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Thursday, March 3, 2011

साख बहाली के उपाय


प्रधानमंत्री को लिखे एक खुले पत्र में केंद्र सरकार की साख बहाली के उपाय बता रहे हैं लेखक
प्रिय प्रधानमंत्री जी, आज आपकी सरकार की विश्वसनीयता दांव पर लगी हुई है। भ्रष्टाचार, नीति-निर्धारण में विचलन और एक पंगु शासन ने देश चलाने की संप्रग सरकार की क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आप ऐसा आभास देते हैं जैसे आप पद पर तो हैं, लेकिन ताकत आपके पास नहीं। फिर आपको क्या करना चाहिए? मेरे विचार से इस सवाल का उत्तर काफी कुछ उन संकेतों में निहित है जो पिछले दिनों कुल मिलाकर निराशाजनक प्रेस कांफ्रेंस में आपने दिए। सरकार को अपनी ताकत वाले क्षेत्रों का इस्तेमाल करना चाहिए और अपना इकबाल नए सिरे से स्थापित करना चाहिए। आपको कुछ सुधारों का श्रेय लेना चाहिए। इसको सबसे अच्छा उदाहरण वस्तु एवं सेवा कर अर्थात जीएसटी है। यह स्वतंत्र देश के रूप में भारत के इतिहास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कर कानून है, जो पहली बार भारत को एक साझा बाजार के रूप में प्रस्तुत करेगा। इससे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगने के साथ-साथ राज्यों और केंद्र के राजस्व में भी सुधार होगा। इसके अतिरिक्त जीएसटी से अप्रत्यक्ष कर प्रणाली का समग्र बोझ भी घटेगा और इसके फलस्वरूप कीमतों में कमी आएगी। यद्यपि जीएसटी का प्रस्ताव पूर्ववर्ती राजग शासन के दौरान किया गया था, लेकिन आपकी सरकार ने इसे वास्तविकता के धरातल पर उतारने के लिए राज्यों को मनाने में बेहद धैर्य का परिचय दिया। अब आपकी सरकार इस संदर्भ में संविधान संशोधन के लिए तैयार है, जो कि जीएसटी लागू करने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा। यह विचित्र है कि भाजपा शासित राज्य इस पहल का विरोध कर रहे हैं। आपके लिए यह उचित नहीं होगा कि जीएसटी के मामले में आप अपना सिर ऊंचा कर भाजपा के विरोध को दोषी ठहराएं, जैसा कि आपने प्रेस कांफ्रेंस में किया। आपको विपक्षी नेताओं के साथ बैठना होगा और उनके साथ किसी समझौते तक पहुंचना होगा। हम जानते हैं कि आप ऐसा करने में समर्थ हैं। जब नाभिकीय सौदे की बात आई थी तो आप विरोधियों को मनाने में सफल रहे थे। इस नाभिकीय करार के जरिये ही भारत और अमेरिका के संबंध एक नए युग में पहुंचे। भारत की अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए नाभिकीय करार जितना महत्वपूर्ण था उतनी ही अहम जीएसटी घरेलू विकास के लिए है। जीएसटी के लिए एक बार समझौता हो जाए तो आपकी सरकार को आक्रामक रुख अपनाकर देश को यह समझाने की कोशिश करनी चाहिए कि इस व्यवस्था को लागू करने की उपलब्धि का क्या महत्व है? मैं जो सुझाव देना चाहता हूं वह यह कि आपको सुधारक के रूप में 1991 की प्रतिबद्धता पुन: तलाशनी चाहिए और उसके अनुरूप पहल करनी चाहिए। आज तो आपके सामने वामपंथी दलों की अड़चन भी नहीं है। खाद्य मुद्रास्फीति को ही लें। अब तक आपकी सरकार अल्पकालिक मरहम ही लगाती रही है। आपने जमाखोरों को पकड़ने की कोशिश की, वायदा कारोबार पर अंकुश लगाने की पहल की तथा खाद्यान्न के निर्यात को प्रतिबंधित करने के उपाय किए। यह सब तब किया गया जब देश में चावल की बंपर फसल हुई और इस बार रिकार्ड गेंहू के उत्पादन का अनुमान व्यक्त किया जा रहा है-इसके बावजूद कि 17 हजार करोड़ रुपये