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Tuesday, March 29, 2011

जाति का जोर


मुफ्त सौगात देने की परंपरा तमिलनाडु में ही शुरू हुई
दक्षिण भारत के तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। अन्नाद्रमुक और द्रमुक आमने-सामने हैं। दोनों दलों का मूल वोट बैंक एक ही है-द्रविड़ वोट। दोनों के ही हिस्से में 25 से 30 फीसदी वोट आते हैं। ऐसे में जीतता वही है, जो गैर द्रविड़ वोटों पर कब्जा कर पाता है। लिहाजा वहां गठबंधन की राजनीति काम आती है। वहां भी छोटे दलों के पुख्ता वोट बैंक हैं और उस बड़े दल के साथ जाने या न जाने की उनकी भी मजबूरी होती है।
तमिलनाडु देश का पहला राज्य है, जहां फिल्मी सितारे सत्ता पर काबिज हुए, और फिर तो यह सिलसिला ही बन गया। इसी तरह तमिलनाडु देश का पहला राज्य है, जहां सबसे पहले चुनावी घोषणापत्रों में मुफ्त सौगातें देने का सिलसिला शुरू हुआ था। वहां सबसे पहले स्कूली बच्चों के लिए मिड डे मील योजना शुरू हुई। दो-तीन रुपये किलो चावल देने की परिपाटी भी वहीं से शुरू हुई। अनाज के बाद बारी आई टीवी की। द्रमुक ने तो पिछला विधानसभा चुनाव बीपीएल समूह को रंगीन टीवी देकर ही जीत लिया था। इस बार के चुनाव में भी कोई लैपटॉप, कोई मिक्सर-ग्राइंडर, कोई पंखा, तो कोई वाशिंग मशीन, यहां तक कि गाय और भेड़ देने की भी घोषणा कर रहा है!
तमिलनाडु में बीती सदी के पचास के दशक में सवर्ण जातियों के खिलाफ आंदोलन चला था। अन्नादुरई, करुणानिधि और एमजी रामचंद्रन (एमजीआर) उस आंदोलन के अगुवा थे। अन्नादुरई ने तमिल फिल्मों का इस्तेमाल आंदोलन के प्रचार-प्रसार के लिए किया। वह फिल्मों के लिए कहानियां लिखा करते थे। करुणानिधि फिल्मों के पटकथा लेखक हुआ करते थे। इसी तरह एमजीआर हीरो थे और बाद में तमिल फिल्मों की नायिका जयललिता उनसे जुड़ीं।
करुणानिधि ने सबसे पहले फिल्मों में संवाद की भाषा बदली। पहले सवर्ण जाति की भाषा में ही संवाद होते थे, जिसमें भारी-भरकम शब्दों का इस्तेमाल होता था। करुणानिधि ने अन्नादुरई के कहने पर उस भाषा में संवाद लिखने शुरू किए, जिसे तमिलनाडु की दलित जनता बोलती थी। इस तरह पेरियार आंदोलन सीधे-सीधे दलितों से जुड़ा। अन्नादुरई ने ऐसी कहानियां लिखीं, जिनमें दलितों का संघर्ष और फिर उनकी जीत का जश्न होता था। उस दौरान राजा-महाराजाओं और महलों की कहानियों से तौबा की गई। उसकी जगह अन्नादुरई और करुणानिधि ने ऐसे विषयों पर फिल्में बनानी शुरू कीं, जिनमें दलित, गरीब, मजदूर और किसानों का दर्द था। एमजीआर इन फिल्मों के हीरो होते थे। वह काली पतलून और लाल कमीज पहनते थे। काली पतलून द्रविड़ नस्ल का प्रतीक होती थी, जबकि लाल कमीज सामाजिक न्याय का। इनकी फिल्मों में बार-बार उगता हुआ लाल सूरज दिखाया जाता, जो उनकी पार्टी का चुनाव चिह्न भी था।
करीब बीस वर्षों तक यह सिलसिला चलता रहा। एक बेहद मजबूत सामाजिक आंदोलन खड़ा हो चुका था। लेकिन सत्तर के दशक में इस कहानी में नाटकीय मोड़ आया। अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के चलते करुणानिधि और एमजीआर अलग हुए। करुणानिधि के पास द्रमुक रहा, जबकि एमजीआर ने अन्नाद्रमुक पार्टी बना ली।
