लखनऊ यह यूपी है। यहां वोटो की जुगत के लिए आरक्षण की मलाई खूब परोसी जाती है। 1995 में प्रदेश की पिछड़ा वर्ग सूची में 55 जातियां थीं और आज की तारीख में यह संख्या 79 पहुंच चुकी है। लगभग डेढ़ दर्जन नई जातियों को पिछड़ा वर्ग सूची में शामिल करने की पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिश सरकार के समक्ष विचाराधीन है तो लगभग दो दर्जन जातियों को लेकर आयोग के समक्ष प्रत्यावेदन लंबित हैं। अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग की जो सूची है, उसमें बदलाव केंद्र के स्तर से और वह भी संसद की मंजूरी के बाद ही हो सकता है। राज्य स्तर से उसमें कोई नई जाति को शामिल करना या हटाना संभव नहीं है, लेकिन राज्य स्तर पर बनने वाली पिछड़ा वर्ग की सूची में कोई नई जाति शामिल करने या किसी जाति को सूची से बाहर करने का अधिकार राज्य सरकार में निहित है, इसी वजह से इस सूची को लेकर सबसे ज्यादा राजनीतिक खेल होते हैं। उप्र की पिछड़ा वर्ग की सूची में जो 24 नई जातियां शामिल की गई, वह 1995 से 2000 की अवधि में शामिल की गई। यह वह अवधि थी जब प्रदेश में बसपा और भाजपा की सरकार रहीं हैं। दरअसल, ये दोनो पार्टियां उप्र की सियासत में समाजवादी पार्टी के यादव वोट बैंक को काउंटर करने के लिए दूसरी पिछड़ी जातियों, खास तौर से अति पिछड़ों को लामबंद करने की शुरू से ख्वाहिशमंद रही हैं। उसी के चलते पिछड़ा वर्ग सूची से बाहर चलने वाली अति पिछड़ी जातियों को सूची में शामिल करा उन्हें अपने पाले में करने की इस अवधि में दोनों दलों के बीच होड़ दिखी और यह होड़ अभी भी बरकरार है। बसपा सरकार के इसी कार्यकाल में राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग लगभग डेढ़ दर्जन नई जातियों को पिछड़ा वर्ग सूची में शामिल करने की सिफारिश कर चुका है। हालांकि सरकार के स्तर पर अभी उस पर कोई निर्णय नहीं किया गया है, लेकिन जानकारों का कहना है कि विधानसभा चुनाव से पूर्व इनमें से कुछ जातियों को पिछड़ा वर्ग सूची में शामिल करने का निर्णय प्रदेश सरकार कर सकती है। सरकारी नौकरियों से लेकर सरकारी योजनाओं में आरक्षण का आकर्षण तमाम जातियों को पिछड़ा वर्ग सूची में शामिल होने की बेकरारी का कारण बन गया है। दो दर्जन जातियों को पिछड़े वर्ग में शामिल करने के प्रत्यावेदन पर राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग विचार कर रहा है।
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Thursday, March 17, 2011
Wednesday, February 9, 2011
उत्तर प्रदेश में कोई नया कर नहीं
मंगलवार को राज्य के वित्त मंत्री लालजी वर्मा ने विधानसभा 169416 करोड़ रुपये का बजट पेश किया। यह मायावती सरकार के वर्तमान कार्यकाल का अंतिम बजट है। सियासी भाषा में कहे तो चुनावी बजट। यही वजह है कि इसमें न तो कोई नया कर थोपा गया है और न ही कोई नई योजना की बात कही गई है। बावजूद इसके सरकार ने अपने वोट बैंक को संदेश दे दिया कि न हमारी विचारधारा में फर्क आया है और न ही हमारी प्रतिबद्धता बदली है। सर्वसमाज के हितों की तरफ ध्यान दिया, लेकिन प्राथमिकता दलित, शोषित एवं वंचित वर्ग को ही दी। चूंकि यह चुनावी बजट है। जाहिर है विपक्ष को रास नहीं आना था वहीं हुआ भी। बजट को लेकर विपक्ष सरकार पर हमलावर रहा उसने इसे जनता को झूठा सब्जबाग दिखाने की कवायद करार दिया, लेकिन सत्ता पक्ष ने सदन में तालियां बजाकर इसका स्वागत किया और इसे आम आदमी का बजट बताया। बजट