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Wednesday, June 1, 2011

इतिहास बनता वामपंथ


लेखक राष्ट्रीय राजनीति में वामपंथी दलों के पराभव के कारणों की तह में जा रहे हैं...
अब वक्त आ गया है जब कम्युनिस्ट पार्टियों के नेता शीशे के सामने खड़े होकर यह विचार करें कि आखिर क्या बात है कि इस देश की जनता उन्हें ठुकराती जा रही है। आज न तो बंगाल में कम्युनिस्ट सत्ता में रह गए और न केरल में। एक जमाना था जब अनेक प्रदेशों में कम्युनिस्टों का वोट बैंक था। बदले हालात में इन सभी प्रदेशों में कम्युनिस्टों का वोट बैंक सिकुड़ गया और अब वे खुद दूसरे की बैसाखी का सहारा ले रहे हैं। किसी की पीठ पर चढ़कर इक्का-दुक्का सीट वे जीत जाते हैं, लेकिन उनके पास वोट बैंक जैसी कोई चीज नहीं रह गई है। इसके लिए कोई बाहर वाला जिम्मेदार नहीं है, बल्कि स्वयं कम्युनिस्ट पार्टी के बड़े नेता जवाबदेह हैं। उन्होंने इस तथ्य को स्वीकार करने से इंकार कर दिया कि बदलते वक्त के साथ विचारों को भी बदलना पड़ता है। भारत ऐसा देश है जहां 60 प्रतिशत नौजवान हैं। इस नौजवान देश की सोच, पसंद, कामकाज के तरीके और शिक्षा बदले माहौल के हिसाब से हैं। जो राजनीतिक दल अपने को उसमें नहीं ढालेंगे या अपनी नीतियों को नहीं बदलेंगे, वे लोगों से कटते जाएंगे। बदले भारत के लिहाज से भारत के राजनीतिक दलों को भी बदलना पड़ेगा। अब पुराने दकियानूसी विचार नहीं चलेंगे। दुर्भाग्य यह है कि अडि़यल कम्युनिस्ट अपने विचार नहीं बदलना चाहते। चीन ने अपने विचार बदल लिए, रूस ने अपने विचार बदल लिए, पोलैंड और हंगरी ने अपने विचार और नीतियां बदल लीं, लेकिन भारतीय कम्युनिस्ट लकीर के फकीर बने हुए हैं। कम्युनिस्टों में यदि किसी के विचारों में मुझे थोड़ा लचीलापन लगता है तो वह सीताराम येचुरी हैं। उन्होंने ठीक ही बयान दिया है और खुलकर कहा है कि हमारी हार की वजह लोगों से अलगाव और लोगों के मन में हमारे प्रति उपजा गुस्सा है। उन्होंने यह भी कहा कि मा‌र्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में परिवर्तन से इंकार नहीं किया जा सकता है। उन्होंने यह भी माना कि मनमोहन सिंह सरकार से समर्थन वापस लेना उनकी सबसे बड़ी भूल थी। यह बात इससे पहले ज्योति बसु और सोमनाथ चटर्जी भी कह चुके हैं। जब प्रकाश करात माकपा के महासचिव बने थे तो मैंने सोचा था कि चलो अब पार्टी दकियानूसी सोच से बाहर निकलेगी और एक आधुनिक माहौल में पढ़ा-लिखा व्यक्ति पार्टी का नेतृत्व करेगा, लेकिन धीरे-धीरे जब उनके विचार सुने तो लगा कि कोई बैलगाड़ी युग का आदमी 14वीं सदी से निकलकर आ गया है। वह जब बोलते तब किसी न किसी की आलोचना ही करते। उनके मुंह से आज तक मैंने किसी की तारीफ नहीं सुनी। उन्हें लगता है कि इस देश के गरीब, महिला, मजदूर आदि के एकमात्र खैरख्वाह और ठेकेदार वही हैं और बाकी लोगों को उनके बारे में बोलने या सोचने का अधिकार नहीं है। इसमें कोई शक नहीं है कि उनकी पत्नी बेहद सक्रिय सांसद हैं और संसद में जोरदारी से तमाम मुद्दे उठाती हैं, लेकिन लगता है कि पति के विचारों की जड़ता ने उन्हें भी जकड़ लिया है। वह चाहते हुए भी लीक से हटकर अपनी बात नहीं रख पातीं। उनकी दोस्ती सुभाषिनी अली जैसी खुले विचारों की कम्युनिस्ट नेता से है, जो अपने व्यवहार से सबका दिल जीत लेती हैं। अकेले