Wednesday, June 1, 2011

बेबसी की दूसरी सालगिरह


बगैर बड़े शोर-शराबे के यूपीए-2 सरकार के दो साल गुजर गये। पूरे समय भ्रष्टाचार की गूंज रही। महंगाई जहां रुकने का नाम नहीं ले रही वहीं सरकारी कामकाज के मानदंडों पर वह च्युत दिखी। सरकार इन अहम सवालों को हल करने में पूरी तरह विफल रही, जिससे आम जन में काफी निराशा है। सरकार को उनकी निराशा से उपजे आक्रोश का कोपभाजन भी होना पड़ रहा है। ऐसे में उसकी साख दांव पर है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने यूपीए-2 के जारी रिपोर्ट कार्ड में इस सचाई को स्वीकार भी किया है। उन्होंने कहा है कि ‘टू जी स्पेक्ट्रम से जुड़े घटनाक्रम, राष्ट्रमंडल खेलों से संबंधित खरीद व ठेकों के मामले तथा राज्य सरकारों से जुड़े ऐसे ही मामले संयोगवश एक साथ उठे। इन घटनाओं के कारण हमारे बहुत से संवेदनशील नागरिकों को प्रशासन की दशा और भ्रष्टाचार के फैलाव पर गहरी चिंता हुई। ये चिंताए तर्कसंगत हैं। यूपीए सरकार इससे निपटने के लिए ठोस कार्रवाई करने के लिए प्रतिबद्ध है। हम उचित कानूनी प्रक्रिया के जरिये दोषियों को दंड देंगे और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए उचित कदम उठाएंगे।’ यह इंगित करता है कि सरकार की साख पर भ्रष्टाचार का दाग सबसे बड़ा है, जिसके चलते उसकी छवि को काफी नुकसान हुआ है। इस दाग को धोने और जनता का विश्वास हासिल करने के लिए सरकार को अब बहुत कुछ करके दिखाना होगा। क्योंकि जनता समझ रही है कि सरकार उसके हितों के लिए क्या कर रही है? यूपीए-2 की दूसरी सालगिरह की र्चचा करने से पहले पिछली पृष्ठभूमि पर नजर डालना जरूरी हो गया है। अपने पहले कार्यकाल में परमाणु करार पर लेफ्ट के समर्थन वापसी के बावजूद सरकार नहीं झुकी। प्रधानमंत्री उस समय जनमानस को यह संदेश देने में सफल हुए थे कि देश की कीमत पर राजनीति उन्हें बर्दाश्त नहीं है।
इसी तरह 26/11 मुम्बई हमले के बाद सरकार ने पाकिस्तान को घेरने तथा आतंकवाद से लड़ने के लिए दृढ़ता दिखायी थी। इसके चलते जनता के बीच ईमानदार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अलग साख थी, जिसको 2009 के चुनाव में कांग्रेस ने भुनाया। उसने दो सौ से अधिक सीटें जीती और सत्ता में वापसी की। भाजपा ने उस समय प्रधानमंत्री पर जितना हमला किया, वह अपनी साख गंवाती गयी। यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि साख की पूंजी पर सवार होकर कांग्रेस ने पुन: सत्ता में वापसी की है। लोगों को इस बार उससे बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद थी किंतु उसके कामकाज की शैली और एक के बाद एक घोटालों ने जनता को काफी निराश किया है। प्रधानमंत्री की छवि कमजोर और बेबस प्रधानमंत्री की बन गयी है। उनके इस बदले रूप से जनता आहत है और लोग झुंझलाहट के साथ कहने लगे हैं कि आखिर सरकार को हो क्या गया है? घोटाले दर घोटाले उजागर हो रहे हैं और सरकार उनमें उलझकर रह गयी है। लोगों को लगने लगा है कि ऊंचे पदों पर बैठे व रसूखदार लोग देश को लूटने में लगे हैं और जेबें भरने का यह काम आम आदमी की कीमत पर हो रहा है। क्योंकि भ्रष्टाचार संस्था का रूप ले चुका है। यही कारण है कि आज अदालतें शासन की संस्थाओं की तरह काम कर रही हैं। टू जी स्पेक्ट्रम मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो रही है। यद्यपि इस मामले में पूर्व टेलीकॉम मंत्री ए.राजा और तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री करुणानिधि की बेटी सांसद कनिमोझी सहित कई नौकरशाह व कॉरपोरेट कम्पनियों के आला अधिकारी जेल में हैं फिर भी इसकी गुत्थी सुलझने का नाम नहीं ले रही है। यह कमजोर सरकारी तंत्र की पोल खोलता है। इतना ही नहीं, कालेधन और सीवीसी (केंद्रीय सतर्कता आयुक्त) की नियुक्ति के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी किसी सरकार को शर्मसार करने के लिए काफी है। काले धन के सवाल पर मार्च में जब न्यायमूर्ति सुदर्शन रेड्डी ने केंद्र की निष्क्रियता पर अपने गुस्से का इजहार किया तो सरकार हरकत में आयी और तब कहीं जाकर कालेधन के सरगना हसन अली को मुम्बई के प्रवर्तन निदेशालय से सम्मन भेजा गया। इतना ही नहीं, सीवीसी की नियुक्ति को लेकर सरकार के साथ चार महीने की खींचतान के बाद इसी 3 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने सीवीसी की नियुक्ति रद्द कर दी। देश के इतिहास में यह पहला अवसर है जब प्रधानमंत्री द्वारा की गयी नियुक्ति रद्द की गयी हो। न्यायालय के इस तीखे तेवर से सरकार की खूब किरकिरी हुई और सरकार बैकफुट पर चली गयी। इन मामलों में लोगों को उम्मीद थी कि सरकार तंत्र की गड़बड़ी को दूर करेगी किंतु ऐसा