सांसद निधि की शुरुआत कराने के मामले में बिहार का महत्वपूर्ण योगदान था। पीवी नरसिंहराव द्वारा अपनी अल्पमत सरकार को बचाने के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा के मुखिया शिबू सोरेन के साथ किए गए सौदेबाजी को आज पूरा देश जानता है। उसी प्रक्रिया में सांसद निधि का प्रावधान हुआ था और नरसिंहराव की सरकार अपने कार्यकाल के पांच वर्ष पूरे करने में सफल रही। पिछले 15-16 सालों में इस प्रावधान के कारण चयनित जन प्रतिनिधियों की साख काफी गिरी है और इसने जनता के पैसे का दुरुपयोग के मामले में नए मापदंड स्थापित किए हैं। इस निधि में बढ़ोतरी होती रही और जन प्रतिनिधि इसे किसी भी तरह छोड़ने को तैयार नहीं है। इस परिदृश्य में बिहार केमुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक सराहनीय कदम उठाया है। बिहार में विधायक निधि समाप्त कर दी गई है और इसका विरोध वहां विपक्ष भी नहीं कर पा रहा है। नीतीश कुमार ने ऐसा माहौल बनाया कि मुंह खोलकर विरोध असंभव हो गया है। साहस के साथ जनमानस की समझ तथा जनहित में राजनीतिक दृष्टि से दीर्घकालिक हितों के निर्णय ले सकने की क्षमता ही किसी के नेतृत्व के गुणों को विस्तार और विश्वसनीयता देती है। ऐसे ही नेता देश को सही नेतृत्व दे सकते हैं। पिछले पांच वर्षो में देश ने यह जाना कि बिहार बदल रहा है। उसके पहले के पंद्रह वर्ष बिहार में कुशासन तथा स्वार्थपरकता के वर्ष थे। पिछले पांच वर्ष में बिहार ने अपना मन बनाया और बदलाव की आवश्यकता पर मोहर लगाई। अब बिहार अपना ऐतिहासिक दायित्व निभा रहा है। नए विचार तथा चिंतन का प्रवाह वहां से प्रस्फुटित हो रहा है। यही नहीं उनका क्रियान्वयन भी हो रहा है। इस प्रकार का परिवर्तन देश में इस समय विरले लोगों द्वारा ही संभव है। 2010 के अंतिम चार महीनों में भ्रष्टाचार के खुलासे जिस तेजी से हुए उससे पूरा देश स्तब्ध है। सभी जानते हैं कि भ्रष्टाचार हर ओर व्याप्त है, लेकिन वह इतना बढ़ गया है और भ्रष्टाचारियों की बेशर्मी इतनी ज्यादा बढ़ चुकी है इसका पता तो अब चल रहा है। राजनेताओं तथा नौकरशाहों का भ्रष्टाचार एक सामान्य बात है, लेकिन आदर्श सोसाइटी घोटाले के मामले जिस तरह सेना के उच्चतम स्तरों पर बैठे लोगों पर उंगली उठाई वह चिंतित करने वाली है। ऐसे स्थिति और माहौल में विधायक निधि समाप्त करने का साहस लगभग असंभव ही था। सांसद निधि का प्रावधान पीवी नरसिंहराव की अल्पमत सरकार को पांच साल का चलाते रहने के लिए खेले गए अनेक खेलों में प्रमुख था। तब का बिहार अलग था। शिबू सोरेन के झारखंड मुक्ति मोर्चा ने वह सरकार बचाई थी। धन का आदान-प्रदान बाकायदा चेक से हुआ, लेकिन तकनीकी कारणों से सर्वोच्च न्यायालय भी कुछ नहीं कर सका। उसके बाद यह धनराशि लगातार बढ़ती रही है। यह जानते हुए भी कि इस प्रावधान से चयनित प्रतिनिधियों की साख लगातार घटी है। आखिर क्या कारण है कि बिहार इसे समाप्त करने का साहस कर सका? ऐसा तभी संभव है जब व्यक्ति अपने व्यक्तित्व में उन सब लोगों की आशाओं, अपेक्षाओं को आत्मसात कर लेता है तभी उसकी अंत:शक्ति उसे बड़े पटल पर सोचने और कार्य करने को प्रेरित करती है। बिहार की घटना छोटी नहीं है। इसमें वह ताकत है जिसका दर्शन लोगों ने जेपी के नेतृत्व में किया था। बिहार ने मूल्य आधारित निर्णय लेने में पहल की है और उसका अनुसरण करने में किसी भी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री को हिचक नहीं होनी चाहिए। सांसद निधि व्यवस्था सारे देश में समाप्त होनी चाहिए। ऐसा कदम भ्रष्टाचार की जड़ों को कमजोर करेगा और जन प्रतिनिधियों की साख में कुछ बढ़ोतरी भी कर सकेगा। दुर्भाग्य से आज के राजनैतिक परिदृश्य में केवल आरोप-प्रत्यारोप ही सामने है। (लेखक एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक हैं)
