प्रदेश में 2012 में होने वाले विधानसभा चुनाव में ताल ठोंकने के लिए पंजीकृत सियासी दलों की आमद बढ़ती ही जा रही है। सूबे में करीब डेढ़ सौ छोटे दल सियासी अखाड़े में कूदने को तैयार हैं, जबकि कई सूरमाओं की दल बनाने की अर्जी केंद्रीय निर्वाचन आयोग के अनुमोदन का इंतजार कर रही है। विधानसभा चुनाव में यह किनको नुकसान पहुंचाएंगे अभी कहना मुश्किल है, लेकिन 2007 के चुनाव में कुछ छोटे दलों ने ही कई दर्जन सीटों पर बड़ों का समीकरण बिगाड़ दिया था। आजादी के बाद यूपी विधानसभा के पहले चुनाव में 12 राष्ट्रीय और दो प्रांतीय दल मैदान में उतरे। तब कोई पंजीकृत दल नहीं था, लेकिन 2012 में होने वाले चुनाव के लिए पंजीकृत दलों की संख्या डेढ़ सौ से अधिक हो गई है। 2007 में यूपी में 112 दलों ने किस्मत आजमाई। सूबे के मुख्य निर्वाचन अधिकारी उमेश सिन्हा के मुताबिक इस बार देश में 1178 पंजीकृत दल हैं। 1969 के विधानसभा चुनाव में भारतीय क्रांति दल, आर्य सभा, यूपी किसान मजदूर पार्टी समेत कुल 17 पंजीकृत दलों ने शिरकत की थी। तबसे यह सिलसिला थमा नहीं। बीच-बीच में इनकी संख्या घटती बढ़ती रही। 1974 में 16, 1977 में सात, 1980 में सात, 1985 में दो, 1989 में 26, 1991 में 23, 1993 में 25, 1996 में 23, 2002 में 75 और 2007 में 112 पंजीकृत दलों ने उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव लड़ा। इनमें अंबेडकर क्रांति दल, आदर्श लोकदल, आल इंडिया माइनारिटीज फ्रंट, भारतीय नागरिक पार्टी, बम पार्टी, जनसत्ता पार्टी, माडरेट पार्टी व विकास पार्टी जैसे कई दल हैं, जिन्हें 2007 में एक प्रतिशत भी मत हासिल नहीं हुए। सूबे का कोई कोना नहीं होगा, जहां के छोटे दल सियासी अखाड़े में न उतर गए हों। इनके कई रंग सामने आए हैं। बुंदेलखंड में सिने अभिनेता राजा बुंदेला बुंदेलखंड कांग्रेस, तो पूर्वी उत्तर प्रदेश में सामाजिक कार्यकर्ता जटाशंकर स्वराज, डा. संजय चौहान जनवादी, मुख्तार अंसारी के बड़े भाई पूर्व सांसद अफजाल अंसारी कौमी एकता दल तथा जातिराज किताब लिखकर हंगामा खड़ा करने वाले नौकरशाह लक्ष्मीकांत शुक्ल मेधा पार्टी से इस बार चुनावी मैदान में होंगे। पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह जनक्रांति पार्टी (राष्ट्रीय), सांसद अमर सिंह राष्ट्रीय लोकमंच व लोकसभा चुनाव में ताकत दिखा चुके डाक्टर अयूब पीस पार्टी के जरिए चुनावी बिगुल बजा चुके हैं। इसके अलावा पहले भी पार्टी बनाकर चुनाव लड़ चुके कई पूर्व नौकरशाह, दबंग और दागी, कारोबारी तथा इलाकाई नेता भी पंजीकृत दलों के जरिए फिर जनता के दरवाजे पर हैं। सियासी दलों की वृद्धि वोटों के बिखराव का सबसे बड़ा सबब बनेगी। 2007 के चुनाव में पंजीकृत दलों में लोकतांत्रिक कांग्रेस को एक, भारतीय जनशक्ति को एक, जनमोर्चा को एक, राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी को एक और उत्तर प्रदेश यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट को एक सीट मिली। पंजीकृत दलों में सर्वाधिक वोट पाने वाले अपना दल और फिर भारतीय समाज पार्टी को एक भी सीट नसीब नहीं हुई, जबकि पूर्वी उत्तर प्रदेश में कई सीटों पर बड़े दलों को समेट कर पीछे कर दिया। जनमोर्चा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कई लोगों की राह में रोड़ा बन गया। राजनीति में अपराधियों, कारोबारियों व नौकरशाहों की बढ़ती सक्रियता ने यह स्थिति पैदा की है। राजनीतिक विश्लेषक सुशील वर्मा कहते हैं कि यह राजनीति के व्यवसायी करण का नतीजा है। क्रिमिनल से लेकर कारोबारी तक को पता है कि यहां सुरक्षा, समृद्धि और शोहरत तीनों है। इसलिए सबकी रुझान यहीं हैं। हालांकि छोटे दलों के कई नेताओं का कहना है कि इससे लोकतंत्र को मजबूती मिलेगी और सियासी मंचों तक आम आदमी की पहंुच बनेगी।