हैरत की बात है कि जिस राज्य में एक मजबूत सामाजिक आंदोलन हुआ और फिल्मों के जरिये जिसका आधार मजबूत हुआ, उसी राज्य में आज चुनावी सियासत भीषण जातिवाद की शिकार है। वहां जाति के आधार पर इस कदर वोट डाले जाते हैं कि उत्तर भारत के राज्य भी शरमा जाएं। मौटे तौर पर उत्तरी तमिलनाडु में करुणानिधि का गठबंधन मजबूत रहता है, जबकि दक्षिण में जयललिता का। पिछले यानी 2006 के विधानसभा चुनाव में द्रमुक गठबंधन को करीब 45 प्रतिशत और पराजित अन्नाद्रमुक गठबंधन को लगभग 40 फीसदी वोट मिले थे। जाहिर है, पिछले चुनाव में करुणानिधि गैरद्रविड़ वोटों का जुगाड़ करने में कामयाब रहे थे। इस बार भी उन्होंने पीएमके को अपने गठबंधन में शामिल किया है। पीएमके अति पिछड़ों की पार्टी है और राज्य के लगभग पांच फीसदी वन्नियार वोटों पर उसका कब्जा है। दूसरी तरफ, जयललिता के साथ कैप्टन विजयकांत गए हैं। वह तमिल फिल्मों के सुपर स्टार हैं। उनकी एमडीएमके नाम की पार्टी है, जिसमें दलित आते हैं। इसके पास दस प्रतिशत वोट है। एक अन्य फिल्मी हस्ती शरद कुमार भी इस बार जयललिता के साथ हैं। उनकी पार्टी एआईएसएमके के पास वोट तो तीन फीसदी के आसपास ही है, लेकिन शरद कुमार की अपील ज्यादा है।
करुणानिधि भी इसमें पीछे नहीं रहना चाहते। उन्होंने एक-एक वोट का जुगाड़ करने के लिए केएमके जैसी छोटी पार्टी से भी हाथ मिलाया है। राज्य में दर्जन भर से ज्यादा अन्य दल भी हैं, जिनके अपने-अपने वोट बैंक हैं।
दरअसल तमिलनाडु में जाति से ज्यादा समुदाय आधारित दल हैं, जो चुनावों को और मुश्किल बना देते हैं। राहुल गांधी ने जाति और समुदाय को तोड़ने के लिए राज्य के कई दौरे किए। युवा कांग्रेस को मजबूत करने के बहाने उन्होंने जनमानस को टटोलने की कोशिश की और खासकर युवा वर्ग से जाति से ऊपर उठकर वोट डालने का आग्रह भी किया। लेकिन उन्हें एहसास हो गया कि जाति और समुदाय की गहरी पैठी जड़ों को तीन-चार दौरों से नहीं उखाड़ा जा सकता। ऐसे में कांग्रेस अकेला चलने के बजाय फिर उसी द्रमुक के साथ चल रही है, जिस पर 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले के आरोप लगे हैं। कांग्रेस की तरह जयललिता भी जानती हैं कि भ्रष्टाचार का मुद्दा हाशिये पर ही रहेगा। चलेगा, तो सिर्फ जाति और समुदाय का जोर। यही वजह है कि जयललिता और करुणानिधि, दोनों ही अपने-अपने गठबंधन में और ज्यादा समुदायों को शामिल करने की होड़ में लगे हैं।

Monday, March 14, 2011

लोहिया के वारिस


उनकी जन्मशती में काफी कुछ सार्थक काम हुआ
किसी नेता या विचारक को हम कैसे याद करते हैं, यह अमूमन उसके कर्म और विचार पर निर्भर नहीं करता, बल्कि यह हमारी वर्तमान दशा और भविष्य के दिशाबोध पर निर्भर करता है। महापुरुषों की याद उनके अपने व्यक्तित्व, कृतित्व और रचना संसार से ज्यादा उनके शिष्यों के आचार-व्यवहार, चिंतन-मनन और काम-काज से बनती है।
इस लिहाज से राममनोहर लोहिया की जन्मशती से बहुत अपेक्षाएं पालने की गुंजाइश नहीं थी। समकालीन भारत में लोहिया के विचार चारों ओर बिखरे हुए हैं। खुद को लोहियावादी मानने वाले लोग तमाम राजनीतिक दलों में पाए जाते हैं। लेकिन कोई एक दल नहीं, जिसे लोहिया की परंपरा का वारिस कहा जा सके। एक समय मुलायम सिंह की पार्टी ऐसा दावा करती थी, अब उसने यह पाखंड भी छोड़ दिया है। लोहिया का नाम किसी राजनीतिक या वैचारिक सत्ता से तार नहीं जोड़ता। ऐसे में 23 मार्च, 2010 को शुरू हुई लोहिया जन्मशती के बारे में यही आशंका थी कि यह एक छोटे से कर्मकांड में बदलकर रह जाएगा।
