मां-माटी-मानुष का नारा देकर पश्चिम बंगाल में वामपंथी शासन का अंत करने वाली तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी ने शुक्रवार को दोपहर एक बजकर एक मिनट पर मुख्यमंत्री का कार्यभार संभाल लिया। राजभवन में आयोजित भव्य समारोह में राज्यपाल एमके नारायणन ने ममता को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई। बॉर्डर वाली सादी-सफेद साड़ी पहनकर राजभवन पहुंचीं ममता ने बांग्ला भाषा में शपथ ली। वह राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री हैं। उनके अतिरिक्त 37 अन्य मंत्रियों ने भी शपथ ली, जिसमें केवल दो कांग्रेस कोटे के हैं। ममता ने शपथ के लिए समय खुद तय किया था। इसके लिए वह मां गायत्री देवी के पांव छूकर घर से निकलीं और रास्ते में उन्होंने कालीघाट के प्रख्यात कालीमंदिर में दर्शन किए। बुलेटप्रूफ कार को छोड़ कर जिस पुरानी काली सैंट्रो कार से वह चलती थीं, उसी कार से दोपहर करीब 12.50 बजे राजभवन पहुंचीं। ममता ने जैसे ही उत्तरी द्वार से राजभवन में प्रवेश किया, बाहर मौजूद हजारों समर्थकों ने नारेबाजी करके अपनी खुशी का इजहार किया। समारोह में ममता सहित 38 मंत्रियों ने शपथ ली। तृणमूल ने 31 कैबिनेट मंत्री और चार राज्यमंत्री बनाए हैं। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष मानस भुइयां व अबू हेना को कैबिनेट मंत्री बनाया गया है। अधिकांश मंत्रियों ने बांग्ला भाषा में ही शपथ ली, जबकि दो लोगों ने अंगे्रजी और एक-एक ने उर्दू व संथाली में शपथ ली। किसी ने भी हिंदी में शपथ नहीं ली। तृणमूल कांग्रेस के कई मंत्रियों ने ईश्वर को साक्षी मानकर पद और गोपनीयता की शपथ ली। इससे पहले वामपंथी सरकारों के मंत्री संविधान के प्रति निष्ठा के नाम पर शपथ लेते थे। शपथ ग्रहण समारोह में केंद्रीय वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी, केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम, रक्षामंत्री एकेएंटनी, पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य, पश्चिम बंगाल वाममोर्चा के चेयरमैन विमान बोस समेत कई महत्वपूर्ण लोग उपस्थित थे। पैतृक आवास बना मुख्यमंत्री निवास ममता बनर्जी के शपथ ग्रहण करते ही 30बी, हरीश चटर्जी स्ट्रीट स्थित टाली बाड़ी, का उनका पैतृक निवास शुक्रवार से मुख्यमंत्री निवास में तब्दील हो गया। नई मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सरकारी निवास की सुविधा लेने से इंकार करते हुए अपने पुराने घर में ही रहने का फैसला किया है जो उनके संघर्ष के दिनों का गवाह रहा है। इसी के चलते सरकार ने इसे मुख्यमंत्री आवास बनाया है। उमड़े समर्थक, दीदी की अंगुली फटी मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद राजभवन से राइटर्स बिल्डिंग (राज्य मुख्यालय) तक की ममता बनर्जी की पदयात्रा के दौरान उनका साथ देने के लिए शुक्रवार को जनसैलाब उमड़ पड़ा। आधा किलोमीटर से कुछ ज्यादा लंबे इस रास्ते में भीड़ के चलते सुरक्षा के लिए किए गए सारे इंतजाम ध्वस्त हो गए। पुलिस की लगाई बेरिकेडिंग कई जगह लोगों के धक्के से टूट गई। इस दौरान समर्थक से गुलदस्ता ले रहीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की धक्का लगने से अंगुली भी फट गई, मुंह में अंगुली लगाकर