हुआ नहीं। उसके आचरण से लोगों को लगा कि वह राजा को सजा दिलाने की जगह बचाने और पूरे मामले में लीपापोती में लगी है। दूसरे, देश में भ्रष्टाचार रोकने के लिए ऐसे शख्स को बिठाया था, जो खुद संदेह के घेरे में था। इन घटनाओं से लोगों का प्रधानमंत्री से भरोसा टूटा। इस भरोसे की पुनर्वापसी के लिए वह क्या करते हैं, यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। महंगाई रोकने में भी सरकार पूरी तरह विफल रही है। उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें आसमान छू रही हैं और सरकार का उस पर कोई नियंतण्रनहीं रह गया है। परिणामस्वरूप आमजन बेहाल है। पांच राज्यों के चुनाव परिणाम आने के एक ही दिन बाद सरकार ने पेट्रोल के दाम में पांच रुपये की वृद्धि कर दी। हालांकि सरकार इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतों का हवाला दे रही है। आलम यह है कि छोटे से अंतराल में आठ बार पेट्रोल की कीमतें बढ़ चुकी हैं। भविष्य में और वृद्धि के संकेत हैं। साथ ही साथ डीजल और रसोई गैस के भी दाम बढ़ने वाले हैं। ऐसे में खाद्यान्न, फल और सब्जियों के दाम स्वत: बढ़ जाएंगे। यही नहीं, अब बिजली दरें बढ़ाने की तैयारी भी शुरू हो चुकी है। इन कड़वी सचाइयों के बीच सरकार अपने रिपोर्ट कार्ड में कुछ भी बताये पर आम आदमी का जीना मुहाल हो गया है। प्रधानमंत्री से इस मोर्चे पर लोगों को बड़ी आशा थी। वे राहत के लिए उनकी तरफ देख रहे हैं, किंतु उम्मीद वहां भी टूटी है। वैसे पांच राज्यों के चुनाव परिणाम कांग्रेस के लिए सुकून भरे हो सकते हैं पर उसे तमिलनाडु के चुनाव परिणाम की गहराई से समीक्षा करनी होगी। तभी उसे सच का पता लग सकेगा क्योंकि ‘भरोसे’ का राजनीति में कितना महत्व है, यह चुनाव परिणाम उसी का आईना है। टूजी स्पेक्ट्रम में ए. राजा और करुणानिधि की बेटी के फंसने से वहां जनता में काफी आक्रोश था। इस भ्रष्टाचार के लपेटे में करुणानिधि का परिवार आ गया था, इसलिए जनता का उनसे भरोसा उठ गया और कांग्रेस के इस मामले में लीपापोती करने से भी नाराजगी थी। इसीलिए द्रमुक अपने राजनीतिक काल में सबसे कम 23 सीटें पा सकी और कांग्रेस जो गठबंधन के तहत 60 सीटों पर लड़ी थी, मात्र 5 ही सीटें जीत सकी। ऐसे में भ्रष्टाचार सरकार के समक्ष अहम मुद्दा बनकर खड़ा है। अब अगले साल उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड सहित कुछ अन्य राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में भ्रष्टाचार और जनता में सरकार के प्रति उपजी निराशा कांग्रेस के लिए मुसीबत का सबब बन सकती है। हम यहां दो घटनाओं का जिक्र कर प्रधानमंत्री को आगाह करना चाहते हैं। 26/11 की घटना को लेकर मुम्बई के लोगों में काफी गुस्सा था। पहली बार बिना किसी राजनीतिक पार्टी की अपील के हजारों लोग सड़कों पर उतर आये थे और उन्होंने खुलेआम राजनीतिक तंत्र और सत्ता प्रतिष्ठान में अनास्था जतायी थी। पूरे देश में आतंकवाद के खात्मे के लिए एकजुटता का माहौल बना था। उस समय मनमोहन सरकार ने आतंकवाद के खिलाफ दृढ़ता दिखा जनता का भरोसा जीत लिया था किंतु कुछ दिनों पूर्व भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कठोर लोकपाल बिल की मांग को लेकर जब अन्ना हजारे ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन किया तो सरकार से नाराज पूरे देश की जनता उनके समर्थन में खड़ी हो गयी क्योंकि अन्ना के रूप में उसे भरोसा मिला। लगा कि वे उसे इस दलदल से निकाल सकते हैं। इसी एकजुटता ने सरकार को झुकने के लिए मजबूर कर दिया। यूपीए सरकार को जनता के इस मनोभाव को समझने की जरूरत है अन्यथा समय उसे सबक सिखाने में देर नहीं करेगा। इसलिए जरूरत जनता का भरोसा जीतने की है। यद्यपि इन चुनौतियों के बीच प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए प्रमुख सोनिया गांधी ने यूपीए-2 की दूसरी सालगिरह पर बिना हल्ला किये भ्रष्टाचार के सफाये का वायदा किया है। उन्होंने घोटालेबाजों को दंडित करने के प्रति प्रतिबद्धता जताते हुए भ्रष्टाचार को अपनी कार्यशैली से मिटाने का वचन दिया है साथ ही दोहराया है कि अब अधिकारियों द्वारा शक्तियों के मनमाने इस्तेमाल पर रोक लगायी जायेगी क्योंकि ईमानदारी और जवाबदेही सरकार के दिल में है। किंतु अब तक भ्रष्टाचार, महंगाई और उग्रवाद जैसी समस्याओं के चलते नौकरशाही के आगे सरकार की छवि बेबस की होकर उभरी है, जो सरकारी नकारेपन को उजागर करती है। आम जनता में जहां भ्रष्टाचार को लेकर गुस्सा है, वहीं वह मंहगाई की मार से बेहाल है। ऐसे में देखना यह है कि सरकार अपनी साख बचाने और बेचारगी के ताने-बाने से कैसे बाहर निकल पाती है? क्योंकि ‘समय’ की उस पर पैनी नजर है।

