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Friday, April 1, 2011

टीवी-लैपटॉप के बदले वोट की आस


बात कुछ ज्यादा पुरानी नहीं है। साल भर पहले की ही बात है। देश का आम आदमी महंगाई की भट्ठी में तप रहा था। कभी पेट्रोल, कभी सब्जी, कभी दाल तो कभी दूध। हर चीज के लिए हाहाकार मचा हुआ था। अच्छे से अच्छा कमाने वाला भी दस रुपये के नोट की कीमत समझ रहा था। हालांकि स्थिति में आज भी कोई सुधार नहीं हुआ है, लेकिन आम आदमी ने महंगाई को अपनी नियति मान लिया है। ठीक इन्हीं हालात में दक्षिण में राजनीतिक पार्टियों ने घोषणाएं की कि अब 35 रुपये किलोग्राम चावल मुफ्त मिलेगा। स्कूल-कॉलेज जाने वाले छात्रों को लैपटॉप मुफ्त मिलेगा। लड़की शादी करेगी तो उसे 12 हजार से 50 हजार रुपये तक की सहायता मिलेगी। चार हजार रुपये का सोने का मंगलसूत्र भी मिलेगा। और भी न जाने क्या-क्या। सुना तो हर कोई भौचक्का रह गया। तुरंत खासतौर पर उत्तर भारतीयों के दिमाग में आया कि गरीब पैदा होना हो तो दक्षिण भारत में हुआ जाए। यहां उत्तर भारत में क्या रखा है। वोटरों को रिझाने के लिए उत्तर भारत में जब शराब और कंबल बांटे जाते हैं तो हंगामा मच जाता है। राजनीतिक दल एक-दूसरे को नैतिकता का पाठ पढ़ाने लगते हैं तो नुक्कड़ और चाय के ठेलों पर बहस छिड़ जाती है कि फलां दल या नेता तो हर बार यही करता है। चुनाव आयोग भी पुलिस की मदद से ऐसे प्रलोभनों को रोकने का भरसक प्रयास करता है, लेकिन दक्षिण के राज्यों खासतौर पर पर तमिलनाडु के चुनावों में राजनीतिक दलों ने मतदाताओं के सामने जो प्रलोभन रखे हैं, उसे क्या कहा जाए। सत्तारूढ़ द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) ने महिलाओं को मिक्सी या ग्राइंडर देने का वादा किया तो अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (एआईएडीएमके) ने इन दोनों चीजों के अलावा महिलाओं को टेबल फैन भी देने की घोषणा की। डीएमके ने कॉलेज छात्रों के लिए मुफ्त लैपटॉप देने की बात कही तो जयललिता ने कॉलेज छात्र ही नहीं, ग्यारहवीं और बारहवीं के छात्र-छात्राओं को भी लैपटॉप देने की घोषणा की। इसके अलावा शादी के लिए 12 से 50 हजार रुपये की मदद। चार हजार रुपये का सोने का मंगलसूत्र। हर माह 35 किलोग्राम मुफ्त चावल। 20 लीटर बिसलरी पानी की कैन। अब आप कर लीजिए बहस इन पर कि क्या यह सही है या गलत है। क्या यह सारी घोषणाएं मतदाताओं को प्रभावित तो क्या एक दल की ओर खड़ा नहीं कर देती हैं। क्या यह आम आदमी को हतोत्साहित नहीं करती हैं कि वह मेहनत करके कुछ कमाए। आप बहस करते रहिए। अपने निष्कर्ष निकालते रहिए। न राजनीतिक दलों को कुछ फर्क पड़ेगा और न ही इन घोषणाओं का लाभ पाने वाले मतदाताओं को। क्योंकि डीएमके तो अब तक तमिलनाडु के मतदाताओं को कलर टीवी बांट रही थी, जिसका उसने बीते चुनावों में वादा किया था। चुनाव आयोग ने भी दक्षिण के इस पैसे वाले लोकतंत्र के आगे हाथ खड़े कर दिए हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी का कहना है कि वे इस मामले में कुछ नहीं कर सकते हैं, क्योंकि राजनीतिक दलों ने यह सब वादा अपने चुनावी घोषणा पत्र में किए हैं। वे कहते हैं कि वितरण