श्रीनगर मेरी जड़ें भी यहीं कश्मीर में हैं। मैं भी कश्मीरी ही हूं। आप लोगों का दु:ख और तकलीफ भी मेरी ही है। मैं यहां किसी प्रकार की सियासत करने नहीं आया। इन भावुक शब्दों के साथ कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने सोमवार को यहां कश्मीर विश्वविद्यालय में चुनिंदा छात्रों के साथ अपना संवाद बनाने का प्रयास किया। वर्ष 2009 के बाद दूसरी बार कश्मीर पहुंचे कांग्रेस के युवराज का युवाओं से यह पहला सीधा संवाद था जो विश्वविद्यालय के कनवोकेशन हॉल में हुआ। हालांकि वह बीते साल भी राज्य के दौरे पर आए थे, लेकिन तब उनकी यात्रा सिर्फ लद्दाख तक ही सीमित रही थी। कांग्रेसी सांसद ने हर सवाल को मुस्कुराकर झेला। जब एक छात्र ने कहा कि आपको क्या पता है कि अपने मां-बाप को गंवाने का दर्द क्या होता है, मैं पांच साल का था जब कश्मीर में जारी हिंसा ने मुझसे मेरे बाप का साया छीन लिया। हम कश्मीरियों को रोज तलाशी, नाकेबंदी झेलनी पड़ती है। सिर्फ कश्मीर में ही नहीं कश्मीर से बाहर भी कश्मीरियों को कैसे तंग किया जाता है, यह तो आपको पता ही होगा। एक अन्य युवक ने कहा कि आप पिछले साल कहां थे जब यहां सड़कों पर कश्मीरी नौजवानों को सुरक्षाबलों द्वारा पीटा जा रहा था और उस दौरान करीब 120 नौजवान मारे गए थे। इस पर राहुल गांधी ने कहा कि मैं जानता हूं कि अपनों को गंवाने का दर्द क्या होता है। मैं 14 साल का था जब मेरी दादी शहीद हुई और उसके सात साल बाद मेरे पिता को भी अपनी जान देनी पड़ी। राहुल हजरत बल दरगाह भी पहुंचे। पंचायतों के युवा पंच-सरपंचों के सम्मेलन को संबोधित करने के लिए शेर-ए-कश्मीर इंटरनेशनल कांफ्रेंस सेंटर पहुंचे। उन्होंने कहा कि मजबूत पंचायती राज व्यवस्था ही सही मायनों में एक मजबूत भारत और एक मजबूत लोकतंत्र की रीड की हड्डी है
Tuesday, September 27, 2011
राज्यपाल को बिल रोकने का हक नहीं
भाजपा शासित राज्यों के राज्यपालों के समक्ष बरसों से लंबित तमाम विधेयकों पर चिंता जताते हुए राज्यसभा में प्रतिपक्ष के नेता अरुण जेटली ने कहा है कि राज्य के संवैधानिक मुखिया को विधेयक को लटकाए रखने का हक नहीं है। बिहार के राज्यपाल का बिना नाम लिए बगैर उन्होंने कहा कि बिल यदि एक बार लौटाया जाता है तो दूसरी बार भेजने पर उस पर सहमति देना बाध्यता है। गलत तरीके से विधेयकों को रोकने की नई परिपाटी शुरू होने पर चिंता जताते हुए जेटली ने कहा कि इससे न्यायपालिका का हस्तक्षेप हो सकता है। उन्होंने इसको लेकर केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मंत्रिपरिषद की सिफारिश राजभवनों में पड़ी है। बिहार विधान सभा उप भवन में विधान परिषद व विधान सभा सदस्यों के लिए आयोजित दो दिवसीय प्रबोधन कार्यक्रम में बोलते हुए लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने सदन की कार्यवाही में व्यवधान डालने के बदले उच्चस्तरीय बहस व चर्चा करने पर बल दिया है। उन्होंने कहा कि शासन व्यवस्था में कार्यपालिका की विधायिका