पहले से ही विपक्ष के दबाव से परेशान सत्तापक्ष के समक्ष यह मांग एक नई खतरे की घंटी है कि बजट सत्र सुचारु रूप से चलाने के लिए 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले पर संयुक्त संसदीय समिति गठित करने के साथ ही केंद्रीय सतर्कता आयुक्त पीजे थॉमस को हटाया जाए। भाजपा की यह नई मांग इस बात का परिचायक है कि उसने सत्तापक्ष पर दबाव और बढ़ा दिया है। संभवत: उसे यह अहसास हो चुका है कि केंद्र सरकार अपनी साख बचाने के लिए हाथ-पांव मार रही है। यह आश्चर्यजनक है कि विपक्षी दल सत्तापक्ष पर अपना दबाव लगातार बढ़ाते जा रहे हैं, लेकिन वह ऐसे संकेत दे रहा है जैसे कुछ हुआ ही न हो। यह तब है जब उसे विपक्ष के साथ-साथ आम जनता के सवालों के जवाब भी नहीं सूझ रहे हैं। केंद्रीय सत्ता को अब तक यह प्रतीति हो जानी चाहिए कि विपक्ष के सवालों में आम जनता की भावनाएं भी निहित हैं। उसे केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि आम जनता को भी संतुष्ट करना है। विडंबना यह है कि उसके समक्ष ऐसे सवाल बढ़ते जा रहे हैं जिनका जवाब देना इसलिए मुश्किल हो रहा है, क्योंकि केंद्रीय सत्ता के नीति-नियंता ठोस फैसले लेने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं और इसका ताजा प्रमाण है पीजे थॉमस के मामले में कांग्रेस और साथ ही केंद्र सरकार की किंकर्तव्यविमूढ़ता। केंद्र सरकार केवल 2 जी स्पेक्ट्रम आवंटन से ही नहीं घिरी, बल्कि वह आदर्श सोसाइटी घोटाले और राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान की गई लूट संबंधी सवालों से भी दो चार है। केंद्र सरकार किस तरह एक मामले से निपटने के पहले ही दूसरे के सामने आ खड़ी होती है, इसका ताजा उदाहरण काले धन का मुद्दा है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि काला धन जमा करने वालों के नाम-पते जानना और इस धन को वापस लाना आसान कार्य नहीं, लेकिन यह निराशाजनक है कि केंद्र सरकार ने अपने आचरण से देश-दुनिया को यह संदेश देने की कोशिश की कि इस मामले में कुछ विशेष नहीं किया जा सकता। शायद यही कारण है कि उसे उच्चतम न्यायालय के कुछ कठिन सवालों का सामना करना पड़ा। उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी से यह स्पष्ट हुआ कि केंद्र सरकार ने संसद में आश्वासन देने के बावजूद उन लोगों की खोज-खबर लेने की कोशिश नहीं की जिन्होंने काला धन विदेशी बैंकों में जमाकर रखा है और जिनके नाम-पते भी उसे हासिल हो गए हैं। उच्चतम न्यायालय ने यह बिल्कुल सही कहा कि आखिर यह पता करने की कोशिश क्यों नहीं की गई कि इन लोगों की आय के Fोत क्या हैं? यह निराशाजनक ही नहीं, बल्कि चिंताजनक है कि इस सवाल का जवाब खोजने के बजाय सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। ध्यान रहे कि उसने कुछ ऐसा ही नीरा राडिया टेप प्रकरण में भी किया था और स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले तथा राष्ट्रमंडल खेलों में हुए घपले-घोटाले के मामलों में भी। इन सभी ज्वलंत मुद्दों पर केंद्रीय सत्ता के आचरण से आम जनता इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए विवश है कि वह शासन करने की इच्छाशक्ति खोती जा रही है। यदि ऐसी सरकार पर विपक्षी दलों का दबाव लगातार बढ़ता जाए तो इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं।
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Thursday, February 3, 2011
खतरे की नई घंटी