की जाने वाली चीजें प्रत्याशियों के चुनावी खर्च में शामिल हों, तभी आयोग कुछ कर सकता है। अजीब कानून और सोच है आयोग की। खैर, इसमें आयोग की गलती भी नहीं है, क्योंकि संविधान बनाने वाले नेताओं ने उसे इतने ही अधिकार दिए हैं यानी बांटों, लेकिन बताकर बांटो। इसीलिए जब डीएमके के नेता अखबारों में लपेटकर मतदाताओं के घरों में रुपये फेंक रहे थे तो आयोग ने इस पर आपत्ति की। आयोग के नियमों के मुताबिक रुपये दो, लेकिन घोषणापत्र में उल्लेख करके। इन सबमें दक्षिण के नेताओं की ओर से एक बड़ा ही वाजिब सवाल खड़ा किया जाता रहा है। उनका कहना है कि जब बिहार के राजनीतिक दल मतदाताओं को लुभाने के लिए छात्रोंओं को मुफ्त साइकिल देते हैं। राजस्थान में भी राजनीतिक दल ऐसा ही करते हैं। साथ ही जन्म लेने वाली लड़कियों के खाते में हजारों रुपये तक जमा कराए जाते हैं। पंजाब में किसानों को मुफ्त बिजली दी जाती है। तब कोई नहीं बोलता है। ऐसे में वे अपने लोगों को लैपटॉप दे रहे हैं तो उन्हें दिक्कत क्यों हो रही है। उनका कहना है कि वे ज्यादा संपन्न हैं, इसलिए हैसियत के हिसाब से अपने मतदाताओं के लिए कल्याणकारी योजनाएं चलाते हैं। उनका कहना है कि कल को बिहार सरकार अपने छात्रों को लैपटॉप देगी तो उसे प्रगतिशील और 21वीं सदी की सरकार बताया जाएगा, लेकिन यही काम तमिलनाडु करे तो गलत। इन चुनावी प्रलोभनों का हर वह राजनीतिक दल विरोध करता है, जो विपक्ष में खड़ा होता है। अन्नाद्रमुक और यहां तक कि बीजेपी भी डीएमके की इन प्रलोभन आधारित घोषणाओं का विरोध करती थी, लेकिन जैसे ही राज्य में विधानसभा चुनावों की घोषणा हुई तो अन्नाद्रमुक तो छोडि़ए, बीजेपी भी लैपटॉप सरीखी घोषणाएं करने में पीछे नहीं रही। राजनीतिक दल ये सारी घोषणाएं गरीबों के लिए करने का दावा करते हैं, लेकिन किसी राज्य में उसकी आबादी से ज्यादा गरीब हों तो आप इस बंदरबांट को क्या कहेंगे। देश में 10.5 करोड़ राशन कार्डधारी यानी गरीब परिवार हैं। इनमें से तकरीबन आधे यानी कोई पौने पांच करोड़ राशन कार्ड धारी देश के संपन्न और दक्षिण के तीन राज्यों तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश से आते हैं। चूंकि चुनाव तमिलनाडु में हो रहे हैं तो फिलहाल बात तमिलनाडु की ही की जाएगी। तमिलनाडु में राजनीतिक दलों ने जो भी घोषणाएं की हैं, उसका लाभ सभी राशन कार्ड धारियों को मिलेगा। केंद्र सरकार की मानें तो राज्य में 48.63 लाख परिवार गरीबी रेखा से नीचे आते हैं, लेकिन राज्य में राशनकार्ड है दो करोड़ 28 हजार परिवारों के पास। एक परिवार में सदस्यों की संख्या पांच भी मानी जाए तो तमिलनाडु में गरीबों की संख्या होती है 10 करोड़, जबकि 2001 की जनगणना के मुताबिक राज्य में 6.6 करोड़ लोग निवास कर रहे थे। राज्य में 1991-2001 के बीच जनसंख्या की दर 11.5 फीसदी थी। इसे 2001-2011 के बीच भी इतनी ही मानें तो तमिलनाडु की कुल संख्या 7.5 करोड़ से ऊपर नहीं जा सकती, लेकिन राज्य में राशन कार्ड धारी ही 10 करोड़ लोग हैं। एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी उठता है कि जब केंद्र सरकार राज्य को राशन का अनाज सिर्फ 48.63 परिवारों के लिए जारी करती है तो शेष राशन कार्ड धारी परिवारों को अनाज की आपूर्ति कौन करता है। जाहिर है कि राज्य सरकार, जिसका खुलासा बीते साल 25 फरवरी को महंगाई पर लोकसभा में हुई बहस के दौरान डीएमके के नेता टीआर बालू ने भी किया था। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार करीब दो करोड़ राशन कार्ड धारियों में से बीपीएल कार्ड धारकों को एक रुपये प्रति किलो की दर से अनाज उपलब्ध कराती है, जबकि एपीएल कार्डधारियों को 8.6 रुपये प्रति किलो की दर से। बालू ने दावा ठोककर कहा था कि राज्य सरकार यह सब तब करती है, जब केंद्र से उसे अनाज प्रति किलो 15 रुपये के हिसाब से मिलता है। बालू और डीएमके पर ऐसी मेहरबानी के लिए बलिहारी जाया जाए। यह बात अन्नाद्रमुक पर भी लागू होती है, क्योंकि सत्ता में चाहे डीएमके रहे या अन्नाद्रमुक, उनके संपन्न और विकसित होते राज्य में जीडीपी के साथ-साथ वोट के लिए गरीबों (राशन कार्ड धारी) की संख्या भी हर साल बढ़ती जाती है। भले यह उसके कुल मतदाताओं की संख्या से ज्यादा ही क्यों न हो जाए। राज्य में फिलहाल दो करोड़ परिवारों के पास राशन कार्ड हैं। एक परिवार में तीन लोग भी वयस्क मानें तो राज्य में छह करोड़ लोग मत डालने योग्य होते हैं, जबकि चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार राज्य में कुल 4.66 करोड़ ही मतदाता हैं और बीते विधानसभा चुनावों में इसके 71 फीसदी यानी 3.3 करोड़ मतदाताओं ने वोट डाले थे। आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि तमिलनाडु में वोटों की फसल के लिए किस तरह से राशकार्डो की खेती की जाती है। जो बाद में आधार बनते हैं मतदाता पहचान पत्रों के बनने में। इस खेल में सभी राजनीतिक दल लगे हैं। चुनाव आयोग कुछ कर सकता है तो करे। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

ममता का मजबूत मोर्चा


पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच विधानसभा चुनाव के लिए हुए गठजोड़ से परिवर्तन की जो गूंज उठ रही है उससे वाम किला कांप रहा है। बंगाल कांग्रेस के एक धड़े द्वारा गठजोड़ नहीं मानने से भी वाम किले की कंपकंपाहट कम नहीं हो पा रही है, क्योंकि उस धड़े के अलग चुनाव लड़ने पर भी नतीजे पर मामूली असर ही पड़ेगा। वह असर ज्यादा से ज्यादा मुर्शिदाबाद की चार सीटों तक सीमित रहेगा। बाकी बंगाल में विपक्षी गठजोड़ के अटूट रहने से लाल दुर्ग में बेचैनी स्वाभाविक है। वैसे विपक्षी गठजोड़ के उपरांत कांग्रेस की हैसियत तृणमूल कांग्रेस के जूनियर पार्टनर की हो गई है। कहने की जरूरत नहीं कि इसके लिए खुद कांग्रेस जिम्मेदार है। बंगाल कांग्रेस के जो बड़े नेता थे वे अपने-अपने संसदीय क्षेत्रों से बाहर नहीं निकले। बंगाल कांग्रेस के जो दूसरे बड़े नेता थे उनमें कई की तुलना तरबूज से की जाने लगी और आज भी की जाती है। बंगाल की राजनीति में तरबूज विशेषण बेहद जनप्रिय रहा है। तरबूज कांग्रेस के उन नेताओं को कहा जाता रहा है, जो भीतर ही भीतर लाल झंडे का समर्थन करते रहे हैं। छोटे-छोटे व्यक्तिगत लाभों के लिए ये नेता वाम नेताओं से अच्छे संबंध रखते रहे हैं। आज भी यह सिलसिला जारी है। बंगाल कांग्रेस के वर्तमान अध्यक्ष