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Friday, March 4, 2011
Thursday, March 3, 2011
दांव पर वाम
आम बजट के कुछ हिस्सों की चुनावी रंगत और समीकरणों की देखभाल से विधानसभा चुनावों के नजदीक होने का कुछ-कुछ अंदाजा था। लेकिन बजट सत्र के बीच ही-असम, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल-के चुनावों की घोषणा हो जाएगी, इतना भी अपेक्षित नहीं था। बजटीय प्रावधानों से उन-उन राज्यों में बने सकारात्मक माहौल का फायदा सत्ताधारी गठबंधन दलों को दिलाने में चुनावी घोषणा अनायास उन पर सहयोगी हो गई है। उन सुविधाओं की घोषणाएं जन स्मृति में एकदम ताजा है। यह एक सुविधाजनक स्थिति है। हालांकि केंद्र और कुछ राज्य स्तर पर बने यूपीए गठबंधन के लिए दो बड़े मुद्दे असुविधाजनक भी हो सकते हैं। भ्रष्टाचार और महंगाई। आए दिन भ्रष्ट तरीके से अकूत धन बनाने के मामले उजागर हो रहे हैं। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले पर सरकार को झख मार कर जेपीसी का गठन करना पड़ा है। कॉमनवेल्थ गेम्स पर जांच चल रही है। महंगाई और काला धन के खिलाफ सरकार गहरे दबाव में है। इन सबसे जनता में संदेश गया है कि सरकार भ्रष्ट है, भ्रष्टाचारियों की संरक्षक और महंगाई रोकने की उसकी कूव्वत नहीं है। इस रिपोर्ट कार्ड की पृष्ठभूमि में होने वाले चुनाव ऐतिहासिक तथा राजनीति का ढर्रा बदलने वाले हो सकते हैं। यह तय है कि उन पांच राज्यों में कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, माकपा समेत वाम दल और द्रमुक-अन्नाद्रुमक के बीच लड़ाई है। भाजपा का जनाधार लेदेक र असम में ही है। इनमें पश्चिम बंगाल के चुनाव पर पूरे देश की नजर है। 2009 के आम चुनाव के थोड़ा पहले और बाद से जिस तरह ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने निकाय चुनावों में बढ़त जारी रखा है, उसे देखते हुए लोग बंगाल से वामदल की ऐतिहासिक विदाई मान रहे हैं। न केवल लोकप्रिय विश्वासों में बल्कि खुद वामपंथी नेताओं की एकांत स्वीकृति है कि ममता को कोई रोकने वाला नहीं है। 1977 से सूबे पर काबिज वामदल सत्ता के वायरस से संक्रमित हो गए हैं और उन्हें फिर से मैदान में आकर संघर्ष से खोई हुई धार और साख अर्जित करनी है। यह माकपा के शीर्ष नेता का ही नजरिया है। सिंगुर-नंदीग्राम की सख्ती, माओवाद और बेलगाम कैडर ने जनता में बदलाव की अकुलाहट पैदा की है। वे बेदाग कही जाने वाली ममता को एक मौका देने पर लगभग सहमत हैं। ऐसा हुआ, जिसकी सम्भावना ज्यादा है, तो वह वामदल का सूपड़ा साफ करने के साथ सहयोगी कांग्रेस को भी तीन दशक बाद सत्ता का स्वाद चखाएंगी। बंगाल में ताकतवर बैठी ममता केंद्रीय समीकरणों में ज्यादा मर्जी चलाना चाहेगी। मतलब, यहां से कई आयाम बदलेंगे। केरल में परिवर्तन चक्र के हिसाब से अबकी कांग्रेस नेतृत्व की बारी है। वैसे भी मुख्यमंत्री अच्युतानंदन परिसंपत्ति और दलगत विवाद के चलते वामदल के लिए खेवनहार नहीं रह गए हैं। तमिलनाडु ऐसा राज्य है जहां परिदृश्य परिवर्तनकारी लगता है। यहां कांग्रेस का द्रमुक से घाटे का गठबंधन जारी है। राज्य में भ्रष्टाचार बड़ा मुद्दा है। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में गिरफ्तार मंत्री राजा द्रमुक के हैं। जनता में उनके व मुख्यमंत्री करुणानिधि के कुनबे के आचरण के प्रति रोष है। उपमुख्यमंत्री स्टालिन के जन्मदिन पर भेजे गए उपहार तक लोगों ने यह मान कर लौटा दिए कि इसमें वही काली कमाई लगी है। यह बहुत अर्थपूर्ण संकेत है। दूसरी बात, करुणानिधि के बेटों में बागडोर को लेकर बवाल है, उसे देखते हुए यह ज्यादा सम्भव है कि जनता अन्नाद्रमुक की जयललिता को चुनना पसंद करे। कांग्रेस असम में हैट्रिक बना सकती है, जहां उल्फा से शांति वार्ता के लाभ उसे मिलने वाले हैं।
खाकी का खौफ
कोई राजनीतिक पार्टी पुलिस सुधार के बारे में गंभीर नहीं
यह देश की प्रशासन-व्यवस्था पर सचमुच एक गंभीर टिप्पणी है कि उच्च पुलिस निगरानी वाले शहरों और थानों व सरकारी कार्यालयों के नजदीक वाले गांवों में अपराध की दर काफी ऊंची है। इसके विपरीत दूरस्थ इलाकों के वे गांव तुलनात्मक रूप से अपराध मुक्त हैं, जहां पुलिस वाले मुश्किल से दिखाई पड़ते हैं। गांवों में जातिगत और सामुदायिक आधार पर होने वाले ज्यादातर अत्याचारों के पीछे पुलिसिया समर्थन होता है। एक बांग्ला कहावत है कि बाघ के काटने पर 16 घाव ही होते हैं, जबकि पुलिस के काटने पर 32 घाव होते हैं। हकीकत यह है कि गांवों में पुलिस का आना सुरक्षा का एहसास नहीं जगाता, बल्कि खौफ जगाता है।
आज के दौर में समृद्ध नागरिकों द्वारा व्यक्तिगत तौर पर निजी सुरक्षा की व्यवस्था इस तथ्य का खुला स्वीकार है कि उनका ‘पुलिस पर भरोसा नहीं’ है। दूसरी ओर, निजी सुरक्षा का भार नहीं उठा सकने वाले करोड़ों लोग भगवान भरोसे जीते हैं। गांवों, झुग्गी बस्तियों और गरीब इलाकों से छोटे बच्चों के गायब होने की हमारे यहां रिपोर्ट भी बहुत कम होती है और जांच भी। पिछले तीन वर्षों में अकेले दिल्ली में 6,687 बच्चे गायब हुए हैं। इनमें वे बच्चे शामिल नहीं हैं, जिनकी गुमशुदगी की रिपोर्ट उनके अभिभावकों ने दर्ज नहीं कराई। दिल्ली से सटे नोएडा के निठारी गांव से गुम हुए बच्चों की रिपोर्ट दर्ज करने के दौरान पुलिस ने उन बच्चों के अभिभावकों को जिस तरह आतंकित किया, वह अपने यहां पुलिसिया रवैये का ठेठ उदाहरण है।
मैंने काफी करीब से देखा है कि कैसे पुलिस ने स्कूल जाते हुए एक बच्चे के अपहरण पर उसके परिवार को आतंकित किया था। मान लीजिए, उस बच्चे का नाम नसीम और उसके पिता का नाम आमिर था। आमिर ने अपहरण का मुकदमा दर्ज कराने के लिए आकाश-पाताल एक कर दिया, फिर भी विफल रहा। पुलिस वाले उस पर यह कहकर हंसते थे कि तुम्हारा बेटा खुद ही भागकर किसी आतंकी समूह में शामिल हो गया होगा। मैंने आमिर को गुमशुदा बच्चों के लिए काम करने वाले एक एनजीओ के पास भेजा, लेकिन उन्होंने भी केस दर्ज कराने में कोई मदद नहीं की। मैंने दिल्ली पुलिस के कई वरिष्ठ अधिकारियों से भी बात की, लेकिन वायदा के बावजूद कुछ नहीं हुआ।