उन्होंने रक्त प्रवाह रोका। इस सबसे ममता के उत्साह में कोई कमी नहीं आई। सड़क के दोनों ओर, घरों की बालकनी और पेड़ों पर चढ़कर लोगों ने अपनी मुख्यमंत्री का दीदार किया। ममता ने भी कई स्थानों पर रुककर लोगों के अभिनंदन को स्वीकार किया और उनसे बातें कीं। भीड़ का आलम यह था कि करीब दस मिनट के इस पैदल रास्ते को तय करने में ममता को तीस मिनट लगे। दिग्गजों को हराने वालों को ईनाम पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य और पूर्व वित्त मंत्री असिम दासगुप्ता को हराने वाले मनीष गुप्ता और अमित मित्रा को मंत्रिमंडल में मंत्री पद का ईनाम दिया गया है। पूर्व मुख्य सचिव गुप्ता और फिक्की के पूर्व महासचिव मित्रा क्रमश: जादवपुर और खरदा से चुनाव जीते थे। पूर्व उद्योग मंत्री निरुपम सेन व रवि रंजन चट्टोपाध्याय व गौतम देव को हराने वाले बृत्य बसु को भी ममता ने अपने मंत्रिमंडल में जगह दी है। ममता ने मित्रा को वित्त मंत्रालय और पार्थ चटर्जी को वाणिज्य, उद्योग और संसदीय मामलों संबंधी मंत्रालय सौंपा है। याद रहे सिद्धार्थ बाबू राजभवन में जब ममता बनर्जी मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रही थीं तो निश्चित रूप से उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय की कमी खल रही होगी। जिन्होंने पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा के सफाए और उनके मुख्यमंत्री बनने का सपना देखा था। सन 1977 में उन्हीं के नेतृत्व वाली कांग्रेस की सरकार को हटाकर पश्चिम बंगाल में ज्योति बसु मुख्यमंत्री बने थे। सिद्धार्थ बाबू का बीती छह नवंबर को निधन हो गया। ममता उनका बेहद सम्मान करती थीं और समय-समय पर उनसे सलाह-मशविरा लेती थीं। 34 वर्षों बाद फिर गैर-कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी ने शुक्रवार को राजभवन में शपथ पत्र पढ़ने के बाद जैसे ही जरुरी कागजात पर हस्ताक्षर किए, बंगाल को 34 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद फिर से एक गैर-कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री ने सत्ता संभाल ली। परिवर्तन की इस लहर से पहले तक सिद्धार्थ शंकर राय राज्य के अंतिम गैर-कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री थे जो 1972 में कांग्रेस के बंगाल की सत्ता में आने पर उस वर्ष 9 मार्च को मुख्यमंत्री बने और 21 जून, 1977 तक पदभार संभाला। वाम मोर्चा को 1977 में भारी जनादेश मिलने के बाद ज्योति बसु ने राज्य की कमान संभाली। उन्होंने 21 जून, 1977 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और 23 वर्षों से अधिक समय तक इस पद पर बने रहने का विश्व रिकार्ड कायम किया। उम्र और अस्वस्थता के कारण बसु ने 6 नवंबर, 2000 को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और उनकी जगह बुद्धदेव भटटचार्य मुख्यमंत्री बने और एक दशक से अधिक समय तक पदभार संभाला। राज्य में 34 वर्षों तक वाम मोर्चा का एकछत्र राज रहा, लेकिन इस बार के विधानसभा चुनाव में चली परिवर्तन की आंधी में वाममोर्चा तिनके की तरह उड़ गया।
Wednesday, May 25, 2011
Sunday, May 22, 2011
केंद्र की कठपुतलियां
लेखक राज्यपाल की केंद्रीय सत्तादल के प्रति वफादारी को कर्नाटक संवैधानिक संकट की वजह बता रहे हैं….