के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सदन में प्रश्न पूछना ऐसा साधन है जिसका विकल्प नहीं है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि संसदीय लोकतंत्र में झिझक नहीं होनी चाहिए। पहला अवसर मिले तो उसका सदुपयोग किया जाए। संसदीय व्यवस्था में अपना स्थान प्राप्त करने के लिए अध्यक्ष की ओर टकटकी लगाना पड़ता है। नजर अध्यक्ष की ओर हो व कुछ भी बोला जाए तो अध्यक्ष की ओर नजर रखकर बोलें। उन्होंने प्रबोधन कार्यक्रम का महत्व बताते हुए कहा कि इससे जनप्रतिनिधि अपने दायित्व का सही तरीके से निर्वाह करेंगे। उनके अनुसार सदन की कार्यवाही सरस होनी चाहिए। टोकाटोकी से सदन की कार्यवाही को गति मिलती है। लोक सभा के पूर्व महासचिव जीसी मल्होत्रा ने कहा कि राज्यपाल को किसी विधेयक को रोकने का अधिकार नहीं है। राज्यपाल निर्वाचित नहीं होते हैं। वह निर्वाचित संस्था के अधिकार को नहीं रोक सकते हैं
भुल्लर पर अकाली दल लाएगा माफी प्रस्ताव
विधानसभा चुनाव की दस्तक के बीच खालिस्तानी आतंकी प्रो. देविंदर पाल सिंह भुल्लर को फांसी की सजा से माफी फिर से एक चुनावी मुद्दा बन गई है और सत्तारूढ़ अकाली दल और कांग्रेस के बीच राजनीति तेज हो गई है। राष्ट्रपति की ओर से भुल्लर की दया याचिका भले ही खारिज हो चुकी हो, लेकिन राजनीति के लिए वह एक मोहरा बन गया है। चुनावी माहौल में राज्य सरकार ने विधानसभा के आगामी सत्र में भुल्लर की सजा माफी के लिए प्रस्ताव लाने की बात कही है। वहीं कांग्रेस ने भाजपा और अकाली दल की नीयत पर सवाल खड़ा कर दिया है। मालूम हो कि इस मुद्दे पर अकाली दल को भाजपा से मदद नहीं मिलेगी। ऐसे में मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने कांग्रेस से मदद मांगने की बात कही थी। मगर कांग्रेस अध्यक्ष कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भी उलटी फांस लगा दी। कैप्टन ने आरोप लगाया कि अकाली-भाजपा सरकार ने अदालत में शपथ देकर भुल्लर को पक्का अपराधी और खतरनाक आतंकवादी बताया था। ऐसे में अकाली दल राजनीतिक स्टंट कर रहा है। दरअसल भुल्लर का जो भी हो, फिलहाल अकाली दल और कांग्रेस में यह होड़ मची है कि चुनाव के वक्त वह भुल्लर की ज्यादा हमदर्द दिखे। पंजाब विधानसभा में अकाली दल के 49 विधायक हैं, जबकि कांग्रेस के 43 विधायक। 117 सदस्यीय विधानसभा में यह प्रस्ताव पारित कराने के लिए अकाली दल को 60 विधायकों की जरूरत होगी। यही वजह है कि भाजपा से मिले जवाब के बाद अकाली दल कांग्रेस से मदद की उम्मीद लगा रहा था
यूपी में एक साल के लिए लटक सकते हैं निकाय चुनाव