गायब होने के छह महीने बाद नसीम अचानक भूत की तरह घर लौट आया। उसके पूरे बदन पर घाव के निशान थे। उसने वह भयानक कहानी बताई कि कैसे नशीला रूमाल सुंघाकर उसे एक पुलिस चौकी के पास मारुति में उठाया गया। उसके बाद उसे एक अज्ञात जगह पर ले जाया गया और साठ से ज्यादा बच्चों के साथ आवासीय इलाके से दूर खेतों के बीच बने एक मकान के बेसमेंट में रखा गया। उन्हें बेसमेंट से बाहर निकलने की मनाही थी और उनसे अवैध बंदूक बनाने वाली एक फैक्टरी में काम कराया जाता था। कुछ अन्य बच्चों के साथ उसने दो बार वहां से भागने की कोशिश की और पकड़े जाने पर बुरी तरह पीटे गए। लेकिन तीसरी बार वह पास के खेत में छिपकर रात भर घिसटते हुए किसी तरह रुड़की रेलवे स्टेशन पहुंचने में सफल रहा।
जब आमिर अपने बेटे को लेकर उसके लौट आने की रिपोर्ट देने थाना गया, तो उस पर मनगढंत किस्सा रचने का आरोप लगाया गया और झिड़कते हुए पूछा गया कि इलाके में और भी बच्चे रहते हैं, लेकिन केवल तुम्हारे ही बेटे का अपहरण क्यों हुआ। पुलिस ने उसके परिवार को आमिर के आतंकी संपर्क की जांच के बहाने तंग करना भी शुरू कर दिया। स्थिति इतनी खराब हो गई कि आमिर ने अपने बेटे को कहीं छिपा दिया। अंतत: उस परिवार ने किसी दूसरे इलाके में जाकर शरण ली। मैंने उसे अपने साथ पुलिस कमिश्नर के पास ले जाने की कोशिश की, ताकि उसका बेटा फंसे हुए अन्य बच्चे को छुड़ाने और उस गिरोह के भंडाफोड़ में मदद कर सके। लेकिन वह पुलिस से कोई बात करने के लिए तैयार नहीं हुआ, क्योंकि अब वह जान चुका था कि पुलिस उस गिरोह से मिली हुई थी और उसके बेटे के लिए बड़ा खतरा साबित हो सकती थी, क्योंकि उसके लौटने पर वे नाराज दिख रहे थे।
देश के ज्यादातर नागरिक, खास तौर से गरीब, नरक से ज्यादा पुलिस थाने से डरते हैं। वे आईएसआई के आतंकियों के बजाय हमारी अपनी पुलिस से कहीं ज्यादा आतंकित रहते हैं। इसका सीधा-सा कारण है-आतंकी एक बार हमला करते हैं, जबकि पुलिस घूस खाने के लिए हर रोज आक्रमण करती है। उनका ज्यादातर समय हफ्ता वसूली, अतिरिक्त कमाई के मौके ढूंढने और अपराधियों के साथ साठगांठ करने में बीतता है। वे खुलेआम ‘सूखी’, ‘गीली’ और ‘मलाईदार पोस्टिंग’ (पदस्थापन) की बात करते हैं। गीली पोस्टिंग वह है, जो नियमित घूस का मौका देती है, जबकि सूखी पोस्टिंग में वैसी सुविधा नहीं होती।
कांग्रेस ने 2009 के चुनावी घोषणापत्र में देश के हरेक नागरिक की अधिकतम संभव सुरक्षा की गारंटी देने, पुलिस बल को ज्यादा प्रभावी और प्रशिक्षित करने तथा उसकी जवाबदेही को संस्थागत करने का वायदा किया था। लेकिन लगता नहीं कि कांग्रेस को अपने वायदे की याद है। कोई भी राजनीतिक दल पुलिस सुधार को लेकर गंभीर नहीं है, क्योंकि एक बार पुलिस जिम्मेदार और सक्षम हो गई, तो उसका दलगत उद्देश्यों के लिए उपयोग करना आसान नहीं होगा। ऐसे में जरूरी है कि नागरिक संगठन पुलिस सुधार के लिए दबाव समूह बनाएं, ताकि देश और नागरिकों के लिए खतरा बनते पुलिस बलों के व्यापक अपराधीकरण पर रोक लग सके। हम अपने बच्चों को ऐसे असुरक्षित वातावरण में नहीं छोड़ सकते।
इस देश के गरीब लोग हमारी अपनी पुलिस से डरते हैं, जबकि अमीर लोग निजी सुरक्षा व्यवस्था पर ही भरोसा करते हैं
साख बहाली के उपाय
प्रधानमंत्री को लिखे एक खुले पत्र में केंद्र सरकार की साख बहाली के उपाय बता रहे हैं लेखक
