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Saturday, April 16, 2011
Wednesday, April 13, 2011
Sunday, April 10, 2011
Monday, April 4, 2011
Friday, April 1, 2011
Monday, March 7, 2011
Wednesday, March 2, 2011
Friday, February 25, 2011
नीतीश ने विपक्ष की बोलती बंद की
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गुरुवार को बिहार विधान सभा में राज्यपाल के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का सरकार की ओर से जवाब देते हुए विपक्ष की बोलती बंद कर दी। उन्होंने विपक्ष पर जातिवादी राजनीति का आरोप लगाते हुए कहा कि यहां बांटने और जोड़ने वालों के बीच द्वंद है। बिहार आज रोल मॉडल के रूप में पूरे देश में उभरा है। यहां की योजनाओं और विकास की चर्चा पूरे देश में हो रही है। उन्होंने विपक्ष सहित केन्द्र की यूपीए सरकार पर प्रहार करते हुए कहा कि बिहार एक नया इतिहास लिख रहा है। ऊंची जातियों के आर्थिक, सामाजिक अध्ययन के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के लखनऊ बेंच के सेवानिवृत्त जज जस्टिस डी के त्रिवेदी की अध्यक्षता में राज्य आयोग के गठन की घोषणा करते हुए उन्होंने कहा कि देर-सबेर पूरे देश में इस तरह की पहल होगी। सबको लेकर ही समाज निर्माण और विकास की बातें हो सकती है। अपराध, त्वरित न्याय, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क आदि की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि इन मौलिक संरचनाओं के विकास के माध्यम से बिहार में जो बदलाव आया है, अब उसकी चर्चा पूरे देश में हो रही है। आम बिहारियों में सुरक्षा और गौरव का अहसास हुआ है। विकास का मतलब केवल चन्द फैक्ट्रियों का लग जाना मात्र नहीं है, बल्कि असली विकास तो मानव विकास से है। टीकाकरण में बिहार राष्ट्रीय औसत से आगे निकल चुका है। भ्रष्टाचार को समाज का कोढ़ बताते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि उन्होंने तो अंजाम की परवाह किए बिना जंग शुरू कर दी है।
अपराध के बाबत प्रतिपक्ष के नेता अब्दुलबारी सिद्दीकी के तमाम आरोपों को नकारते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि त्वरित और नियमित सुनवाइयों के माध्यम से वर्ष 2006 से लेकर जनवरी 2011 तक 57,341 मामलों में सजा सुनाई जा चुकी है। यह इस अवधि में देश के किसी भी राज्य में सुनाई गई सजा में सर्वाधिक है। उन्होंने कहा कि माहौल बदला है। लोग गवाही दे रहे हैं। कोर्ट में सुनवाई हो रही है। पहले लोग डरे-सहमे रहते थे, अब लोगों के मन से डर निकल गया है। महिलाओं को सुकून मिला है। पिछले बिहार विधान सभा चुनाव में इसी का नतीजा था कि महिलाएं बड़ी तादात में घर से निकलीं और वोट दी। इसी प्रकार स्वास्थ्य सेवा में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ है। साल 2006 के शुरू में जहां प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र पर महीने में औसतन 39 लोग इलाज के लिए जाते थे वहीं अब वहां प्रति माह 5 हजार से ज्यादा मरीज जाते हैं। टीकारण के माध्यम से स्वास्थ्य प्रतिरक्षण का अभियान चलाया गया है। टीकाकरण का राष्ट्रीय औसत जहां 61 प्रतिशत है वहीं टीकाकरण में बिहार का औसत 66.6 प्रतिशत हो गया है। सरकार का लक्ष्य इस औसत को देश के सबसे आगे रहने वाले राज्यांे से भी अधिक करना है।
मुख्यमंत्री ने विपक्ष को निशाना बनाते हुए कहा कि जब 2005 में पहली बार उन्होंने सरकार गठित की थी तो सूबे 12.5 प्रतिशत अल्पसंख्यक, दलित, महादलित और आदिवासी के बच्चे स्कूलों से बाहर थे। पांच साल बाद यह संख्या घटकर 3.5 प्रतिशत रह गयी है। सरकार अब शिक्षा गुणवत्ता पर ध्यान दे रही है। जो बच्चे स्कूल जाएं वे बीच में पढ़ाई नहीं छोड़ें, बल्कि अपनी पढ़ाई पूरी करके ही स्कूल से बाहर आएं। मुख्यमंत्री साइकिल योजना की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि अब तक 4 लाख 90 हजार लड़कियों को साइकिल दी जा चुकी है। अब लड़कियां साइकिल चलाती हुई स्कूल जाती है। यह प्रगति और विकास की असली निशानी है। बिहार के निजी स्कूलों में 5.2 प्रतिशत बच्चे पढ़ते हैं, वहीं यहां के सरकारी स्कूलों में 79.9 प्रतिशत बच्चे पढ़ते हैं। सड़क के मामले में सरकार की सोच है कि सूबे के किसी दूरस्थ इलाके से भी कोई व्यक्ति छह घंटे के अंदर पटना जा जाए।