लेकिन जो कुछ हुआ, उसे महज एक छोटे से कर्मकांड की संज्ञा नहीं दी जा सकती। स्वर्गीय सुरेंद्र मोहन जैसी निर्विवाद छवि की अध्यक्षता में बनी जन्मशती समारोह समिति के कई सदस्यों ने अपने पूर्वाग्रह, सांगठनिक जुड़ाव और सहूलियत से ऊपर उठकर व्यापक एका बनाने का काम किया। देश भर में फैले तमाम कार्यकर्ताओं ने अनेकानेक कार्यक्रमों के जरिये लोहिया को याद किया। बिना किसी चमक-दमक के, पर असीम लगन से हुए इन प्रयासों ने उनकी मूर्तिभंजक छवि बचाए रखी। खुद लोहिया को ऐसे प्रयासों से सुकून मिलता।
विचार जगत में इस जन्मशती के बहाने कुछ नए काम हुए। स्वर्गीय हरिदेव शर्मा की लगन और मस्तराम कपूर के उद्यम से लोहिया की रचनावली प्रकाशित हुई। समाजवादी आंदोलन से जुड़ी तमाम पत्रिकाओं ने विशेषांकों के जरिये लोहिया की याद को दर्ज किया और कुछ नए आयाम भी खोले। देश भर में लोहिया पर सेमिनार हुए। लिहाजा उम्मीद की जा सकती है कि नेहरूवादी और मार्क्सवादी दबदबे के चलते लोहिया को बौद्धिक जगत से बहिष्कृत रखने की परंपरा में सेंध लगेगी।
अगर जन्मशती का उद्देश्य राजनीतिक दायरों में लोहिया का नाम बचाकर रखना और बौद्धिक जगत में लोहिया की पहचान बनाना था, तो दो वर्ष तक चले इन प्रयासों को निरर्थक नहीं कहा जा सकता। लेकिन क्या इतनी भर अपेक्षा रखना लोहिया के साथ न्याय होगा? लोहिया खुद होते, तो निस्संदेह ज्यादा सख्त सवाल पूछते, जैसे कि उन्होंने गांधी के बाद उनके शिष्यों से पूछे थे। राजनीति के दायरे में असली सवाल यह है कि क्या वह राजनीति मजबूत हुई, जिसे लोहिया क्रांतिकारी मानते थे। बौद्धिक क्षेत्र में क्या लोहिया के विचार आगे बढ़े? क्या उनकी वैचारिक परंपरा सुदृढ़ हुई? इनके उत्तर देना लोहियावादियों के लिए कठिन होगा।
लोहिया की राजनीति को उनसे जुड़े लोगों या संगठनों की राजनीति मान लेना न सिर्फ लोहिया के साथ अन्याय होगा, बल्कि हमारे भविष्य के प्रति भी खतरनाक होगा। चाहे मुलायम सिंह यादव हों, शरद यादव हों या फिर रामविलास पासवान, इन सबकी राजनीति का शुरुआती दौर लोहिया के आंदोलन में गुजरा। आज भी वे गाहे-बगाहे लोहिया का नाम ले लेते हैं और उनसे जुड़े प्रतीकों का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन उनकी राजनीति अकसर जातिवाद का सहारा लेती है, जिसके प्रति लोहिया ने बार-बार आगाह किया। आज इन सभी नेताओं और दलों की राजनीति उस पूंजीवादी व्यवस्था से समझौता कर चुकी है, जिसके खिलाफ लोहिया ने जीवन भर लडाई लड़ी। अगर यही लोहिया के वारिस हैं, तो लोहियावादी राजनीति का कोई भविष्य न तो है, न होना चाहिए।
आज लोहिया की राजनीति की तलाश हमें लोहियावादी या समाजवादी ठप्पे से दूर ले जाएगी। लोहिया के राजनीतिक वारिसों की खोज आज हमें देश भर में फैले जनांदोलनों तक ले जाएगी। वे स्वयं को समाजवादी नहीं कहते। कई तो लोहिया का नाम तक नहीं जानते। लेकिन उनके आंदोलन आज वही काम कर रहे हैं, जो लोहिया ने किया।
