पांच राज्यों के चुनाव नतीजों के बाद कांग्रेसी खेमे में जीत के दावे हैं। संप्रग की बढ़त की चर्चा भी है, लेकिन कांग्रेसी नेतृत्व के चेहरों पर वह खुशी और उत्साह नहीं है, जो जीत को बयां किया करता है। संप्रग की यह जीत जहां क्षेत्रीय दलों की जीत को रेखांकित करती है, वहीं राष्ट्रीय दलों के नाम पर कांग्रेस के सिमटते जनाधार की आहट भी है। दरअसल, यह नब्बे के दशक से शुरू हुई गठबंधन राजनीति की नई ऊंचाइयों का संकेत है, जो कांग्रेसी खुशी को खुशफहमी में बदलने की पटकथा लिख रही है। पांच राज्यों के चुनाव नतीजों में संप्रग की जीत या तो क्षेत्रीय दलों का बेहतर प्रदर्शन है या असम सरीखी विकल्पहीनता का परिणाम। असल में कांग्रेस सहित राष्ट्रीय होने का दम भरने वाली सभी राजनीतिक पार्टियां राष्ट्रीय होने के मूल सिद्धांत को खारिज करके राष्ट्रीय होने दावा करती हैं। बगैर राज्यों की मजबूती के देश में एक स्वस्थ संघीय ढांचे की कल्पना नहीं की जा सकती है। इसी क्रम में राष्ट्रीय दलों का राष्ट्रीय अस्तित्व भी तभी तक सुरक्षित है, जबकि उनके पास केंद्रीय नेतृत्व के साथ ही राज्यों में भी व्यापक जनाधार वाला नेतृत्व है। परंतु वर्तमान दौर में अधिकतर दल राजनीतिक सत्ता के केंद्रीकरण का शिकार है, जिस कारण अधिकतर दलों में मजबूत सूबाई क्षत्रपों का आभाव है और यही सूबाई क्षत्रपों का अभाव भौगोलिक, सामाजिक और राजनीतिक असमानताओं का कारण बनता है, जो अंततोगत्वा क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के उभरने का कारण बनता है। पांच राज्यों के इस चुनाव में राष्ट्रीय दलों को बी पार्टी की भूमिका में खड़ा करने वाली क्षेत्रीय पार्टियों की यही धमक स्पष्ट सुनाई दी है। कभी बंगाल में मुख्य दल की भूमिका में रहने वाली कांग्रेस तमाम तरह के अपमान झेलते हुए ममता बनर्जी की बी पार्टी बनने को विवश है। विधानसभा सीटों के बंटवारे को लेकर बंगाल में हुई कांग्रेस की फजीहत का गवाह पूरा देश है। किस प्रकार ममता बनर्जी ने जीत की कम संभावना वाली सीटें कांग्रेस के लिए छोड़कर एक तरफा ढंग से एक तारीख निश्चित कर डाली कि यदि कांग्रेस चाहे तो इस तारीख तक अपनी सहमति दे दे। अन्यथा, तृणमूल कांग्रेस अकेले चुनाव लडे़गी। ऐसी तमाम फजीहत के बाद भी कांग्रेस ने ममता का पिछलग्गू बनना स्वीकार करते हुए चुनाव में जाना तय किया। कांग्रेस की कमोबेश यही स्थिति तमिलनाडु में भी रही है, जहां आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी करुणा परिवार पार्टी की बी पार्टी बनकर ही कांग्रेस को संतोष करना पड़ा। हालांकि चुनाव के पहले तक और चुनाव परिणाम वाले दिन 13 मई तक कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कहते रहे कि हमारे पास अकेले चुनाव में जाने का विकल्प था और कई राजनीतिक विश्लेषकों ने अकेले चुनाव लड़ने पर लाभ में रहने की बात भी कही थी, लेकिन हमने गठबंधन धर्म का पालन करते हुए