डा. मानस भुइयां तो सार्वजनिक समारोहों में गौतम देव जैसे वाम नेता के साथ अपनी आत्मीयता नहीं छिपाते। ऐसे ही नेताओं के कारण बंगाल कांग्रेस को माकपा की बी टीम कहा जाता रहा है और ऐसे ही नेताओं की देन है कि बंगाल कांग्रेस आज प्राय: साइनबोर्ड के रूप में परिणत हुआ है। कांग्रेस की इस स्थिति के कारण और गनी खां के मालदह, दासमुंशी के रायगंज व अधीर चौधरी के मुर्शिदाबाद में सीमित रहने से तृणमूल कांग्रेस को फैलने का सुनहरा मौका मिला। दूसरी तरफ, तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी ने वाम मोर्चा की नीतियों के खिलाफ अनवरत समझौताविहीन संग्राम कर अपने को वाम मोर्चे के एक मात्र विश्वसनीय विकल्प के रूप में प्रतिष्ठित किया, इसीलिए उन्होंने 294 सीटों वाली बंगाल विधानसभा में पहले 64 और बाद में एक और सीट कांग्रेस को देने का फार्मूला दिया तो कांग्रेस हाईकमान ने उसे भी स्वीकार कर लिया। कहने के लिए इसे ममता के समक्ष कांग्रेस के सम्मान का आत्मसमर्पण भी कह सकते हैं। कांग्रेस के पास कोई चारा भी तो न था। बंगाल के कांग्रेसियों के साथ बैठक कर हाईकमान ने समीक्षा में पाया था कि अकेले लड़ने पर कांग्रेस को कोई लाभ नहीं होगा, उल्टे नुकसान होगा, जबकि 65 सीटों पर लड़ने पर 40 सीटों पर कांग्रेस जीत सकती है। कांग्रेस व तृणमूल कांग्रेस ने 2001 का विधानसभा चुनाव भी मिलकर लड़ा था। तब समझौते के कारण कांग्रेस के 14 विधायकों का टिकट कट गया था। उन विधायकों ने शरद पवार की नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के चुनाव चिन्ह घड़ी पर चुनाव लड़ा। वे सभी उम्मीदवार वोटकटवा साबित हुए थे। इस बार ममता ने एनसीपी के साथ भी चुनावी समझौता कर अपार बुद्धिमत्ता का परिचय दिया है। ममता ने एनसीपी को कूचबिहार की अपनी जीती हुई सीट दिनहाटा दे दी है। तृणमूल कांग्रेस ने एसयूसीआई (सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर आफ इंडिया) के लिए दो सीटें छोड़ी हैं। कांग्रेस, एनसीपी और एसयूसीआई के साथ गठजोड़ कर तृणमूल कांग्रेस ने बंगाल में मिनी संप्रग बना लिया है। इस मिनी संप्रग के पक्ष में परिवर्तन की लहर को तृणमूल कांग्रेस के चुनावी घोषणा पत्र ने भी बढ़ाया ही है। ममता ने एलान किया है कि उनकी पार्टी की सरकार बनती है तो हर दो सौ दिन पर वह जनता के समक्ष सरकार के कामकाज का ब्यौरा रखेंगी। यह एलान नया ही नहीं, अभिनव भी है। इससे ममता की राजनीतिक इच्छाशक्ति का पता चलता है। उन्होंने नारा दिया है कि कृषि हमारी अनुप्रेरणा है और उद्योग चेतना। उन्होंने एक और नारा दिया है-कर्म में दिशा, भविष्य की आशा। ममता ने अपने कर्म से ही अपने को बंगाल के लोगों के भरोसे का साथी बनाया है। दूसरी तरफ माकपा केप्रभुत्व वाले वाम मोर्चे ने गत चौंतीस वषरें के दौरान हर आम चुनाव में जितने चुनावी घोषणा पत्र जारी किए उनमें आधे भी क्रियान्वित हुए होते तो रवींद्रनाथ ठाकुर के 150वें जन्म वर्ष में हम उन्हें उद्धृत कर पाते-आमार सोनार बांग्ला, आमि तोमाय भालोबासी। छह नवंबर 2000 को बंगाल की बागडोर थामने पर जिस बुद्धदेव भट्टाचार्य को माकपा और उसके सहयोगी दलों के साथ ही अधिसंख्य बंगवासियों ने हाथों हाथ लिया था, उसे आज सिंगुर-नंदीग्राम कांडों के जिम्मेदार व्यक्ति के रूप में देखा जा रहा है। बंगाल की जनता द्वारा उन्हें खलनायक के रूप में देखे जाने और दस वर्ष के उनके शासनकाल में दल के भीतर वाम मोर्चा के भीतर और बाहर लगातार उन्हें चुनौतियां मिलती रहने और जनता के साथ उनकी सरकार की दूरी बढ़ने से विपक्षी गठजोड़ के लिए एक साथ कई अनुकूलताएं हैं। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

बांग्लादेशी लिखेंगे प. बंगाल की तकदीर


 प. बंगाल में सरकार का फैसला बांग्लादेशी घुसपैठिये करेंगे। राज्य में मुसलिम मतदाता पहले से निर्णायक रहे हैं। बांग्लादेशी घुसपैठ ने राज्य का जनसांख्यिकी संतुलन ऐसा बदल दिया है कि अब मुसलिम मतदाता ही सूबे में सत्ता तय करेंगे। जम्मू-कश्मीर के बाद आबादी में अनुपात के हिसाब से सबसे ज्यादा मुसलिमों वाले प. बंगाल की राजनीति स्वाभाविक रूप से उन पर ही केंद्रित हो गई है। उनमें भी खास तौर से बांग्लादेशी मुसलमानों का समर्थन हासिल करने के लिए ममता बनर्जी और वामपंथियों में होड़ मची हुई है। ममता अगर मुसलिमों को रेलवे के किराए में छूट दे रही हैं तो प. बंगाल सरकार ने रंगनाथ मिश्र कमेटी की सिफारिशों को लागू कर मुसलिमों को राज्य की नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था कर दी है। मगर मुसलिमों को रिझाने की दौड़ में ममता बनर्जी फिलहाल वामपंथियों से आगे नजर आ रही हैं। खास तौर से वे इलाके जहां, बांग्लादेश घुसपैठ के चलते मुसलिम जनसंख्या में वृद्धि हुई है, उनमें ममता ने पूरी ताकत झोंकी हुई है। ममता ने अपने घोषणापत्र में मुसलिम बहुल एक दर्जन जिलों के लिए सब्जी, फलों, मछलियों और समुद्री भोजन (सी फूड) का व्यापार बढ़ाने और खाद्य प्रसंस्करण के इंतजाम करने का एलान किया है। मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर और बीरभूम समेत इन एक दर्जन जिलों में आजीविका का जरिया जहां सब्जी, फल और मछलियां व समुद्री भोजन है, वहीं इनमें मुसलिम आबादी 30 फीसदी से लेकर 70 फीसदी तक है। इन जिलों में मुसलिम आबादी की बढ़ोतरी दर के 2001 जनगणना के आंकड़े चौंकाने वाले रहे हैं। 1991 से 2001 के दशक में इन जिलों में 35 फीसदी मुसलिम आबादी बढ़ी है। प. बंगाल सरकार के सूत्र और राजनीतिक दल भी मानते हैं कि यह बढ़ोत्तरी दर स्वाभाविक नहीं। बिना घुसपैठ के मुसलिमों की आबादी दर इस अनुपात में नहीं बढ़ सकती। वैसे भी बांग्लादेश की सीमा से सटे प. बंगाल और असम के अलावा बिहार के चंद जिलों में ही इस तरह से मुसलिम आबादी बढ़ी है। प. बंगाल में जिस तरह से वामपंथी काडर ने बांग्लादेशियों के थोक में राशन कार्ड बनवाए और भारतीय नागरिकता दिलाई, उसके बाद 2011 की जनगणना में करीब 10 फीसदी मुसलिम आबादी बढ़ने के आसार हैं। यानी 2001 में करीब 30 फीसदी मुसलिम अब 2011 में करीब 40 फीसदी होंगे, यह बात प. बंगाल प्रशासन खुद मान रहा है। जाहिर है कि ऐसे में इस वोट बैंक के लिए वामपंथियों और ममता पंथियों में मारकाट मची है। नंदीग्राम आंदोलन के दौरान मुसलिम आबादी ममता के साथ हो गई है। इसी तरह उत्तर 24 परगना व नदिया में मतुआ संप्रदाय के बीच भी ममता ने पैठ बना ली है। 