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Tuesday, March 22, 2011

आरक्षण पर चुप सियासत


जाट आंदोलनकारियों ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से सटे राज्यों में जगह-जगह रोज यातायात ठप कर जन जीवन बेहाल कर दिया है। होली बाद उनका आंदोलन और तेज तथा व्यापक करने का इरादा है। इस बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संज्ञान लेते हुए यूपी सरकार को आंदोलनकारियों से ट्रैक खाली कराने का आदेश दिया है। केंद्रीय सेवाओं में आरक्षण की मांग को लेकर ये आंदोलनकारी सरकार को ब्लैकमेल कर रहे हैं और केंद्र व राज्य की सरकारें हाथ पर हाथ धरे बैठी हैं क्योंकि वोट की राजनीति आड़े आ रही है। इसीलिए जाम रेलवे ट्रैक को खाली कराने के लिए सख्ती नहीं बरती जा रही है। परिणामस्वरूप आमजन बेहद परेशान हैं। होली के त्योहार पर ट्रेनों के रद्द होने के कारण वह घर नहीं जा पा रहे हैं, परीक्षार्थियों की परीक्षाएं छूट रही हैं। बीमार गंतव्य स्थानों को इलाज के लिए नहीं पहुंच पा रहे हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा में इनका नग्न नाच चल रहा है। ऐसे में इस आंदोलन ने कई सवाल खड़े कर दिये हैं। क्या मुट्ठीभर लोग अपने निजी स्वार्थो की पूर्ति के लिए व्यापक जन जीवन को तबाह कर सकते हैं। लोकतंत्र में ‘मांग’ मनवाने का क्या यह सही तरीका है? सरकारें इनके खिलाफ कार्रवाई करने से हिचक क्यों रही हैं? रेलवे ट्रैक जाम करना अथवा देश को आर्थिक क्षति पहुंचाना क्या शांतिपूर्ण आंदोलन की श्रेणी में आता है। इस आंदोलन से परेशान आम नागरिक राज्य-केंद्र सरकारों से इसका जवाब चाहता है। पिछले माह रेलवे बजट के दौरान संसद में रेलमंत्री सुश्री ममता बनर्जी ने अपने बजट भाषण में जब रेल रोको आंदोलन के चलते वर्ष 2010 में 1500 करोड़ रुपये राजस्व के नुकसान की जानकारी दी तो सभी सन्न रह गये थे। क्योंकि रेल बाधाओं के चलते रेलवे को 1500 से अधिक यात्री ट्रेनों को रद्द करना पड़ा था और इतनी ही ट्रेनों को परिवर्तित मागरे से चलाया गया था। इस अवधि में रेल रोको आंदोलनों के 115 मामले दर्ज हुए, इनमें से कुछ आंदोलन तो तीन सप्ताह से अधिक समय तक चले थे। उन्होंने कहा कि अब जिन राज्यों में इस तरह के आंदोलन नहीं होंगे, उस राज्य को तोहफे के तौर पर नई ट्रेनें दी जायेंगी। उनकी यह घोषणा इस आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में सरकारों की भूमिका को देखते हुए हास्यास्पद लगती है क्योंकि वोट की जितनी ताकत जिस आंदोलन के पीछे होगी, उसे किसी भी हद तक कानून तोड़ने की छूट होगी। जाटों का यह आंदोलन उसी का जीता-जागता उदाहरण है। पिछले पांच मार्च से ये आंदोलनकारी रेलवे ट्रैक जाम किये हुए हैं। लगभग तीन सौ करोड़ रुपये का राजस्व का नुकसान हो चुका है। लगभग 270 से अधिक ट्रेनें रद्द हैं और 244 परिवर्तित मार्ग से चलायी गई हैं। रेल यातायात हमारी जीवन रेखा है। इसके संचालन में अवरोध से जहां जन जीवन पर सीधा असर पड़ता है, वहीं देश को भारी आर्थिक क्षति होती है, जिसका सीधा खमियाजा पूरा देश भुगतता है। इसके निर्बाध संचालन के लिए कठोर कानून बनना चाहिए ताकि आंदोलनकारी छोटे स्वार्थो के लिए अवरोध पैदा कर रेल न रोक सकें। आंदोलनकारी जाटों के प्रति सरकारों की यह मेहरबानी अनायास ही नहीं