कांग्रेस अजब-गजब संयोगों का पर्याय है। प्रधानमंत्री अर्थशास्त्र के विद्वान हैं लेकिन देश मुद्रास्फीति और महंगाई की गिरफ्त में है। वह ईमानदार कहे जाते हैं लेकिन पूरी सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी हुई है। विधिमंत्री रहे प्रख्यात विधिवेत्ता कर्नाटक के राज्यपाल हंसराज भारद्वाज संविधान प्रमुख होकर भी बहुमत प्राप्त राज्य सरकार की बर्खास्तगी पर आमादा हैं। वह उच्चतम न्यायालय की सदन को ही विश्वासमत का श्रेष्ठ स्थान बताने की स्थापना से असहमत हैं। वह सदन आहूत करने और विश्वासमत लेने के मुख्यमंत्री के अनुरोध को भी टाल चुके हैं। वह जैसे-तैसे कर्नाटक सरकार का वध चाहते हैं। वह महामहिम हैं लेकिन कांग्रेस के सामान्य कार्यकर्ताओं की तरह भाजपा सरकार के खिलाफ हैं। संवैधानिक ढांचा विफल हो जाने की उनकी अपनी व्याख्या है। ताजा सिफारिश विवाद का विषय है। केंद्र उनकी सिफारिश नहीं मानता तो भी वह लज्जित नहीं होते। वह राज्यपाल जैसी संवैधानिक संस्था की साख गिराने वाले महामहिमों की सूची के चमकते नायक हैं। आश्चर्य है कि बावजूद इसके केंद्र उन्हें वापस नहीं बुलाता। राज्यपालों का आचरण संविधान निर्माण के समय से ही विवादों के घेरे में हैं। रोहिणी कुमार चौधरी ने संविधान सभा में राज्यपालों की नियुक्ति प्रक्रिया पर आशंका जताई और कहा कि प्रधानमंत्री के परामर्श से राष्ट्रपति राज्यपाल की नियुक्त करेंगे। प्रधानमंत्री राजनीति में डूबा व्यक्ति होगा। उसके विचार तटस्थ नहीं होंगे। उड़ीसा के विश्वनाथ दास ने भी शंका व्यक्त की-ब्रिटिश साम्राज्यवाद के गवर्नर जो कुछ करते थे, वही अब सत्तारूढ़ दल करेगा। जवाहरलाल नेहरू ने बहस में हस्तक्षेप किया और कहा, इस पद के लिए हम एक पूर्ण तटस्थ व्यक्ति रखेंगे जो प्रांत की सरकार को मान्य हो। अगर ऐसा नहीं हुआ तो वह अपने प्रकार्य अच्छी तरह नहीं कर सकेगा। संविधान सभा केंद्र में सत्तारूढ़ दल के पिट्ठू राज्यपाल नहीं चाहती थी। बावजूद इसके अधिकांश राज्यपालों ने संविधान की मर्यादा भंग की। पहले आम चुनाव में कांग्रेस मद्रास प्रेसीडेंसी में हार गई। टी प्रकाशम ने सरकार गठन का दावा किया। राज्यपाल ने अल्पमत के बावजूद सी राजगोपालाचार्य को शपथ दिलाई, जोड़तोड़ हुई, बहुमत बना। यह सब पंडित नेहरू के समय हुआ। लोकतंत्र जवाबदेही से चलता है। सारी संवैधानिक संस्थाएं जवाबदेह हैं। राज्यपाल की कोई जवाबदेही नहीं। राज्यपाल केंद्रीय सत्तादल के अनुसार ही चलते हैं। राज्य सरकारों की बर्खास्तगी संवेदनशील मसला है। डॉ. अंबेडकर ने संविधान सभा में कहा था कि इस अस्त्र का प्रयोग कम से कम किया जाएगा लेकिन संविधान प्रवर्तन 1950 से अब तक मात्र 61 वर्ष में लगभग 115 दफा राज्य सरकारों की बर्खास्तगी की जा चुकी है। 1970 में उत्तर प्रदेश विधानसभा का अधिवेशन प्रस्तावित था, लेकिन राज्यपाल ने बहुमत के लिए सदन की प्रतीक्षा नहीं की और चरण सिंह सरकार बर्खास्त हो गई। हरियाणा के राज्यपाल तपासे ने बहुमत दल के नेता देवीलाल को विधायकों की परेड के लिए 24 मई, 1982 की तारीख दी और इसी बीच भजनलाल को मुख्यमंत्री की शपथ भी दिला दी गई। आंध्र के राज्यपाल रामलाल ने बहुमत के बावजूद एनटी रामाराव सरकार का वध (1984) किया। रामाराव सारे विधायकों सहित