की सबसे खास बात यह रही कि इस बार सरकार ने पार्को, स्मारकों के अपने प्रेम का खुलकर इजहार किया। इनकी सुरक्षा एवं रखरखाव के लिए 122 करोड़ रुपये खर्च करने का बजट में प्रावधान किया है। इसमें यह भी उल्लेख किया गया है कि कांशीराम ग्रीन पार्क, रमाबाई पार्क का अभी और विस्तार होगा और इसके लिए बजट में अलग से प्रावधान किया गया है। बजट में इस बार स्पेशल कम्पोनेंट प्लान में लगभग सात प्रतिशत (6.8) की बढ़ोत्तरी की है। पिछले साल के बजट में इस मद का बजट जहां 9000 करोड़ के आसपास था, वहीं इस बार 9722 करोड़ रुपये कर दिया। महंगाई का मुद्दा चुनाव में टर्निग प्वाइंट बनता है। बजट भाषण में न केवल इसे छुआ गया, बल्कि जनता की नाराजगी को केंद्र की तरफ मोड़ने की कोशिश की गई। इशारा साफ था कि केंद्र की गलत नीतियों एवं किसान विरोधी मानसिकता के कारण महंगाई बढ़ रही है। इसी साल स्थानीय निकाय चुनाव होने हैं और उसके बाद विधानसभा चुनाव। शायद यही वजह है कि बजट में शहरों पर खास मेहरबानी दिखाई गई। शहरी अवस्थापना सुविधाओं के लिए पांच हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। हालंाकि विपक्ष इसे अपर्याप्त बता रहा हैं। नए बजट में बुनकरों के लिए स्वास्थ बीमा योजना शुरू करने बात कर एक बड़े तबके को खुश करने की कोशिश की गई है। पावरलूम के आधुनिकीकरण को भी योजना शुरू की जाएगी और इसके लिए लगभग सवा करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई है। अल्पसंख्यकों का ध्यान भी अपनी तरफ खींचने की कोशिश हुई है। मदरसों में आधुनिक शिक्षा देने के लिए इस साल 50 हजार करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई है। अल्पसंख्यक छात्रों की छात्रवृत्ति के लिए 294 करोड़ और शुल्क प्रतिपूर्ति के लिए छह करोड़ रुपये का प्रावधान बजट में किया गया है। सामाजिक सुरक्षा की योजनाओं का बजट भी पिछले साल की तुलना में 15 प्रतिशत वृद्धि कर इसे 10084 करोड़ रुपये कर दिया गया है। आंतरिक सुरक्षा पर हाथ तंग यूपी के बजट में आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर सरकार का हाथ तंग दिखा। सूबे में नक्सली और आतंकी घटनाओं का डर बना है, लेकिन उससे निबटने को कोई वृहद प्लान का प्रस्ताव बजट में नहीं किया है। कमांडो बल की तैनाती, नक्सल प्रभावित सीमावर्ती राज्यों से समन्वय से एक कार्य योजना तैयार करने का अपना पुराना वादा दोहराया भर गया है। हां, भारत-नेपाल सीमा की सुरक्षा के लिए सड़कों के निर्माण के लिए 132 करोड़ का प्रावधान किया गया है। अग्निशमन, पुलिस आधुनिकीकरण जैसी योजनाओं के बजट में भी मामूली वृद्धि की गयी है।
Thursday, February 3, 2011
रथ से मनोरथ हासिल करने में जुटी भाजपा
भाजपा में फिर से रथ यात्राओं का युग आ गया है। भाजयुमो की कोलकाता से कश्मीर तक की राष्ट्रीय एकता यात्रा अभी-अभी पूरी हुई ही थी कि पश्चिम बंगाल में नव जागरण यात्रा शुरू हो गई है। इन दोनों की देखा-देखी उत्तर प्रदेश में भी यात्रा को लेकर सुगबुगाहट है। राज्य का युवा मोर्चा अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए माहौल बनाने परिवर्तन यात्रा निकालने का मन बना रहा है। अगर केंद्रीय नेतृत्व से हरी झंडी मिल गई तो जल्दी ही उत्तर प्रदेश की सड़कों पर भी भाजपा का रथ दौड़ रहा होगा। पार्टी नेताओं का मानना है कि रथ यात्राओं से न केवल सघन जन सपंर्क हो रहा है, बल्कि काडर भी सक्रिय हो रहा है। रणनीति के मुताबिक ही इन यात्राओं का नेतृत्व