है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान की राजनीति में यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 14 लोकसभा और 70 विधानसभा तथा हरियाणा की 4 लोकसभा व 30 विधानसभा सीटों पर इनका दबदबा है। राजस्थान में तो इन्हें आरक्षण मिला ही हुआ है। केंद्र के अलावा हरियाणा व राजस्थान में कांग्रेस की सरकारें हैं तो उत्तर प्रदेश में बसपा का सत्ता पर कब्जा है। वर्ष 2007 में मायावती ने अपने सोशल इंजीनियरिंग फामरूले क्े तहत जाट बहुल खतौली, कांधला, बिजनौर, चांदपुर, कांठ, मोदीनगर तथा शिकारपुर सीटों पर जीत दर्ज कर अजित सिंह के दुर्ग में सेंध लगा दी है। दलित, मुस्लिम और जाट मतदाताओं के इसी समीकरण के चलते उसे आशातीत सफलता भी मिली। अब 2012 में विधानसभा चुनाव होने हैं। इसीलिए मुख्यमंत्री मायावती इस समीकरण को बिगाड़ना नहीं चाहतीं। इसीलिए रेलवे ट्रैक जाम कर जन-जीवन तबाह कर रहे जाटों का आंदोलन उन्हें शांतिपूर्ण लग रहा है। उन्होंने तनिक देर किये बगैर आरक्षण की उनकी मांग का समर्थन कर डाला। इसी राजनीतिक सोच और शैली के हरियाणा के कांग्रेसी मुख्यमंत्री भी हैं। इसलिए वह भी मौन साधे हैं तो केंद्र की सरकार भी जाटों को नाराज नहीं करना चाहती हैं। इसलिए वह बीच का रास्ता तलाशने की कोशिश में है। इसके विपरीत भाजपा, रालोद, सपा भी उनकी मांग का समर्थन कर रही हैं। इसीलिए आसन्न चुनाव को देखते हुए कोई भी दल उनके आंदोलन के इस तरीके का मुखर विरोध करने का साहस नहीं जुटा पा रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश राज्य का सबसे समृद्ध क्षेत्र है। यहां के जाट काफी सम्पन्न हैं और उनकी आर्थिक स्थिति अन्य जातियों की तुलना में बेहतर है। फिर नौकरियों में इनकी आरक्षण की मांग का औचित्य समझ में नहीं आता। किंतु सच्चाई यह है कि आज आरक्षण वोट बैंक की राजनीति का हथियार बना चुका है। जब भी कहीं से आरक्षण की मांग उठती है, राजनीतिक दल उनके समर्थन में आगे आ जाते हैं क्योंकि उन्हें उनके वोट बैंक के खोने का भय सताने लगता है। सच्चाई यह है कि स्वतंत्रता के बाद अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था केवल दस वर्षो के लिए की गई थी, किंतु हर दस वर्ष के बाद इनके आरक्षण की अवधि बढ़ती ही जा रही है। कोई भी दल इसे खत्म करने का साहस नहीं जुटा पा रहा है। वैसे आरक्षण की राजनीति को बल वी.पी. सिंह के शासन काल में मिला, जब देश में मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू हुई, जिसके तहत पिछड़ी जातियों को 27 प्रतिशत आरक्षण दिया गया। इस कमीशन ने जाट समुदाय को पिछड़ों की सूची में नहीं रखा था किंतु कुछ राज्यों ने अपनी राजनीतिक सुविधा के लिए उन्हें पिछड़ी जाति के रूप में मान्यता दे दी। इसी के बाद इस समुदाय ने केंद्रीय सेवाओं में आरक्षण की मांग शुरू कर दी। इतना ही नहीं मुस्लिम समुदाय भी आरक्षण की मांग कर रहा है। कुछ राज्यों ने सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर मुस्लिम समाज को आरक्षण देने के उपाय शुरू कर दिये हैं। कुछ राज्य सरकारें इसके लिए केंद्र सरकार पर भी दबाव बना रही हैं। वोट बैंक हथियाने के लिए राजनीतिक दल ‘आरक्षण’ की मांग का बेहिचक समर्थन कर रहे हैं, जो समाज के लिए घातक बनता जा रहा है। क्योंकि सरकारी नौकरियां दिनों-दिन कम होती जा रही हैं, जिसके कारण प्रतिस्पर्धा