प्रिय प्रधानमंत्री जी, आज आपकी सरकार की विश्वसनीयता दांव पर लगी हुई है। भ्रष्टाचार, नीति-निर्धारण में विचलन और एक पंगु शासन ने देश चलाने की संप्रग सरकार की क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आप ऐसा आभास देते हैं जैसे आप पद पर तो हैं, लेकिन ताकत आपके पास नहीं। फिर आपको क्या करना चाहिए? मेरे विचार से इस सवाल का उत्तर काफी कुछ उन संकेतों में निहित है जो पिछले दिनों कुल मिलाकर निराशाजनक प्रेस कांफ्रेंस में आपने दिए। सरकार को अपनी ताकत वाले क्षेत्रों का इस्तेमाल करना चाहिए और अपना इकबाल नए सिरे से स्थापित करना चाहिए। आपको कुछ सुधारों का श्रेय लेना चाहिए। इसको सबसे अच्छा उदाहरण वस्तु एवं सेवा कर अर्थात जीएसटी है। यह स्वतंत्र देश के रूप में भारत के इतिहास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कर कानून है, जो पहली बार भारत को एक साझा बाजार के रूप में प्रस्तुत करेगा। इससे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगने के साथ-साथ राज्यों और केंद्र के राजस्व में भी सुधार होगा। इसके अतिरिक्त जीएसटी से अप्रत्यक्ष कर प्रणाली का समग्र बोझ भी घटेगा और इसके फलस्वरूप कीमतों में कमी आएगी। यद्यपि जीएसटी का प्रस्ताव पूर्ववर्ती राजग शासन के दौरान किया गया था, लेकिन आपकी सरकार ने इसे वास्तविकता के धरातल पर उतारने के लिए राज्यों को मनाने में बेहद धैर्य का परिचय दिया। अब आपकी सरकार इस संदर्भ में संविधान संशोधन के लिए तैयार है, जो कि जीएसटी लागू करने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा। यह विचित्र है कि भाजपा शासित राज्य इस पहल का विरोध कर रहे हैं। आपके लिए यह उचित नहीं होगा कि जीएसटी के मामले में आप अपना सिर ऊंचा कर भाजपा के विरोध को दोषी ठहराएं, जैसा कि आपने प्रेस कांफ्रेंस में किया। आपको विपक्षी नेताओं के साथ बैठना होगा और उनके साथ किसी समझौते तक पहुंचना होगा। हम जानते हैं कि आप ऐसा करने में समर्थ हैं। जब नाभिकीय सौदे की बात आई थी तो आप विरोधियों को मनाने में सफल रहे थे। इस नाभिकीय करार के जरिये ही भारत और अमेरिका के संबंध एक नए युग में पहुंचे। भारत की अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए नाभिकीय करार जितना महत्वपूर्ण था उतनी ही अहम जीएसटी घरेलू विकास के लिए है। जीएसटी के लिए एक बार समझौता हो जाए तो आपकी सरकार को आक्रामक रुख अपनाकर देश को यह समझाने की कोशिश करनी चाहिए कि इस व्यवस्था को लागू करने की उपलब्धि का क्या महत्व है? मैं जो सुझाव देना चाहता हूं वह यह कि आपको सुधारक के रूप में 1991 की प्रतिबद्धता पुन: तलाशनी चाहिए और उसके अनुरूप पहल करनी चाहिए। आज तो आपके सामने वामपंथी दलों की अड़चन भी नहीं है। खाद्य मुद्रास्फीति को ही लें। अब तक आपकी सरकार अल्पकालिक मरहम ही लगाती रही है। आपने जमाखोरों को पकड़ने की कोशिश की, वायदा कारोबार पर अंकुश लगाने की पहल की तथा खाद्यान्न के निर्यात को प्रतिबंधित करने के उपाय किए। यह सब तब किया गया जब देश में चावल की बंपर फसल हुई और इस बार रिकार्ड गेंहू के उत्पादन का अनुमान व्यक्त किया जा रहा है-इसके बावजूद कि 17 हजार करोड़ रुपये का खाद्यान्न एफसीआई की तिरपाल के नीचे सड़ रहा है। खाद्य मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने की कुंजी दीर्घकालिक आपूर्ति में निहित है। इसके लिए जरूरी है कि आप कृषि के ढांचे में सुधार करें-उत्पादन और वितरण, दोनों ही स्तरों