विचार जगत में भी हमें इसी ईमानदारी और निर्ममता से काम लेना होगा। लोहियावादी दृष्टि का मतलब यह नहीं हो सकता कि हम उनकी लिखी-कही हर बात से चिपके रहें। उनके सिद्धांत के प्रति न्याय करने के लिए हमें लोहिया के विचार से असहमत होना पड़ सकता है, नए तथ्यों की रोशनी में उनके आग्रहों से अलग होना पड़ सकता है। यही नहीं, अगर हम लोहिया के सवालों को गंभीरता से लें, तो कई बार हमें उनके उत्तर को खारिज करना पड़ेगा। उनकी वैचारिक विरासत का सबसे बड़ा खजाना है, उनकी विचार पद्धति और नजरिया, जो हमें बिलकुल नए सवालों और उनका उत्तर देने के नए तरीकों की ओर ले जाता है। इस पद्धति की खूबसूरती यही है कि इसमें बने-बनाए उत्तर नहीं हैं। समसामायिक उत्तरों की तलाश हमें अपने आप करनी होगी। ठीक वैसे ही, जैसे लोहिया ने अपने श्रद्धेय विचारकों से सीखते हुए भी अपने उत्तर स्वयं खोजे थे।
लोहिया की विरासत महज एक नेता या संगठन की धरोहर नहीं है। 

Thursday, March 10, 2011

जेपीसी से हासिल क्या होगा


अंतत: संसद के दोनों सदनों में संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के गठन की औपचारिक स्वीकृति मिल गई। अगर विपक्ष ने शीतकालीन सत्र में संसद का बहिष्कार नहीं किया होता, तो सरकार दबाव में नहीं आती। मगर सवाल है कि क्या जेपीसी के गठन से भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष में किसी अन्य संस्था से ज्यादा प्रभावी परिणाम आएगा।
जेपीसी के गठन की घोषणा करते हुए प्रधानमंत्री ने जो कहा, उससे स्पष्ट है कि सरकार इसके पक्ष में नहीं थी, किंतु उसके पास कोई चारा नहीं है। उन्होंने कहा, ‘मेरी सरकार को विश्वास था कि चूंकि सभी प्रभावी कदम उठाए जा रहे हैं, इसलिए हम विपक्ष को जेपीसी के गठन की मांग पर जोर न देने के लिए मना लेंगे। हम अपने ईमानदार प्रयासों के बावजूद इसमें सफल नहीं हो सके। हम इस स्थिति को बनाए नहीं रख सकते, जिसमें बजट जैसे महत्वपूर्ण सत्र में संसद की कार्यवाही न चलने दी जाए। यही वे विशेष परिस्थितियां हैं, जिनमें हमारी सरकार जेपीसी के गठन को सहमत हुई है।सोचने वाली बात है कि जो सरकार जेपीसी को जरूरी नहीं मानती, वह इसके प्रति कितनी गंभीर होगी। ठीक है कि जेपीसी का स्वरूप सर्वदलीय है एवं इसे किसी को भी पूछताछ के लिए बुलाने का अधिकार है, परंतु जेपीसी कोई जांच एजेंसी नहीं है। इसकी सफलता सरकार की भूमिका पर निर्भर है। बगैर सरकार के सहयोग के यह जांच भी नहीं कर सकती। यानी सब कुछ सरकार की राजनीतिक ईमानदारी एवं इच्छाशक्ति पर निर्भर करेगा।
जो सरकार इसके गठन को राजी नहीं थी, उससे इच्छाशक्ति दिखाने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? वैसे भी इससे पहले चार बार जेपीसी का गठन हो चुका है, लेकिन व्यावहारिक स्तर पर वह निरर्थक ही साबित हुआ है। राजनीतिक दल ईमानदारी बरतें, तो अपने विशेषाधिकारों के कारण यह समिति वाकई भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई में सर्वाधिक प्रभावी हो सकती है। लेकिन न पहले ऐसा हुआ है और न अब ऐसा होगा। सर्वदलीय समिति होने के कारण इसकी विश्वसनीयता तो होती है, लेकिन राजनीतिक खींचतान का शिकार होना भी इसकी नियति होती है। जेपीसी गठन पर दोनों सदनों में बहस के दौरान बिलकुल दो विपरीत विचार सामने आए, जिससे लगता है कि दोनों पक्षों के बीच शायद ही सहमति हो। इसलिए इसके गतिरोध का शिकार होने की आशंका ज्यादा है। हमारी राजनीति जिस अवस्था में पहुंच गई है, उसमें दुर्भावना रहित भूमिका की संभावना लगभग क्षीण है, चाहे भ्रष्टाचार का ही मामला क्यों न हो। इसलिए जेपीसी से भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी जोरदार पहल की उम्मीद बेमानी ही होगी। अगर जेपीसी से भ्रष्टाचार रोकने में मदद मिलती, तो यह बोफोर्स घोटाले और हर्षद मेहता कांड के समय भी हो सकता था।