शीर्ष नेताओं के बजाए छोटे नेताओं के हाथ में रहे और बड़े नेता उनमें शामिल होकर उनका स्तर बनाए रखे। इससे बड़े नेताओं में टकराहट भी नहीं होगी और नया नेतृत्व भी आगे बढ़ेगा। पार्टी को इसके लिए कोई ज्यादा खर्च भी नहीं करना पड़ रहा है। इन यात्राओं के लिए भाजपा पुराने रथों का इस्तेमाल कर रही है। राष्ट्रीय एकता यात्रा में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के रथ को नया रंग-रूप दिया गया था, तो अब पश्चिम बंगाल में रविवार से शुरू हुई नवजागरण यात्रा में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह की यात्रा में उपयोग किए गए रथ का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस साल होने वाले पांच राज्यों के चुनाव के बाद भाजपा के लिए बड़ा मोर्चा उत्तर प्रदेश है। वहां पर प्रदेश के बड़े नेताओं को सुपर टीम के रूप में मोर्चे पर लगाने के साथ सर्वेक्षणों के जरिए उम्मीदवारों की खोज भी शुरू हो गई है। प्रदेश के विभन्न हिस्सों में बड़ी रैलियां करने के कार्यक्रम लगभग तैयार हैं। संगठन को भी नए सिरे से कसा जा रहा है। जल्दी ही कुछ लोगों की जिम्मेदारियों में फेरबदल किए जाने की संभावना है। इधर राज्य भाजपा का युवा मोर्चा भी सक्रिय हुआ है। युवा मोर्चा की राष्ट्रीय एकता यात्रा के दौरान प्रदेश युवा मोर्चा के अध्यक्ष हरीश द्विवेदी के नेतृत्व में राज्य में सफल सभाओं का आयोजन करने में सफलता हासिल की है। इनमें कुछ सभाओं में तो पार्टी के अनुमान से ज्यादा भीड़ जुटी। बाद में जम्मू-कश्मीर में प्रवेश कर गिरफ्तारी देने वालों में भी प्रदेश का जत्था सबसे अग्रणी रहा। राष्ट्रीय एकता यात्रा को प्रदेश में मिले समर्थन से उत्साहित युवा मोर्चा ने राज्य में परविर्तन यात्रा निकालने का मन बनाया है। इस मामले पर केंद्रीय नेतृत्व विचार कर जल्द ही निर्णय ले सकता है।
Wednesday, January 26, 2011
नए परिसीमन से फिलहाल घाटे में भाजपा
उत्तराखंड विधानसभा के आगामी चुनाव में लगभग एक साल बाकी है। चुनाव के बाद सत्ता किस करवट बैठेगी अभी यह भी तय नहीं है। बावजूद इसके यह अभी से तय है कि सूबे में सत्तासीन भाजपा आधा दर्जन से ज्यादा सीटों के घाटे के साथ चुनावी समर में उतरेगी। नुकसान भाजपा की मुख्य प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस को भी उठाना पड़ रहा है, लेकिन अपेक्षाकृत काफी कम, महज एक विधानसभा सीट का। अलबत्ता, मौजूदा विधानसभा में बहुजन समाज पार्टी व उत्तराखंड क्रांति दल ऐसे किसी भी नुकसान से साफ बचते नजर आ रहे हैं। चुनाव से पहले ही विधानसभा सीटों के नुकसान का यह समीकरण किसी सियासी जोड़-तोड़ का नतीजा नहीं है, बल्कि यह है राज्य विधानसभा सीटों के नए परिसीमन से उभरी तस्वीर है। अगले चुनाव नए परिसीमन के आधार पर होना तय है ऐसे में सियासी दलों को इससे प्रथमदृष्टया होने वाले लाभ हानि का गणित साफ दिखाई दे रहा है। सत्तारूढ़ भाजपा को आधा दर्जन से अधिक और मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस को एक सीट का नुकसान इसी परिसीमन प्रक्रिया के नतीजों के रूप में होता नजर आ रहा है। सत्तारूढ़ भाजपा के पास मौजूदा विधानसभा में जितनी सीटें हैं उनमें से आधा दर्जन से ज्यादा चुनाव से पहले ही कम होने जा रही हैं। इन सीटों पर अभी भाजपा विधायक हैं। मसलन, राज्य के बागेश्र्वर जिले में तीन विधानसभा सीटें हैं और वर्तमान में तीनों भाजपा के ही पास हैं, लेकिन नए परिसीमन में यहां एक सीट खत्म हो गई है। यानि भाजपा को एक सीट का नुकसान। कमोवेश यही स्थिति चमोली जिले की भी है, जहां फिलवक्त चारों सीटें भाजपा के पास हैं,लेकिन भविष्य में इस जिले की एक सीट, नंदप्रयाग खत्म हो जाएगी।, मतलब सीधे-सीधे भाजपा को एक सीट का नुकसान यहां भी होगा। आरक्षण की नई व्यवस्था के कारण भी भाजपा को कई सीटों का घाटा उठाना पड़ रहा है। मसलन, ऊधमसिंह नगर जिले की बाजपुर सीट अब अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गई है तो टिहरी जिले की धनोल्टी सीट आरक्षण के दायरे से बाहर हो गई है। ऐसा ही देहरादून जिले की सहसपुर व राजपुर सीटों के साथ भी हुआ है। रिजर्व सीट सहसपुर अब सामान्य हो रही है तो अभी सामान्य श्रेणी की राजपुर सीट नए परिसीमन में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गई है। इन सभी सीटों पर सिटिंग विधायक भाजपा के हैं, यानि इनके इन सीटों से मैदान में न उतरने का खामियाजा भी पार्टी को उठाना पड़ सकता है। कुछ ऐसी ही स्थिति पौड़ी जिले में भी है, जहां वर्तमान में आठ से में पांच विधायक भाजपा के हैं, लेकिन नए परिसीमन में यहां केवल छह सीटें रह गई हैं। कह सकते हैं कि यहां भी घाटा भाजपा को ही है। इसके उलट कांग्रेस को भाजपा के मुकाबले कहीं कम घाटे की स्थिति का सामना करना पड़ेगा। मसलन, कांग्रेस के सिटिंग विधायक वाली एकमात्र कनालीछीना सीट ही नए परिसीमन में अस्तित्वविहीन हुई है। जाहिर है ऐसे में नए परिसीमन से कांग्रेस को मात्र एक सीट का नुकसान। बसपा और उक्रांद इस मायने में जरूर भाग्यशाली हैं कि उन्हें ऐसी किसी असहज स्थिति से दो-चार नहीं होना पड़ रहा है।
Sunday, January 9, 2011
एक के लिए चार राज्यों को नहीं खोएगी कांग्रेस
एक के लिए चार प्रदेशों को खोना कतई सही फैसला नहीं होगा। कांग्रेस नेतृत्व के यह मन बनाने के बाद अब अलग तेलंगाना की राह फिलहाल प्रशस्त होने की उम्मीद न के बराबर है। अलबत्ता पार्टी कोर ग्रुप ने राज्य में, खास तौर से तेलंगाना में उपद्रव न बढ़ने देने के लिए अर्द्धसैनिक बल भारी तादाद में आंध्र प्रदेश भेज ही दिए हैं। अगर जरूरी समझा गया तो सेना को भी भेजने का विकल्प खुला रखा गया है। अलबत्ता, इस दौरान सभी दलों के साथ बातचीत के बाद तेलंगाना स्वायत्त क्षेत्रीय परिषद के फार्मूले को ही केंद्र सरकार आगे बढ़ाएगी। सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ हुई पार्टी की कोर ग्रुप की बैठक में तेलंगाना और महंगाई पार्टी के एजेंडे में ऊपर थे। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने मुद्रास्फीति और महंगाई काबू करने के सरकारी उपायों पर सदस्यों को जानकारी दी। अलबत्ता, ज्यादातर समय तेलंगाना पर ही चर्चा हुई। कांग्रेस को तेलंगाना की चिंता तो है, लेकिन छोटे राज्य के पक्ष में आगे बढ़ने पर इसी साल दो चुनाव वाले राज्यों में ही संकट खड़ा हो सकता है। पश्चिम बंगाल में गोरखालैंड तो असम में बोडोलैंड को लेकर भी भावनाएं उफान मारने की आशंका है। इसके अलावा महाराष्ट्र से विदर्भ को अलग करने की मांग भी बहुत पुरानी है। उत्तर प्रदेश को तीन हिस्सों-पूर्वाचल, हरित प्रदेश और बुंदेलखंड में बांटने की पैरवी भी लगातार होती रही है। ऐसे में केंद्रीय नेतृत्व इस मुद्दे पर बहुत संभल कर आगे बढ़ रहा है। गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने सुरक्षा उपायों के बारे में कोर ग्रुप को जानकारी दी और प्रणब मुखर्जी, रक्षा मंत्री एके. एंटनी और सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल ने राजनीतिक समाधान के कुछ सुझाव दिए। इसके तहत पहले अपनी पार्टी के सांसदों और नेताओं को क्षेत्रीय परिषद के लिए तैयार किया जाएगा। इसके बाद इस आंदोलन या मांग से जुड़ी पार्टियों टीआरएस और भाजपा के अलावा टीडीपी समेत जनवरी के तीसरे हफ्ते में सर्वदलीय बैठक बुलाने की योजना है। छोटे राज्य के खिलाफ बागी जगनमोहन अगले हफ्ते एक हजार लोगों के साथ दिल्ली में धरने पर आ रहे हैं, इस तथ्य को भी इंगित किया गया। इस बात पर सहमति थी कि कांग्रेस अपनी तरफ से पत्ते बिल्कुल नहीं खोलेगी। तेलंगाना विरोधी या समर्थक कांग्रेस नेताओं को भी संयम रखने के लिए कहा जाएगा। चूंकि, पार्टी आंध्र में नुकसान तय मान रही है, लिहाजा उसकी कोशिश वहां हिंसा रोक कर दूसरे राज्यों में छोटे प्रदेशों की मांग रोकना प्राथमिकता पर होगी।
Tuesday, December 28, 2010
चार साल में एक बिंदु पर ही काम हुआ
उत्तराखंड सरकार से समर्थन वापसी के बाद पत्रकारों से मुखातिब उक्रांद अध्यक्ष त्रिवेंद्र सिंह पंवार ने विस्तार से दल की नाराजगी का खुलासा किया। उन्होंने कहा कि दल ने भाजपा सरकार को नौ बिंदुओं पर सशर्त समर्थन दिया था। नौ में एक बिंदु भू-अध्यादेश पर आंशिक रूप से काम हुआ, वह भी उक्रांद कोटे के कैबिनेट मंत्री के प्रयासों से संभव हो सका। भाजपा सरकार से समर्थन वापसी के अपने तर्क के समर्थन में पंवार ने नौ बिंदु गिनाए। उन्होंने कहा कि समर्थन का पहला बिंदु गैरसैंण राजधानी को लेकर था। भाजपा ने विश्वास दिलाया था कि गैरसैंण को राज्य की राजधानी बनाने के लिए जनहित में कार्य किया जाएगा, लेकिन यह मुद्दा दरकिनार किया गया। दूसरा बिंदु विकल्पधारियों की वापसी को लेकर था। समर्थन देते समय राज्य में 18000 विकल्पधारी थे। उक्रांद के दबाव के बावजूद सिर्फ 6000 विकल्पधारियों को ही वापस भेजा जा सका। अभी हजारों विकल्पधारी राज्य में मौजूद हैं, उनकी वापसी के लिए कदम नहीं उठाए जा रहे। तीसरा बिंदु राज्य में अनुच्छेद 371 लागू करने को लेकर था। इस बिंदु के तहत भू-कानून में कुछ संशोधन हो पाया। जिससे राज्य में भूमि की अनियंत्रित खरीद-फरोख्त पर कुछ हद तक रोक लग सकी, लेकिन हिमाचल प्रदेश की तरह धारा 371 राज्य में लागू नहीं हो पाई। भू कानून लागू करने में जिस सीमा तक भी सफलता मिली, वह उक्रांद कोटे के मंत्री की कोशिशों की वजह से संभव हुआ। चौथा बिंदु पर्वतीय क्षेत्र में रोजगार नीति को लेकर था। राज्य सरकार इस मामले में पूरी तरह फेल हुई है। पांचवां बिंदु पहाड़ में उद्योगों की स्थापना को लेकर है। इस मामले में भी सरकार फेल साबित हुई है। छठा बिंदु परिसीमन में पहाड़ के साथ हुए अन्याय को लेकर है, जिसमें पहाड़ की छह विधानसभा सीटें कम कर दी गईं थी। सरकार ने इस मामले में भी कदम नहीं उठाया। सातवां बिंदु परिसंपत्तियों के बंटवारे का है। दस साल बाद भी उत्तराखंड की परिसंपत्तियां बंधक बनी हुई हैं। सरकार इन्हें वापस लाने का प्रयास करती हुई दिखाई नहीं दे रही है। आठवां बिंदु मूल निवासी को स्थायी निवास प्रमाण पत्र की अनिवार्यता से मुक्त रखने को लेकर था, इसमें भी सरकार ने प्रयास नहीं किए। नौवां बिंदु आंदोलनकारियों के चिन्हीकरण की समय सीमा 1989 करने के लिए था। सरकार ने यह मांग स्वीकार तो की, लेकिन इस क्षेत्र में काम कुछ नहीं हुआ। पंवार का कहना है कि सरकार जनहित के कार्य करने में पूरी तरह विफल रही।
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