Showing posts with label २४ जनवरी २०११. Show all posts
Showing posts with label २४ जनवरी २०११. Show all posts
Wednesday, January 26, 2011
नवचिंतन का क्रियान्वयन
सांसद निधि की शुरुआत कराने के मामले में बिहार का महत्वपूर्ण योगदान था। पीवी नरसिंहराव द्वारा अपनी अल्पमत सरकार को बचाने के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा के मुखिया शिबू सोरेन के साथ किए गए सौदेबाजी को आज पूरा देश जानता है। उसी प्रक्रिया में सांसद निधि का प्रावधान हुआ था और नरसिंहराव की सरकार अपने कार्यकाल के पांच वर्ष पूरे करने में सफल रही। पिछले 15-16 सालों में इस प्रावधान के कारण चयनित जन प्रतिनिधियों की साख काफी गिरी है और इसने जनता के पैसे का दुरुपयोग के मामले में नए मापदंड स्थापित किए हैं। इस निधि में बढ़ोतरी होती रही और जन प्रतिनिधि इसे किसी भी तरह छोड़ने को तैयार नहीं है। इस परिदृश्य में बिहार केमुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक सराहनीय कदम उठाया है। बिहार में विधायक निधि समाप्त कर दी गई है और इसका विरोध वहां विपक्ष भी नहीं कर पा रहा है। नीतीश कुमार ने ऐसा माहौल बनाया कि मुंह खोलकर विरोध असंभव हो गया है। साहस के साथ जनमानस की समझ तथा जनहित में राजनीतिक दृष्टि से दीर्घकालिक हितों के निर्णय ले सकने की क्षमता ही किसी के नेतृत्व के गुणों को विस्तार और विश्वसनीयता देती है। ऐसे ही नेता देश को सही नेतृत्व दे सकते हैं। पिछले पांच वर्षो में देश ने यह जाना कि बिहार बदल रहा है। उसके पहले के पंद्रह वर्ष बिहार में कुशासन तथा स्वार्थपरकता के वर्ष थे। पिछले पांच वर्ष में बिहार ने अपना मन बनाया और बदलाव की आवश्यकता पर मोहर लगाई। अब बिहार अपना ऐतिहासिक दायित्व निभा रहा है। नए विचार तथा चिंतन का प्रवाह वहां से प्रस्फुटित हो रहा है। यही नहीं उनका क्रियान्वयन भी हो रहा है। इस प्रकार का परिवर्तन देश में इस समय विरले लोगों द्वारा ही संभव है। 2010 के अंतिम चार महीनों में भ्रष्टाचार के खुलासे जिस तेजी से हुए उससे पूरा देश स्तब्ध है। सभी जानते हैं कि भ्रष्टाचार हर ओर व्याप्त है, लेकिन वह इतना बढ़ गया है और भ्रष्टाचारियों की बेशर्मी इतनी ज्यादा बढ़ चुकी है इसका पता तो अब चल रहा है। राजनेताओं तथा नौकरशाहों का भ्रष्टाचार एक सामान्य बात है, लेकिन आदर्श सोसाइटी घोटाले के मामले जिस तरह सेना के उच्चतम स्तरों पर बैठे लोगों पर उंगली उठाई वह चिंतित करने वाली है। ऐसे स्थिति और माहौल में विधायक निधि समाप्त करने का साहस लगभग असंभव ही था। सांसद निधि का प्रावधान पीवी नरसिंहराव की अल्पमत सरकार को पांच साल का चलाते रहने के लिए खेले गए अनेक खेलों में प्रमुख था। तब का बिहार अलग था। शिबू सोरेन के झारखंड मुक्ति मोर्चा ने वह सरकार बचाई थी। धन का आदान-प्रदान बाकायदा चेक से हुआ, लेकिन तकनीकी कारणों से सर्वोच्च न्यायालय भी कुछ नहीं कर सका। उसके बाद यह धनराशि लगातार बढ़ती रही है। यह जानते हुए भी कि इस प्रावधान से चयनित प्रतिनिधियों की साख लगातार घटी है। आखिर क्या कारण है कि बिहार इसे समाप्त करने का साहस कर सका? ऐसा तभी संभव है जब व्यक्ति अपने व्यक्तित्व में उन सब लोगों की आशाओं, अपेक्षाओं को आत्मसात कर लेता है तभी उसकी अंत:शक्ति उसे बड़े पटल पर सोचने और कार्य करने को प्रेरित करती है। बिहार की घटना छोटी नहीं है। इसमें वह ताकत है जिसका दर्शन लोगों ने जेपी के नेतृत्व में किया था। बिहार ने मूल्य आधारित निर्णय लेने में पहल की है और उसका अनुसरण करने में किसी भी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री को हिचक नहीं होनी चाहिए। सांसद निधि व्यवस्था सारे देश में समाप्त होनी चाहिए। ऐसा कदम भ्रष्टाचार की जड़ों को कमजोर करेगा और जन प्रतिनिधियों की साख में कुछ बढ़ोतरी भी कर सकेगा। दुर्भाग्य से आज के राजनैतिक परिदृश्य में केवल आरोप-प्रत्यारोप ही सामने है। (लेखक एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक हैं)