राष्ट्रपति भवन पहुंचे। विधायकों को राष्ट्रपति भवन ले जाने की परंपरा शुरू हुई। राज्यपाल संविधान की संरक्षक संस्था है लेकिन तमाम राज्यपालों ने संविधान को भी शर्मसार किया है। गुजरात के राज्यपाल कृष्णपाल ने शंकर सिंह बाघेला के पक्ष में भाजपा सरकार की बर्खास्तगी की। अयोध्या हादसे के दिन बहुमत प्राप्त मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने त्यागपत्र दिया। लेकिन राज्यपाल ने उत्तर प्रदेश सरकार की बर्खास्तगी ही की। केंद्र ने अयोध्या कांड के बहाने तीन अन्य भाजपाई राज्य सरकारें भी बर्खास्त करवाईं। राज्यपाल रोमेश भंडारी ने उत्तर प्रदेश में नया रिकॉर्ड बनाया। कल्याण सिंह ने 21 अक्टूबर, 1997 को बहुमत सिद्ध किया। बावजूद इसके महामहिम ने कल्याण सिंह को हटाकर जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री बनाया। न्यायालय के निर्देश पर विधानसभा का विशेष सत्र 26 फरवरी, 1998 को हुआ। कल्याण सिंह जीत गए। बिहार सरकार की बर्खास्तगी पर न्यायालय का आदेश जगजाहिर है। कांग्रेस ने प्रतिबद्ध राज्यपाल की परंपरा चलाई। 1977 की जनता पार्टी सरकार भी उसी रास्ते चली। उसने नौ विधानसभाएं भंग कीं। 1980 में केंद्र की कांग्रेसी सरकार ने भी नौ विधानसभाएं बर्खास्त कीं। मूलभूत प्रश्न यह है कि क्या राज्यपाल केंद्र में सत्तारूढ़ दल के ही एजेंट हैं। 1970 के राज्यपाल सम्मेलन में आचार संहिता पर सहमति बनी। राष्ट्रपति ने जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल की अध्यक्षता में राज्यपालों की पांच सदस्यीय समिति बनाई। समिति ने तय किया, बहुमत का प्रश्न विधानसभा ही तय करेगी, मुख्यमंत्री अधिवेशन न बुलाए तो बहुमत समाप्त माना जाएगा। वैकल्पिक सरकार की संभावनाओं के खत्म होने पर सदन भंग ही रास्ता है। गठबंधन सरकारों में किसी घटक के अलग हो जाने पर भी सरकार पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। मुख्यमंत्री से विधानसभा बुलाकर बहुमत सिद्ध करने को कहा जाना चाहिए। फिर सरकारिया आयोग (1983) ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि राज्य का शासन जब संविधान के उपबंधों के अनुसार नहीं चल रहा है तब तथ्यों सहित राज्य सरकार को पहले चेतावनी दी जानी चाहिए और सरकार के उत्तर पर गंभीरतापूर्वक विचार करके ही कोई कार्रवाई की जानी चाहिए। सन् 1997 के राज्यपाल सम्मेलन में भी आचरण संबंधी सात सूत्रीय दिशानिर्देश तय हुए। राजग सरकार के संविधान समीक्षा आयोग ने भी कई मूल्यवान सिफारिशें की थीं लेकिन प्रतिबद्ध राज्यपाल अपने काम पर हैं। कर्नाटक के राज्यपाल ने केंद्र के ईमानदार प्रतिनिधि के रूप में काम नहीं किया। उन्होंने राज्य सरकार के विरुद्ध दो बार केंद्र को रिपोर्ट दी। केंद्र ने पहली रिपोर्ट खारिज की, दूसरी पर असमंजस है। बुनियादी सवाल यह है कि बार-बार केंद्र को गुमराह करने और केंद्र व राज्य दोनों को ही विषम परिस्थितियों में झोंकने वाले राज्यपाल के प्रति केंद्र के मन में खास तरह की ममता क्यों है? क्या केंद्र ने ही उन्हें कर्नाटक सरकार को अस्थिर करने या उसका वध करने की सुपारी दी है? अनेक राज्यपालों के आचरण से संविधान की गरिमा को चोट पहुंची है। राज्यपालों की नियुक्ति व आचरण पर ठोस कार्रवाई की जरूरत है। इस पद पर राजनेताओं की नियुक्ति बंद होनी चाहिए। निवर्तमान राज्यपाल को बाद में किसी लाभ के पद पर नियुक्त न किए जाने का प्रावधान भी जरूरी है। संवैधानिक चीरहरण का धारावाहिक आचरण बर्दाश्त के बाहर है। (लेखक उप्र विधानपरिषद के सदस्य हैं )