वास्तव में जेपीसी पर गतिरोध हमारी वर्तमान राजनीति के चरित्र को ही तो उद्घाटित कर रहा था। सरकार अपना गिरेबान बचाने के लिए इसे अस्वीकार कर रही थी, तो विपक्ष भी इसके माध्यम से राजनीतिक लक्ष्य साधता रहा। लेकिन किसी भी नजरिये से जेपीसी न तो परम लक्ष्य हो सकता है और न बिलकुल त्याज्य। जेपीसी के गठन के बावजूद सीबीआई जांच एवं न्यायिक कार्रवाई भी चलती ही रहेगी और लोकलेखा समिति की जांच भी। क्या संभव है कि दोनों पक्षों के नेता यह फैसला कर लें कि जब जेपीसी गठित हो ही गई है, तो शेष जांच रोक दिए जाएं एवं एक निश्चित समय-सीमा के अंदर रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई हो? जेपीसी की अनुशंसाओं के बाद भी तो प्राथमिकी दर्ज करके न्यायालय में ही कार्रवाई होगी। हां, यह समिति भ्रष्टाचार रोकने के लिए कुछ अनुशंसाएं कर सकती है, जिसके आधार पर संसद इससे संबंधित नियम-कानून बना सकती है। किंतु ऐसा तब होगा, जब समिति की कार्रवाई स्वाभाविक गति से लक्ष्य तक पहुंचेगी। यह भी असंभव नहीं कि कोई अपने राजनीतिक स्टैंड से अलग हट जाए, क्योंकि विपक्ष का रवैया भ्रष्टाचार रोकने से ज्यादा राजनीतिक लाभ उठाने वाला है। सही है कि 2 जी स्पेक्ट्रम, राष्ट्रमंडल, आदर्श सोसाइटी मामले में भ्रष्टाचार के खिलाफ जो कार्रवाई हुई, उसके पीछे विपक्षी सक्रियता का महत्वपूर्ण योगदान है, पर इसमें भ्रष्टाचार रोकने के प्रति प्रतिबद्धता नहीं झलकती। साफ है कि विपक्ष सरकार को कठघरे में खड़ा कर राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश करेगा और सरकार अपनी खाल बचाना चाहेगी।

लाल दुर्ग को चुनौती


बंगाल की वाम मोरचा सरकार साम्राज्यवादी ताकतों के निशाने पर है
पश्चिम बंगाल हमारे देश में वामपंथी तथा जनतांत्रिक आंदोलन का दुर्ग है। बंगाल ने यह हैसियत मजदूर वर्ग तथा किसान जनता के अनवरत संघर्षों और जनतांत्रिक अधिकारों, धर्मनिरपेक्षता तथा सामाजिक न्याय की हिमायत में चलाए गए आंदोलनों के जरिये हासिल की है। वर्ष 1977 में वाम मोरचा सरकार के गठन के साथ मजदूर वर्ग के संघर्षों और जनतंत्र के लिए संघर्ष के इतिहास का एक नया अध्याय शुरू हुआ। इस सरकार ने ऐसे कार्यक्रमों को लागू किया, जिन्होंने मेहनतकश जनता के सभी तबकों के हितों को आगे बढ़ाया। इनमें सबसे महत्वपूर्ण था, भूमि सुधारों को लागू करना। केरल तथा त्रिपुरा को छोड़कर देश के दूसरे किसी राज्य में पश्चिम बंगाल की तरह भूमि सुधारों को लागू नहीं किया गया।