लखनऊ राज्य निर्वाचन आयोग भले ही 31 दिसंबर तक निकाय चुनाव कराने को तैयार हो, लेकिन वार्डो के आरक्षण के बहाने मायावती सरकार 31 दिसंबर तक चुनाव टलवाने में कामयाब हो गई तो अगले साल अक्टूबर-नवंबर से पहले चुनाव संभव नहीं होंगे। सरकार उससे पहले चुनाव चाहेगी भी तो राज्य निर्वाचन आयोग कराने की स्थिति में नहीं रहेगा। राज्य निर्वाचन आयोग ने निकायों का कार्यकाल खत्म होने से पहले उसके चुनाव कराने की तैयारी चार माह पहले से कर रखी है। यद्यपि राज्य सरकार के टाल-मटोल से मौजूदा निकायों के खत्म हो रहे कार्यकाल (20 नवंबर तक) से पहले चुनाव की उम्मीद खत्म होती जा रही है। सरकार वार्डो के आरक्षण की प्रक्रिया नए सिरे से शुरू कर चुनाव को टालने की कोशिश में है। निर्वाचन आयोग के मुताबिक सरकार ने भले ही वार्ड आरक्षण संबंधी तैयारियां पूरी न होने के चलते उसके 24 सितंबर से पांच नवंबर के दरमियान निकाय चुनाव कराने वाले कार्यक्रम पर सहमत नहीं दी है, लेकिन वह तो 31 दिसंबर तक चुनाव करा सकते हैं। संयुक्त निर्वाचन आयुक्त जेपी सिंह का कहना है कि 31 दिसंबर तक चुनाव कराने में आयोग को कोई दिक्कत नहीं है बशर्ते 15 नवंबर से पहले सरकार चुनाव की अधिसूचना जारी करने को तैयार हो। गौर करने की बात यह है कि आयोग को चुनावी प्रक्रिया पूरी करने के लिए 40-45 दिन चाहिए ही होते हैं। सन् 2006 में निकाय चुनाव की प्रक्रिया 25 सितंबर को शुरू कर आयोग ने 6 नवंबर को मतगणना कराकर 13 नवंबर को निकायों के गठन की अधिसूचना जारी कर दी थी। सिंह का साफ कहना है कि यदि 31 दिसंबर तक चुनाव नहीं होते हैं तो उसके लिए अगले वर्ष अक्टूबर-नवंबर से पहले चुनाव संभव नहीं होंगे। कारण है कि आयोग को पहली जनवरी को 18 वर्ष पूरे करने वालों के नाम मतदाता सूची में शामिल करने के लिए सूची का नए सिरे से पुनरीक्षण करना होगा जिसमें वैसे तो छह माह लगते हैं लेकिन बीच में विधानसभा चुनाव होने से आठ माह तक लग सकते हैं। यही नहीं तब तक जनगणना-2011 के अंतिम आंकड़े भी आ जाएंगे जिसके आधार पर सरकार को नए सिरे से निकायों का परिसीमन व आरक्षण की प्रक्रिया पूरी करनी होगी। ऐसे में साफ है कि इधर 31 दिसंबर तक निकाय चुनाव न होने की दशा में अगले वर्ष अक्टूबर-नवंबर से पहले चुनाव संभव नहीं होंगे
Wednesday, September 21, 2011
निर्वाचन की नई कसौटी
जीवंत लोकतांत्रिक चुनाव सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक लोकाचार से प्रभावित होता है। अपने देश में शुरुआती चुनावों में राजनीतिक स्वाधीनता के संघर्ष के प्रभाव में चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों के आधार पर होता था। सोशल इंजीनियरिंग जो अभी तक जारी है, बाद के दिनों में हावी हुई। आखिर में आर्थिक विकास का मुद्दा राष्ट्रीयता की भावना और सोशल इंजीनियरिंग पर भारी पड़ा। दिल्ली, गुजरात, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और हाल ही में बिहार में सत्ता विरोधी रुझानों को धता बताते हुए सत्तारूढ़ दलों की चुनावों में विजय से इस बात की पुष्टि होती है। अब मतदान केंद्र में जाकर इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन का बटन दबाने वाले आम आदमी के लिए आर्थिक विपन्नता और असमानता पहले से कहीं अधिक मायने रखने लगी है। वह उस उम्मीदवार या पार्टी का चुनाव करता है जो उसके आर्थिक जीवन को बेहतर बना सकती है। कुछ अन्य राज्यों के साथ-साथ 2012 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। एक