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Thursday, December 8, 2011
दीदी ने दी कर्मचारियों व पेंशनरों को नए वर्ष की सौगात
राज्य के सरकारी कर्मचारियों व पेंशनरों के लिए नए वर्ष में खुशखबरी है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बुधवार को सरकारी कर्मचारियों के 12 संगठनों के साथ बैठक के बाद बकाया 23 फीसदी महंगाई भत्ते की पहली किस्त 10 प्रतिशत आगामी वर्ष जनवरी से कर्मचारियों को देने की घोषणा की है। मुख्यमंत्री ने कहा कि इससे राज्य के 10 लाख सरकारी कर्मचारी व 4.30 लाख पेंशनर लाभांवित होंगे। उन्होंने कहा कि 10 फीसदी डीए स्कूल, कालेज, नगर पालिका, पंचायत स्तर के कर्मचारियों को मिलेगा। बाकी 13 फीसदी डीए के भुगतान को लेकर बाद में विचार किया जाएगा। दस फीसदी डीए के भुगतान की घोषणा से कर्मचारी खुश हैं। मुख्यमंत्री बनर्जी ने कहा कि पिछली सरकार ने दो लाख से अधिक ऋण का बोझ छोड़ रखा है, जिस पर ब्याज के रूप में प्रतिमाह 15000 करोड़ रुपये देना पड़ रहा है। सरकारी की आर्थिक स्थित खराब होने के बावजूद कर्मचारियों के हित को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया है। इसके सरकार के कोष पर प्रतिमाह 250 करोड़ रुपये यानी सालाना 3000 करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा। उल्लेखनीय है कि पिछली सरकार के समय का 16 फीसदी व ममता सरकार के समय 7 फीसदी डीए का भुगतान कर्मचारियों को नहीं हो सका था। बकाया इन्हीं 23 फीसदी में से पहली किस्त के रूप में 10 फीसदी डीए के भुगतान की घोषणा की गई है। राज्य सरकार कर्मचारियों की वामपंथी संगठन राज्य को-आर्डिनेशन कमेटी के सचिव अनंत बनर्जी ने मुख्यमंत्री की घोषणा पर साधुवाद देते हुए कहा कि सरकार चाहती तो 16 फीसदी डीए का भुगतान हो सकता था, क्योंकि पिछली सरकार ने लेखानुदान में वर्ष 2011 व 12 के लिए डीए व वेतन के रूप में 55000 करोड़ रुपये पास किया था। वहीं दूसरी ओर युनाइटेड स्टेट गवर्नमेंट कर्मचारी फेडरेशन (बंगाल) के विश्वजीत भट्टचार्य, फेडरेशन आफ सेक्रेटेरिएट (बंगाल) के सचिव संजीव पाल, यूएसजीईएफ के पार्थ चटर्जी ने फैसले पर खुशी जताई है।
ममता को मनाने में जुटे केंद्र ने दिया विशेष आर्थिक पैकेज
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बीते माह पैट्रोल मूल्य वृद्धि के फैसले पर सहनशीलता दिखाने का यूपीए सहयोगी तृणमूल कांग्रेस को इनाम दे दिया है। केंद्र सरकार ने पश्चिम बंगाल की ममता बैनर्जी सरकार की काफी समय से चली आ रही आर्थिक पैकेज की मांग को पूरा करते हुए राज्य को लगभग नौ हजार करोड़ रुपये की विशेष आर्थिक सहायता देने का फैसला किया है। सरकार के उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अगुवाई में हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में पिछड़ा क्षेत्र विकास कोष से राज्य को विशेष आर्थिक सहायता देने के फैसले पर मुहर लगाई। इसके तहत राज्य को 8750 करोड़ रुपये की सहायता दी जानी है। तृणमूल समेत अन्य सहयोगियों के विरोध के चलते खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष विदेश निवेश के फैसले पर फौरी ब्रेक लगाने के बाद सरकार ने पश्चिम बंगाल की विशेष पैकेज मांग को पूरा कर अपने अहम सहयोगी को खुश करने की भी कोशिश की है। हालांकि यह बात और है कि ममता बैनर्जी की ओर से राज्य के लिए मांगी गई 19 हजार करोड़ रुपये की सहायता के मुकाबले सरकार ने अपने खजाने से फिलहाल आधी से भी कम रकम निकाली है। दरअसल, यूपीए सरकार ने बीते माह पैट्रोलियम मूल्य वृद्धि को लौटाने के लिए रौद्र रूप दिखा रही