डीएमके के साथ जाना तय किया। बावजूद इस गठबंधन धर्मी पिछलग्गूपन के चुनाव में कांग्रेस को बुरी तरह मुंह की खानी पड़ी। कांग्रेस को विधानसभा चुनावों में महज पांच सीटों से ही संतोष करना पड़ा और यह पांच सीटें संप्रग-1 के समय कांग्रेस के सहयोगी रहे वामपंथियों को मिली 20 सीटों से भी काफी कम है। तमिलनाडु की एक दौर की मुख्य पार्टी कांग्रेस यहां भी जयललिता और करुणा परिवार के बीच झूलती रहने वाली बी पार्टी बनकर रह गई है। हालांकि पार्टी की स्थिति को दुरुस्त करने के लिए पिछले सालों में कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश के बाद तमिलनाडु को विशेष समय दिया, लेकिन राहुल की इन कोशिशों के बावजूद तमिलनाडु में पार्टी को दुर्गति से बचाया नहीं जा सका। वैसे बिहार के बाद तमिलनाडु में राहुल गांधी का चुनाव प्रचार और खराब नतीजे एक नए सवाल को जन्म दे रहे हैं। खैर, यह एक अलग विषय है। कांग्रेस की बी पार्टी बनने यह प्रक्ति्रया लगातार तेजी पर है और देश की राजनीति को निर्णायक रूप से प्रभावित करने वाले बडे़ राज्यों में इसका प्रभाव सबसे ज्यादा है। तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, बिहार के बाद पश्चिम बंगाल भी इसमें शामिल हो गया है और जगनमोहन रेड्डी के उदय के बाद आंध्र प्रदेश भी इसी राह पर बढ़ता दिखाई पड़ रहा है। कांग्रेस की राजनीति में वर्तमान दौर में आंध्र प्रदेश का विशेष स्थान है, जिसके लिए जगनमोहन रेड्डी के पिता और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस रेड्डी का महत्वपूर्ण योगदान है। अब कांग्रेस से बगावत कर चुके जगनमोहन रेड्डी ने हाल ही में संपन्न हुए चुनाव में जीत से उत्साहित होकर यदि नई पार्टी की घोषणा कर दी, जिसकी पूरी संभावना नजर भी आ रही है, तो आंध्र प्रदेश दक्षिण भारत का उत्तर प्रदेश, बिहार या कह लें दूसरा तमिलनाडु बन सकता है। आंध्र प्रदेश में हुए उपचुनावों में मिले समर्थन ने जगनमोहन की महत्वाकांक्षाओं को नया बल और नई ऊर्जा दी है। ध्यान रहे, पांच लाख अस्सी हजार से भी अधिक वोटों से जीतने वाले जगनमोहन ने तेलगू देशम और कांग्रेस दोनों की जमानत तक भी जब्त करा दी है। केरल में सरकार बनाने का दावा करने वाली कांग्रेस की स्थिति कोई अच्छी नही है। कांग्रेस बेशक राज्य में सरकार बनाने जा रही है, लेकिन अभी भी प्रदेश में माकपा ही अकेली सबसे बड़ी पार्टी है। माकपा के 45 विधायक जीत कर सदन में दाखिल हुए हैं तो वहीं कांग्रेस के विधानसभा में महज 38 ही सदस्य हैं। केरल में कांग्रेस लंबे समय से एक गठबंधन का हिस्सा रही है, मगर वर्तमान गठबंधन में कांग्रेस उतनी मजबूत स्थिति में नही है। कांगेस का केरल में सरकार बनाने का अरमान सांप्रदायिक मुस्लिम लीग के कंधे पर बैठकर ही पूरा हो रहा है, जिसके विधान सभा में 20 सदस्य हैं। असल में केरल में कांग्रेस की यह कथित जीत इस चुनाव में मुस्लिम और ईसाई कट्टरपंथी ताकतों