1971 के बाद बांग्लादेश से आए इस संप्रदाय की आबादी 60 लाख बताई जाती है। मतुआ कुनबा भी बढ़ता ही जा रहा है। पहले रेहड़ी, रिक्शा या खेतों और समुद्र या नदी के किनारे मजदूरी करते रहे बांग्लादेशी मुसलमानों की संख्या बढ़ी है। कोलकाता में 1991 से 2001 तक 19 फीसदी मुसलमान बढ़े थे, जबकि गैर मुसलिम आबादी मात्र 0.7 प्रतिशत। उस समय कोलकाता में 20 फीसदी मुसलमान थे। मगर अब बांग्लादेश की सीमा से सटे गांवों से कोलकाता में बांग्लादेशी खासी संख्या में बढ़े हैं। एक पूर्व वरिष्ठ नौकरशाह कहते हैं कि इस दफा जनगणना में कोलकाता में मुसलिम आबादी 35 फीसदी से कम किसी कीमत पर नहीं होगी|

भाजपा का अवसरवादी चेहरा


भाजपा विचारधारा को लेकर कभी स्पष्ट नहीं रही। 1977 में जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हुआ तो इसने अपना एजेंडा त्याग दिया। 1980 में जनता पार्टी से अलग भाजपा बनी तो गांधीवादी समाजवाद को सिद्धांत माना गया। 1986 में अयोध्या आंदोलन से जुड़ने की घोषणा के साथ प्रखर हिन्दुत्व का स्वर अंगीकार कर राजनीतिक लाभ लिया पर पार्टी नेतृत्व का बहुमत हमेशा विचारधारा को लेकर संभ्रम का शिकार रहा। इसलिए विकीलीक्स के संदेश में भले जेटली के कथन का जो भी अभिप्राय अमेरिकी राजनयिक ने लगाया, हिन्दुत्व ज्यादातर शीर्ष भाजपा नेताओं के लिए अवसरवादी मुद्दा ही रहा है
भाजपा के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली ने हिन्दुत्व संबधी अपने कथित बयान पर सफाई दे दी है तथा पार्टी व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दोनों ने इसे स्वीकार लिया है। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कहा है कि अमेरिकी राजनयिक ने इसकी गलत व्याख्या की, अरुण जेटली के मुंह से ऐसी बातें निकल ही नहीं सकतीं। संघ कार्यकारी मंडल के सदस्य राम माधव ने भी कह दिया है कि जेटली अपनी सफाई दे चुके हैं, इसलिए इस पर अलग से कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार कांग्रेस एवं अन्य भाजपा विरोधी संगठनों के लिए भले यह भाजपा नेताओं के पाखंड का मुद्दा है, संघ परिवार के नेताओं के लिए यह कोई मुद्दा ही नहीं है। तो क्या अरुण जेटली की सफाई एवं संघ व पार्टी के समर्थन के साथ यह मुद्दा समाप्त हो गया है? नि:स्संदेह, भाजपा एवं संघ नेताओं के लिए यह मुद्दा नहीं हो, पर भाजपा एवं संघ परिवार के सोचने-समझने वाले कार्यकर्ता, विचारधारा के आधार पर भाजपा का समर्थन करने वालों के लिए यह समाप्त नहीं हुआ है। हम नहीं चाहते कि विकीलीक्स के संदेशों के आधार पर देश में राजनीतिक तूफान खड़ा हो, या देश की अन्य अनिवार्य चुनौतियां ताक पर रख हम उसके पीछे भागने लगें। लेकिन इससे एक बार फिर भाजपा की विचारधारा, खासकर हिन्दुत्व व हिन्दू राष्ट्र तथा इसके वरिष्ठ नेताओं का इसके प्रति रुख का मुद्दा सतह पर आ गया है। सबसे पहले विकीलीक्स का संदेश देखें। नई दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास के राजनयिक राबर्ट ब्लेक ने 6 मई 2005 को भेजे एक संदेश में कहा कि जेटली ने उनसे हिन्दुत्व के सवाल पर बातचीत में कहा कि हिन्दू राष्ट्रवाद भाजपा