बढ़ती जा रही है। ऐसी स्थिति में सक्षम तबकों को आरक्षण का लाभ दिया जायेगा तो किसी न किसी स्तर पर अन्य आरक्षित वगरे के ही अधिकारों में कटौती होगी। इसलिए अपेक्षाकृत सक्षम लोगों को आरक्षण देने की वकालत करने वाले राजनेताओं को आज नये सिरे से सोचने की जरूरत है क्योंकि इससे आने वाले दिनों में आपसी वैमनस्य बढ़ेगा और जातियों के बीच खाई और चौड़ी होगी। आरक्षण का उद्देश्य सामाजिक रूप से पिछड़े वगरे को समाज की मुख्य धारा में लाने का है न कि सरकारी नौकरियां बांटने का। ऐसे में आरक्षित वगरे के लिए नौकरियां सीमित ही रहेंगी। इसीलिए आरक्षण की सीमा बढ़ाने के लिए संविधान में संशोधन की मांग हो रही है। सच्चाई यह है कि जिन जातियों को आरक्षण का लाभ मिल रहा है, वह भी सामाजिक व आर्थिक रूप से मुख्यधारा में नहीं आ सकी हैं। इसका लाभ इन्हीं जातियों के मलाईदार तबकों तक सीमित होकर रह गया है। इसलिए अति पिछड़ा और अति दलित को आरक्षण की मांग शुरू हो गई है। बिहार में यही सवाल चुनावी मुद्दा भी बना और इसके पैरोकार नीतीश कुमार की आज वहां सरकार है। उत्तर प्रदेश में भी यह मांग शुरू हो गई है। इसलिए अब जरूरत आरक्षण के नये तरीकों के बारे में सोचने की है, अन्यथा आरक्षित जातियों के बीच जिस तरह आर्थिक व सामाजिक विषमता बढ़ रही है, वह सामाजिक समरसता को तोड़ने का कारक बनने की दिशा में तेजी से बढ़ रही है। इस खतरे को समझना होगा। आज देश में जनगणना हो रही है, उसमें जातियों की भी गिनती होनी है। उसी के बाद सामाजिक व आर्थिक रूप से पिछड़ी जातियों के आंकड़े सामने आयेंगे। तभी हमारे नेताओं को इन आंकड़ों के आधार पर आरक्षण का नया रूप देना चाहिए। यदि आरक्षण के नये तरीके नहीं बनाये गये तो इसके राजनीतिक इस्तेमाल की प्रवृत्ति बढ़ती चली जायेगी, जो समाज के लिए अहितकारी होगी। जाट आज अपने वोट की ताकत का धौंस दिखाकर सरकारों को ब्लैकमेल कर रहे हैं। उनकी आरक्षण की मांग का औचित्य समझे बगैर उनका समर्थन करने वाले राजनीतिक दलों को राजनीति से ऊपर उठकर उनके आंदोलन के इस तरीके का प्रबलता से विरोध करना चाहिए, अन्यथा रेलवे ट्रैक जाम करने की घटनाएं आम हो जाएंगी। दूसरे, सरकार को बगैर किसी राग-द्वेष के कानून हाथ में लेने वाले ऐसे आंदलोनकारियों से सख्ती से निपटना होगा। ऐसे कड़े कानून बनाये जाने चाहिए ताकि कोईंआंदोलनकारी जन जीवन को तबाह न कर सके। क्योंकि केंद्र और राज्य सरकारों (उत्तर प्रदेश/हरियाणा) की भूमिका से लोगों में निराशा बढ़ी है और उनके इस रवैये की चहुंतरफा आलोचना हो रही है। जाट आज अपने वो ट की ताकत का धौंस दिखाकर सरकारों को ब्लैकमेल कर रहे हैं। उनकी आरक्षण की मांग का औ चित्य समझे बगैर उनका समर्थन करने वाले राजनीतिक दलों को राजनीति से ऊपर उठकर उनके आंदोलन के इस तरीके का प्रबलता से विरोध करना चाहिए, अन्यथा रेलवे ट्रैक जाम करने की घटनाएं आम हो जाएंगी। सरकार को बगैर किसी राग-द्वेष के कानू न हाथ में लेने वाले आंदोलनकारियों से सख्ती से निपटना हो

Monday, March 21, 2011

पुराने कारनामों का नया दस्तावेज