छल-कपट का नया ठिकाना


लेखक एचआर भारद्वाज को राज्यपाल बनाए रखने से कांग्रेस को भारी राजनीतिक नुकसान होने की आशंका जता रहे हैं...
कर्नाटक के राज्यपाल के रूप में हंसराज भारद्वाज ने पिछले एक वर्ष में जैसा आचरण किया है उसे देखते हुए किसी को इस पर संदेह नहीं होना चाहिए कि उन्होंने बेंगलूर के राजभवन को साजिश, कपट और शरारत का गढ़ बना दिया है और ऐसा करते हुए वह राज्य में संविधान और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को सबसे अधिक क्षति पहुंचाने वाले व्यक्ति बन गए हैं। उन्होंने जो हथकंडे अपनाए हैं वे किसी अधकचरे वकील द्वारा जिरह में अपनाए जाने वाले तौर-तरीकों से मिलते-जुलते हैं। इससे भी अधिक विचित्र यह है कि जब-जब उनके ये तौर-तरीके असफल हो जाते हैं तो उन्हें पलटी मारने में तनिक भी देर नहीं लगती। सीधे शब्दों में कहा जाए तो हंसराज भारद्वाज ने अपने इस आचरण से उस पद की गरिमा ही गिराई है जिस पर वह आसीन हैं। उनके पिछले रिकार्ड को देखिए। गत अक्टूबर में जब 11 भाजपा विधायकों ने मुख्यमंत्री के खिलाफ बगावत कर सरकार से समर्थन वापस लेने की घोषणा की तो उन्होंने येद्दयुरप्पा से विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए कहा। यद्यपि उन्हें विधानसभा स्पीकर को यह आदेश देने का अधिकार नहीं था कि उन्हें किस तरह काम करना चाहिए, लेकिन फिर भी भारद्वाज के इस निर्णय को स्वीकार किया गया। इसके बाद जब येद्दयुरप्पा ने बहुमत साबित कर दिया तो उन्होंने विश्वास मत को धोखाधड़ी की संज्ञा दी और राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश कर दी। उस समय सभी इससे अवगत थे कि विधानसभा अध्यक्ष द्वारा 16 विधायकों की सदस्यता रद करने का फैसला एक बड़े कानूनी मसले का रूप ले लेगा-पहले उच्च न्यायालय में और फिर उच्चतम न्यायालय में। उच्च न्यायालय द्वारा स्पीकर के फैसले को सही ठहराने के बावजूद यह स्पष्ट था कि 16 विधायकों के भविष्य का फैसला अंतत: उच्चतम न्यायालय को ही करना है। इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने हाल में जो फैसला दिया उसमें भाजपा विधायकों के संदर्भ में स्पीकर के फैसले को खारिज कर दिया गया। उच्चतम न्यायालय के फैसले का आधार यह था कि स्पीकर ने भाजपा विधायकों को अयोग्य ठहराने में प्रक्रिया का सही तरह पालन नहीं किया। पांच निर्दलीय विधायकों के संदर्भ में उच्चतम न्यायालय का कहना यह था कि उनका समर्थन वापस लेना दलबदल विरोधी कानून के दायरे में नहीं आता। उच्चतम न्यायालय ने जो कुछ कहा उससे राज्यपालों को किसी भी तरह निर्वाचित सरकारों को अस्थिर करने का अधिकार नहीं मिल जाता। पिछले अक्टूबर में भी जब भारद्वाज ने राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश की थी तो जो लोग सहमति में सिर हिला रहे थे वे भी इस पर अनिश्चित थे कि केंद्र सरकार उच्चतम न्यायालय के इस स्पष्ट अभिमत के बाद उनकी सिफारिश को कैसे मान सकती है जिसमें कहा गया है कि राज्यपालों को यह अधिकार नहीं है कि वे किसी सरकार के बहुमत का निर्धारण करें। अगर भारद्वाज को कुछ संदेह भी था तो उन्हें अदालतों के निर्णय का इंतजार करना चाहिए था। बोम्मई मामले में उच्चतम न्यायालय ने पहला और सबसे बुनियादी सिद्धांत यह सामने रखा था कि किसी सरकार के बहुमत अथवा अल्पमत में होने का फैसला सदन के भीतर ही हो सकता है, राजभवन में नहीं। सौभाग्य से केंद्र सरकार का संचालन करने वालों ने भारद्वाज की तुलना में बेहतर समझ दिखाई और उन्होंने उनकी सिफारिश अस्वीकार कर दी। भारद्वाज ने फिर पलटी मारी और येद्दयुरप्पा से 14 अक्टूबर को विश्वास मत हासिल करने के लिए कहा। मुख्यमंत्री ने उनकी सिफारिश पर अमल किया और विश्वास मत जीत लिया। 2011 की शुरुआत में भारद्वाज फिर अपने रंग में आ गए। येद्दयुरप्पा पर लगे कुछ आरोपों ने भारद्वाज को विपक्षी नेता की तरह आचरण करने का अवसर प्रदान कर दिया। चूंकि भारद्वाज ने विधायकों के निष्कासन पर आपत्ति जताई थी इसलिए 26 विधायकों के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से वह अपना पक्ष सही सिद्ध हुआ मान सकते हैं, लेकिन यह साफ है कि राज्यपाल ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को एकदम गलत तरीके से समझा और राज्य में एक बार फिर राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश कर अपने अधिकारों का अतिक्रमण किया। जिस तरह पिछली बार केंद्र सरकार ने उनकी सिफारिश पर अमल करने का कोई तुक नहीं पाया था उसी तरह इस बार भी भारद्वाज की सिफारिश खारिज हो गई। हैरत की बात है कि भारद्वाज एक बार फिर पलटी मारने में तनिक भी नहीं सकुचाए। इससे अधिक हास्यास्पद और क्या होगा कि मंगलवार को कर्नाटक में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश करने वाले राज्यपाल ने गुरुवार को एक सार्वजनिक समारोह में कहा कि येद्दयुरप्पा को भारी समर्थन हासिल है। केंद्र सरकार को गौर करना चाहिए कि भारद्वाज संविधान और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को क्षति पहुंचा रहे हैं। जहां तक कांग्रेस का संबंध है तो उसे भारद्वाज सरीखे एक पक्षपाती नेता को राज्यपाल बनाए रखने की भारी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है, जो सर्वथा उचित तरीके से निर्वाचित एक मुख्यमंत्री को अस्थिर करने में लगे हैं। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