पर। आपको खाद्यान्न भंडारण में एफसीआइ के साथ प्रतिस्पर्धा को अनुमति देनी होगी। आधुनिक रिटेल में विदेशी निवेश को भी अनुमति मिलनी चाहिए। कोल्ड चेन की पहल करनी होगी और फसलों की बर्बादी पर अंकुश लगाना होगा। इसके साथ ही किसानों को अपनी भूमि उद्यमियों को लीज पर देने की अनुमति भी देनी होगी। यद्यपि सुधार राज्यों के स्तर पर होते हैं, लेकिन इन्हें आगे बढ़ाने के लिए केंद्र में सुधारों के प्रति दृढ़ इच्छाशक्ति वाली सरकार की आवश्यकता है। तीसरा उदाहरण लें। हमारे देश का भविष्य शहरों में लिखा जाएगा, न कि गांवों में। हमारे शहरों का ढांचा दरक रहा है। आपकी सरकार ने इसे समझा भी है। केंद्र सरकार ने जवाहर लाल नेहरू शहरी नवीकरण मिशन के जरिए शहरों की दशा सुधारने की पहल भी की है। कुछ शहरों ने इस पहल को सही तरह लिया है और इस योजना के तहत दी गई भारी-भरकम राशि का उपयोग किया है, लेकिन ज्यादातर शहर ऐसा करने में असफल रहे हैं। राज्य इसके प्रति इसलिए अनिच्छुक हैं, क्योंकि इससे शक्ति का केंद्र विधायकों के हाथ से निकलकर शहरी निकायों में जा रहा है। आपकी सरकार को ऐसे राज्यों की सार्वजनिक निंदा करनी चाहिए। आपकी सरकार को राज्यों के बीच पनप रही प्रतिस्पर्धा की भावना का भरपूर इस्तेमाल करना चाहिए और इस बेहतरीन कार्यक्रम को आगे बढ़ाना चाहिए। चौथा उदाहरण शिक्षा के अधिकार संबंधी कानून का है। इस कानून में कई अच्छे पहलू हैं, लेकिन यह शिक्षा में व्याप्त भयानक लाइसेंस राज की समस्या पर ध्यान नहीं देता। किसी को भी एक स्कूल या कालेज खोलने के लिए ढेरों लाइसेंस प्राप्त करने होते हैं और हर कोई यह जानता है कि ये लाइसेंस रिश्वत देकर ही मिलते हैं। शिक्षा के अधिकार से संबंधित कानून यह स्वीकार करता है कि भारत में सरकारी स्कूल असफल रहे हैं, इसलिए उसमें निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत स्थान गरीबों के लिए आरक्षित बनाने का प्रावधान रखा गया है। जल्द ही इन सीटों के लिए मारामारी आरंभ हो जाएगी और मुझे भय है कि ये स्थान राजनेताओं और नौकरशाहों द्वारा झटक लिए जाएंगे और फिर उन्हें ऊंची कीमतों पर बेचा जाएगा। राज्य अभी शिक्षा के अधिकार से संबंधित कानून को लागू करने की कोशिश कर रहे हैं, इसलिए यह जरूरी है कि केंद्र सरकार हस्तक्षेप करे और स्कूलों की स्वायत्तता सुनिश्चित की जाए। सीटें साफ-सुथरे तरीके से पात्र छात्रों को मिलनी चाहिए। आज 35 प्रतिशत बच्चे निजी स्कूलों में हैं और यह संख्या बढ़ती ही जा रही है। केंद्र सरकार को शिक्षा को लाइसेंस राज से मुक्त बनाने की भी ठोस पहल करनी चाहिए। कुछ अन्य सुधार भी हैं जिनकी पहल आपकी सरकार ने की है, जैसे भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन, खनन और अन्य क्षेत्रों से संबंधित विधेयक। आपको यह महसूस करना होगा कि केवल विधेयक पारित करना ही पर्याप्त नहीं। इसके बाद भी बहुत कुछ करना जरूरी होता है। ये कुछ तरीके हैं जिनकी मदद से संप्रग सरकार अपनी विश्वसनीयता फिर से बहाल कर सकती है। कृपया आप हमें यह अहसास कराएं कि आप केवल पद में ही नहीं हैं, बल्कि वाकई आपके पास ताकत है। (लेखक प्रख्यात स्तंभकार हैं)
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