नए परिसीमन से फिलहाल घाटे में भाजपा
उत्तराखंड विधानसभा के आगामी चुनाव में लगभग एक साल बाकी है। चुनाव के बाद सत्ता किस करवट बैठेगी अभी यह भी तय नहीं है। बावजूद इसके यह अभी से तय है कि सूबे में सत्तासीन भाजपा आधा दर्जन से ज्यादा सीटों के घाटे के साथ चुनावी समर में उतरेगी। नुकसान भाजपा की मुख्य प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस को भी उठाना पड़ रहा है, लेकिन अपेक्षाकृत काफी कम, महज एक विधानसभा सीट का। अलबत्ता, मौजूदा विधानसभा में बहुजन समाज पार्टी व उत्तराखंड क्रांति दल ऐसे किसी भी नुकसान से साफ बचते नजर आ रहे हैं। चुनाव से पहले ही विधानसभा सीटों के नुकसान का यह समीकरण किसी सियासी जोड़-तोड़ का नतीजा नहीं है, बल्कि यह है राज्य विधानसभा सीटों के नए परिसीमन से उभरी तस्वीर है। अगले चुनाव नए परिसीमन के आधार पर होना तय है ऐसे में सियासी दलों को इससे प्रथमदृष्टया होने वाले लाभ हानि का गणित साफ दिखाई दे रहा है। सत्तारूढ़ भाजपा को आधा दर्जन से अधिक और मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस को एक सीट का नुकसान इसी परिसीमन प्रक्रिया के नतीजों के रूप में होता नजर आ रहा है। सत्तारूढ़ भाजपा के पास मौजूदा विधानसभा में जितनी सीटें हैं उनमें से आधा दर्जन से ज्यादा चुनाव से पहले ही कम होने जा रही हैं। इन सीटों पर अभी भाजपा विधायक हैं। मसलन, राज्य के बागेश्र्वर जिले में तीन विधानसभा सीटें हैं और वर्तमान में तीनों भाजपा के ही पास हैं, लेकिन नए परिसीमन में यहां एक सीट खत्म हो गई है। यानि भाजपा को एक सीट का नुकसान। कमोवेश यही स्थिति चमोली जिले की भी है, जहां फिलवक्त चारों सीटें भाजपा के पास हैं,लेकिन भविष्य में इस जिले की एक सीट, नंदप्रयाग खत्म हो जाएगी।, मतलब सीधे-सीधे भाजपा को एक सीट का नुकसान यहां भी होगा। आरक्षण की नई व्यवस्था के कारण भी भाजपा को कई सीटों का घाटा उठाना पड़ रहा है। मसलन, ऊधमसिंह नगर जिले की बाजपुर सीट अब अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गई है तो टिहरी जिले की धनोल्टी सीट आरक्षण के दायरे से बाहर हो गई है। ऐसा ही देहरादून जिले की सहसपुर व राजपुर सीटों के साथ भी हुआ है। रिजर्व सीट सहसपुर अब सामान्य हो रही है तो अभी सामान्य श्रेणी की राजपुर सीट नए परिसीमन में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गई है। इन सभी सीटों पर सिटिंग विधायक भाजपा के हैं, यानि इनके इन सीटों से मैदान में न उतरने का खामियाजा भी पार्टी को उठाना पड़ सकता है। कुछ ऐसी ही स्थिति पौड़ी जिले में भी है, जहां वर्तमान में आठ से में पांच विधायक भाजपा के हैं, लेकिन नए परिसीमन में यहां केवल छह सीटें रह गई हैं। कह सकते हैं कि यहां भी घाटा भाजपा को ही है। इसके उलट कांग्रेस को भाजपा के मुकाबले कहीं कम घाटे की स्थिति का सामना करना पड़ेगा। मसलन, कांग्रेस के सिटिंग विधायक वाली एकमात्र कनालीछीना सीट ही नए परिसीमन में अस्तित्वविहीन हुई है। जाहिर है ऐसे में नए परिसीमन से कांग्रेस को मात्र एक सीट का नुकसान। बसपा और उक्रांद इस मायने में जरूर भाग्यशाली हैं कि उन्हें ऐसी किसी असहज स्थिति से दो-चार नहीं होना पड़ रहा है।
Subscribe to:
Posts (Atom)