की करीबी का ही नतीजा है। कांग्रेस की यही सांप्रदायिकता पर फिसलन वाली नीति ही आने वाले सालों में केरल में संकट की आहट लेकर आने वाली है। इस विधानसभा चुनाव में भाजपा ने राज्य में अपना सबसे अच्छा प्रदर्शन किया है। हर सीट पर अच्छे वोट हासिल करने के अलावा कम से कम दो सीटों नेमम और कासारगोड में कांग्रेस को तीसरे स्थान पर धकेल दिया है और दूसरे व तीसरे स्थान में भी भाजपा तथा कांग्रेस में बीस हजार से ज्यादा का अंतर है। अब असम ही एक ऐसा राज्य है, जो कांग्रेस की खुशी का सबसे बड़ा कारण बन रहा है। असम में इस कांग्रेसी जीत के दो मुख्य कारण हैं, जिसमें सबसे पहला और मुख्य कारण राज्य की राजनीति का विपक्षहीन होना है। विपक्षहीन राजनीति की यह विकल्पहीनता ही असम में कांग्रेस को लगातार सत्ता में रहने और जीत पर अभिभूत होने का कारण दे रही है। असम में विपक्ष के नाम पर एक ओर असम गण परिषद है तो दूसरी तरफ भाजपा भी असम में लगातार मुख्य दल बनने की जी तोड़ कोशिश में है, लेकिन जहां असम गण परिषद पिछले कई सालों से संगठन में चल रही फजीहत से नहीं उबर पा रही है, वहीं विविधताओं वाले जनजातीय असम समाज में संभवतया भाजपा की एकरूपता वाली राजनीति भी अपना स्थान बना पाने में नाकामयाब रही है। अब इस विपक्षहीनता की स्थिति में इस जीत का श्रेय कांग्रेस को दिया जाए या असम के तथाकथित विपक्ष को समझ पाना मुश्किल है। हां, पिछले कुछ सालों में असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई अवश्य एक नए कांग्रेसी सूबाई क्षत्रप बनकर उभरे हैं, जिसका फायदा कांग्रेस और मुख्यमंत्री दोनों को मिला है। परंतु असम पूर्वोत्तर का एक छोटा राज्य है, जो राष्ट्रीय राजनीति को बडे़ स्तर पर प्रभावित कर पाने की स्थिति में नहीं है। अब इसे कांग्रेस की खुशफहमी ही कहा जाएगा, जो देश के बडे़ राज्यों में लगातार अपनी कमजोर होती स्थिति के बावजूद भी खुश होने का सुख संजोने की भ्रामक स्थिति की शिकार है। भ्रष्टाचार पर बार-बार गठबंधन की विवशताओं का हवाला देने वाली कांग्रेस अपनी कमजोर होती स्थिति के कारण नए गठबंधनों की कमजोर नेतृत्व वाली दबंग क्षेत्रीय पार्टियों के इशारों पर नाचने वाली और ज्यादा मजबूर पार्टी बनकर रह जाएगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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Thursday, May 19, 2011
Sunday, January 23, 2011
सरकार की छवि बदलने की कोशिश
काफी समय के इंतजार के बाद आखिरकार केंद्रीय मंत्रिमंडल में आंशिक बदलाव हो ही गया। प्रधानमंत्री और कांग्रेस की लगातार घोषणाओं के बावजूद इसमें मंहगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने की प्रतिबद्धताओं का कहीं अता-पता नहीं था। प्रधानमंत्री ने इसे छोटा फेरबदल भले ही बताया है, लेकिन इसमें सरकार की छवि बदलने और लोगों की तकलीफे बांटने की चिंता की बजाय उत्तर प्रदेश और केरल जैसे राज्यो