Thursday, May 19, 2011
मुस्लिमों ने भी नहीं दिया साथ
भूगोल का कोई छात्र इस सवाल का बखूबी उत्तर दे देगा कि केरल और असम के बीच की दूरी कितनी है। जाहिर है कि दोनों भारत के सुदूर सूबे हैं और इनके बीच की दूरियां भी खासी हैं। पर हाल ही में हुए दोनों राज्यों की विधानसभाओं के चुनावों के नतीजों पर गौर करने पर एक सामनता साफ तौर पर दिखाई दे रही है। दरअसल, दोनों ही राज्यों के मुसलमानों ने उन दलों के हक में बड़े पैमाने पर वोट दिया, जो उनके मजहब की बुनियाद पर चल रहे हैं। उदाहरण के रूप में केरल में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग और असम में आल इंडिया युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआइयूडीएफ) को मुसलमानों ने दिल खोलकर वोट दिया। असम की 70 सदस्यों वाली विधानसभा में 16 मुसलमान जीते। इनमें से अधिकतर एआइयूडीएफ से थे। उधर, केरल में मुस्लिम लीग के 21 उम्मीदवार जीते। जाहिर है कि इन दोनों ही जगहों पर मतदाताओं का धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण अपने आप में खतरे की घंटी है। इसके साथ ही यह ध्रुवीकरण उन राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों को भी सोचने के लिए मजबूर करता है, जो सभी धर्मो और जातियों के मतदाताओं के हक में संघर्ष करते हैं। उन्हें सोचना होगा कि उन्हें मुसलमानों ने किस वजह के चलते खारिज किया। यहां सवाल यह है कि मुस्लिम मतदाताओं ने इन सूबों में अपने मजहब के आधार पर बने सक्रिय दलों के लिए ही क्यों वोट दिए? कुछ जानकार कहते हैं कि चूंकि कांग्रेस, लेफ्ट, भाजपा, असम गण परिषद जैसे दलों में उन्हें सही प्रकार से नुमाइंदगी हासिल नहीं होती। इसलिए वे अब उन दलों का रुख करने लगे हैं, जो उनके हैं। यह सारी बहस का सरलीकरण करने जैसा है। पश्चिम बंगाल में तो इस तरह से नहीं हुआ। असम और केरल में मुसलमानों का वोट मुसलमान के लिए ही वाली मानसिकता किसी भी सूरत में उचित नहीं मानी जा सकती। इन सूबों में क्रमश: 30 और 25 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है। अगर केरल की बात करें तो भारत में इस्लाम सबसे पहले केरल में ही आया था, बारास्ता अरब देशों से। भारत की पहली मस्जिद भी कालीकट (केरल ) में ही है। असम में भी मुसलमानों की आबादी के बढ़ने को लेकर यह आरोप लगते हैं कि बांग्लादेश की सरहद से लगने वाले कुछ जिलों में लगातार होती घुसपैठ के कारण वहां पर मुसलमानों की जनसंख्या बढ़ती ही चली गई। खैर, पहली नजर में देखने में कुछ भी गलत नजर नहीं आता कि मुसलमान किसी दल विशेष को वोट दें। आखिर इंडियन मुस्लिम लीग भारत के संविधान को मानती है और उसका उस मुस्लिम लीग से कोई लेना-देना नहीं है, जिसने 1947 में भारत का दो फाड़ करवाया था। उसकी वेबसाइट के होम पेज पर उसके आला नेताओं के साथ-साथ बापू की भी फोटो है। इसे खंगालने पर साफ तौर पर दिखता है कि पार्टी का गठन देश के मुसलमानों, कमजोर और पिछड़ों को लोकतांत्रिक तरीके से उनके अधिकार