पहले से ही विपक्ष के दबाव से परेशान सत्तापक्ष के समक्ष यह मांग एक नई खतरे की घंटी है कि बजट सत्र सुचारु रूप से चलाने के लिए 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले पर संयुक्त संसदीय समिति गठित करने के साथ ही केंद्रीय सतर्कता आयुक्त पीजे थॉमस को हटाया जाए। भाजपा की यह नई मांग इस बात का परिचायक है कि उसने सत्तापक्ष पर दबाव और बढ़ा दिया है। संभवत: उसे यह अहसास हो चुका है कि केंद्र सरकार अपनी साख बचाने के लिए हाथ-पांव मार रही है। यह आश्चर्यजनक है कि विपक्षी दल सत्तापक्ष पर अपना दबाव लगातार बढ़ाते जा रहे हैं, लेकिन वह ऐसे संकेत दे रहा है जैसे कुछ हुआ ही न हो। यह तब है जब उसे विपक्ष के साथ-साथ आम जनता के सवालों के जवाब भी नहीं सूझ रहे हैं। केंद्रीय सत्ता को अब तक यह प्रतीति हो जानी चाहिए कि विपक्ष के सवालों में आम जनता की भावनाएं भी निहित हैं। उसे केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि आम जनता को भी संतुष्ट करना है। विडंबना यह है कि उसके समक्ष ऐसे सवाल बढ़ते जा रहे हैं जिनका जवाब देना इसलिए मुश्किल हो रहा है, क्योंकि केंद्रीय सत्ता के नीति-नियंता ठोस फैसले लेने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं और इसका ताजा प्रमाण है पीजे थॉमस के मामले में कांग्रेस और साथ ही केंद्र सरकार की किंकर्तव्यविमूढ़ता। केंद्र सरकार केवल 2 जी स्पेक्ट्रम आवंटन से ही नहीं घिरी, बल्कि वह आदर्श सोसाइटी घोटाले और राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान की गई लूट संबंधी सवालों से भी दो चार है। केंद्र सरकार किस तरह एक मामले से निपटने के पहले ही दूसरे के सामने आ खड़ी होती है, इसका ताजा उदाहरण काले धन का मुद्दा है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि काला धन जमा करने वालों के नाम-पते जानना और इस धन को वापस लाना आसान कार्य नहीं, लेकिन यह निराशाजनक है कि केंद्र सरकार ने अपने आचरण से देश-दुनिया को यह संदेश देने की कोशिश की कि इस मामले में कुछ विशेष नहीं किया जा सकता। शायद यही कारण है कि उसे उच्चतम न्यायालय के कुछ कठिन सवालों का सामना करना पड़ा। उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी से यह स्पष्ट हुआ कि केंद्र सरकार ने संसद में आश्वासन देने के बावजूद उन लोगों की खोज-खबर लेने की कोशिश नहीं की जिन्होंने काला धन विदेशी बैंकों में जमाकर रखा है और जिनके नाम-पते भी उसे हासिल हो गए हैं। उच्चतम न्यायालय ने यह बिल्कुल सही कहा कि आखिर यह पता करने की कोशिश क्यों नहीं की गई कि इन लोगों की आय के Fोत क्या हैं? यह निराशाजनक ही नहीं, बल्कि चिंताजनक है कि इस सवाल का जवाब खोजने के बजाय सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। ध्यान रहे कि उसने कुछ ऐसा ही नीरा राडिया टेप प्रकरण में भी किया था और स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले तथा राष्ट्रमंडल खेलों में हुए घपले-घोटाले के मामलों में भी। इन सभी ज्वलंत मुद्दों पर केंद्रीय सत्ता के आचरण से आम जनता इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए विवश है कि वह शासन करने की इच्छाशक्ति खोती जा रही है। यदि ऐसी सरकार पर विपक्षी दलों का दबाव लगातार बढ़ता जाए तो इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं।
रथ से मनोरथ हासिल करने में जुटी भाजपा