का खाद्यान्न एफसीआई की तिरपाल के नीचे सड़ रहा है। खाद्य मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने की कुंजी दीर्घकालिक आपूर्ति में निहित है। इसके लिए जरूरी है कि आप कृषि के ढांचे में सुधार करें-उत्पादन और वितरण, दोनों ही स्तरों पर। आपको खाद्यान्न भंडारण में एफसीआइ के साथ प्रतिस्पर्धा को अनुमति देनी होगी। आधुनिक रिटेल में विदेशी निवेश को भी अनुमति मिलनी चाहिए। कोल्ड चेन की पहल करनी होगी और फसलों की बर्बादी पर अंकुश लगाना होगा। इसके साथ ही किसानों को अपनी भूमि उद्यमियों को लीज पर देने की अनुमति भी देनी होगी। यद्यपि सुधार राज्यों के स्तर पर होते हैं, लेकिन इन्हें आगे बढ़ाने के लिए केंद्र में सुधारों के प्रति दृढ़ इच्छाशक्ति वाली सरकार की आवश्यकता है। तीसरा उदाहरण लें। हमारे देश का भविष्य शहरों में लिखा जाएगा, न कि गांवों में। हमारे शहरों का ढांचा दरक रहा है। आपकी सरकार ने इसे समझा भी है। केंद्र सरकार ने जवाहर लाल नेहरू शहरी नवीकरण मिशन के जरिए शहरों की दशा सुधारने की पहल भी की है। कुछ शहरों ने इस पहल को सही तरह लिया है और इस योजना के तहत दी गई भारी-भरकम राशि का उपयोग किया है, लेकिन ज्यादातर शहर ऐसा करने में असफल रहे हैं। राज्य इसके प्रति इसलिए अनिच्छुक हैं, क्योंकि इससे शक्ति का केंद्र विधायकों के हाथ से निकलकर शहरी निकायों में जा रहा है। आपकी सरकार को ऐसे राज्यों की सार्वजनिक निंदा करनी चाहिए। आपकी सरकार को राज्यों के बीच पनप रही प्रतिस्पर्धा की भावना का भरपूर इस्तेमाल करना चाहिए और इस बेहतरीन कार्यक्रम को आगे बढ़ाना चाहिए। चौथा उदाहरण शिक्षा के अधिकार संबंधी कानून का है। इस कानून में कई अच्छे पहलू हैं, लेकिन यह शिक्षा में व्याप्त भयानक लाइसेंस राज की समस्या पर ध्यान नहीं देता। किसी को भी एक स्कूल या कालेज खोलने के लिए ढेरों लाइसेंस प्राप्त करने होते हैं और हर कोई यह जानता है कि ये लाइसेंस रिश्वत देकर ही मिलते हैं। शिक्षा के अधिकार से संबंधित कानून यह स्वीकार करता है कि भारत में सरकारी स्कूल असफल रहे हैं, इसलिए उसमें निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत स्थान गरीबों के लिए आरक्षित बनाने का प्रावधान रखा गया है। जल्द ही इन सीटों के लिए मारामारी आरंभ हो जाएगी और मुझे भय है कि ये स्थान राजनेताओं और नौकरशाहों द्वारा झटक लिए जाएंगे और फिर उन्हें ऊंची कीमतों पर बेचा जाएगा। राज्य अभी शिक्षा के अधिकार से संबंधित कानून को लागू करने की कोशिश कर रहे हैं, इसलिए यह जरूरी है कि केंद्र सरकार हस्तक्षेप करे और स्कूलों की स्वायत्तता सुनिश्चित की जाए। सीटें साफ-सुथरे तरीके से पात्र छात्रों को मिलनी चाहिए। आज 35 प्रतिशत बच्चे निजी स्कूलों में हैं और यह संख्या बढ़ती ही जा रही है। केंद्र सरकार को शिक्षा को लाइसेंस राज से मुक्त बनाने की भी ठोस पहल करनी चाहिए। कुछ अन्य सुधार भी हैं जिनकी पहल आपकी सरकार ने की है, जैसे भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन, खनन और अन्य क्षेत्रों से संबंधित विधेयक। आपको यह महसूस करना होगा कि केवल विधेयक पारित करना ही पर्याप्त नहीं। इसके बाद भी बहुत कुछ करना जरूरी होता है। ये कुछ तरीके हैं जिनकी मदद से संप्रग सरकार अपनी विश्वसनीयता फिर से बहाल कर सकती है। कृपया आप हमें यह अहसास कराएं कि आप केवल पद में ही नहीं हैं, बल्कि वाकई आपके पास ताकत है। (लेखक प्रख्यात स्तंभकार हैं)

