेबाजों के नाम का खुलासा होने से सरकार की साख पर ही आंच आ जाएगी? आखिर सच को उजागर न होने देने के कुतर्क के पीछे सरकार की मंशा क्या हो सकती है? सरकार के मंत्रिमंडल में भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे लोगों का अभी भी ऊंचे पदों पर जमे रहना संदेह पैदा करता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

भाजपा की तिरंगा यात्रा ने कांग्रेस को चिंता में डाला


भाजपा की तिरंगा यात्रा का कांग्रेस से जवाब देते नहीं बन रहा है। पार्टी की चिंता है कि कहीं भाजपा इसका राजनीतिक लाभ उठाने में सफल न हो जाए। इस विषय पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सोमवार को पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रणव मुखर्जी, एके एंटनी और गुलामनवी आजाद के साथ एक बैठक भी की। बताया जा रहा है कि पार्टी में कश्मीर के मामले को फिलहाल ऑस्कर फर्नांडिस देखेंगे। एक तरफ कांग्रेस को श्रीनगर में लाल चौक पर तिरंगा फहराने के बहाने भाजपा को राजनीतिक लाभ मिलने की चिंता है, वहीं दूसरी तरफ पार्टी ने इस संभावित नुकसान की भरपाई के लिए भाजपा और उसके मातृ संगठन आरएसएस पर हमले तेज करने की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। इस क्रम में कांग्रेस ने भाजपा पर कई सवाल दागे हैं। प्रवक्ता मनीष तिवारी ने भाजपा नेताओं से पूछा है कि अगर उनके अंदर ज्यादा ही देशप्रेम उमड़ रहा है तो वे पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के मुजफ्फराबाद में जाकर तिरंगा क्यों नहीं फहराते ? उन्होंने कहा कि वह भाजपा नेताओं को सलाह देना चाहेंगे कि वे अपनी पार्टी की सरकारवाले राज्य छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के कब्जेवाले दंडकारण्य में जाकर तिरंगा फहरा लें ? इस मामले में कांग्रेस ने आरएसएस को भी लपेटा है। कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव और प्रवक्ता मोहन प्रकाश ने भाजपा से सवाल किया है कि वह यह बताए कि आरएसएस 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस क्यों नहीं मानती ? उन्होंने आरएसएस पर आरोप लगाया कि वह 14 अगस्त को कार्यक्रम आयोजित करता है। बिना कहे कांग्रेस नेता ने यह स्मरण करा दिया कि 14 अगस्त को पाकिस्तान अपना स्वतंत्रता दिवस मनाती है। कांग्रेस नेता मोहन प्रकाश ने यह आरोप भी लगाया कि आरएसएस देश की आजादी का कोई सम्मान नहीं करती और यही वजह है कि अभी भी वह भगवा ध्वज को तिरंगे से ज्यादा अहमियत देती है और अपने दफ्तरों पर इसे ही फहराती है। कांग्रेस ने और कई सवाल भी भाजपा से किए हैं। प्रवक्ता मोहन प्रकाश ने कहा कि भाजपा को यह बताना चाहिए कि आरएसएस अपने सभी दफ्तरों पर तिरंगा क्यों नहीं फहराती ? उन्होंने कहा कि नागपुर के आरएसएस मुख्यालय पर तिरंगा फहराने के लिए कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने लाठियां खाईं और 600 कार्यकर्ताओं को जेल भेजा गया। तब जाकर आजादी के बाद पहली बार साल 2003 में आरएसएस ने नागपुर में अपने मुख्यालय पर तिरंगा फहराया। कांग्रेस नेता ने भाजपा नेताओं से इस पर सवाल किया कि उन्होंने हुबली में ईदगाह मैदान पर भी कभी तिरंगा फहराया था, पर आज जबकि कर्नाटक में उनकी अपनी सरकार है वे वहां जाकर तिरंगा क्यों नहीं फहराते ? उन्होंने कहा कि भाजपा का तिरंगे से कोई लेना-देना नहीं है। वह तो तनाव पैदा करने के लिए इसे मुद्दा बनाने की हरकत कर रही है। कांग्रेस नेता ने कहा कि भाजपा को इस सवाल का भी जवाब देना चाहिए उसे 19 साल बाद (साल 1992 में डा.मुरली मनोहर जोशी ने वहां तिरंगा फहराया था) श्रीनगर में तिरंगा फहराने की क्या सूझी है ? हालांकि कांग्रेस प्रवक्ता का भाजपा पर यह आरोप भी है कि डा.जोशी के तिरंगा फहराने के बाद कश्मीर में आतंकवाद बढ़ा। उन्होंने कहा कि भाजपा की तिरंगा यात्रा से आतंकवादियों का ही फायदा होनेवाला है। आखिर में कांग्रेस नेता ने भाजपा से यह सवाल किया कि कश्मीर जाकर भाजपा नेताओं को तिरंगा फहराने का क्या हक है। कश्मीर के लोग वहां के सभी जिलों में तिरंगा फहराते हैं। उन्होंने कहा कि अगर भाजपा के दफ्तर जाकर कांग्रेसी तिरंगा फहराएंगे तो भाजपा नेताओं को कैसा लगेगा ?
कहा, पाक अधिकृत कश्मीर जाकर क्यों नहीं फहराते तिरंगा
हुबली में अब तिरंगा क्यों नहीं फहराता आरएसएस