में आगामी विधानसभा चुनाव की आहट अधिक थी। कांग्रेस की यह सारी कवायद नए साल के चुनावी महासमर और 2012 में मिशन यूपी की डगर पर बढ़ने की राहुल गांधी की सियासी कार्ययोजना का हिस्सा है। यूपी में अकेले सत्ता में वापसी का राहुल गांधी का खयाल उनकी महत्वकांक्षा का खुमार ज्यादा और वास्तविकता कम है। यह खुमार अब पूरी कांग्रेस पर हावी है। तभी घेटालों और मंहगाई से लापरवाह कांग्रेस ने अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता और मंशा को इस छोटे से बदलाव में दिखा दिया है। यह भी तय है कि अगले बडे़ बदलाव में भी कांग्रेस का एजेंडा सहयोगियों को साधने और अगले दिनों के सियासी महासमर की तैयारियों से ज्यादा से आगे बढ़ने वाला नही है। कांग्रेस की यह सियासी तैयारियां इसलिए भी विशेष हैं, क्योकि पार्टी उत्तर प्रदेश में फिर से एकला चलो की रणनीति पर ही आगे बढ़ रही है। मंहगाई का ठीकरा गठबंधन सरकार की राजनीतिक विवशता पर डालना कांग्रेस की एकला चलो की राजनीतिक मानसिकता का प्रमाण है। पिछले दिनों 2 जी स्पेक्ट्रम, आदर्श घोटाले और महंगाई पर हुई फजीहत से त्रस्त कांग्रेस जाहिर है गठबंधन राजनीति से परेशान है। परंतु कांग्रेस के होनहार महासचिव को समझना चाहिए कि यह केवल राजनीतिक गठबंधन भर नही हैं, बल्कि इन गठबंधनों की अपनी ऐतिहासिक विवशताएं हैं। इन गठबंधनों के अपने ठोस आर्थिक एवं सामाजिक कारण भी हैं। इसके कारण आजाद हिंदुस्तान के छह दशकों की विकास यात्रा और उस विकास से जनित विषमताओं में छुपा हुआ है। गठबंधन केवल जातीय समीकरणों और उनके विश्लेषणों भर से नहीं बनते, बल्कि उनके ध्रुवीकरण की अपनी सामाजिक विवशताएं भी होती हैं। इसके लिए सर्वाधिक यदि कोई राजनीतिक पार्टी दोषी है तो वह कांग्रेस ही है। उत्तर प्रदेश में या कहें पूरे भारत में कांग्रेस की सत्ता में टिके रहने का सबसे मजबूत आधार दलित एवं मुस्लिम अल्पसंख्यक मतदाताओं का उसके साथ होना रहा है। परंतु यदि उत्तर प्रदेश की ही बात की जाए तो मुस्लिम और दलित वोटों का नया ध्रुवीकरण हो चुका है। मुस्लिम वोट जहां कांग्रेस, सपा और बसपा के बीच बंटा हुआ है तो दलित वोटों की सबसे बड़ी और कहें तो एकछत्र दावेदार मायावती की बहुजन समाज पार्टी ही है। राज्य के पिछडे़ मतदाताओं का गैर कांग्रेसवाद से जुडाव का एक लंबा इतिहास रहा है। ऐसी स्थिति में यदि कुछ बचता है तो अगडा वोट बैंक और अति पिछड़ों का कुछ हिस्सा। यहां भाजपा कांग्रेस के आधार की नई साझीदार के रूप में उभरकर सामने आई है। अब कांग्रेस की गठबंधन रहित नई रणनीति का आधार और अनुभव क्या है, यह तो भविष्य ही तय करेगा। परंतु यह तो तय है कि कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी को गठबंधन और उसकी ऐतिहासिक आवश्यकताओं को समझकर विश्लेषण करना होगा। वास्तव में पिछले तीन दशक में गठबंधन सकारों का बनना केवल भारत की जरूरत नहीं वरन एक विश्वव्यापीरुझान है। केवल