Monday, February 7, 2011

विचलित करने वाला मौन


लेखक भ्रष्टाचार पर शासकों की खामोशी और निष्कि्रयता को राजधर्म के उल्लंघन के रूप में देख रहे हैं…

2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की समस्याएं फिलहाल खत्म नहीं होने वाली हैं। कपिल सिब्बल सोचते हैं कि वह अपने इस चतुराई भरे तर्क से मनमोहन सिंह का बचाव कर लेंगे कि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी कैग की रिपोर्ट में जिस बात का इशारा किया गया है वैसा कुछ नहीं है और देश का धन किसी ने नहीं लूटा है। इस तरह कपिल सिब्बल ने मामले को और उलझाने का काम किया, जिस कारण सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करते हुए कहना पड़ा कि वह न्यायिक जांच में हस्तक्षेप कर रहे हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। इस बारे में 21 जनवरी को जस्टिस जीएस सिंघवी और एके गांगुली की न्यायिक पीठ ने कहा कि मंत्री महोदय को अनिवार्य रूप से अपने उत्तरदायित्व के अनुरूप व्यवहार करना चाहिए। वास्तव में सरकार द्वारा चुप्पी साधे रखना ही 2जी स्पेक्ट्रम मामले में वर्तमान राजनीतिक संकट की मूल वजह बना। यही वह कारण है कि अभी तक गतिरोध बना हुआ है और संसद का एक पूरा सत्र हंगामे की भेंट चढ़ गया। ईमानदार प्रधानमंत्री पर अब भारतीय जनता का गुस्सा तेजी से बढ़ रहा है, जो संभवत: हाल के भारतीय इतिहास में सर्वाधिक भ्रष्ट सरकार के मुखिया के पद पर बैठे हुए हैं। अंधकारपूर्ण वर्तमान हालात में देश की जनता खिन्न और निराश है और वह अब एक ऐसे ईमानदार व्यक्ति से छुटकारा पाना चाहती है जो अपने आसपास के बेईमान लोगों पर अंकुश नहीं लगा सका। यह वही मनमोहन सिंह हैं जिन्हें एक समय जनता एक नि:स्वार्थ और नैतिक व्यक्ति के रूप में देखती थी। कुछ ऐसे ही महाभारत में भीष्म भी थे। वह तब भी मौन रहे जब द्रौपदी का चीर हरण किया जा रहा था। दु:शासन द्वारा अपमानित होने के कारण द्रौपदी क्रुद्ध हुई और उसने शासकों के धर्म के बारे में सवाल उठाए, लेकिन तब सभागार में बैठे राजपरिवार के किसी भी सदस्य ने उसे उत्तर नहीं दिया और हर कोई शांत बना रहा। उस समय विदुर ने तिरस्कार भाव से मौन की अनैतिकता का सवाल उठाया और सभागार में बैठे लोगों को लताड़ लगाई। उस समय विदुर ने किसी अपराध के घटित होने पर आधा दंड दोषी को दिए जाने, एक तिहाई दंड सहयोगियों अथवा इस तरह के कृत्य में शामिल होने वालों के लिए और शेष एक तिहाई दंड मौन रहने वालों के लिए बताया था। 2जी घोटाले में हमारे प्रधानमंत्री की चुप्पी बहुत गहरे तक हमें मथने वाली अथवा परेशान करने वाली है। सितंबर 2007 में पूर्व संचार मंत्री ए. राजा ने जब स्पेक्ट्रम आवंटन की दोषपूर्ण नीति घोषित की तो प्रधानमंत्री इसमें चोरी-छिपे बड़े पैमाने पर होने वाले अपराध को भांप गए थे। इसीलिए उन्होंने ए. राजा द्वारा घोषित की गई नीति पर ऐतराज करते हुए अपनी तरफ से एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने उनसे पारदर्शी नीति बनाने और उसे अपनाने के बारे में कहा था। तब ए. राजा ने खुद का बचाव करते हुए उन्हें तत्काल जवाब भी दिया। 