दूसरे किसी राज्य ने पश्चिम बंगाल की तरह यह भी सुनिश्चित नहीं किया कि कृषि के विकास के लाभ आम किसानों को मिले, न कि भूस्वामियों तथा धनी किसानों के एक छोटे से तबके को। इसीलिए जहां राष्ट्रीय स्तर पर खेती की पैदावार में पिछले काफी अरसे से अवरोध बना हुआ है, पश्चिम बंगाल में खेती की पैदावार चार फीसदी सालाना की दर से बढ़ती रही है। पंचायती व्यवस्था को संस्थागत रूप दिए जाने से ग्रामीण मेहनतकशों के लिए स्थानीय स्तर पर निर्णयों को प्रभावित करना संभव हुआ है। वाम मोरचे के दीर्घ शासन में इस राज्य में एक स्थिर धर्मनिरपेक्ष वातावरण कायम हुआ है और मेहनतकश जनता के विभिन्न तबकों के जनतांत्रिक अधिकार सुनिश्चित किए गए हैं। वाम मोरचा सरकार ने अपनी इन्हीं उपलब्धियों के चलते लगातार सात बार विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की है और वह भी हर बार दो-तिहाई बहुमत से।
आज वामपंथ के इस दुर्ग पर हमला हो रहा है। इस हमले की वजह क्या है? दरअसल वामपंथ कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की नव उदारवादी नीतियों का अविचल रहकर मुकाबला करता आया है। ये वही नीतियां हैं, जो मुट्ठी भर लोगों को और धनी बना रही हैं। शासक वर्ग तथा साम्राज्यवाद को अच्छी तरह से पता है कि वामपंथ उनकी आकांक्षाओं के पूरे होने के रास्ते में एक बड़ी बाधा साबित होने जा रहा है। इसलिए वे भारत में वामपंथ को कमजोर करना चाहते हैं। इसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए वे वामपंथ के सबसे मजबूत आधार पश्चिम बंगाल को निशाना बना रहे हैं।
वर्ष 2008 से ही लगातार कोशिशें की जा रही थीं कि प्रतिक्रियावादी दक्षिणपंथी ताकतों से लेकर धुर-वामपंथ तक सभी वामपंथ-विरोधी ताकतों को गिरोहबंद किया जाए। तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठजोड़ और माओवादियों के साथ उसका गठजोड़ इसी गिरोहबंदी का मूर्त रूप है। पिछले लोकसभा चुनाव से लेकर विगत फरवरी तक इसी गिरोह के हाथों माकपा तथा वाम मोरचे के लगभग 380 कार्यकर्ताओं तथा समर्थकों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है। हजारों लोग घरों से उजाड़ दिए गए हैं। किसानों तथा बर्गादारों की बेदखलियां हुई हैं और पार्टियों व जन संगठनों के दफ्तरों पर जबरन कब्जे किए गए हैं।
माओवादी ऐसी चरम वामपंथी ताकत है, जो अराजकतावादी हिंसा का सहारा लेती है। अपनी गलत विचारधारा तथा राजनीति के साथ वह अविचारपूर्ण हिंसा करने वाले दस्तों में बदल गई है। वह उन ताकतों के साथ हाथ मिलाने के लिए भी तैयार हो जाती है, जिनके खिलाफ लड़ने का दावा करती है। तृणमूल कांग्रेस के साथ माओवादियों का गठजोड़ इस पतित राजनीति की आंखें खोलने वाली मिसाल के तौर पर देखा जा सकता है।
पश्चिम बंगाल में वामपंथ पर हो रहा यह हमला वास्तविक अर्थों में एक वर्गीय हमला है, जो सिर्फ माकपा तथा वाम मोरचे के खिलाफ ही नहीं है, बल्कि व्यापक अर्थों में आम आदमी और उसे मिलने वाली सुविधाओं के खिलाफ भी है। वाम मोरचे को सत्ता से हटाने का अर्थ उन भूमि संबंधों को पलटने की राह हमवार करना होगा, जो गरीब किसानों तथा ग्रामीण गरीबों के पक्ष में हैं। जिस पश्चिम बंगाल को अब तक सांप्रदायिक शक्तियों से बिलकुल अलग-थलग रखा गया है, वह प्रगति-विरोधी ताकतों के सत्तारूढ़ होने पर एक बार फिर से सांप्रदायिक राजनीति का शिकार हो जाएगा। यह हम पहले ही देख चुके हैं कि तृणमूल कांग्रेस किस तरह से लगातार धार्मिक तथा जातिगत पहचानों को खुराक मुहैया करा रही है, चाहे वह गोरखालैंड आंदोलन हो या स्वतंत्र कामतापुर राज्य की मांग।