भाजपा में फिर से रथ यात्राओं का युग आ गया है। भाजयुमो की कोलकाता से कश्मीर तक की राष्ट्रीय एकता यात्रा अभी-अभी पूरी हुई ही थी कि पश्चिम बंगाल में नव जागरण यात्रा शुरू हो गई है। इन दोनों की देखा-देखी उत्तर प्रदेश में भी यात्रा को लेकर सुगबुगाहट है। राज्य का युवा मोर्चा अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए माहौल बनाने परिवर्तन यात्रा निकालने का मन बना रहा है। अगर केंद्रीय नेतृत्व से हरी झंडी मिल गई तो जल्दी ही उत्तर प्रदेश की सड़कों पर भी भाजपा का रथ दौड़ रहा होगा। पार्टी नेताओं का मानना है कि रथ यात्राओं से न केवल सघन जन सपंर्क हो रहा है, बल्कि काडर भी सक्रिय हो रहा है। रणनीति के मुताबिक ही इन यात्राओं का नेतृत्व शीर्ष नेताओं के बजाए छोटे नेताओं के हाथ में रहे और बड़े नेता उनमें शामिल होकर उनका स्तर बनाए रखे। इससे बड़े नेताओं में टकराहट भी नहीं होगी और नया नेतृत्व भी आगे बढ़ेगा। पार्टी को इसके लिए कोई ज्यादा खर्च भी नहीं करना पड़ रहा है। इन यात्राओं के लिए भाजपा पुराने रथों का इस्तेमाल कर रही है। राष्ट्रीय एकता यात्रा में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के रथ को नया रंग-रूप दिया गया था, तो अब पश्चिम बंगाल में रविवार से शुरू हुई नवजागरण यात्रा में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह की यात्रा में उपयोग किए गए रथ का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस साल होने वाले पांच राज्यों के चुनाव के बाद भाजपा के लिए बड़ा मोर्चा उत्तर प्रदेश है। वहां पर प्रदेश के बड़े नेताओं को सुपर टीम के रूप में मोर्चे पर लगाने के साथ सर्वेक्षणों के जरिए उम्मीदवारों की खोज भी शुरू हो गई है। प्रदेश के विभन्न हिस्सों में बड़ी रैलियां करने के कार्यक्रम लगभग तैयार हैं। संगठन को भी नए सिरे से कसा जा रहा है। जल्दी ही कुछ लोगों की जिम्मेदारियों में फेरबदल किए जाने की संभावना है। इधर राज्य भाजपा का युवा मोर्चा भी सक्रिय हुआ है। युवा मोर्चा की राष्ट्रीय एकता यात्रा के दौरान प्रदेश युवा मोर्चा के अध्यक्ष हरीश द्विवेदी के नेतृत्व में राज्य में सफल सभाओं का आयोजन करने में सफलता हासिल की है। इनमें कुछ सभाओं में तो पार्टी के अनुमान से ज्यादा भीड़ जुटी। बाद में जम्मू-कश्मीर में प्रवेश कर गिरफ्तारी देने वालों में भी प्रदेश का जत्था सबसे अग्रणी रहा। राष्ट्रीय एकता यात्रा को प्रदेश में मिले समर्थन से उत्साहित युवा मोर्चा ने राज्य में परविर्तन यात्रा निकालने का मन बनाया है। इस मामले पर केंद्रीय नेतृत्व विचार कर जल्द ही निर्णय ले सकता है।
काले धन पर राहुल का बयान सिर्फ मजाक
काले धन पर कांगे्रस महासचिव राहुल गांधी के बयान को भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने मजाक बताया है। उन्होंने कहा कि विदेश में जमा भारतीयों के काले धन को वापस देश लाने के मुद्दे पर कांगे्रस विरोधाभासी स्थिति में है। राहुल ने औरंगाबाद में शनिवार को कहा था कि विदेशी बैंकों में जमा काला धन आम भारतीयों का है और इसे वापस लाकर जनकल्याण कार्यो में खर्च किया जाना चाहिए। यहां मीडिया से बातचीत में गडकरी ने कहा कांगे्रस एक तरफ उन लोगों के नाम उजागर नहीं कर रही, जिनका काला धन विदेश में है। जबकि राहुल गांधी उनका पर्दाफाश करने और धन को वापस लाने की बात कर रहे हैं। यह वाकई मजाक है। गडकरी ने सरकार से जानना चाहा है कि आखिर वह क्यों अपराधियों का नाम छुपा रही है। क्या उसे रोक रहा है? इस साल मई में तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इस पर गडकरी ने कहा कि उनकी पार्टी किसी अन्य दल से समर्थन नहीं मांगेगी, लेकिन यदि कोई उनके साथ आना चाहता है तो इंकार नहीं करेगी। उन्होंने कर्नाटक का उदाहरण दिया कि कभी वहां उनकी पार्टी के सिर्फ दो विधायक थे, आज भाजपा की सरकार है। गडकरी ने सरकार की इस बात को गलत बताया कि उसे मुख्य सतर्कता आयुक्त पी.