बार फिर मतदाता अपने जनप्रतिनिधियों का चुनाव करंेगे। वे क्या चुनते हैं, यह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इसकी प्रबल संभावना है कि उत्तर प्रदेश में पिछले पांच वर्षो के दौरान विकास या विकासहीनता का मुद्दा आत्मघोषित सामाजिक इंजीनियरिंग के मुद्दे पर भारी पड़ेगा। उत्तर प्रदेश की जीडीपी वृद्धि दर पर गौर करें तो पता चलता है कि यह राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। तथ्य यह है कि उत्तर प्रदेश पिछले दस वर्षो के दौरान किसी भी वर्ष में जीडीपी वृद्धि दर के मामले में शीर्ष तीन राज्यों की सूची में शामिल नहीं रहा है। भारत और उत्तर प्रदेश की जीडीपी वृद्धि दर में दो से तीन प्रतिशत का अंतर पिछले पांच वर्षो में देखने को मिल रहा है। अगर इसमें नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गाजियाबाद का अंशदान घटा दें तो यह अंतर और भी अधिक हो जाएगा। यह कहना गलत नहीं होगा कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के तहत आने वाले इन इलाकों के विकास का अधिक लाभ उत्तर प्रदेश के निवासियों के बजाय दिल्लीवासियों को मिला है। उत्तर प्रदेश में प्रति व्यक्ति जीडीपी का औसत पांच प्रतिशत से भी कम है, जबकि भारत का औसत करीब 7.5 फीसदी है। इससे पता चलता है कि उत्तर प्रदेश के लोगों की आर्थिक स्थिति अन्य राज्यों के निवासियों के मुकाबले खराब है। वास्तव में, उत्तर प्रदेश की विकास दर भारत की विकास दर की तुलना में गिर रही है। आर्थिक विकास को बहुत से पहलू प्रभावित करते हैं। हालांकि इनमें से चार पहलू ऐसे हैं जिनका प्रभाव सबसे अधिक पड़ता है। ये हैं-मानव पूंजी की गुणवत्ता, निजी निवेश की मात्रा, ढांचागत सुविधाओं की गुणवत्ता व विस्तार तथा सामाजिक व्यवस्था। राजनीतिक स्वतंत्रता के समय और उसके दो दशक बाद तक उत्तर प्रदेश में अन्य राज्यों की अपेक्षा अधिक प्रतिष्ठित शैक्षिक, तकनीकी और प्रोफेशनल संस्थान थे। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, आइआइटी कानपुर, किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज लखनऊ ऐसे ही कुछ नाम हैं, जिनकी चमक देश के अन्य संस्थानों से कहीं अधिक थी। पूरे देश से छात्र उत्तर प्रदेश में पढ़ने के लिए आते थे। आज आर्थिक रूप से समर्थ राज्य से बाहर के लोग आइआइटी कानपुर को छोड़कर उत्तर प्रदेश के किसी शिक्षण संस्थान में अपने बच्चों को पढ़ने के लिए भेजना पसंद नहीं करते। यही नहीं, उत्तर प्रदेश काम करने के लिहाज से भी सबसे घटिया राज्यों में शामिल है। उत्तर प्रदेश में निवेश की दर भी तेजी से गिर रही है। एक समय भारत के पांच शीर्ष औद्योगिक शहरों में शामिल कानपुर आज एक मृत शहर सा नजर आता है। आगरा, इलाहाबाद, लखनऊ और वाराणसी जैसे सुप्रसिद्ध शहरों में बहुत कम आधुनिक औद्योगिक और व्यावसायिक इकाइयां लग रही हैं। निवेश के निचले स्तर के कारणों का अनुमान लगाना कठिन नहीं है। उत्तर प्रदेश में ढांचागत सुविधाओं, चाहे वे भौतिक हों या