दिलाने के लिए है। उधर, अगर बात ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट की करें तो इसकी वेबसाइट को देखने पर कहीं भी यह नजर नहीं आएगा कि यह मुसलमानों के हक में लड़ना चाहती है। पर यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है कि वास्तुस्थिति यही है। हालांकि मुस्लिम लीग के विपरीत इसके कई पदाधिकारी हिंदू भी हैं। मशहूर अर्थशास्त्री और सच्चर कमेटी से जुड़े रहे डा. अबू सालेह शरीफ कहते हैं, हमारी तो ख्वाहिश रही है कि मुसलमान देश की मुख्यधारा की पार्टियों से जुड़ें। वे अपने बच्चों को मदरसों के स्थान पर सामान्य स्कूलों में भेजें। उन्हें उन दलों से खुद को जोड़ना बेहतर रहेगा, जो समाज के समग्र विकास में यकीन रखते हैं। अगर वे इस तरह से नहीं सोचते-करते हैं तो यह अपने आप में कोई बहुत आदर्श स्थिति नहीं होगी। पर अच्छी बात यह है कि पश्चिम बंगाल में वोटिंग के वक्त मुसलमानों ने अपने मताधिकार का प्रयोग करते हुए उम्मीदवार की जाति और धर्म को तरजीह नहीं दी। वहां 50 से भी अधिक मुसलमान जीते। पर गौर करने लायक तथ्य है कि पश्चिम बंगाल में सर्वाधिक मुसलमान उम्मीदवार तृणमूल कांग्रेस के जीते। लेफ्ट फ्रंट को मुसलमानों के बीच में उस तरह की कामयाबी नहीं मिली, जैसी उसे उम्मीद थी। बंगाल में सामाजिक समरसता के लिए वामदलों के योगदान को कतई कम करके नहीं आंका जा सकता। हालांकि पश्चिम बंगाल देश के विभाजन से प्रभावित होने वाला राज्य था। इसके बावजूद वहां लेफ्ट ने सांप्रदायिक दंगे कभी नहीं होने दिए। (लेखक टीवी पत्रकार हैं)
अपने गढ़ों में कमजोर होती कांग्रेस
पांच राज्यों के चुनाव नतीजों के बाद कांग्रेसी खेमे में जीत के दावे हैं। संप्रग की बढ़त की चर्चा भी है, लेकिन कांग्रेसी नेतृत्व के चेहरों पर वह खुशी और उत्साह नहीं है, जो जीत को बयां किया करता है। संप्रग की यह जीत जहां क्षेत्रीय दलों की जीत को रेखांकित करती है, वहीं राष्ट्रीय दलों के नाम पर कांग्रेस के सिमटते जनाधार की आहट भी है। दरअसल, यह नब्बे के दशक से शुरू हुई गठबंधन राजनीति की नई ऊंचाइयों का संकेत है, जो कांग्रेसी खुशी को खुशफहमी में बदलने की पटकथा लिख रही है। पांच राज्यों के चुनाव नतीजों में संप्रग की जीत या तो क्षेत्रीय दलों का बेहतर प्रदर्शन है या असम सरीखी विकल्पहीनता का परिणाम। असल में कांग्रेस सहित राष्ट्रीय होने का दम भरने वाली सभी राजनीतिक पार्टियां राष्ट्रीय होने के मूल सिद्धांत को खारिज करके राष्ट्रीय होने दावा करती हैं। बगैर राज्यों की मजबूती के देश में एक स्वस्थ संघीय ढांचे की कल्पना नहीं की जा सकती है। इसी क्रम में राष्ट्रीय दलों का राष्ट्रीय अस्तित्व भी तभी तक सुरक्षित है, जबकि उनके पास केंद्रीय नेतृत्व के साथ ही राज्यों में भी व्यापक जनाधार वाला नेतृत्व है। परंतु वर्तमान दौर में अधिकतर दल राजनीतिक सत्ता के केंद्रीकरण का शिकार है, जिस कारण अधिकतर दलों में मजबूत सूबाई क्षत्रपों का आभाव है और यही सूबाई क्षत्रपों का अभाव भौगोलिक, सामाजिक और राजनीतिक असमानताओं का कारण बनता है, जो अंततोगत्वा क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के उभरने का कारण बनता है। पांच राज्यों के इस चुनाव में राष्ट्रीय दलों को बी पार्टी की भूमिका में