विकासशील देश ही नहीं, बल्कि विकसित दुनिया भी इस नए रुझान और परिघटना का शिकार है। पिछले तीन दशक से विकास की नव उदारवादी संकल्पना ने सामाजिक और आर्थिक विषमताओं की प्रक्रिया को तेज किया है जिससे नए तरह के सामाजिक ंअंतर्विरोधों और संघषरें का जन्म हुआ। एक बड़ी जनवादी व्यवस्था होने के कारण भारतीय संदर्भों में इन अंतर्विरोधों को उनके समाजिक परिवेश, संस्कृति एवं लोक जीवन के अनुरूप ही इन संघषरें को स्वर देने वाले इनके प्रतिनिधि उभरे। विकास के यह अंतर्विरोध कश्मीर से कन्याकुमारी और त्रिपुरा से अरुणाचल तथा राजस्थान, गुजरात तक देश के हर हिस्से में दिखाई दे जाएंगे। इस जांच के लिए किसी अलग तरह के पैमाने या दृष्टि की जरूरत नहीं है। यही स्थिति छतीसगढ़ के बस्तर और झारखंड के पलामू जैसे इलाके की या ऐसे ही किसी इलाके की है, जो आधुनिक दुनिया के विकास से अछूता आदिवासी संसार है।
Saturday, January 15, 2011
आंध्र प्रदेश की राजनीतिक दुश्वारियां
आंध्र प्रदेश में कांग्रेस को मिल रही चुनौती अब उसके लिए निर्णायक चेतावनी बन रही है। दक्षिण भारत के सबसे बडे राज्य आंध्र प्रदेश में कांग्रेस को चुनौती आंध्र प्रदेश की कांग्रेसी राजनीति के इतिहास की सबसे गंभीर चुनौती है। यह चुनौती न अलग राज्य तेलंगाना से है और न ही किसी नए विपक्षी गठजोड से है। बल्कि यह चुनौती कांग्रेस को उसके भीतर से ही मिल रही है। इस चुनौती के सूत्रधार पूर्व मुख्यमंत्री वाईएसआर रेड्डी के पुत्र जगनमोहन रेड्डी की राजनीतिक गतिविधियां जितना तेज होती जाती हैं, कांग्रेसी जनाधार और अस्तित्व के लिए खतरा और बढ़ता जाता है। जगनमोहन रेड्डी का राजनीतिक अभियान और उन्हें मिलने वाला कांग्रेसी सांसदों, विधायकों और जनता का समर्थन इसी प्रकार बढ़ता रहा तो वह दिन दूर नहीं, जब आंध्र प्रदेश कांग्रेस के लिए दक्षिण भारत का यूपी बिहार बन जाएगा, जहां पार्टी तीसरे नंबर से भी नीचे पहुंचकर अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही है। 29 नवंबर 2010 को कांग्रेस छोड़ने वाले जगनमोहन रेड्डी कांग्रेस को ललकारते हुए या कहे तो धमकाते हुए दिल्ली पंहुच चुके हैं। जगनमोहन रेड्डी ने कृष्णा नदी के जल बंटवारे को लेकर दिल्ली में धरना दिया, जिसमें कांग्रेस के दो दर्जन से अधिक विधायक, दो सांसद और तीन विधान परिषद सदस्य शामिल थे। हालांकि उनके धरने में कांग्रेस के अलावा तेलगूदेशम पार्टी, प्रजाराज्यम पार्टी और टीआरएस के कुछ विधायक भी शामिल थे, लेकिन कांग्रेसी जनप्रतिनिधियों की बड़ी संख्या के अपने निहितार्थ हैं और कांग्रेस के लिए भविष्य के संकेत भी। वास्तव में आंध्र प्रदेश में कांग्रेस कई राजनीतिक संकटों से एक साथ जूझ रही है, मगर उसके माथे पर चिंता की रेखाएं जितनी गहरी जगनमोहन के कारण हैं, उतनी किसी दूसरे कारण से नहीं हैं। यदि विपक्षी दलों की बात की जाए तो उनका कोई भी आंदोलन विपक्षी जमीन और विपक्षी शक्ति पर