 जिन लोगों को लोकसभा में 22 जुलाई 2008 का दृश्य याद होगा, उनके लिए विकिलीक्स के खुलासे पर आश्चर्य करने का कोई कारण नहीं है। उस दिन मनमोहन सिंह सरकार ने विश्वास मत जीत लिया था, लेकिन मतदान के पूर्व भाजपा के तीन सांसदों द्वारा लोकसभा की मेज पर एक-एक हजार के नोटों से भरी अटैचियां रखने का शर्मनाक नजारा दुनिया के सामने आ चुका था। भारतीय संसद के इतिहास में वह इस किस्म का पहला काला दिन था। इसके पूर्व कभी ऐसा नहीं हुआ था। हालांकि इतना होने के बावजूद विपक्ष तब इसे बड़ा मुद्दा बनाने में सफल नहीं हुआ और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार पूरे आत्मविश्वास से काम करती रही। सरकार की ओर से ही यह आरोप लगाया गया कि विपक्ष ने जानबूझकर उसकी सरकार को बदनाम करने के लिए अपनी ही नोटों की गड्डियां लोकसभा में लहराई। यह बड़ी विचित्र स्थिति थी और पता नहीं क्यों विपक्ष ने बाद में इस मामले को तूल नहीं दिया, लेकिन आम नागरिकों के अंदर यह विश्वास घर कर गया कि सरकार बचाने के लिए करोड़ों का लेन-देन हुआ है। विकिलीक्स के खुलासे से केवल आम नागरिकों की उस धारणा की पुष्टि हुई है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा सरकार बचाने के लिए किसी प्रकार के लेन-देन से इनकार करने मात्र से आम नागरिकों के अंदर घर कर चुकी इस धारणा का अंत संभव नहीं। सरकार और कांग्रेस पार्टी चाहे जो तर्क दे, विकिलीक्स के तथ्यों में कुछ त्रुटियां भी हैं। मसलन, अजीत सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल के लोकसभा में कुल तीन सांसद थे, चार नहीं, जैसा विकिलीक्स बता रहा है और तीनों सांसदों ने विश्वास मत के विरुद्ध मतदान किया था, पक्ष में नहीं। ऐसी कुछ बातें और सामने लाई जा सकती हैं। इससे यह आम धारणा गलत साबित नहीं होती कि सरकार बचाने के लिए सांसदों की खरीद-फरोख्त से लेकर अन्य प्रकार के लोभ लालच का शर्मनाक कृत्य किया गया। नचिकेता सतीश शर्मा के साथ था या नहीं, उसने अमेरिकी दूतावास के किसी राजनयिक को नोट दिखाए या नहीं, उसे सरकार बचाने के लिए सांसदों को खरीदने की सूचना दी या नहीं, इन सब पर दो राय हो सकती है, लेकिन इनके आधार पर कांग्रेस पार्टी और सरकार लोगों के गले यह नहीं उतार सकती कि उसके पाले में विपक्ष के जो सांसद आए या जिन्होंने विश्वासमत के दौरान मतदान नहीं किया, उसके पीछे केवल उन सांसदों की अंतरात्मा की आवाज थी। इस समय मसला भारत-अमेरिका नाभिकीय समझौते के सही या गलत होने का भी नहीं, सरकार की साख का है। वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी का यह तर्क वैधानिक रूप से सही है कि 14वीं लोकसभा में जो कुछ हुआ, उसे 15वीं लोकसभा में लागू नहीं कर सकते। उस समय सरकार विश्वास मत जीत गई और संविधान के अनुसार उसे एक सरकार के सारे अधिकार प्राप्त रहे। प्रणब मुखर्जी से यह प्रश्न किया जाना चाहिए कि क्या कोई अधिकारी अपने कार्यकाल में कोई अपराध करे और इसका खुलासा उसके पद से हटने के बाद हो तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई नहीं हो सकती? झारखंड मुक्ति मोर्चा रिश्वत कांड में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव पर पदमुक्त होने के बाद मुकदमा चला। उन पर भी तो 1993 में अपनी सरकार बचाने के लिए सांसदों को घूस देने का ही आरोप था। यह बात अलग है कि न्यायालय ने उन्हें बरी कर दिया, पर न्यायालय में मुकदमा तो चला। संप्रग तब भी शासन में था और मनमोहन सिंह ही तब भी प्रधानमंत्री थे, इस नाते उस दौरान जो कुछ हुआ, उसका संबंध सीधे वर्तमान के साथ बनता है। अगर घूस देकर सरकार बचाई गई