खड़ा करने वाली क्षेत्रीय पार्टियों की यही धमक स्पष्ट सुनाई दी है। कभी बंगाल में मुख्य दल की भूमिका में रहने वाली कांग्रेस तमाम तरह के अपमान झेलते हुए ममता बनर्जी की बी पार्टी बनने को विवश है। विधानसभा सीटों के बंटवारे को लेकर बंगाल में हुई कांग्रेस की फजीहत का गवाह पूरा देश है। किस प्रकार ममता बनर्जी ने जीत की कम संभावना वाली सीटें कांग्रेस के लिए छोड़कर एक तरफा ढंग से एक तारीख निश्चित कर डाली कि यदि कांग्रेस चाहे तो इस तारीख तक अपनी सहमति दे दे। अन्यथा, तृणमूल कांग्रेस अकेले चुनाव लडे़गी। ऐसी तमाम फजीहत के बाद भी कांग्रेस ने ममता का पिछलग्गू बनना स्वीकार करते हुए चुनाव में जाना तय किया। कांग्रेस की कमोबेश यही स्थिति तमिलनाडु में भी रही है, जहां आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी करुणा परिवार पार्टी की बी पार्टी बनकर ही कांग्रेस को संतोष करना पड़ा। हालांकि चुनाव के पहले तक और चुनाव परिणाम वाले दिन 13 मई तक कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कहते रहे कि हमारे पास अकेले चुनाव में जाने का विकल्प था और कई राजनीतिक विश्लेषकों ने अकेले चुनाव लड़ने पर लाभ में रहने की बात भी कही थी, लेकिन हमने गठबंधन धर्म का पालन करते हुए डीएमके के साथ जाना तय किया। बावजूद इस गठबंधन धर्मी पिछलग्गूपन के चुनाव में कांग्रेस को बुरी तरह मुंह की खानी पड़ी। कांग्रेस को विधानसभा चुनावों में महज पांच सीटों से ही संतोष करना पड़ा और यह पांच सीटें संप्रग-1 के समय कांग्रेस के सहयोगी रहे वामपंथियों को मिली 20 सीटों से भी काफी कम है। तमिलनाडु की एक दौर की मुख्य पार्टी कांग्रेस यहां भी जयललिता और करुणा परिवार के बीच झूलती रहने वाली बी पार्टी बनकर रह गई है। हालांकि पार्टी की स्थिति को दुरुस्त करने के लिए पिछले सालों में कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश के बाद तमिलनाडु को विशेष समय दिया, लेकिन राहुल की इन कोशिशों के बावजूद तमिलनाडु में पार्टी को दुर्गति से बचाया नहीं जा सका। वैसे बिहार के बाद तमिलनाडु में राहुल गांधी का चुनाव प्रचार और खराब नतीजे एक नए सवाल को जन्म दे रहे हैं। खैर, यह एक अलग विषय है। कांग्रेस की बी पार्टी बनने यह प्रक्ति्रया लगातार तेजी पर है और देश की राजनीति को निर्णायक रूप से प्रभावित करने वाले बडे़ राज्यों में इसका प्रभाव सबसे ज्यादा है। तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, बिहार के बाद पश्चिम बंगाल भी इसमें शामिल हो गया है और जगनमोहन रेड्डी के उदय के बाद आंध्र प्रदेश भी इसी राह पर बढ़ता दिखाई पड़ रहा है। कांग्रेस की राजनीति में वर्तमान दौर में आंध्र प्रदेश का विशेष स्थान है, जिसके लिए जगनमोहन रेड्डी के पिता और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस रेड्डी का महत्वपूर्ण योगदान है। अब कांग्रेस से बगावत कर चुके जगनमोहन रेड्डी ने हाल ही में संपन्न हुए चुनाव में जीत से उत्साहित होकर यदि नई पार्टी की घोषणा कर दी, जिसकी पूरी संभावना नजर भी आ रही है, तो आंध्र प्रदेश दक्षिण भारत का उत्तर प्रदेश, बिहार या कह लें दूसरा तमिलनाडु बन सकता है। आंध्र प्रदेश में हुए उपचुनावों में मिले समर्थन ने जगनमोहन की महत्वाकांक्षाओं को