इतिहास बनता वामपंथ


लेखक राष्ट्रीय राजनीति में वामपंथी दलों के पराभव के कारणों की तह में जा रहे हैं...
अब वक्त आ गया है जब कम्युनिस्ट पार्टियों के नेता शीशे के सामने खड़े होकर यह विचार करें कि आखिर क्या बात है कि इस देश की जनता उन्हें ठुकराती जा रही है। आज न तो बंगाल में कम्युनिस्ट सत्ता में रह गए और न केरल में। एक जमाना था जब अनेक प्रदेशों में कम्युनिस्टों का वोट बैंक था। बदले हालात में इन सभी प्रदेशों में कम्युनिस्टों का वोट बैंक सिकुड़ गया और अब वे खुद दूसरे की बैसाखी का सहारा ले रहे हैं। किसी की पीठ पर चढ़कर इक्का-दुक्का सीट वे जीत जाते हैं, लेकिन उनके पास वोट बैंक जैसी कोई चीज नहीं रह गई है। इसके लिए कोई बाहर वाला जिम्मेदार नहीं है, बल्कि स्वयं कम्युनिस्ट पार्टी के बड़े नेता जवाबदेह हैं। उन्होंने इस तथ्य को स्वीकार करने से इंकार कर दिया कि बदलते वक्त के साथ विचारों को भी बदलना पड़ता है। भारत ऐसा देश है जहां 60 प्रतिशत नौजवान हैं। इस नौजवान देश की सोच, पसंद, कामकाज के तरीके और शिक्षा बदले माहौल के हिसाब से हैं। जो राजनीतिक दल अपने को उसमें नहीं ढालेंगे या अपनी नीतियों को नहीं बदलेंगे, वे लोगों से कटते जाएंगे। बदले भारत के लिहाज से भारत के राजनीतिक दलों को भी बदलना पड़ेगा। अब पुराने दकियानूसी विचार नहीं चलेंगे। दुर्भाग्य यह है कि अडि़यल कम्युनिस्ट अपने विचार नहीं बदलना चाहते। चीन ने अपने विचार बदल लिए, रूस ने अपने विचार बदल लिए, पोलैंड और हंगरी ने अपने विचार और नीतियां बदल लीं, लेकिन भारतीय कम्युनिस्ट लकीर के फकीर बने हुए हैं। कम्युनिस्टों में यदि किसी के विचारों में मुझे थोड़ा लचीलापन लगता है तो वह सीताराम येचुरी हैं। उन्होंने ठीक ही बयान दिया है और खुलकर कहा है कि हमारी हार की वजह लोगों से अलगाव और लोगों के मन में हमारे प्रति उपजा गुस्सा है। उन्होंने यह भी कहा कि मा‌र्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में परिवर्तन से इंकार नहीं किया जा सकता है। उन्होंने यह भी माना कि मनमोहन सिंह सरकार से समर्थन वापस लेना उनकी सबसे बड़ी भूल थी। यह बात इससे पहले ज्योति बसु और सोमनाथ चटर्जी भी कह चुके हैं। जब प्रकाश करात माकपा के महासचिव बने थे तो मैंने सोचा था कि चलो अब पार्टी दकियानूसी सोच से बाहर निकलेगी और एक आधुनिक माहौल में पढ़ा-लिखा व्यक्ति पार्टी का नेतृत्व करेगा, लेकिन धीरे-धीरे जब उनके विचार सुने तो लगा कि कोई बैलगाड़ी युग का आदमी 14वीं सदी से निकलकर आ गया है। वह जब बोलते तब किसी न किसी की आलोचना ही करते। उनके मुंह से आज तक मैंने किसी की तारीफ नहीं सुनी। उन्हें लगता है कि इस देश के गरीब, महिला, मजदूर आदि के एकमात्र खैरख्वाह और ठेकेदार वही हैं और बाकी लोगों को उनके बारे में बोलने या सोचने का अधिकार नहीं है। इसमें कोई शक नहीं है कि उनकी पत्नी बेहद सक्रिय सांसद हैं और संसद में जोरदारी से तमाम मुद्दे उठाती हैं, लेकिन लगता है कि पति के विचारों की जड़ता ने उन्हें भी जकड़ लिया है। वह चाहते हुए भी लीक से हटकर अपनी बात नहीं रख पातीं। उनकी दोस्ती सुभाषिनी अली जैसी खुले विचारों की कम्युनिस्ट नेता से है, जो अपने व्यवहार से सबका दिल जीत लेती हैं। अकेले सुभाषिनी सारे राजनीतिक दलों से ऐसा समन्वय बना सकती हैं जो शायद येचुरी के बाद कोई न कर सके, लेकिन उनको पार्टी नेतृत्व ने ऐसा मौका नहीं दिया। दुख तो तब होता है जब पूरे देश से लाल झंडे का सफाया करवाने के बाद भी प्रकाश करात अपनी गलती मानने को तैयार नहीं हैं। उनके ताजा बयान भी उसी तरह हठधर्मी हैं। बंगाल और केरल के ज्यादातर कम्युनिस्ट नेता यह मानते हैं कि पार्टी की हार की शुरुआत महासचिव प्रकाश करात की गलत नीतियों और अड़यिल रुख के कारण हुई। वह सुरजीत की तरह न तो उदार रहे और न ही उनकी सोच उतनी कारगर निकली। 2009 में सबसे बड़ी भूल थी बेवजह मनमोहन सिंह सरकार से समर्थन वापस लेना। उस समय वामदलों की अच्छी-खासी छवि बन गई थी। वह सरकार से मनमाफिक फैसले करवा लेते थे। मगर प्रकाश करात पर तीसरे मोर्चे का भूत सवार हो गया और उन्हें लगा कि तीसरा मोर्चा सबसे बड़ी शक्ति के रूप में उभरेगा, जिसमें वाममोर्चा सबसे अधिक सीटें ले पाएगा। उन्हें लगा कि शायद ज्योति बाबू के जमाने में हुई ऐतिहासिक भूल को दुरुस्त करके वाममोर्चे का प्रधानमंत्री बन सकता है। अपने तर्क से प्रकाश करात इस कदर अभिभूत थे कि उन्होंने किसी की नहीं सुनी तथा सोमनाथ चटर्जी जैसे वरिष्ठ व्यक्ति को न केवल बेइज्जत किया, बल्कि पार्टी से भी निकाल दिया। इन नेताओं का मानना है कि करात की राजनीति पर पकड़ नहीं है। सीताराम येचुरी जैसे लोगों की राय की भी उन्होंने उपेक्षा की। चुनाव नतीजे से साफ हो गया कि वाममोर्चे की हालत खस्ता है। तीसरा मोर्चा धराशायी हो गया तथा उनके गृहराज्य केरल में पार्टी बुरी तरह हार गई। करात की जिद के कारण वाममोर्चा ने कांग्रेस से रिश्ते और बिगाड़ लिए और संसद में उनका नेतृत्व भाजपा तक से समन्वय स्थापित करने लगा। करात के इशारे पर वासुदेव आचार्य सुषमा स्वराज से सुबह-शाम बात कर रणनीति बनाने लगे। इन सबका फायदा ममता बनर्जी को मिला और उन्होंने पश्चिम बंगाल में सत्ता हासिल कर ली। केरल में प्रकाश करात ने विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री और वयोवृद्ध कम्युनिस्ट नेता अच्युतानंदन का टिकट काट दिया। अच्युतानंदन क्षुब्ध और अपमानित महसूस करते रहे। बाद में पोलित ब्यूरो ने उन्हें टिकट दिया, लेकिन तब तक नुकसान हो चुका था। अच्युतानंदन की लोकप्रियता आज भी बरकरार है। वाममोर्चा को एक नया झटका बंगाल में माओवादियों से भी मिला। माओवादी हर जिले, कस्बे और गांव में व्यापारियों, ठेकेदारों, इंजीनियरों से पैसा वसूलते रहे हैं। अभी तक वसूली का काम वामपंथी खासतौर से माकपा के कार्यकर्ता करते थे। नाजायज वसूली के इस धंधे में वामपंथी कार्यकर्ताओं का माओवादियों से जमकर झगड़ा हो रहा है। जनता दोनों से त्रस्त है। विकास होता नहीं है, विकास के लिए जो पैसे आते हैं उनमें जबरन वसूली करने में ये लोग लग जाते हैं। एक ही काम के लिए दो-दो जगह पैसा देने से लोग तंग हैं। जनता ने बंगाल में आमूलचूल और केरल में साधारण परिवर्तन किया, लेकिन परिवर्तन तो परिवर्तन है। अब वक्त आ गया है कि कम्युनिस्ट पार्टी के जमीनी नेता खड़े हों और पोलिट ब्यूरो में बैठे लोगों को सबक सिखाएं। उन्हें तानाशाह की तरह सोचने से रोकें वरना कम्युनिस्ट पार्टियां इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएंगी। (लेखक राज्यसभा के सदस्य हैं)