सामाजिक, की दशा दयनीय है। सड़कें गड्ढों से भरी हैं, ट्रेनें जगह-जगह रुक-रुक कर चलती हैं और हवाई अड्डे बहुत कम और बदतर हैं। स्वास्थ्य, स्वच्छता सुविधाएं और पानी की आपूर्ति बदहाल है और नागरिक जीवन की गुणवत्ता अफ्रीका के पिछड़े हुए देशों से भी गई-बीती है। प्रशासन का आकार तो विशाल है, किंतु इसमें सक्षमता नहीं है। यह अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता। पारिस्थितिक तंत्र हितकारी नहीं है। सुधार की संभावना दूर-दूर तक दिखाई नहीं देतीं। यहां योजनाओं की घोषणाओं पर जोर है, न कि उनके क्रियान्वयन पर। सामाजिक व्यवस्था, जिसके दायरे में जान-माल व स्वतंत्रता की सुरक्षा, नागरिकों में आपसी सौहार्द्र, आर्थिक अवसरों की संभावना और बिना परेशानी के कामकाज की सुविधा शामिल हैं, भी निराश-हताश करती है। यहां तक कि बिहार, जहां कभी जंगल राज बताया जाता था, बहुत तेजी से तरक्की की सीढि़यां चढ़ रहा है। उत्तर प्रदेश में सामाजिक व राजनीतिक हालात लगातार बिगड़ रहे हैं। अक्सर यहां काम देरी से होता है या फिर होता ही नहीं। काम में न केवल देरी होती है, बल्कि वे होते भी नहीं हैं। विडंबना यह है कि इसके बारे में कहीं कोई चिंता नहीं दिखाई देती। लोगों को सुविधाओं से वंचित करने के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन भी सुनाई नहीं देते। कुल मिलाकर यहां के समाज में मायूसी और विषाद घर कर चुका है। गरीबी में जीवनयापन कर रहे लोगों का असंतोष और विरोध समझ में आता है। इसकी प्रतिक्रिया होनी ही है। एक खामोश क्रांति वातावरण में फैल सकती है। विधायिका और राजनीतिक कार्यपालिका में जगह बनाने के दावेदार लोग यदि आर्थिक खुशहाली को अपना घोषणापत्र बनाएं तो वे अपना भला कर सकते हैं। खोखले वायदे अब काम नहीं आने वाले। वितरण प्रणाली में सुधार और जवाबदेही के ढांचे को मजबूत बनाने के तौर-तरीके भी एजेंडे में शामिल होने चाहिए। राजनीतिक दल अपने चुनावी कौशल और नारेबाजी की राजनीति के साथ-साथ सामाजिक समीकरणों के सहारे सफल होने की कोशिश करेंगे। इसके बजाय उन्हें जमीन पर कान लगाकर फुसफुसाहट सुननी चाहिए, जमीनी सच्चाई का सामना करना चाहिए और उन्हें मुद्दों का रूप देकर अपने समाधान के साथ मतदाताओं के पास जाना चाहिए। जो लोग सकारात्मक सोच के साथ ऐसा करेंगे उनके जीतने की संभावना अन्य लोगों की अपेक्षा अधिक होगी। समय तेजी से भाग रहा है। उम्मीदवारों को तेजी से कार्य करना चाहिए और उस राह पर अपने कदम बढ़ाने चाहिए जहां से अभी तक कम लोग गुजरे हैं। (लेखक सेबी और एलआइसी के पूर्व अध्यक्ष हैं
मुंडा को सुरक्षा में कोताही बर्दाश्त नहीं