3 जनवरी, 2008 को प्रधानमंत्री ने इस पत्र के मिलने की पुष्टि की और इस नीति को अपनी स्वीकृति देने की बात भी स्वीकार की। इस तरह ए. राजा को स्पेक्ट्रम लाइसेंस आवंटन के मामले में आगे बढ़ने की दिशा मिली। मई, 2010 में प्रधानमंत्री ने स्वीकार किया कि ए. राजा ने वास्तव में उन्हें पत्र लिखकर सूचित किया था। सवाल यह है कि आवंटन नीति पर आपत्ति उठाने के बाद प्रधानमंत्री चुप क्यों हो गए? यही वह सवाल जिसका उत्तर भारतीय जनता अब जानना चाहती है। इस संकट में प्रधानमंत्री के मौन के अतिरिक्त एक अन्य विचलित करने वाला पहलू भी है। सफलता के संदर्भ में हमारी धारणा भी दांव पर लगी हुई है। ए. राजा ने इस धारणा को कमजोर करने की कोशिश की है। हाल तक राजा दुनिया की निगाहों में एक भारी सफलता के उदाहरण थे। उनके पास शक्ति थी, पैसा था, रुतबा था। इसके बाद उनका पतन शुरू हुआ। सवाल यह है कि सफलता के लिए हम कितनी कीमत चुकाने के लिए तैयार हैं? क्या यह संभव है कि हम सफल भी हो जाएं और अच्छे भी बने रहें। एक व्यक्ति जो ईमानदार और दयालु है उसे केवल इन गुणों के आधार पर ही ऊंचे दर्जे पर क्यों नहीं रखा जा सकता? राजा का उदय और पराभव प्रत्येक भारतीय माता के समक्ष आने वाली उस दुविधा को रेखांकित करता है जिसे अपने बच्चे को कोई नाम देना है। पश्चिम में हर किसी को टाम, डिक और हैरी नाम मिल जाता है, लेकिन अपने देश में माता-पिता बच्चे का नाम तय करने में महीनों का समय लगाते हैं। इसलिए, क्योंकि वे इस नामकरण के साथ एक प्रकार से अपने बच्चे का भविष्य और भाग्य तय कर रहे होते हैं। सफलता और अच्छाई के बीच फंसे वे स्पष्ट रूप से सफलता को चुनते हैं। यही कारण है कि अपने देश में हर पांचवें बच्चे का नाम अर्जुन होता है और युधिष्ठिर आपको ढूंढने से भी नहीं मिलेंगे। राजा ने हमें पूरी दुनिया के सामने नीचा दिखाया है। हालांकि हम हमेशा से अपनी एक भद्दी सच्चाई को जानते रहे हैं। भारत में भ्रष्टाचार बच्चे के जन्म लेते ही आरंभ हो जाता है। आपको जन्म प्रमाणपत्र हासिल करने के लिए किसी को रिश्वत देनी पड़ती है। यह सिलसिला उसकी मौत तक चलता रहता है, जब मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए एक बार फिर किसी की जेब भरनी पड़ती है। यह समझना मुश्किल है कि महान विचारों के साथ जन्म लेने वाले देश में आखिर इतना भ्रष्टाचार कैसे आ गया? हम माता-पिता को इसका दोष नहीं दे सकते कि वे अपने बच्चे को सफल होते देखना चाहते हैं, लेकिन वे अपने बच्चों को सही कार्य करने की शिक्षा तो दे ही सकते हैं। उन्हें अपराध के समय शांत न रहने की नसीहत दी जा सकती है। इसके साथ ही शासन के संस्थानों में अपरिहार्य हो चुके सुधारों को लागू करके भी भ्रष्टाचार को कम किया जा सकता है। द्रोपदी के सवाल इसलिए प्रशंसनीय थे, क्योंकि उसने राजधर्म पर जोर दिया था। यह आश्चर्यजनक है कि हम अपनी ऊर्जा राजनीतिक वामपंथ और दक्षिणपंथ के विभाजन पर बहस करते हुए खर्च करते हैं, जबकि बहस सही और गलत के विभाजन पर होनी चाहिए। मनमोहन सिंह इसे समझते हैं। यही कारण है कि 2004 में सत्ता में आने के बाद उन्होंने प्रशासनिक सुधार के साथ भ्रष्टाचार पर चोट करने का भरोसा व्यक्त किया था, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सके। सुधार कभी आसान नहीं होते-यह बिल्कुल कुरुक्षेत्र में युद्ध करने के समान होता है, फिर भी यह करना ही होता है। हमारे शासक यदि अभी भी सक्रियता दिखाने से इनकार करते हैं तो उन्हें भी पतन के लिए तैयार रहना चाहिए। फ्रांस के शासकों ने भी जनता का विश्वास खो दिया था और 1789 में ऐसे ही पतन का शिकार हुए थे। (लेखक प्रख्यात स्तंभकार हैं)