राजनीति के बवंडर में बाबा



लेखक राजनीतिक महत्वाकांक्षा के कारण बाबा रामदेव के प्रस्तावित अनशन की सफलता पर संदेह प्रकट कर रहे हैं...
अन्ना हजारे के बाद अब बाबा रामदेव भ्रष्टाचार के खिलाफ चार जून से अनशन पर बैठेंगे। बाबा रामदेव एक साथ दो लड़ाइयां लड़ रहे हैं। एक भ्रष्टाचार के खिलाफ और दूसरी अन्ना हजारे के करीबियों के खिलाफ। रामदेव को लग रहा है कि उनकी शुरू की हुई लड़ाई का श्रेय कोई और लूट रहा है। शिकायत तो उन्हें अन्ना हजारे से भी है। दिल का दर्द रह-रहकर जबान पर आ रहा है। बाबा का दावा है कि अन्ना हजारे को महाराष्ट्र के बाहर जानता कौन था? उत्तर भारत में उन्हें जनमानस में लाने वाले वही तो हैं। और अन्ना ने रालेगण सिद्धि से दिल्ली आते-आते बाबा को हाशिए पर धकेल दिया। यह अनशन भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम के साथ ही हाशिए से मुख्यधारा में लौटने की कोशिश ही नहीं, यह दिखाने का प्रयास भी है कि अन्ना से बड़ा जनसमर्थन बाबा के साथ है। रामदेव को लोग योग गुरु के रूप में जानते हैं। जब तक वह योग गुरु की भूमिका में थे, लालूप्रसाद यादव से लेकर नरेंद्र मोदी तक किसी को उनके साथ खड़े होने में एतराज नहीं था। जैसे ही उन्होंने राजनीतिक महत्वाकांक्षा दिखाई सारे रिश्ते बदल गए। पहला हल्ला बोला लालू प्रसाद यादव ने और बाबा को उनकी जाति याद दिलाई। कोई आशंका से खिलाफ हो गया तो कोई उम्मीद से साथ हो गया। बाबा के अभियान से किसी को कोई मतलब नहीं है। सबके अपने-अपने हित हैं। जिसका हित सध रहा है वह बाबा के साथ, नहीं तो दे रहा है घुमा के। सबकी नजर बाबा के समर्थकों पर है। किसी को इससे मतलब नहीं कि बाबा जो मुद्दे उठा रहे हैं वे कितने वाजिब या गैर वाजिब हैं। बाबा भी कुछ भ्रम में हैं। उन्हें लग रहा है कि जो साथ आना चाहते हैं और जो विरोध कर रहे हैं, दोनों उनके उठाए मुद्दों पर मिल रहे जनसमर्थन की ताकत से डरे हुए हैं। उन्हें नहीं पता कि हमारे राजनीतिक दलों का मूलमंत्र है कि जो सिद्धांत पर अड़ा वह चुनाव में गिरा। यकीन न हो तो प्रकाश करात से पूछ लीजिए। सो बाबाजी सिद्धांत आप अपने पास रखिए, सहेजकर। राजनीतिक दलों का सबसे बड़ा सिद्धांत वोट का सौदा है। अन्ना हजारे दिला दें तो उनकी जय और बाबा दिला दें तो उनकी भी जय। और अगर विरोधी को वोट दिला रहे हैं तो अभी खोलते हैं तुम्हारा कच्चा-चिट्ठा। आरोप सही हैं या गलत यह तो बाद में साबित होगा। पहले तो नंगों की कतार में खड़े होकर चिल्लाओ की देखो भाई हमने कपड़े पहन रखे हैं। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के साथ राजनीतिक दल जो कर रहे हैं उसे देखकर व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की एक रचना याद आ रही है। इसमें उन्होंने लिखा है कि एक दिन भगवान कृष्ण बिहार में चुनाव लड़ने आ गए। बिहार पहुंच कर कृष्ण ने कुछ नेताओं से कहा कि वे चुनाव लड़ रहे हैं, सुनिए उन्हें क्या जवाब मिला। हां-हां, आप क्यों न लडि़एगा। आप भगवान हैं। आपका नाम है। आपकी आरती होती है। आपकी फोटो बिकती है। आप नहीं लड़ेंगे तो कौन लड़ेगा, आप तो यादव हैं न? कृष्ण ने कहा, मैं ईश्वर हूं। मेरी कोई जाति नहीं है। उन्होंने कहा, इधर भगवान होने से काम नहीं चलेगा। आपको कोई वोट नहीं देगा। जात नहीं रखिएगा, तो कैसे जीतिएगा? कृष्ण इस जातिवाद से तंग आ गए। कहने लगे, ये सब पिछड़े लोग हैं। चलो विश्वविद्यालय चलें। हमें प्रबुद्ध लोगों का समर्थन लेकर इस जातिवाद की जड़ें काट देनी चाहिए। विश्वविद्यालय में राजनीति के प्रोफेसर से वे बातें कर रहे थे। प्रोफेसर ने साफ कह दिया, मैं कायस्थ होने के नाते कायस्थों का ही समर्थन करूंगा। कृष्ण ने कहा, आप विद्वान होकर भी इतने संकीर्ण