तो साफ है कि ऐसा नहीं किया जाता तो सरकार गिर जाती और अगर सरकार गिर जाती तो उसके बाद की राजनीतिक स्थिति क्या होती, कोई नहीं जानता। संभव है संप्रग बिखर जाता और वह दोबारा शासन में लौटता ही नहीं। अनैतिक और अवैधानिक तरीके से बहुमत हासिल करने वाली सरकार द्वारा लिए गए निर्णयों की वैधानिकता का प्रश्न भी इससे जुड़ा हुआ है। प्रणब दा का यह तर्क भी उचित नहीं है कि यह किसी संप्रभु देश की सरकार और उसके दूतावास के बीच हुई बातचीत का मसला है और उसके बारे में कुछ नहीं किया जा सकता। यह प्रश्न यहां है ही नहीं। इस समय प्रश्न केवल यह है कि उस दौरान सरकार, मुख्य राजनीतिक पार्टी, उसके अपने नेता तथा सरकार को सहयोग करने आगे आए नेताओं ने सरकार बचाने के लिए संासदों को घूस दिया या नहीं? सारी बातें घूस देने की ओर इशारा कर रही हैं। हम मानते हैं कि एक के बाद एक खुलासे के कारण अस्थिरता की आशंका बढ़ रही है और जनहित के महत्वपूर्ण मुद्दे हाशिए पर जा रहे हैं, जो कतई देशहित में नहीं। किंतु किया क्या जा सकता है। वर्तमान खुलासा और उस समय का समूचा घटनाक्रम तथा सामने आए तथ्य घूस दिए जाने के आरोपों को बल प्रदान करते हैं। विश्वास मत का समर्थन करने के लिए धन देने का आरोप लगाने वाले तत्कालीन तीन भाजपा सांसदों मध्य प्रदेश के मुरैना से अशोक अर्गल, मंडला के सांसद फग्गन सिंह कुलस्ते और सालुंबर राजस्थान से महावीर भगोड़ा ने यह कहा था कि उन्हें जब से धन देने की पेशकश की गई, उन्होंने सारी बातों की वीडियो रिकॉर्डिग करवाई। एक प्रमुख टीवी चैनल ने भी लेन-देन के स्टिंग ऑपरेशन की बात स्वीकारते हुए कहा कि पूरा टेप लोकसभा अध्यक्ष को सौंप दिया गया है। चैनल द्वारा वीडियो नहीं दिखाए जाने पर भाजपा ने यह सार्वजनिक घोषणा की थी कि उसका कोई नेता तब तक चैनल के किसी कार्यक्रम में भाग नहीं लेगा, जब तक पूरा ऑपरेशन प्रसारित नहीं किया जाता। अंतत: उस चैनल ने स्टिंग ऑपरेशन के कुछ अंश प्रसारित भी किए। अगर आरोप के पीछे तथ्य नहीं होता तो भाजपा इतना सख्त रवैया किसी समाचार चैनल के खिलाफ नहीं अपनाती। वैसे भी विपक्ष के 11 सांसदों द्वारा पाला बदलकर मतदान करना और 10 सांसदों का अनुपस्थित रहना यों ही नहीं हो सकता। भाजपा के सात सांसद टूट गए, कांग्रेस को सपा का आश्चर्यजनक साथ मिला, जदयू, अकाली दल यानी राजग एवं वाम खेमे के तेलुगू देशम, जनता दल सेक्युलर के सांसदों ने सरकार के पक्ष में मतदान करके या अनुपस्थित रहकर उसकी जीवन रक्षा में भूमिका निभाई थी। इतना बड़ा राजनीतिक उलटफेर बगैर किसी ऑपरेशन के संभव ही नहीं। ये सांसद नाभिकीय समझौते को भारत के हित में मानने के कारण सरकार बचाना चाहते थे, इसे कौन स्वीकार कर सकता था। इसलिए विकिलीक्स के माध्यम से आए खुलासे पर आश्चर्य करने का कोई कारण नहीं है। राजनीतिक तौर पर संप्रग उस दौरान आरोपों को नकारने में सफल रही और इस समय भी उसका स्वर वही है। प्रधानमंत्री विकिलीक्स की रिपोर्ट को गलत बता रहे हैं। यह भी तर्क दिया जा रहा है कि अमेरिका के बारे में कई हजार पृष्ठ थे, पर उस देश में ऐसा हंगामा नहीं हुआ, जैसा हमारे यहां हो रहा है। अमेरिका संबंधी खुलासे में अपने देश के अंदर सरकार बचाने या समर्थन के लिए घूस देने जैसे शर्मनाक कृत्य का आरोप नहीं था। उसमें विदेश नीति में अमेरिका के राष्ट्रीय हित को साधने के लिए अनैतिक