नया बल और नई ऊर्जा दी है। ध्यान रहे, पांच लाख अस्सी हजार से भी अधिक वोटों से जीतने वाले जगनमोहन ने तेलगू देशम और कांग्रेस दोनों की जमानत तक भी जब्त करा दी है। केरल में सरकार बनाने का दावा करने वाली कांग्रेस की स्थिति कोई अच्छी नही है। कांग्रेस बेशक राज्य में सरकार बनाने जा रही है, लेकिन अभी भी प्रदेश में माकपा ही अकेली सबसे बड़ी पार्टी है। माकपा के 45 विधायक जीत कर सदन में दाखिल हुए हैं तो वहीं कांग्रेस के विधानसभा में महज 38 ही सदस्य हैं। केरल में कांग्रेस लंबे समय से एक गठबंधन का हिस्सा रही है, मगर वर्तमान गठबंधन में कांग्रेस उतनी मजबूत स्थिति में नही है। कांगेस का केरल में सरकार बनाने का अरमान सांप्रदायिक मुस्लिम लीग के कंधे पर बैठकर ही पूरा हो रहा है, जिसके विधान सभा में 20 सदस्य हैं। असल में केरल में कांग्रेस की यह कथित जीत इस चुनाव में मुस्लिम और ईसाई कट्टरपंथी ताकतों की करीबी का ही नतीजा है। कांग्रेस की यही सांप्रदायिकता पर फिसलन वाली नीति ही आने वाले सालों में केरल में संकट की आहट लेकर आने वाली है। इस विधानसभा चुनाव में भाजपा ने राज्य में अपना सबसे अच्छा प्रदर्शन किया है। हर सीट पर अच्छे वोट हासिल करने के अलावा कम से कम दो सीटों नेमम और कासारगोड में कांग्रेस को तीसरे स्थान पर धकेल दिया है और दूसरे व तीसरे स्थान में भी भाजपा तथा कांग्रेस में बीस हजार से ज्यादा का अंतर है। अब असम ही एक ऐसा राज्य है, जो कांग्रेस की खुशी का सबसे बड़ा कारण बन रहा है। असम में इस कांग्रेसी जीत के दो मुख्य कारण हैं, जिसमें सबसे पहला और मुख्य कारण राज्य की राजनीति का विपक्षहीन होना है। विपक्षहीन राजनीति की यह विकल्पहीनता ही असम में कांग्रेस को लगातार सत्ता में रहने और जीत पर अभिभूत होने का कारण दे रही है। असम में विपक्ष के नाम पर एक ओर असम गण परिषद है तो दूसरी तरफ भाजपा भी असम में लगातार मुख्य दल बनने की जी तोड़ कोशिश में है, लेकिन जहां असम गण परिषद पिछले कई सालों से संगठन में चल रही फजीहत से नहीं उबर पा रही है, वहीं विविधताओं वाले जनजातीय असम समाज में संभवतया भाजपा की एकरूपता वाली राजनीति भी अपना स्थान बना पाने में नाकामयाब रही है। अब इस विपक्षहीनता की स्थिति में इस जीत का श्रेय कांग्रेस को दिया जाए या असम के तथाकथित विपक्ष को समझ पाना मुश्किल है। हां, पिछले कुछ सालों में असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई अवश्य एक नए कांग्रेसी सूबाई क्षत्रप बनकर उभरे हैं, जिसका फायदा कांग्रेस और मुख्यमंत्री दोनों को मिला है। परंतु असम पूर्वोत्तर का एक छोटा राज्य है, जो राष्ट्रीय राजनीति को बडे़ स्तर पर प्रभावित कर पाने की स्थिति में नहीं है। अब इसे कांग्रेस की खुशफहमी ही कहा जाएगा, जो देश के बडे़ राज्यों में लगातार अपनी कमजोर होती स्थिति के बावजूद भी खुश होने का सुख संजोने की भ्रामक स्थिति की शिकार है। भ्रष्टाचार पर बार-बार गठबंधन की विवशताओं का हवाला देने वाली कांग्रेस अपनी कमजोर होती स्थिति के कारण नए गठबंधनों की कमजोर नेतृत्व वाली दबंग क्षेत्रीय पार्टियों के इशारों पर नाचने वाली और ज्यादा मजबूर पार्टी बनकर रह जाएगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Subscribe to:
Posts (Atom)