तृणमूल कांग्रेस ने विशेष आर्थिक पैकेज की अपनी मंशा स्पष्ट कर दी थी। जाहिर है पार्टी सरकार को संकट से बचाने की कीमत वसूलने का मौका नहीं गंवाना चाहती थी। मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने आठ नवंबर 2011 को पश्चिम बंगाल के राजभवन में केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के साथ अपनी मुलाकात में राज्य के लिए करीब 20 हजार करोड़ की सहायता की दरकार बताई थी। वहीं तृणमूल सांसदों ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आगे भी इसके लिए पेशबंदी की थी। महत्वपूर्ण है कि नवंबर में पैट्रोल की कीमतों में दो बार हुई बढ़ोतरी के खिलाफ तृणमूल ने सरकार से बाहर होने का भी दबाव बनाया था। तात्कालिक तौर पर तो मनमोहन सरकार ने अपने फैसले को जायज बताते हुए सख्ती दिखाई थी। साथ ही वित्त मंत्री विशेष आर्थिक पैकेज की मांग को भी ठुकरा दिया था। लेकिन बाद में सरकार की ओर से न केवल पैट्रोल की कीमतों में कमी का फैसला आया बल्कि राज्य के लिए पैकेज को भी मंजूरी मिल गई। वैसे पश्चिम बंगाल के लिए विशेष आर्थिक पैकेज की ममता बैनर्जी की मांग नई नहीं है। मई 2011 में राज्य की कमान संभालने के बाद से ममता इसकी मांग करती रही हैं। इसके वो हर मंच पर उठाती भी रही हैं। यह बात और है कि सरकार ने अपने अहम सहयोगी की मांग को कान तब दिए जब सियासी मुसीबत में वजूद बचाने के लिए उसका साथ अनिवार्य नजर आने लगा।
लोकपाल में आरक्षण न मिला तो नहीं चलने देंगे संसद
महंगाई, कालेधन और भ्रष्टाचार के सवालों के बीच देश के डेढ़ सौ से अधिक दलित सांसदों ने एससी, एसटी के आरक्षण के मुद्दे पर नई बहस छेड़ दी है। वे कार्यकारी आदेश से सरकारी नौकरियों में मिले इस आरक्षण के लिए संसद के इसी सत्र में कानून बनाने की मांग पर अड़ गए हैं। साथ ही प्रस्तावित लोकपाल में भी दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों व महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण की मांग कर दी है। ऐसा नहीं होने पर एससी-एसटी संसदीय फोरम ने संसद को न चलने देने की चेतावनी भी दे दी है। दलगत राजनीति से ऊपर उठकर अनुसूचित जाति-जनजाति (एसटी-(एससी) संसदीय फोरम के बैनर तले एकजुट सांसदों ने प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री नारायण सामी से बुधवार को यहां आरक्षण के मुद्दे पर फिर से बात की। नारायणसामी से मुलाकात के बाद फोरम के सदस्य व राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष पीएल पुनिया, फोरम के सचिव व राज्यसभा सदस्य जेडी सीलम, लोजपा प्रमुख व राज्यसभा सदस्य रामविलास पासवान ने बुधवार को यहां संसद भवन परिसर में पत्रकारों से कहा कि इन मसलों पर अब वे गुरुवार को प्रधानमंत्री से भी मिलेंगे। जबकि, संसद के पिछले सत्र में भी उनसे व नारायणसामी से मिल चुके हैं, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। पुनिया ने कहा कि प्रस्तावित लोकपाल के लिए बनने वाली सर्च कमेटी, सेलेक्शन कमेटी और लोकपाल के ढांचे (संस्था) में भी दलितों, पिछड़ों (ओबीसी), अल्पसंख्यकों व महिलाओं को मिलाकर 50 प्रतिशत आरक्षण मिलना चाहिए। सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जाति का 15 प्रतिशत व जनजाति का 7.5 प्रतिशत दशकों पुराना आरक्षण अभी तक महज एक कार्यकारी आदेश पर टिका हुआ है। फोरम की मांग इस आरक्षण के लिए संसद से कानून बनाने की है। नारायणसामी ने कानून मंत्रालय से मशविरा कर विधेयक लाने को कहा था, अब कुछ नहीं हुआ। फोरम की मांग न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति में भी एससी-एसटी का आरक्षण की है।
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