सुभाषिनी सारे राजनीतिक दलों से ऐसा समन्वय बना सकती हैं जो शायद येचुरी के बाद कोई न कर सके, लेकिन उनको पार्टी नेतृत्व ने ऐसा मौका नहीं दिया। दुख तो तब होता है जब पूरे देश से लाल झंडे का सफाया करवाने के बाद भी प्रकाश करात अपनी गलती मानने को तैयार नहीं हैं। उनके ताजा बयान भी उसी तरह हठधर्मी हैं। बंगाल और केरल के ज्यादातर कम्युनिस्ट नेता यह मानते हैं कि पार्टी की हार की शुरुआत महासचिव प्रकाश करात की गलत नीतियों और अड़यिल रुख के कारण हुई। वह सुरजीत की तरह न तो उदार रहे और न ही उनकी सोच उतनी कारगर निकली। 2009 में सबसे बड़ी भूल थी बेवजह मनमोहन सिंह सरकार से समर्थन वापस लेना। उस समय वामदलों की अच्छी-खासी छवि बन गई थी। वह सरकार से मनमाफिक फैसले करवा लेते थे। मगर प्रकाश करात पर तीसरे मोर्चे का भूत सवार हो गया और उन्हें लगा कि तीसरा मोर्चा सबसे बड़ी शक्ति के रूप में उभरेगा, जिसमें वाममोर्चा सबसे अधिक सीटें ले पाएगा। उन्हें लगा कि शायद ज्योति बाबू के जमाने में हुई ऐतिहासिक भूल को दुरुस्त करके वाममोर्चे का प्रधानमंत्री बन सकता है। अपने तर्क से प्रकाश करात इस कदर अभिभूत थे कि उन्होंने किसी की नहीं सुनी तथा सोमनाथ चटर्जी जैसे वरिष्ठ व्यक्ति को न केवल बेइज्जत किया, बल्कि पार्टी से भी निकाल दिया। इन नेताओं का मानना है कि करात की राजनीति पर पकड़ नहीं है। सीताराम येचुरी जैसे लोगों की राय की भी उन्होंने उपेक्षा की। चुनाव नतीजे से साफ हो गया कि वाममोर्चे की हालत खस्ता है। तीसरा मोर्चा धराशायी हो गया तथा उनके गृहराज्य केरल में पार्टी बुरी तरह हार गई। करात की जिद के कारण वाममोर्चा ने कांग्रेस से रिश्ते और बिगाड़ लिए और संसद में उनका नेतृत्व भाजपा तक से समन्वय स्थापित करने लगा। करात के इशारे पर वासुदेव आचार्य सुषमा स्वराज से सुबह-शाम बात कर रणनीति बनाने लगे। इन सबका फायदा ममता बनर्जी को मिला और उन्होंने पश्चिम बंगाल में सत्ता हासिल कर ली। केरल में प्रकाश करात ने विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री और वयोवृद्ध कम्युनिस्ट नेता अच्युतानंदन का टिकट काट दिया। अच्युतानंदन क्षुब्ध और अपमानित महसूस करते रहे। बाद में पोलित ब्यूरो ने उन्हें टिकट दिया, लेकिन तब तक नुकसान हो चुका था। अच्युतानंदन की लोकप्रियता आज भी बरकरार है। वाममोर्चा को एक नया झटका बंगाल में माओवादियों से भी मिला। माओवादी हर जिले, कस्बे और गांव में व्यापारियों, ठेकेदारों, इंजीनियरों से पैसा वसूलते रहे हैं। अभी तक वसूली का काम वामपंथी खासतौर से माकपा के कार्यकर्ता करते थे। नाजायज वसूली के इस धंधे में वामपंथी कार्यकर्ताओं का माओवादियों से जमकर झगड़ा हो रहा है। जनता दोनों से त्रस्त है। विकास होता नहीं है, विकास के लिए जो पैसे आते हैं उनमें जबरन वसूली करने में ये लोग लग जाते हैं। एक ही काम के लिए दो-दो जगह पैसा देने से लोग तंग हैं। जनता ने बंगाल में आमूलचूल और केरल में साधारण परिवर्तन किया, लेकिन परिवर्तन तो परिवर्तन है। अब वक्त आ गया है कि कम्युनिस्ट पार्टी के जमीनी नेता खड़े हों और पोलिट ब्यूरो में बैठे लोगों को सबक सिखाएं। उन्हें तानाशाह की तरह सोचने से रोकें वरना कम्युनिस्ट पार्टियां इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएंगी। (लेखक राज्यसभा के सदस्य हैं)