Wednesday, January 26, 2011

नवचिंतन का क्रियान्वयन


सांसद निधि की शुरुआत कराने के मामले में बिहार का महत्वपूर्ण योगदान था। पीवी नरसिंहराव द्वारा अपनी अल्पमत सरकार को बचाने के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा के मुखिया शिबू सोरेन के साथ किए गए सौदेबाजी को आज पूरा देश जानता है। उसी प्रक्रिया में सांसद निधि का प्रावधान हुआ था और नरसिंहराव की सरकार अपने कार्यकाल के पांच वर्ष पूरे करने में सफल रही। पिछले 15-16 सालों में इस प्रावधान के कारण चयनित जन प्रतिनिधियों की साख काफी गिरी है और इसने जनता के पैसे का दुरुपयोग के मामले में नए मापदंड स्थापित किए हैं। इस निधि में बढ़ोतरी होती रही और जन प्रतिनिधि इसे किसी भी तरह छोड़ने को तैयार नहीं है। इस परिदृश्य में बिहार केमुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक सराहनीय कदम उठाया है। बिहार में विधायक निधि समाप्त कर दी गई है और इसका विरोध वहां विपक्ष भी नहीं कर पा रहा है। नीतीश कुमार ने ऐसा माहौल बनाया कि मुंह खोलकर विरोध असंभव हो गया है। साहस के साथ जनमानस की समझ तथा जनहित में राजनीतिक दृष्टि से दीर्घकालिक हितों के निर्णय ले सकने की क्षमता ही किसी के नेतृत्व के गुणों को विस्तार और विश्वसनीयता देती है। ऐसे ही नेता देश को सही नेतृत्व दे सकते हैं। पिछले पांच वर्षो में देश ने यह जाना कि बिहार बदल रहा है। उसके पहले के पंद्रह वर्ष बिहार में कुशासन तथा स्वार्थपरकता के वर्ष थे। पिछले पांच वर्ष में बिहार ने अपना मन बनाया और बदलाव की आवश्यकता पर मोहर लगाई। अब बिहार अपना ऐतिहासिक दायित्व निभा रहा है। नए विचार तथा चिंतन का प्रवाह वहां से प्रस्फुटित हो रहा है। यही नहीं उनका क्रियान्वयन भी हो रहा है। इस प्रकार का परिवर्तन देश में इस समय विरले लोगों द्वारा ही संभव है। 2010 के अंतिम चार महीनों में भ्रष्टाचार के खुलासे जिस तेजी से हुए उससे पूरा देश स्तब्ध है। सभी जानते हैं कि भ्रष्टाचार हर ओर व्याप्त है, लेकिन वह इतना बढ़ गया है और भ्रष्टाचारियों की बेशर्मी इतनी ज्यादा बढ़ चुकी है इसका पता तो अब चल रहा है। राजनेताओं तथा नौकरशाहों का भ्रष्टाचार एक सामान्य बात है, लेकिन आदर्श सोसाइटी घोटाले के मामले जिस तरह सेना के उच्चतम स्तरों पर बैठे लोगों पर उंगली उठाई वह चिंतित करने वाली है। ऐसे स्थिति और माहौल में विधायक निधि समाप्त करने का साहस लगभग असंभव ही था। सांसद निधि का प्रावधान पीवी नरसिंहराव की अल्पमत सरकार को पांच साल का चलाते रहने के लिए खेले गए अनेक खेलों में प्रमुख था। तब का बिहार अलग था। शिबू सोरेन के झारखंड मुक्ति मोर्चा ने वह सरकार बचाई थी। धन का आदान-प्रदान बाकायदा चेक से हुआ, लेकिन तकनीकी कारणों से सर्वोच्च न्यायालय भी कुछ नहीं कर सका। उसके बाद यह धनराशि लगातार बढ़ती रही है। यह जानते हुए भी कि इस प्रावधान से चयनित प्रतिनिधियों की साख लगातार घटी है। आखिर क्या कारण है कि बिहार इसे समाप्त करने का साहस कर सका? ऐसा तभी संभव है जब व्यक्ति अपने व्यक्तित्व में उन सब लोगों की आशाओं, अपेक्षाओं को आत्मसात कर लेता है तभी उसकी अंत:शक्ति उसे बड़े पटल पर सोचने और कार्य करने को प्रेरित करती है। बिहार की घटना छोटी नहीं है। इसमें वह ताकत है जिसका दर्शन लोगों ने जेपी के नेतृत्व में किया था। बिहार ने मूल्य आधारित निर्णय लेने में पहल की है और उसका अनुसरण करने में किसी भी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री को हिचक नहीं होनी चाहिए। सांसद निधि व्यवस्था सारे देश में समाप्त होनी चाहिए। ऐसा कदम भ्रष्टाचार की जड़ों को कमजोर करेगा और जन प्रतिनिधियों की साख में कुछ बढ़ोतरी भी कर सकेगा। दुर्भाग्य से आज के राजनैतिक परिदृश्य में केवल आरोप-प्रत्यारोप ही सामने है। (लेखक एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक हैं)