हैं? प्रोफेसर ने समझाया, देखिए न, विद्या से मनुष्य अपने सच्चे रूप को पहचानता है। हमने विद्या प्राप्त की, तो हम पहचान गए कि हम कायस्थ हैं। उधर कृष्ण के राजनीति में उतरने की बात खूब फैल गई थी और राजनीतिक दल सतर्क हो गए थे। जनसंघ का ख्याल था कि गोपाल होने के कारण बहुत करके कृष्ण अपना साथ देंगे, पर अगर विरोध हुआ तो उसकी तैयारी कर लेनी चाहिए। उन्होंने कथावाचकों को बैठा दिया था कि पोथियां देखकर कृष्ण की पोलें खोजो। गड़बड़ करेंगे तो चरित्रहनन कर देंगे। चरित्रहनन शुरू हो गया था। एक सज्जन ने कहा, इनकी डब्ल्यू का मामला बड़ा गड़बड़ है। भगाई हुई है। रुक्मिणी नाम है। बड़ा दंगा हुआ था जब उन्होंने रुक्मिणी को भगाया था। पोथी में सब लिखा है। जो किसी की लड़की को भगा लाया, वह अगर शासन में आ गया, तो हमारी बहू-बेटियों की इज्जत का क्या होगा? बाबा रामदेव को पता नहीं है कि हम जब राजनीति पर आते हैं तो भगवान को भी नहीं छोड़ते। भ्रष्टाचार के खिलाफ बाबा की मुहिम राजनीति के गलियारे में फंस गई है। अन्ना हजारे उनसे आगे सिर्फ इसलिए निकल गए हैं कि उन्होंने अपने लंबे सार्वजनिक जीवन में कभी राजनीतिक महत्वाकांक्षा का संकेत नहीं दिया। इस मुद्दे पर बाबा रामदेव के साथ खड़े होने वालों की संख्या चाहे जितनी हो जाए पर उसकी धमक अन्ना हजारे के अभियान जैसी नहीं होगी, क्योंकि उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने उन्हें एक खेमे में खड़ा कर दिया है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

अल्पसंख्यकों के लिए खुलेंगे विश्वविद्यालय


अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय ने बिहार के किशनगंज में रफी अहमद किदवई यूनिवर्सिटीज आफ हेल्थ एंड मेडिकल साइंसेज, राजस्थान के अजमेर में ख्वाजा गरीब नवाज यूनिवर्सिटीज आफ प्रोफेशनल टेक्नोलॉजी और कर्नाटक के बेंगलूर में टीपू सुल्तान यूनिवर्सिटीज आफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी खोलने का फैसला किया है। यह तीनों विश्वविद्यालय वक्फ की जमीन पर खोले जाएंगे। मुस्लिम समुदाय में उच्च शिक्षा की कमी को देखते हुये मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने उक्त तीनों विश्वविद्यालयों के गठन पर सैद्धांतिक स्वीकृति दे दी है। मानव संसाधन मंत्रालय ने अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय से कहा है कि वह अगर इन तीनों विश्वविद्यालयों को ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में खुलवाना चाहता है तो वह इसके लिए जमीन और अतिरिक्त संसाधन शीघ्र उपलब्ध कराएं क्योंकि इस योजना की राशि देश में सोलह केंद्रीय विश्वविद्यालयों की स्थापना के लिए पहले ही आवंटित कर दी गई है। ये केंद्रीय विश्वविद्यालय इस पंचवर्षीय योजना के अंत तक बन कर तैयार भी हो जाएंगे। सूत्रों के मुताबिक अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के पास तीन विकल्प रह गए हैं। पहला विकल्प यह कि वक्फ की जमीन में मुस्लिम समुदाय खुद इसे शुरू कर दे और इसे डीम्ड यूनिवर्सिटीज घोषित कर दिया जाए। दूसरा संसद से कानून पास करके अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की तरह इसे अल्पसंख्यक संस्थान घोषित किया जाए। तीसरा विकल्प है कि सरकार और वक्फ बोर्ड मिलकर इसकी स्थापना करें। वक्फ बोर्ड जमीन देकर और सरकार पैसा लगाकर इसके गठन में योगदान करें। मानव संसाधन विकास मंत्रालय तीनों में से किसी भी विकल्प के आधार पर इन विश्वविद्यालयों की स्थापना करने के लिए तैयार है। शिक्षा मंत्रालय नए विश्वविद्यालय खोलने के बजाय इन तीनों को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटीज की विस्तार योजना से जोड़ देने के लिए भी तैयार है.