एवं अवैध तरीके अपनाने, उनके राजनयिकों द्वारा दूसरे देशों के नेताओं द्वारा की गई अपमानजनक टिप्पणियां आदि हैं। वस्तुत: दोनों खुलासे में गुणात्मक अंतर है। इसलिए दोनों को एक तराजू में रखकर नहीं तौला जा सकता है। वास्तव में मनमोहन सिंह सरकार के लिए आज यह जरूरी हो गया है कि वह स्वयं के दामन को पाक-साफ साबित करें। अगर वह पाक-साफ साबित करने का उपक्रम करने की जगह अपने बचाव में केवल तर्क देने तक सीमित रहती है तो उसके बारे में कायम आम धारणा और मजबूत होगी। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

सरकार के आगे नए सवाल


विकिलीक्स के खुलासे से संप्रग सरकार की बची-खुची साख भी खत्म होती देख रहे हैं लेखक
भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी संप्रग-2 सरकार एक बार फिर सवालों के घेरे में खड़ी है। विकिलीक्स के खुलासे के बाद सरकार की नीयत और नियति को लेकर विपक्ष का हमलावर रुख यदि और तेज हुआ है तो इसके लिए जिम्मेदार कोई और नहीं खुद सरकार है। एक के बाद एक लगातार हो रहे भ्रष्टाचार के खुलासों की कड़ी में विकिलीक्स का यह खुलासा कि सरकार अमेरिकी इशारे पर काम कर रही है और 2008 में संप्रग-1 सरकार ने संसद में बहुमत का जुगाड़ करने के लिए सांसदों की खरीद-फरोख्त की थी, एक गंभीर मामला है। पूरा विपक्ष और देश अब सरकार से जानना चाहता है कि आखिर विकिलीक्स के खुलासे की सच्चाई क्या है और यह भी कि इस मामले को दबाने का प्रयास क्यों किया जा रहा है? सबसे हास्यास्पद पहलू यह है कि दिन-प्रतिदिन जनता की नजरों में अपनी विश्वसनीयता और साख खोती जा रही सरकार सफाई के तौर पर विकिलीक्स की प्रामाणिकता पर ही सवाल उठा रही है और कह रही है कि उसकी सूचनाओं के आधार पर सरकार को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। प्रणब मुखर्जी ने संसद में एक कदम आगे जाते हुए बचाव में तर्क रखा कि सांसदों की खरीद-फरोख्त का मामला संप्रग-1 सरकार के कार्यकाल में उठा था, जबकि वर्तमान सरकार नए रूप में गठित हुई है और इसे जनता ने अलग से जनादेश दिया है, इस कारण संप्रग-2 सरकार संप्रग-1 सरकार के कार्यो के लिए तकनीकी और कानूनी आधार पर जवाबदेह नहीं है। शायद प्रणब मुखर्जी भूल रहे हैं कि सवाल तकनीकी जवाब का नहीं, बल्कि राजनीतिक जवाब का है। तकनीकी रूप से प्रणब मुखर्जी जो कुछ कह रहे हैं वह सही है, लेकिन क्या जनता की नजरों में विश्वसनीयता का प्रश्न सरकार के किसी कार्यकाल विशेष तक का ही मामला होता है। इस तरह के जवाब से भले ही सरकार को फिलहाल बचा लिया जाए, लेकिन जब वे चुनाव में जनता के पास जाएंगे क्या तब भी यही उत्तर होगा? क्या जनता भूल जाएगी कि 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन, राष्ट्रमंडल खेल और सीवीसी मामले में भी सरकार ने शुरू में कुछ ऐसे ही तर्क रखे थे और बाद में क्या हुआ? ए. राजा जेल में हैं, सुरेश कलमाड़ी से पूछताछ चल रही है और सीवीसी पद पर पीजे थॉमस की नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट गैर-कानूनी घोषित कर चुका है, ऐसे में सरकार एक बार फिर पुराने तर्ज पर राजनीतिक दांवपेंच का खेल खेल रही है और पूरे मसले पर जवाब देने के बजाय हठधर्मिता दिखा रही है। सरकार आखिर क्यों नहीं समझ पा रही है कि वह जितनी ज्यादा हठधर्मिता दिखाएगी उसकी छवि उतनी ही धूमिल