दक्षिणपंथी ताकतों का मुकाबला करने के वाम मोरचे के संघर्ष को सिर्फ पश्चिम बंगाल के मुद्दे के रूप में नहीं देखना चाहिए। पश्चिम बंगाल का वाम मोरचा चूंकि देश के वामपंथी आंदोलन का अगुआ दस्ता है, इसलिए तमाम वामपंथी तथा जनतांत्रिक ताकतों को इसके साथ खड़ा होना चाहिए। मजदूर वर्ग यह जानता है कि पश्चिम बंगाल का मजदूर आंदोलन, उदारीकरण तथा निजीकरण की लड़ाई में अग्रणी है और बाकी देश का किसान आंदोलन पश्चिम बंगाल के किसान संघर्षों का उदाहरण की तरह अनुपालन करता है।
वाम मोरचा सरकार द्वारा निरंतर सात बार कार्यकाल पूरे किए जाने के बाद अब फिर राज्य विधानसभा के चुनाव होने जा रहे हैं। यह चुनावी लड़ाई वामपंथ और उन ताकतों के बीच है, जो शासक वर्गों के हितों का प्रतिनिधित्व करती हैं। माकपा और वाम मोरचा मजदूरों, किसानों, खेत मजदूरों, मध्य वर्ग और आम आदमी के हितों के साथ दृढ़ता से खड़े रहकर यह संघर्ष चला रहे हैं। ऐसे में जनता ही यह सुनिश्चित करेगी कि आने वाले विधानसभा चुनाव में वाम मोरचा एक बार फिर विजयी हो।

Thursday, March 3, 2011

खाकी का खौफ


कोई राजनीतिक पार्टी पुलिस सुधार के बारे में गंभीर नहीं
यह देश की प्रशासन-व्यवस्था पर सचमुच एक गंभीर टिप्पणी है कि उच्च पुलिस निगरानी वाले शहरों और थानों व सरकारी कार्यालयों के नजदीक वाले गांवों में अपराध की दर काफी ऊंची है। इसके विपरीत दूरस्थ इलाकों के वे गांव तुलनात्मक रूप से अपराध मुक्त हैं, जहां पुलिस वाले मुश्किल से दिखाई पड़ते हैं। गांवों में जातिगत और सामुदायिक आधार पर होने वाले ज्यादातर अत्याचारों के पीछे पुलिसिया समर्थन होता है। एक बांग्ला कहावत है कि बाघ के काटने पर 16 घाव ही होते हैं, जबकि पुलिस के काटने पर 32 घाव होते हैं। हकीकत यह है कि गांवों में पुलिस का आना सुरक्षा का एहसास नहीं जगाता, बल्कि खौफ जगाता है।
आज के दौर में समृद्ध नागरिकों द्वारा व्यक्तिगत तौर पर निजी सुरक्षा की व्यवस्था इस तथ्य का खुला स्वीकार है कि उनका पुलिस पर भरोसा नहींहै। दूसरी ओर, निजी सुरक्षा का भार नहीं उठा सकने वाले करोड़ों लोग भगवान भरोसे जीते हैं। गांवों, झुग्गी बस्तियों और गरीब इलाकों से छोटे बच्चों के गायब होने की हमारे यहां रिपोर्ट भी बहुत कम होती है और जांच भी। पिछले तीन वर्षों में अकेले दिल्ली में 6,687 बच्चे गायब हुए हैं। इनमें वे बच्चे शामिल नहीं हैं, जिनकी गुमशुदगी की रिपोर्ट उनके अभिभावकों ने दर्ज नहीं कराई। दिल्ली से सटे नोएडा के निठारी गांव से गुम हुए बच्चों की रिपोर्ट दर्ज करने के दौरान पुलिस ने उन बच्चों के अभिभावकों को जिस तरह आतंकित किया, वह अपने यहां पुलिसिया रवैये का ठेठ उदाहरण है।
मैंने काफी करीब से देखा है कि कैसे पुलिस ने स्कूल जाते हुए एक बच्चे के अपहरण पर उसके परिवार को आतंकित किया था। मान लीजिए, उस बच्चे का नाम नसीम और उसके पिता का नाम आमिर था। आमिर ने अपहरण का मुकदमा दर्ज कराने के लिए आकाश-पाताल एक कर दिया, फिर भी विफल रहा। पुलिस वाले उस पर यह कहकर हंसते थे कि तुम्हारा बेटा खुद ही भागकर किसी आतंकी समूह में शामिल हो गया होगा। मैंने आमिर को गुमशुदा बच्चों के लिए काम करने वाले एक एनजीओ के पास भेजा, लेकिन उन्होंने भी केस दर्ज कराने में कोई मदद नहीं की। मैंने दिल्ली पुलिस के कई वरिष्ठ अधिकारियों से भी बात की, लेकिन वायदा के बावजूद कुछ नहीं हुआ।