के लिए हमेशा र्चचा का बिन्दु रहेगा। हालांकि उन्होंने इसे एक अवसरवादी मुद्दा बताया। अपनी सफाई में जेटली ने कहा है कि राष्ट्रवाद या हिन्दू राष्ट्रवाद के संदर्भ में अवसरवाद शब्द का उल्लेख न मेरा विचार है और न भाषा। जेटली यह तो मानते हैं कि उन्होंने ब्लेक से कई मुद्दों पर बातचीत की। इनमें आतंकवाद, बांग्लादेश से होने वाली घुसपैठ और नरेन्द्र मोदी को अमेरिका जाने का वीजा न दिए जाने का मसला शामिल है। ध्यान दें कि उन्होंने अपनी सफाई में हिन्दुत्व, हिन्दू राष्ट्र पर ब्लेक से बातचीत में क्या कहा- यह नहीं बताया है। केवल यह कहना कि अवसरवाद शब्द उनका नहीं है, इससे कौन संतुष्ट हो सकता है। जेटली अवसरवाद जैसे शब्द का प्रयोग नहीं करेंगे, इस पर तो विश्वास किया जा सकता है, लेकिन उन्होंने वाकई क्या कहा, यह जानने का अधिकार तो देश को है। अगर गडकरी ने उनसे इस विषय पर बातचीत की है तो उन्हें ही बताना चाहिए कि आखिर अमेरिकी राजनयिक से इन मामलों पर क्या कहा गया। भाजपा ने अपने मान्य दस्तावेजों में केवल हिन्दुत्व शब्द प्रयोग किया है। इसने दस्तावेजों में हिन्दू राष्ट्र शब्द का प्रयोग नहीं किया। हिन्दू राष्ट्र शब्द संघ एवं उससे जुड़े दूसरे अनुशांगिक संगठन करते हैं। हालांकि 1998 तक भाजपा के ज्यादातर नेता हिन्दू राष्ट्र के सवाल पर इसकी व्याख्या करते थे, कभी क्षमायाचक की मुद्रा में अपना बचाव नहीं करते थे। 1998 से पूर्व के चुनाव घोषणा पत्र में सबकी शुरुआत में हिन्दुत्व एवं सांस्कृतिक राष्ट्रीयता शब्द मिलेगा। उसके बाद इनका स्वर बदल गया। शासन में आने के बाद वे कहते तो थे कि अपनी विचारधारा को लेकर क्षमायाचक नहीं हैं, पर व्यवहार में क्षमायाचक ही होते थे। इसमें दो राय नहीं कि स्वयं को जनसंघ का उत्तराधिकारी मानने तथा संघ की पृष्ठभूमि स्वीकार करने के कारण भाजपा की वैचारिक पृष्ठभूमि हिन्दुत्ववादी है। पीछे की बात छोड़ भी दें तो 2004 के लोकसभा चुनाव में पराजय झेलने के बाद पार्टी ने भविष्य के लिए कार्ययोजना नामक दस्तावेज में कहा कि भाजपा हिन्दुत्व की विचारधारा से संचालित आंदोलन का अंग है। इसके पूर्व रायपुर की कार्यकारिणी में हिन्दुत्व को पार्टी की आत्मा कहा गया। यह अलग बात है कि हिन्दुत्व की कभी स्पष्ट राजनीतिक व्याख्या भाजपा ने देश के सामने नहीं रखी। जाहिर है, अयोध्या में राममंदिर निर्माण, समान आचार संहिता, कश्मीर में धारा 370 जैसे मुद्दों पर इनकी प्रखरता के कारण लोगों ने इसे ही हिन्दुत्व का सगुण मुद्दा मान लिया। भाजपा के हिन्दुत्व पर जो प्रश्न होते हैं, उनमें ज्यादातर का संकेत इन्हीं मूल मुद्दों पर उसके नजरिए से होता है। यह ठीक है कि कोई विदेशी आसानी से एक मुलाकात में हिन्दुत्व या हिन्दू राष्ट्र शब्द को नहीं समझ सकता। पश्चिम में जिसे आधुनिक राष्ट्र राज्य कहते हैं उसकी अवधारणा तथा भारतीय परंपरा में राष्ट्र की अवधारणा में मौलिक अंतर है। दोनों के आविर्भाव एवं सशक्त होने की प्रक्रिया भिन्न रही है। यूरोप में राष्ट्र और राज्य समानार्थी हैं, जबकि भारत में दोनों अलग-अलग हैं। राष्ट्र सामान्यत: एक सांस्कृतिक संकल्पना रही है। इसका भूगोल और राजनीति से रिश्ता होना