होगी। यदि सरकार विकिलीक्स के खुलासे पर जांच की मांग मान लेती है तो यह उसकी राजनीतिक बुद्धिमत्ता मानी जाएगी। मेरे विचार से अभी कांगे्रस के पास समय है और वह राजनीतिक दलों के साथ मिल-बैठकर कोई रास्ता निकाल सकती है। यदि यह मामला लंबा खिंचता है तो राजनीतिक ध्रुवीकरण तेज होगा और अंतत: सरकार को ही अधिक नुकसान उठाना पड़ेगा। इस पूरे घटनाक्रम से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की छवि और अधिक धूमिल हुई है और पहली बार विपक्ष ने सीधे उनकी ईमानदारी पर सवाल उठाते हुए उनसे इस्तीफे की मांग की है। प्रधानमंत्री अभी भी कह रहे हैं कि सांसदों की खरीद-फरोख्त की उन्हें कोई जानकारी नहीं है और उन्होंने किसी को भी इसके लिए अधिकृत नहीं किया था। यह जवाब इसके प्रत्युत्तर में है कि कैप्टन सतीश शर्मा के निकट सहयोगी नचिकेता कपूर ने रुपयों से भरा थैला अमेरिकी राजनयिक को दिखाया था और उन्हें आश्वस्त किया था कि सरकार को बचा लिया जाएगा और उनके पास रुपयों की कमी नहीं है। यह तथ्य किसी की सुनी-सुनाई नहीं, बल्कि खुद उस अमेरिकी राजनयिक से संबंधित हैं जिसने यह बात संदेश के रूप में दर्ज करके अमेरिकी सरकार को भेजी थी। राजनयिक शिष्टाचार और अंतरराष्ट्रीय संधि कानून के तहत भले ही संबंधित अमेरिकी से पूछताछ नहीं हो सकती, लेकिन सरकार इस तथ्य को झुठला भी नहीं सकती, क्योंकि उसी विकिलीक्स ने आडवाणी और मलफोर्ड के बीच मुलाकात का खुलासा किया है और यह भी बताया है कि सरकार ने एक समय कम्युनिस्टों पर भरोसा नहीं होने की बात से अमेरिकी सरकार को अवगत कराया था। विकिलीक्स की प्रामाणिकता पर सवाल उठाने वालों को नहीं भूलना चाहिए कि उसकी सूचनाओं को आज तक किसी भी सरकार ने झूठा और मनगढं़त नहीं करार दिया है और न ही इससे उसे कोई विशेष फायदा होने वाला है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि विकिलीक्स ने जो कुछ भी बताया है वह अमेरिकी दूतावास द्वारा अपने अधिकारियों और सरकार को भारत के घटनाक्रम से अवगत कराने के लिए लिखे गए संदेश हैं। जहां तक सरकार के कामकाज और हमारी स्वतंत्र विदेश नीति में अमेरिकी दखलंदाजी का प्रश्न है तो यह कोई नई बात नहीं है। हां, इतना अवश्य है कि इसका खुलासा इतने विस्तार में और प्रामाणिक रूप में पहली बार हुआ है। अमेरिका अपने हितों को पूरा करने के लिए इस तरह के कूटनीतिक हथकंडे अपनाता रहता है। यहां सवाल सरकार की ईमानदारी, राष्ट्रनिष्ठा और देश के हितों को लेकर है। यदि वास्तव में अमेरिकी दबाव और उसके इशारे पर मंत्रियों का फेरबदल किया गया है तो हमारी संप्रुभता और स्वतंत्र नीति के लिए एक खतरनाक संकेत है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि कम्युनिस्ट पार्टियां पहले भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर अमेरिका का पिछलग्गू होने का आरोप लगाती रही हैं और अब यह तथ्यात्मक सच्चाई के रूप में सामने है। वर्तमान सरकार की कार्यप्रणाली व विश्वसनीयता को लेकर टकराव व विरोध के जो दृश्य संसद के भीतर और देश के बाकी हिस्सों में देखने को मिल रहा है वह 1973-74 की याद दिलाता है। उस वक्त भी इंदिरा गांधी की सरकार ने कुछ ऐसी ही हठधर्मिता अपनाई थी, जिसकी अंतिम परिणति आपातकाल के रूप में देश को झेलना पड़ा। हालांकि आज ऐसी कोई संभावना नहीं है, लेकिन जिस तरह से भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा रही है और विपक्ष की बातों को सरकार अनसुना कर रही है वह कोई शुभ संकेत नहीं। आने वाले दिनों में अपनी खराब होती छवि को सुधारने के लिए सरकार जनहित के कार्यक्रमों को आगे बढ़ाना चाहेगी, जिसका संकेत प्रधानमंत्री के इस बयान से मिलता है कि अब चुनाव सुधारों की आवश्यकता है। आज सवाल सरकार की खत्म होती साख और उस विश्वसनीयता का है जिस पर भरोसा करके जनता ने उसे दूसरे कार्यकाल के लिए विश्वासमत दिया था।

पीएम के बयान से बात और बिगड़ी


पिछले कार्यकाल में संप्रग की सरकार बचाने के लिए सांसदों की खरीद-फरोख्त मामले में प्रधानमंत्री की सफाई के बाद बात और बिगड़ गई है। विपक्ष के हमले पर प्रधानमंत्री का जवाबी वार ही सरकार के गले फंस रहा है। विपक्ष प्रधानमंत्री पर गलतबयानी का आरोप लगाकर विशेषाधिकार हनन की व्यूह रचना में लग गया है। वह पूरे मामले पर सदन में चर्चा कराने दबाव भी बनाएगा। वामदलों और तेलगू देशम ने विशेषाधिकार हनन का नोटिस दे दिया है, जबकि भाजपा मंगलवार को नोटिस देगी। अब गेंद दोनों सदनों के सभापतियों के पाले मे हैं। दरअसल विपक्ष की पेशबंदी इस प्रकरण को सीबीआई की जांच की तरफ बढ़ाने की है, ताकि सरकार की और किरकिरी हो। विश्वास मत पर समर्थन की खरीद और इसकी अमेरिका को जानकारी के मसले पर गुरुवार तक सरकार प्रधानमंत्री के बयान के पक्ष में नहीं थी, लेकिन शुक्रवारसुबह एक कार्यक्रम में डा. सिंह ने जब यह कहा कि सांसदों की खरीद फरोख्त के लिए उन्होंने किसी को अधिकृत नहीं किया था तो विपक्ष भड़क गया और प्रधानमंत्री से संसद में बयान की मांग के साथ दोनों सदन स्थगित हो गए। गतिरोध तोड़ने के लिए राजनीतिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति जुटी और दोपहर बाद प्रधानमंत्री अपने बयान समेत सदन के सामने थे, लेकिन उनके बयान पर राज्यसभा में विपक्ष को स्पष्टीकरण पूछने से रोकने के बाद गतिरोध का दूसरा दौर शुरु हो गया। उत्तेजित विपक्ष मंगलवार को लोकसभा में नियम 193 के तहत चर्चा का नोटिस भी देगा। संसद में प्रधानमंत्री के तेवर तीखे थे, लेकिन विपक्ष नए सिरे से हावी होता दिखा। प्रधानमंत्री ने विकिलीक्स की विश्वसनीयता खारिज करते हुए कहा कि 2008 में सरकार बचाने के लिए उनकी सरकार ने कोई गलत काम नहीं किया। उन्होंने 2009 के लोकसभा चुनाव नतीजों की तरफ इशारा करते हुए कहा कि इस मुद्दे को उठाने के बाद भी चुनाव में विपक्ष की बुरी गत बनी थी। इसी के साथ वह यह भी कह गए कि मामले की जांच के लिए बनी संसदीय समिति को सांसदों की खरीद-फरोख्त के ठोस सबूत नहंी मिले थे। विपक्ष के अनुसार प्रधानमंत्री ने जिस किशोरचंद्र देव कमेटी की रिपोर्ट का हवाला देकर मामले को समाप्त बताने का प्रयास किया उसमें रिश्वतखोरी की बात प्रमुखता से कही गई है और कमेटी ने इसे आपराधिक मामला करार देते हुए उचित एजेंसी से जांच कराने की सिफारिश भी की थी। माकपा का नोटिस संसद सत्र के दौरान संसद से बाहर पीएम के बयान पर है, जबकि भाजपा और तेलुगू देशम ने उनके बयान को ही गलत बताकर उन्हें घेरा है। विपक्ष के हमलों से परेशान कांग्रेस ने लोकसभा में नेता विपक्ष सुषमा स्वराज पर आसन के आदेश का पालन न करने का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ विशेषाधिकारहनन का प्रस्ताव लाने की बात कही है।