चिंता का सबब बनी पुत्रों की सियासी उड़ान


उत्तर प्रदेश के पिछले दो उपचुनाव के नतीजे भाजपा के नजरिये से कतई तसल्लीबख्श नहीं कहे जा सकते। एक में वह पीस पार्टी और दूसरे में निर्दलीय उम्मीदवार से भी पीछे चली गई, लेकिन पार्टी के कई दिग्गजों के लिए इस चिंता से कहीं बड़ी चिंता अपने बेटों की सियासी उड़ान के टेकआफ को लेकर है। इसके लिए उन्हें अगले साल प्रस्तावित विधान सभा चुनाव से बेहतर रनवे नहीं मिल सकता है, शायद यही वजह है कि कई बड़े नेता फिलवक्त अपने बेटों के लिए पार्टी के अंदर समीकरण और एक राय बनाने के अभियान में जुटे हैं। भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के पुत्र पंकज सिंह संगठन में प्रदेश मंत्री हैं। उनके लिए पार्टी का टिकट उतना मुश्किल नहीं, जितना यह तय करना कि उन्हें लड़ना कहां है? उनके लिए सुरक्षित से सुरक्षित सीट की तलाश हो रही है। अब तक उनके लिए तीन सीटें तलाशी जा चुकी हैं, जिनमें एक लखनऊ की है, दूसरी वाराणसी की और तीसरी गौतमबुद्ध नगर से। अब अगर पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष अपने बेटे को लेकर फिक्रमंद हो सकते हैं तो पार्टी के दूसरे नेता क्यों नहीं? सत्यदेव सिंह को लीजिए। वह संगठन में कई अहम पदों पर काम कर चुके हैं। शाही कमेटी में वह प्रवक्ता हैं। बलरामपुर से एमपी हुआ करते थे। उनका राजनीतिक जनाधार गोण्डा और बलरामपुर जिले के ही इर्द-गिर्द माना जाता रहा है, लेकिन अब जब यह इलाका भाजपा के लिए सुरक्षित नहीं रहा तो सत्यदेव सिंह नहीं चाहते हैं कि उनके बेटे वैभव की राजनीतिक पारी किसी जोखिम के साथ शुरू हो। इसलिए वह अपने बेटे को लखनऊ पूर्वी विधानसभा सीट से चुनाव लड़वाना चाहते हैं जो भाजपा के लिए सबसे सुरक्षित मानी जाती है। प्रोफेसर रामजी सिंह संगठन मंत्री रह चुके हैं। विधान परिषद के सदस्य भी रहे हैं। वर्तमान में राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य हैं। अब वह चाहते हैं उनका बेटा अरिजीत सिंह भी राजनीति में आगे आए। वह बेटे को मऊ से टिकट दिलवाना चाहते हैं। पार्टी के पूर्व सांसद राम बख्श वर्मा को भी अपने पुत्र आलोक वर्मा के लिए कन्नौज से टिकट की ख्वाहिश है। वरिष्ठ नेता और लखनऊ के सांसद लाल जी टंडन के पुत्र गोपाल टंडन की लखनऊ से टिकट की दावेदारी जग जाहिर है। लाल जी टंडन के सांसद बन जाने के बाद उनके द्वारा विधानसभा की छोड़ी गई सीट लखनऊ पश्चिम पर तो गोपाल टंडन की दावेदारी शुरू से रही है, लेकिन उपचुनाव के वक्त उनका टिकट कट गया था। आम चुनाव में इस सीट के लिए उनका दावा फिर से है। पुत्र ही नहीं पुत्रियां भी टिकट की दावेदार हैं। पार्टी की प्रदेश महामंत्री प्रेमलता कटियार प्रदेश सरकार में कई बार मंत्री भी रही हैं। उनकी ख्वाहिश अपनी बेटी नीलिमा कटियार को राजनीति में लाने की है। प्रेमलता अपनी बेटी के लिए कानपुर से टिकट चाहती हैं। पूर्व मंत्री राम प्रकाश त्रिपाठी के निधन के बाद उनकी पुत्री अर्चना पाण्डे छिबरामऊ से टिकट की दावेदार हैं.