गायब होने के छह महीने बाद नसीम अचानक भूत की तरह घर लौट आया। उसके पूरे बदन पर घाव के निशान थे। उसने वह भयानक कहानी बताई कि कैसे नशीला रूमाल सुंघाकर उसे एक पुलिस चौकी के पास मारुति में उठाया गया। उसके बाद उसे एक अज्ञात जगह पर ले जाया गया और साठ से ज्यादा बच्चों के साथ आवासीय इलाके से दूर खेतों के बीच बने एक मकान के बेसमेंट में रखा गया। उन्हें बेसमेंट से बाहर निकलने की मनाही थी और उनसे अवैध बंदूक बनाने वाली एक फैक्टरी में काम कराया जाता था। कुछ अन्य बच्चों के साथ उसने दो बार वहां से भागने की कोशिश की और पकड़े जाने पर बुरी तरह पीटे गए। लेकिन तीसरी बार वह पास के खेत में छिपकर रात भर घिसटते हुए किसी तरह रुड़की रेलवे स्टेशन पहुंचने में सफल रहा।
जब आमिर अपने बेटे को लेकर उसके लौट आने की रिपोर्ट देने थाना गया, तो उस पर मनगढंत किस्सा रचने का आरोप लगाया गया और झिड़कते हुए पूछा गया कि इलाके में और भी बच्चे रहते हैं, लेकिन केवल तुम्हारे ही बेटे का अपहरण क्यों हुआ। पुलिस ने उसके परिवार को आमिर के आतंकी संपर्क की जांच के बहाने तंग करना भी शुरू कर दिया। स्थिति इतनी खराब हो गई कि आमिर ने अपने बेटे को कहीं छिपा दिया। अंतत: उस परिवार ने किसी दूसरे इलाके में जाकर शरण ली। मैंने उसे अपने साथ पुलिस कमिश्नर के पास ले जाने की कोशिश की, ताकि उसका बेटा फंसे हुए अन्य बच्चे को छुड़ाने और उस गिरोह के भंडाफोड़ में मदद कर सके। लेकिन वह पुलिस से कोई बात करने के लिए तैयार नहीं हुआ, क्योंकि अब वह जान चुका था कि पुलिस उस गिरोह से मिली हुई थी और उसके बेटे के लिए बड़ा खतरा साबित हो सकती थी, क्योंकि उसके लौटने पर वे नाराज दिख रहे थे।
देश के ज्यादातर नागरिक, खास तौर से गरीब, नरक से ज्यादा पुलिस थाने से डरते हैं। वे आईएसआई के आतंकियों के बजाय हमारी अपनी पुलिस से कहीं ज्यादा आतंकित रहते हैं। इसका सीधा-सा कारण है-आतंकी एक बार हमला करते हैं, जबकि पुलिस घूस खाने के लिए हर रोज आक्रमण करती है। उनका ज्यादातर समय हफ्ता वसूली, अतिरिक्त कमाई के मौके ढूंढने और अपराधियों के साथ साठगांठ करने में बीतता है। वे खुलेआम सूखी’, ‘गीलीऔर मलाईदार पोस्टिंग’ (पदस्थापन) की बात करते हैं। गीली पोस्टिंग वह है, जो नियमित घूस का मौका देती है, जबकि सूखी पोस्टिंग में वैसी सुविधा नहीं होती।
कांग्रेस ने 2009 के चुनावी घोषणापत्र में देश के हरेक नागरिक की अधिकतम संभव सुरक्षा की गारंटी देने, पुलिस बल को ज्यादा प्रभावी और प्रशिक्षित करने तथा उसकी जवाबदेही को संस्थागत करने का वायदा किया था। लेकिन लगता नहीं कि कांग्रेस को अपने वायदे की याद है। कोई भी राजनीतिक दल पुलिस सुधार को लेकर गंभीर नहीं है, क्योंकि एक बार पुलिस जिम्मेदार और सक्षम हो गई, तो उसका दलगत उद्देश्यों के लिए उपयोग करना आसान नहीं होगा। ऐसे में जरूरी है कि नागरिक संगठन पुलिस सुधार के लिए दबाव समूह बनाएं, ताकि देश और नागरिकों के लिए खतरा बनते पुलिस बलों के व्यापक अपराधीकरण पर रोक लग सके। हम अपने बच्चों को ऐसे असुरक्षित वातावरण में नहीं छोड़ सकते।
इस देश के गरीब लोग हमारी अपनी पुलिस से डरते हैं, जबकि अमीर लोग निजी सुरक्षा व्यवस्था पर ही भरोसा करते हैं