अनिवार्य नहीं था। इसके विपरीत भूगोल एवं राजनीति ही यूरोपीय राज्य का निर्धारक तत्व बना। भारतीय परंपरा में राष्ट्र एक जीवन दर्शन का पर्याय था जिसे लोगों ने जीवन शैली के रूप में अपनाया था। हिन्दुत्व शब्द यहीं पर प्रासंगिक हो जाता है। यद्यपि हिन्दू शब्द भारतीय वांग्मय में काफी समय बाद जुड़ा। वेदों में कहीं हिन्दू, हिन्दू धर्म या हिन्दुत्व नहीं है, लेकिन हिन्दुत्व कह देने से वे सारे सांस्कृतिक, सामाजिक, आध्यात्मिक पहलू स्पष्ट हो जाते हैं जो भारत की सनातन विचारधारा से जुड़े हैं। मूल रूप में हिन्दुत्व किसी उपासना पद्धति, कर्मकांड, मजहब का पर्याय नहीं है। यूरोप या अमेरिका के किसी व्यक्ति को ये बातें समझा पाना कितना कठिन है, इसे आसानी से समझा जा सकता है। लेकिन क्या भाजपा के नेता ही इन शब्दों का वास्तविक अभिप्राय समझते हैं? लालकृष्ण आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे वरिष्ठ नेताओं की हिन्दुत्व पर राय जब-तब देश ने सुनी है। भाजपा के प्रमुख स्तंभ रहे गोविन्दाचार्य की हिन्दुत्व की व्याख्या भी कई बार सुनी है। क्या इस समय भाजपा नेताओं के हिन्दुत्व या हिन्दू राष्ट्र पर विचार देश ने सुने हैं? वाजपेयी सरकार के समय अध्यक्ष के रूप में वेंकैया नायडू ने यह नारा ही दे दिया था- एक हाथ में भाजपा का झंडा और दूसरे में एनडीए का एजेंडा। बाद में सभी नेताओं के मुंह से निकलने लगा, 'हिन्दुत्व हमारे लिए आस्था का विषय है, राजनीति का नहीं।' ऐसी पंक्ति से कोई क्या अर्थ लगाएगा? सोचिए, अगर जेटली ने ऐसा ही कुछ अमेरिकी राजनयिक से कहा हो तो वह इसका अर्थ तो अवसरवाद के लिए हिन्दुत्व को अपनाए जाने के रूप में ही लेगा। भाजपा के संदर्भ में यह सच नहीं भूलना चाहिए कि यह विचारधारा को लेकर शत-प्रतिशत स्पष्ट नहीं रही है। 1977 में जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हुआ तो इसने अपना एजेंडा त्याग दिया। 1980 में जनता पार्टी से अलग होकर भाजपा बनी तो हिन्दुत्व शब्द का प्रयोग नहीं था। गांधीवादी समाजवाद को सिद्धांत माना गया।1984 लोकसभा चुनाव के बाद अवश्य पार्टी ने चेहरा बदलने की कोशिश की और 1986 में अयोध्या आंदोलन से जुड़ने की घोषणा के साथ प्रखर हिन्दुत्व का स्वर अंगीकार किया जिसका राजनीतिक लाभ भी उसे मिला, पर पार्टी नेतृत्व का बहुमत हमेशा विचारधारा को लेकर संभ्रम का शिकार रहा। आडवाणी ने 1998 में साफ कह दिया कि देश को आइडियोलोजी नहीं आइडियलिज्म यानी विचारधारा नहीं आदर्शवाद चाहिए। उसके बाद उन्होंने कई बार कहा कि शासन संचालन में विचारधारा प्रासंगिक नहीं है। अयोध्या में राम मंदिर का शिलान्यास बिहार के जिस कामेश्वर चौपाल से कराया गया, उन्होंने कई साल पूर्व एक बातचीत में कहा था कि हम लोगों को तो किसी मंच पर चढ़ते ही यह कहते हुए श्रीहीन कर दिया जाता था कि आप अयोध्या मामले पर कुछ नहीं बोलिएगा। क्या ये उदाहरण हिन्दुत्व को राजनीतिक अवसरवाद के रूप में इस्तेमाल करने के प्रमाण नहीं हैं? इसलिए विकीलीक्स के संदेश में भले जेटली के कथन का जो भी अभिप्राय अमेरिकी राजनयिक ने लगाया, हिन्दुत्व ज्यादातर शीर्ष भाजपा नेताओं के लिए अवसरवादी मुद्दा ही रहा है।