रांची मुख्यमंत्री द्वारा सचिवालय में गृह विभाग की आननफानन में बुलाई गई बैठक में पुलिस अधिकारियों की खूब क्लास लगी। मुख्यमंत्री ने जहां जिलों से मासिक रिपोर्ट मुख्यालय को नहीं मिलने पर नाराजगी जताई वहीं अफसरों को स्पष्ट हिदायत दी कि इसमें कोई कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने इसे अनुशासनहीनता करार देते हुए कहा कि शिथिलता और लापरवाही करने वाले अफसरों के खिलाफ कार्रवाई होगी। उन्होंने बैठक में निर्देश दिया कि भूमि हड़पने, एससी-एसटी से जुड़े मामलों, महिला और बाल अत्याचार से जुड़े मुकदमे जल्द निपटाने की जरूरत है। मुख्यालय से इसकी समय-समय पर मानीटरिंग आवश्यक है। मुख्यमंत्री ने संगठित गिरोहों पर धावा बोलने का आदेश देते हुए कहा कि एक अभियान चलाकर इनका खात्मा करें। मुख्यमंत्री का दबाव इस बात को लेकर था कि कार्यकुशल सिपाहियों को प्रशिक्षित करें ताकि आम आदमी को यह अहसास रहे कि पुलिस उनकी सुरक्षा में हमेशा तत्पर है। मुंडा ने बताया कि उन्होंने अपने स्तर से केंद्रीय गृह मंत्रालय को पत्र भेजकर अनुरोध किया है कि सक्षम पुलिसकर्मियों को मेरू स्थित बीएसएफ कैंप में प्रशिक्षण दिया जाए
मोदी जैसों का कद बढ़ना शुभ संकेत नहीं
नई दिल्ली गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के तीन दिन के सद्भावना उपवास के फायदों को लेकर भाजपा गदगद हो सकती है, लेकिन कांग्रेस ने इसे बीते दस साल में भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा पाखंड करार दिया है। पार्टी ने यहां तक कह दिया कि है कि चूंकि मोदी देश की सामाजिक बनावट और समन्वित स्वरूप को ही नहीं स्वीकारते, लिहाजा उनके जैसे नेताओं का कद बढ़ना देश के लिए शुभ संकेत नहीं है। कांग्रेस महासचिव एवं मीडिया विभाग के चेयरमैन जनार्दन द्विवेदी ने पत्रकारों के एक सवाल के जवाब में कहा, मोदी का उपवास भाजपा एवं राजग का सिरदर्द है। उससे संप्रग पर कोई फर्क नहीं पड़ता। भाजपा की ओर से मोदी को भविष्य के प्रधानमंत्री के रूप में पेश करने से धर्मनिरपेक्ष और गैर धर्मनिरपेक्ष लोगों के ध्रुवीकरण के मद्देनजर क्या कांग्रेस खुश है? द्विवेदी ने कहा, बिल्कुल नहीं। मोदी जैसों का कद बढ़ना देश के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। लिहाजा कांग्रेस के प्रसन्न होने का सवाल ही नहीं पैदा होता। उपवास पर राजग के घटक दलों के अलग-अलग बयानों पर उन्होंने कहा, अगर उसमें जदयू और शिवसेना नहीं शामिल हुईं, तो राजग है कहां? दरअसल भाजपा के प्रमुख नेता अपने-अपने प्रभुत्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं। आडवाणी की रथयात्रा हो या फिर भाजपा अध्यक्ष के पैंतरे, यह सब उसी का हिस्सा है। उसी क्रम में मोदी भाजपा पर प्रभुत्व के लिए उपवास का नाटक कर रहे थे। इसमें कोई ताज्जुब नहीं है। कांग्रेस महासचिव ने कहा कि उपवास पर बैठे नरेंद्र मोदी ने अपनी छवि ठीक करने के प्रयास में चाहे जो कहा हो, समाज का कोई भी समुदाय यह नहीं मान सकता कि वह अंतरात्मा से जाति और सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ हैं। भाजपा में कुछ लोग मोदी के बिना राजनीति की कल्पना नहीं कर सकते। मोदी का ढोल बजाना उन लोगों की मजबूरी है। दरअसल जिस तरह भाजपा कर्नाटक में मजबूर थी, कुछ मामलों में गुजरात में भी उसकी वही स्थिति है
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