खड़ा होगा, लेकिन जगनमोहन का विरोधी अभियान ऐसा आंदोलन है, जो कांग्रेसी जमीन और उसी के संसाधनों पर खड़ा है। जगनमोहन के पिता वाईएसआर रेड्डी कांग्रेस अध्यक्ष के सबसे करीबी और प्रिय राजनेता थे। हालांकि इसका एकमात्र कारण केवल गांधी परिवार के प्रति वफादारी ही नहीं था, बल्कि वाईएसआर की अपनी राजनीतिक योग्यता और उनके व्यापक जनाधार के कारण वह कांग्रेसी आलाकमान के बेहद करीबी थे। वाईएसआर रेड्डी की लोकप्रियता का परिणाम पिछले आम चुनावों में साफ दिखाई दिया, जब कांग्रेस ने सभी राजनीतिक विश्लेषणों और कयासों को धता बताते हुए अपनी लोकसभा सीटों में बढ़ोतरी की। वर्ष 2004 के आम चुनावों में टीडीपी के खिलाफ हवा के अलावा वामपंथी और टीआरएस भी कांग्रेस यूपीए के हिस्से थे। फिर भी कांग्रेस को केवल 29 सीटें हासिल हुई, जबकि 2009 के आम चुनावो में वामपंथियो और टीआरएस के टीडीपी के साथ चले जाने के बावजूद कांग्रेस ने 33 सीटें हासिल की। आंध्र प्रदेश की राजनीति के जानकार जानते हैं कि यह कांग्रेस नहीं, बल्कि वाईएसआर के व्यक्तित्व का कमाल ही अधिक था और आज जब उन्हीं वाईएसआर का बेटा अपने पिता के जनाधार और उनके प्रति साहनुभूति पर सवार होकर चला है तो जाहिर है कि खतरा गंभीर ही है। वाईएसआर के अलावा भी आंध्र प्रदेश की राजनीति में एक रेड्डी कारक हमेशा हावी रहती है। यों तो प्रदेश में कुल आबादी की लगभग सात प्रतिशत रेड्डियों की संख्या कोई निर्णायक नहीं कही जा सकती है, लेकिन अपनी समाजिक स्थिति और राजनीतिक वर्चस्व के कारण आंध्र प्रदेश के बनने के बाद से ही प्रदेश की राजनीति में रेड्डी हमेशा हावी रहे हैं। यही कारण है कि अभी तक के चुने गए आंध्र प्रदेश के 16 मुख्यमंत्रियों में से नौ रेड्डी ही थे। वर्तमान मुख्यमंत्री किरण रेड्डी भी अपने किसी बडे़ जनाधार या चमत्कारिक व्यक्तित्व के कारण नहीं, बल्कि रेड्डी होने और जगनमोहन रेड्डी की कांग्रेस विरोधी मुहिम की हवा निकालने के लिए ही मुख्यमंत्री चुने गए हैं। वाईएसआर के भाई को मंत्रिमंडल में शामिल करना भी इसी कांग्रेसी कवायद का हिस्सा भर है, लेकिन लगता है कि कांग्रेस के ये सतही राजनीतिक टोटके कुछ काम नहीं कर पा रहे हैं और पार्टी के लिए प्रदेश में खतरा लगातार बढ़ता ही जा रहा है। जगनमोहन रेड्डी के बढ़ते जनाधार और राजनीतिक समर्थन से लगातार इसकी आहट मिल रही है और कांग्रेस है कि अपने बागी सांसदों एवं विधायकों के खिलाफ कार्रवाई की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रही है। आंध्र प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री ने स्वयं बागी विधायकों से मिलकर उन्हें अनुशासन की सीख देते हुए चेताया, लेकिन बागी नेताओं ने केंद्रीय एवं राज्य नेतृत्व को अनसुना करते हुए दिल्ली के धरने में शामिल होने को ही प्राथमिकता देना बेहतर समझा। इसके अलावा जगनमोहन रेड्डी का व्यवहार और राजनीतिक समर्थन का प्रत्युतर भी एक सधे