Wednesday, May 25, 2011

नाकामी-बदनामी के दो बरस


लेखक भ्रष्टाचार और कुशासन के कारण संप्रग सरकार के दो वर्ष पूरे होने के जश्न को निरर्थक मान रहे हैं...
यदि 22 मई को संप्रग सरकार के दो वर्ष पूरे नहीं हो रहे होते तो उसके पास जश्न मनाने के बहाने आम जनता से कुछ भी कहने के लिए नहीं होता। चूंकि सरकार के कार्यकाल के दो वर्ष पूरे हो रहे थे इसलिए जश्न मनाने की औपचारिकता पूरी करनी ही थी। यह जिस तरह पूरी की गई उससे स्वत: स्पष्ट हो जाता है कि जश्न मनाने का काम मजबूरी में किया गया। आखिर इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि कोई सरकार अपने कार्यकाल के दो वर्ष पूरे करे और इस मौके पर उसके नेता केवल डिनर करें। इस अवसर पर सरकार की ओर से 74 पेज की अपनी कथित उपलब्धियों की जो रपट जारी की गई उस पर यदि किसी ने गौर नहीं किया तो उसके लिए उन्हें दोष नहीं दिया जा सकता। वैसे भी अर्थव्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य, आधारभूत ढांचे, कृषि आदि के क्षेत्र में जो उपलब्धियां गिनाई गईं उनमें छिपी नाकामियां साफ नजर आती हैं। अपनी सरकार के दो वर्ष पूरे होने पर आयोजित समारोह में प्रधानमंत्री के इस कथन से कोई उत्साहित होने वाला नहीं है कि कुछ गलतियां हुई हैं, लेकिन सरकार उन्हें ठीक करने के लिए प्रतिबद्ध है और हताश होने का कोई सवाल नहीं उठता। यह अच्छी बात है कि प्रधानमंत्री हताश नहीं हैं, लेकिन आम जनता की मनोदशा उनसे सर्वथा भिन्न है और इससे उन्हें न सही सोनिया गांधी को अवश्य अवगत होना चाहिए। संप्रग सरकार के दो वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित समारोह में सोनिया गांधी की ओर से भी यह कहा गया कि हम भ्रष्टाचार से लड़ेंगे और इस संदर्भ में जो कह रहे हैं वह करके दिखाएंगे। अब ऐसे वक्तव्य इसलिए दिलासा नहीं दे सकते, क्योंकि कांग्रेस के बुराड़ी महाअधिवेशन में ऐसी ही बातें की गई थीं और फिर भी भ्रष्टाचार से न लड़ने के संकेत दिए जाते रहे। काले धन के मामले में प्रवर्तन निदेशालय अथवा आयकर विभाग जब-जब सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष उपस्थित होता है, तब-तब वह उसकी फटकार सुनकर बाहर आता है। काले धन के कुख्यात कारोबारी और सबसे बड़े कर चोर माने जाने वाले हसन अली के खिलाफ हो रही जांच यही बताती है कि कैसे किसी मामले की सही तरह से जांच नहीं की जानी चाहिए। संप्रग सरकार भ्रष्टाचार से लड़ने के चाहे जैसे दावे क्यों न करे, उसकी कार्यप्रणाली और भाव-भंगिमा यही बताती है कि या तो उसमें ऐसा करने की इच्छाशक्ति नहीं या फिर यह काम उसके वश में नहीं। भ्रष्टाचार विरोधी सोनिया गांधी के पांच सूत्रों पर विचार करने के लिए गठित मंत्री समूह अभी विचार-विमर्श करने में ही मशगूल है। प्रधानमंत्री का ताजा बयान यह भी बता रहा है कि सरकार अभी तक यह नहीं तय कर सकी है कि मंत्रियों और वरिष्ठ नौकरशाहों के विशेषाधिकार खत्म किए जाएं या नहीं? संप्रग सरकार के नीति-नियंताओं को यह अहसास होना चाहिए कि सरकार के साथ-साथ खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की प्रतिष्ठा दांव पर लग चुकी है और इसके लिए वही जिम्मेदार हैं, क्योंकि जब सुरेश कलमाड़ी मनमानी कर रहे थे तब उन्हें लिखित और मौखिक रूप से चेताया गया था। ऐसा ही काम ए.राजा की मनमानी के मामले में भी किया गया था, लेकिन उन्होंने उन्हें क्लीनचिट देने का काम किया। वह दागी पीजे थॉमस को भी तब तक क्लीनचिट देते रहे जब तक सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें सीवीसी की कुर्सी से जबरन उतार नहीं दिया। एंट्रिक्स-देवास घोटाला तो खुद प्रधानमंत्री कार्यालय की ही गफलत की देन था। सरकार में बैठे लोग यह स्वीकार नहीं करेंगे, लेकिन वास्तविकता यही है कि भ्रष्ट तत्वों के खिलाफ प्रधानमंत्री की अकर्मण्यता और निष्कि्रयता ने देश में हजारों कलमाड़ी और राजा पैदा कर दिए हैं। यदि प्रधानमंत्री अपने ही कार्यालय पर नियंत्रण नहीं रख पा रहे हैं तो फिर पूरी सरकार को कैसे नियंत्रित करेंगे? इस पर आश्चर्य नहीं कि अपने दूसरे कार्यकाल में वह अपने मंत्रियों पर और मंत्री अपने अमले पर लगाम लगाने में समर्थ नहीं दिख रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण है पाकिस्तान को सौंपी गई भगोड़ों की सूची। गृहमंत्री पी. चिदंबरम की मानें तो इस सूची में गफलत के लिए सीबीआइ जिम्मेदार है। उन्होंने इस सूची के लिए अपनी आलोचना के जवाब में यह भी स्पष्ट किया कि सीबीआइ उनके तहत काम नहीं करती। यह शीर्ष एजेंसी प्रधानमंत्री के तहत काम करती है और उसके कुछ अधिकारियों ने तब शेखचिल्लियों को भी मात दे दी जब वे मियाद खत्म हो चुके वारंट को लेकर एक भगोड़े के प्र‌र्त्यपण के लिए डेनमार्क पहुंच गए। ऐसा तभी होता है जब शासन के शीर्ष पर बैठे लोग शासन करने की इच्छा खो देते हैं। ऐसे ही लोग जब मजबूरी में अपनी कथित कामयाबी का जश्न मनाते हैं तो यह कहते हैं कि हताश होने की जरूरत नहीं है, लेकिन जनता की मजबूरी यह है कि वह यह देख रही है कि अभी तक भ्रष्टाचार के खिलाफ जो भी कार्रवाई हुई है वह या तो न्यायपालिका या फिर विपक्ष के दबाव में ही हुई है। (लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं)