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Wednesday, June 29, 2011

भाकपा-माकपा का सफर


लेखक भाकपा और माकपा के विलय संबंधी विचार की सार्थकता पर संदेह जता रहे हैं

मा‌र्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का विलय क्या भारतीय राजनीति में डूबते साम्यवाद को त्राण दिला पाएगा? क्या वामपंथी विचारधारा वर्तमान समय में भारत का कोई कल्याण कर सकती है? क्या साम्यवादी दर्शन आज की बदलती परिस्थितियों में प्रासंगिक है? वस्तुत: पश्चिम बंगाल में चौंतीस सालों के अनवरत राज में बने लाल दुर्ग के ध्वस्त होने के बाद से मा‌र्क्सवादी पार्टी सकते में है। केरल में माकपा नीत एलडीएफ चार सीटों के अंतर के कारण सत्ता से बेदखल हो गई। स्वाभाविक है कि वामपंथी विचारधारा को लेकर इस तरह का आत्ममंथन चल रहा है और इसी मंथन से दोनों दलों के एक बार फिर से एक होने का सुझाव भी आया है। भारत में आर्थिक और सामाजिक स्तर पर जो विरूपताएं हैं उसका सबसे बड़ा कारण साम्यवादी चिंतन ही है। वर्ष 1800 में विश्व व्यापार में भारत की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत थी। ब्रितानी शोषण के चलते 1947 तक यह आंकड़ा दो प्रतिशत पर आ गया। भारतीय अर्थव्यवस्था को नेहरू के समाजवादी ढर्रे पर चलाने के प्रयास के कारण 1991 तक विश्व व्यापार में भारत का प्रतिशत 0.4 (अर्थात नगण्य) तक आ पहुंचा। अंतरराष्ट्रीय देनदारियों के लिए हमें अपना स्वर्ण भंडार गिरवी रखना पड़ा और भारत, जो किसी समय सोने की चिडि़या कहलाता था को प्रत्येक आवश्यक उपभोक्ता वस्तुओं के लिए जमाखोरी व कालाबाजारी से जूझना पड़ा। वामपंथियों के विकृत सामाजिक दर्शन के कारण जहां हिंदू समाज को जातियों में विभाजित करने का कुप्रयास किया गया, वहीं मजहब के नाम पर मुसलमानों का एकीकरण किया गया, जिसकी परिणति भारत के रक्तरंजित विभाजन व अलग पाकिस्तान में हुई। कम्युनिस्ट आंदोलन की सर्वाधिक अंतर्घाती भूमिका और अक्षम्य अपराध अलगाववादी ताकतों को प्रोत्साहन देना है। धर्म को जनता की अफीम पुकारने वाले कम्युनिस्टों ने जिन्ना को वे सारे तर्क-कुतर्क उपलब्ध कराए, जो एक अलग मजहबी राष्ट्र के लिए जरूरी थे। कम्युनिस्टों का यह आत्मघाती आचरण अनवरत जारी है। आज भी मुसलमानों के कट्टरवादी धड़े को कम्युनिस्टों का त्वरित समर्थन सहज प्राप्त हो रहा है। गुजरात दंगों के बहाने नरेंद्र मोदी, गुजरात और देश को कलंकित करने की मुहिम में लगी तीस्ता सीतलवाड, अरुंधति राय, मेधा पाटकर जैसी स्वयंभू सामाजिक कार्यकर्ता वामपंथी आभा से ही ग्रस्त हैं। केरल में मुस्लिम बहुल जिले-मल्लपुरम का सृजन कराने वाले मा‌र्क्सवादियों को केरल के विधानसभा चुनाव में पराजय का स्वाद इसलिए भी चखना पड़ा, क्योंकि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री अच्युतानंद द्वारा की जा रही इस्लामी कट्टरवाद की आलोचना के साथ खुद को जोड़ नहीं पाया। भारत में साम्यवाद का इतिहास इस बात का गवाह है कि बीसवीं सदी के भारतीय इतिहास के महत्वपूर्ण क्षणों में कम्युनिस्टों ने भारी गलतियां कीं। कम्युनिस्टों ने भारत की अखंडता की बजाए उसे टुकड़ों में बांटे रखने की हर संभव कोशिश की। इसी कारण केएम अशरफ और हिरेन मुखर्जी जैसे कामरेडों ने भारत को राज्यों का संघ बनाने का सिद्धांत उछाला था। उन्होंने 15 अगस्त, 1947 को आजादी मिल जाने के बावजूद भारत के स्वतंत्र अस्तित्व को नकारा और 1948 में भारतीय सेना के खिलाफ हैदराबाद के रजकरों को अपनी पूरी मदद दी। सैद्धांतिक तौर पर भारतपरस्ती और चीनपरस्ती के कारण माकपा दो फाड़ भले हुई हो, किंतु दोनों का इतिहास भारतीय संस्कृति के खिलाफ उनकी वैमनस्यता का गवाह है। माओ त्से तुंग के जन्मदिवस 26 दिसंबर, 1926 को शुरू हुए भारतीय कम्युनिस्ट दल का नाम कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया रखा गया। यदि उन्हें अपने राष्ट्र पर गर्व होता तो वे इसका नाम इंडियन कम्युनिस्ट पार्टी भी रख सकते थे। आजादी के बाद लोकतंत्र का हिस्सा बनना कम्युनिस्टों का स्वांग मात्र है। 1954 में कम्युनिस्ट नेता पी.राममूर्ति ने एक राष्ट्रीय मोर्चे के गठन की सलाह दी, जो पं. नेहरू की सरकार की प्रगतिवादी नीतियों को अपना समर्थन देती। सोवियत संघ और चीन समर्थक कम्युनिस्ट खेमे में से सोवियत प्रेमी कम्युनिस्ट नेहरू सरकार के नजदीक आने लगे। 1964 में मोहन कुमारमंगलम ने औपचारिक रूप से कम्युनिस्टों के कांग्रेस में शामिल होने की परंपरा शुरू की। यह अंतर्विरोधों का लाभ उठाते हुए वस्तुत: देश को कमजोर करने की साजिश का हिस्सा था। इंदिरा गांधी की सरकार में कुमारमंगलम जैसे कई मंत्री उनके नजदीकी सलाहकार थे। कम्युनिस्टों की घुसपैठ का प्रभाव पड़ना अवश्यंभावी था। न्यायपालिका और कार्यपालिका को सरकार के प्रति वफादार बनाने का विचार कम्युनिस्टों का ही था, जिसकी अंतिम परिणति आपातकाल के रूप में हुई। कुमार मंगलम, एचआर गोखले जैसे बुद्धिजीवी प्रतिबद्ध न्यायपालिका के साथ प्रतिबद्ध नौकरशाही की भी पुरजोर वकालत करते थे। (लेखक भाजपा के राज्यसभा सदस्य हैं)


Wednesday, May 25, 2011

कांग्रेस का असंवैधानिक चरित्र


लेखक कर्नाटक के राज्यपाल हंसराज भारद्वाज के आचरण को वंशवादी कांग्रेसी परंपरा का प्रमाण बता रहे हैं...
कर्नाटक के राज्यपाल हंसराज भारद्वाज के सौजन्य से राज्य की भाजपा सरकार को अस्थिर करने की मुहिम क्या रेखांकित करती है? दक्षिण भारत में कर्नाटक ऐसा एकमात्र राज्य है जहां भाजपा की सरकार बनी है। भाजपा सरकार के गठन के बाद से ही कांग्रेसी राज्यपाल असंवैधानिक तरीके से जननिर्वाचित सरकार गिराने का प्रयास करते रहे हैं। महत्वपूर्ण संवैधानिक पद पर होते हुए भी भारद्वाज का आचरण दलगत राजनीति से ऊपर नहीं उठ पा रहा है। मुख्यमंत्री येद्दयुरप्पा को 223 सदस्यीय विधानसभा में 121 सदस्यों का समर्थन प्राप्त है। पूर्ण बजट पारित करने के लिए विधानसभा सत्र आहूत करना आवश्यक है, किंतु सत्र बुलाने की जगह राज्यपाल ने एक बार फिर केंद्र सरकार से भाजपा सरकार को बर्खास्त करने की संस्तुति भेज दी। हालांकि केंद्र सरकार ने राज्यपाल की सिफारिश को स्वीकार करने से इंकार कर दिया है, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता है कि सब कुछ सामान्य हो गया है। जनवरी में राज्यपाल ने मुख्यमंत्री येद्दयुरप्पा के संवैधानिक अधिकारों की अनदेखी करते हुए उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की अनुमति दी थी। पिछले वर्ष उन्होंने तीन दिनों में दो बार मुख्यमंत्री येद्दयुरप्पा को बहुमत साबित करने को कहा था। स्वाभाविक है कि राज्यपाल अपने बल पर ही जनता द्वारा निर्वाचित और बहुमत प्राप्त सरकार को निरंकुश तरीके से बर्खास्त करने पर आमादा नहीं हैं। उनका आचरण वंशवादी कांग्रेसी चाटुकारों की परंपरा के अनुरूप है, जिनके बीच एक वंश विशेष के प्रति स्वामिभक्ति साबित करने की होड़ लगी रहती है। भाजपा शासित अन्य प्रदेशों के साथ भी कांग्रेसनीत संप्रग सरकार का व्यवहार संघीय व्यवस्था के खिलाफ है। कांग्रेस ने गुजरात दंगों के बहाने गुजरात की भाजपा सरकार को बर्खास्त करने के लिए पर्दे के पीछे से मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ दुष्प्रचार अभियान की कमान संभाल रखी है। तीस्ता सीतलवाड, अरुंधति राय, अरुणा राय, मेधा पाटकर जैसे धरातल पर दिखने वाले मानवाधिकारी वस्तुत: उन भूमिगत सेक्युलरिस्टों के चेहरे हैं जो वोट बैंक की राजनीति के लिए भाजपा सरकार को उखाड़ फेंकना चाहते हैं। नरेंद्र मोदी को मौत का सौदागर बताने वाले सेक्युलरिस्टों को पिछले तीन विधानसभा चुनावों में करारी शिकस्त मिली है। प्रदेश की जनता ने लगातार तीसरी बार शासन की बागडोर नरेंद्र मोदी के हाथों में सौंपी है, जिनके सफल नेतृत्व में प्रदेश का अभूतपूर्व विकास हुआ है। समाज में खुशहाली और संपन्नता आई है, जिसमें हिंदू-मुसलमान बराबर के भागीदार हैं, किंतु कांग्रेसी आकाओं के संकेतों पर मोदी के खिलाफ काल्पनिक गड़े मुदरें को उखाड़ने का कुत्सित अभियान अबाधित चल रहा है। छत्तीसगढ़, हिमाचल, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, झारखंड की भाजपा सरकारों के साथ भी कांग्रेसनीत केंद्र सरकार का रवैया असहयोगात्मक रहा है। राज्य के विकास के लिए दी जाने वाली केंद्रीय सहायता में यह भेदभाव परिलक्षित होता है। कांग्रेस का यह आचरण संघीय ढांचे के प्रतिकूल होने के साथ संविधान की मूल भावना के भी खिलाफ है। कांग्रेस सत्ता के गुरूर में राज्यों के अधिकारों का हनन करती आई है। एसआर बोम्मई बनाम केंद्र सरकार मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि संवैधानिक व्यवस्थाओं के अंतर्गत राज्यों के मुकाबले केंद्र को ज्यादा शक्तियां व अधिकार प्राप्त हैं, किंतु इसका आशय यह नहीं है कि केंद्र राज्यों को अपना पिछलग्गू माने। राज्यों का स्वतंत्र संवैधानिक अस्तित्व है..राज्यों को प्राप्त सीमाओं व अधिकारों के दायरे में राज्य सर्वोच्च हैं। यह स्थापित सत्य है कि राजनीतिक वैरशोधन के लिए सत्ता के नशे में कांग्रेस अपने संवैधानिक दायित्वों को ताक पर रखती आई है। भाजपानीत राजग सरकार के बाद केंद्रीय सत्ता में लौटते ही संप्रग सरकार ने राजग सरकार द्वारा नियुक्त सभी राज्यपालों को बर्खास्त कर दिया था। वस्तुत: कांग्रेस पूरे देश में केवल अपनी राजनीतिक विचारधारा का वर्चस्व चाहती है। राज्यपालों की बर्खास्तगी आदेश को उचित ठहराने के लिए तत्कालीन गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने कहा था, उनकी बर्खास्तगी जरूरी थी, क्योंकि वे हमारी पार्टी की विचारधारा से अलग विचारधारा से संबंध रखते थे। इस कारण उनके लिए केंद्र से तालमेल बिठाना मुश्किल हो सकता था। यह कैसी मानसिकता है? क्या एकदलीय निरंकुशता स्वस्थ लोकतंत्र के हित में है? किंतु कांग्रेसी राज का यही सच है। इंदिरा गांधी के कार्यकाल में उनके विश्वासपात्र कुमार मंगलम ने प्रतिबद्ध न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका, जो केंद्र सरकार के प्रति हर हाल में प्रतिबद्ध हो, की वकालत की थी। इस विचार के कारण तब सर्वोच्च न्यायालय के तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की वरीयता की अनदेखी कर एक कनिष्ठ न्यायाधीश को मुख्य न्यायाधीश के पद पर नियुक्त किया गया था। कुमार मंगलम, एचआर गोखले जैसे बुद्धिजीवी प्रतिबद्ध न्यायपालिका के साथ प्रतिबद्ध नौकरशाही की भी वकालत करते थे। उनके अनुसार कांग्रेस के दीर्घकालीन अस्तित्व के लिए संवैधानिक निकायों की पार्टी प्रतिबद्धता जरूरी थी। आपातकाल के दौरान संजय गांधी की मंडली का प्रिय नारा एक राष्ट्र, एक पार्टी और एक नेता था। वस्तुत: आपातकाल की घोषणा होने से पूर्व ही सत्ता के अवैध शक्ति प्रयोग और दमन के आधार पर ऐसी व्यवस्था स्थापित करने की पूरी कोशिश की गई थी। तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा की मनोवृत्ति को बढ़ावा दिया। चाटुकारों ने यह नारा भी दिया कि जो इंदिराजी के हित में है, वही भारत के हित में है। इसीलिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय के बावजूद 1975 में आपातकाल लगाकर उन्होंने निरंकुशता का परिचय दिया। अपनी अधिनायकवादी मनोवृत्ति का प्रदर्शन करते हुए उन्होंने विपक्ष को कालकोठरियों में कैद कर सदन का दोहन किया और कानून में मनोवांछित फेरबदल कर उसे अपने हितों के पोषण के अनुकूल बनाया। पार्टी और सरकार की मुखिया होने केअधिकार से उन्होंने अपनी मर्जी के अनुसार राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पद पर बिठाया या हटाया और अपने मंत्रिमंडल में भी जब-तब मंत्रियों के पदभार बदले। इसीलिए अपने निर्वाचन क्षेत्रों के प्रति अपने दायित्वों को भूलकर पार्टी नेताओं ने इंदिरा गांधी की चाटुकारिता को अधिक वरीयता दी। यह परंपरा बदस्तूर चली आ रही है। भारद्वाज का आचरण उसी मानसिकता से प्रेरित है। (लेखक राज्यसभा के सदस्य हैं)