हुए और बेहद कूटनीतिक राजनेता सरीखा है। दिल्ली में उन्होंने बेहद रोमानी अंदाज में अपने आप को एक भद्र पुरुष बताते हुए कहा कि वह पार्टी को न तोड़कर कांग्रेस का फायदा ही कर रहे हैं। अन्यथा, वह कभी भी सरकार गिरा सकते हैं। दरअसल, यह सज्जनता बेहद द्विअर्थी है। वह जानते हैं कि कांग्रेस को तोड़ने का यह सही समय नहीं है। यदि वह अभी कांग्रेस को दो फाड़ करके नई पार्टी का निर्माण करते हैं तो अभी तक उनके साथ होने का दावा करने वाले कई विधायक सत्ता के लोभ और कुर्सी के मोल भाव में वापस कांग्रेस के प्रति एकजुटता जाहिर कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में उनके जनसमर्थन पर भी फर्क पडे़गा, जो उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर दूरगामी परिणाम छोड़ सकता है। कांग्रेस की यह टूट पार्टी से उनके संवाद का रास्ता भी बंद कर देगी, जो संभवतया वह नहीं चाहते हैं, क्योंकि जगनमोहन रेड्डी की महत्वाकांक्षा कांग्रेस को तोड़ना नहीं, केवल मुख्यमंत्री पद ही है। यदि जनसंपर्क के लिए जगनमोहन रेड्डी द्वारा उठाए मुद्दों पर भी गौर किया जाए तो उनकी रणनीति अधिक स्पष्ट हो जाती है। जगनमोहन का राजनीतिक अभियान कृष्णा जल बंटवारे के आंध्र प्रदेश के परंपरागत भावनात्मक सवाल पर बात करता है या किसानों की दुर्दशा के तुलनात्मक रूप से अधिक सुरक्षित मसले पर, मगर वह तेलंगाना और विशाल आंध्र प्रदेश के सवाल पर वह बच निकलने का रास्ता ही तलाशते हैं। मुद्दों के चयन में उनकी यह सर्तकता उनके एक चतुर एवं महत्वाकांक्षी राजनेता होने के साथ उनकी भावी रणनीति का भी स्पष्ट संकेत है। यदि जगनमोहन रेड्डी तेलंगाना के सवाल पर कोई सख्त रुख अपनाते हैं तो वह न तो टीडीपी या टीआरएस के जानाधार में आंशिक साझेदारी से आगे बढ़ पाएंगे, न ही अपने नए जनाधार में टूट को रोक सकते हैं। यदि जैसा जगनमोहन कह रहे हैं कि उनके समर्थक विधायक अगले चुनाव यानी 2014 तक इंतजार करेंगे और अगला चुनाव उनकी पार्टी से ही लडे़गे तो उसमें जगनमोहन के कई छिपे हुए मंतव्य हैं। ऐसा करने से उनके समर्थक विधायकों और सांसदों की फूट से बचा जा सकता है और संभवतया तब तक तेलंगाना मसले का भी कुछ हल हो चुका होगा होगा। इसके अलावा इस बीच उन्हें अपनी पार्टी को बनाने और बढ़ाने का समय भी मिल ही जाएगा। जगनमोहन मामले पर डरी सहमी कांग्रेस के लिए आंध्र प्रदेश की राजनीति में यह समय बेहद मुश्किलों वाला है। वहां पक्ष विपक्ष में जितने भी समीकरण बन रहे हैं, वह सभी कांग्रेस के खिलाफ ही हैं। ऐसे में तय है कि फायदा किसी का भी हो, नुकसान तो तय है कि कांग्रेस का ही होगा और यह भी तय है कि यदि जगनमोहन रेड्डी की रणनीति कामयाब होती है तो दक्षिण भारत का सबसे बड़ा राज्य कांग्रेस के लिए दक्षिण का यूपी-बिहार ही सिद्ध होगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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