जे. थॉमस पर पूर्व में लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की खबर नहीं थी। उन्होंने कहा कि इस मामले की चयन समिति में सुषमा स्वराज भी थीं और उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लिखित में थॉमस के चयन का विरोध किया था। गडकरी ने कहा कि स्वराज अपनी इस की सत्यता स्थापित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा पेश करेंगी। संचार मंत्री कपिल सिब्बल द्वारा शनिवार को शुरू की गई नई दूरसंचार नीति के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि इसमें पारदर्शिता की जरूरत है।
राज्य चुनावों में मनरेगा का नुस्खा अपनाएगी सरकार
पिछले लोकसभा चुनाव में कामयाब रहे मनरेगा के नुस्खे को सरकार ने गांठ बांध लिया है। यही वजह है कि अब वह राज्य विधानसभा चुनावों में भी इसका फायदा उठाने की तैयारी में अभी से जुट गई है। मनरेगा में मजदूरी बढ़ाना भी इसी रणनीति का हिस्सा है। अब इस मुहिम को आगे बढ़ाते हुए खुद प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी चुनावी राज्यों के ज्यादा से ज्यादा जमीनी प्रतिनिधियों से रूबरू होकर इस स्कीम के बारे में आगे की नब्ज टटोलेंगे। कांग्रेस इस बार मनरेगा की मजदूरी में 30 फीसदी तक की वृद्धि को मुद्दा बनाएगी। जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, उनमें राज्य के न्यूनतम वेतन से इसकी तुलना की जाएगी। ग्रामीण विकास मंत्रालय की ओर से आयोजित मनरेगा मेला में देश के सभी राज्यों से लगभग डेढ़ हजार पंचायत प्रतिनिधियों को बुलाया गया है। इनमें ग्राम सभा, ब्लॉक समिति और जिला परिषद के उन प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया है, जिन्होंने मनरेगा के क्रियान्वयन में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है। इनमें भी उन राज्यों को ज्यादा तरजीह दी गई है जहां चालू वर्ष में ही विधानसभा चुनाव होने हैं। यहां कांग्रेस समेत संप्रग के अन्य घटक दलों की राजनीतिक साख दांव पर लगी हुई है। वाम शासित पश्चिम बंगाल में कांग्रेस तृणमूल कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव मैदान में उतर रही है। जबकि तमिलनाडु की सत्ता पर काबिज संप्रग के घटक डीएमके के साथ कांग्रेस चुनाव लड़ेगी। मनरेगा मेला में तमिलनाडु के तिरुअन्नामलाई जिले को उत्कृष्ट कार्य के लिए पुरस्कृत किया जाएगा। तथ्य यह है कि जिन सात राज्यों की ग्राम पंचायतों को पुरस्कृत करने के लिए चुना गया है, उनमें केरल और पश्चिम बंगाल की पंचायतें शामिल हैं। पिछले पांच सालों में मनरेगा की मजदूरी में दोगुना से अधिक वृद्धि हुई है। हाल ही में मनरेगा मजदूरी में 17 से 30 फीसदी तक की वृद्धि की गई है। तमिलनाडु और पुडुचेरी में मजदूरी 119 रुपये, असम और पश्चिम बंगाल में 130 रुपये और केरल में 150 रुपये हो गई है। इस बात का फायदा संप्रग के घटक दल अपने-अपने चुनावी राज्यों में उठाने की तैयारी में हैं।
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