इस दिशा में उल्लेखनीय उपलब्धि रही है। जाति विशेष के अफसरों की तैनाती के विपक्ष के आरोप पर बिफरते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि विपक्ष आज भी जातिवादी राजनीति कर रहा है, मगर बिहार की जनता इससे आगे निकल चुकी है।
अपराध के बाबत प्रतिपक्ष के नेता अब्दुलबारी सिद्दीकी के तमाम आरोपों को नकारते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि त्वरित और नियमित सुनवाइयों के माध्यम से वर्ष 2006 से लेकर जनवरी 2011 तक 57,341 मामलों में सजा सुनाई जा चुकी है। यह इस अवधि में देश के किसी भी राज्य में सुनाई गई सजा में सर्वाधिक है। उन्होंने कहा कि माहौल बदला है। लोग गवाही दे रहे हैं। कोर्ट में सुनवाई हो रही है। पहले लोग डरे-सहमे रहते थे, अब लोगों के मन से डर निकल गया है। महिलाओं को सुकून मिला है। पिछले बिहार विधान सभा चुनाव में इसी का नतीजा था कि महिलाएं बड़ी तादात में घर से निकलीं और वोट दी। इसी प्रकार स्वास्थ्य सेवा में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ है। साल 2006 के शुरू में जहां प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र पर महीने में औसतन 39 लोग इलाज के लिए जाते थे वहीं अब वहां प्रति माह 5 हजार से ज्यादा मरीज जाते हैं। टीकारण के माध्यम से स्वास्थ्य प्रतिरक्षण का अभियान चलाया गया है। टीकाकरण का राष्ट्रीय औसत जहां 61 प्रतिशत है वहीं टीकाकरण में बिहार का औसत 66.6 प्रतिशत हो गया है। सरकार का लक्ष्य इस औसत को देश के सबसे आगे रहने वाले राज्यांे से भी अधिक करना है।
मुख्यमंत्री ने विपक्ष को निशाना बनाते हुए कहा कि जब 2005 में पहली बार उन्होंने सरकार गठित की थी तो सूबे 12.5 प्रतिशत अल्पसंख्यक, दलित, महादलित और आदिवासी के बच्चे स्कूलों से बाहर थे। पांच साल बाद यह संख्या घटकर 3.5 प्रतिशत रह गयी है। सरकार अब शिक्षा गुणवत्ता पर ध्यान दे रही है। जो बच्चे स्कूल जाएं वे बीच में पढ़ाई नहीं छोड़ें, बल्कि अपनी पढ़ाई पूरी करके ही स्कूल से बाहर आएं। मुख्यमंत्री साइकिल योजना की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि अब तक 4 लाख 90 हजार लड़कियों को साइकिल दी जा चुकी है। अब लड़कियां साइकिल चलाती हुई स्कूल जाती है। यह प्रगति और विकास की असली निशानी है। बिहार के निजी स्कूलों में 5.2 प्रतिशत बच्चे पढ़ते हैं, वहीं यहां के सरकारी स्कूलों में 79.9 प्रतिशत बच्चे पढ़ते हैं। सड़क के मामले में सरकार की सोच है कि सूबे के किसी दूरस्थ इलाके से भी कोई व्यक्ति छह घंटे के अंदर पटना जा जाए।
इस दिशा में उल्लेखनीय उपलब्धि रही है। जाति विशेष के अफसरों की तैनाती के विपक्ष के आरोप पर बिफरते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि विपक्ष आज भी जातिवादी राजनीति कर रहा है, मगर बिहार की जनता इससे आगे निकल चुकी है।
Thursday, February 24, 2011
Thursday, February 17, 2011
दलित एजेंडे पर बरसा रहे डंडे
कहने को सूबे में दलित एजेंडे पर काम करने वाली सरकार है मगर कई एक विभाग ऐसे हैं जहां सरकारी नुमाइंदे खुद यहां डंडे बरसाने से नहीं चूक रहे हैं। मसलन दलितों के विकास के नाम पर सरकार में ऊंचे-ऊंचे ओहदों पर बैठे अफसर मुख्यमंत्री मायावती तक को गच्चा दे रहे हैं। स्वास्थ्य सेवाओं में खासकर आयुर्वेद विभाग में तो दलितों को मिलने वाली सुविधाओं का टोटा है। उन्हें स्पेशल कम्पोनेंट के नाम पर भी एक पैसा नहीं दिया जा रहा है।
बसपानेत्री के राज में दलितों के साथ हो रहे अन्याय का उजागर मुरादाबाद निवासी सलीम बेग की आरटीआई द्वारा मांगी गई सूचना के जरिए हुआ है। बेग ने मुख्यमंत्री कार्यालय के जनसूचना अधिकारी से सूचना मांगी थी कि आयुर्वेद विभाग में दलितों के विकास के लिए पिछले तीन सालों में कितना धन स्वीकृत किया गया, कितना अवमुक्त और कितना शेष है? मगर मुख्यमंत्री कार्यालय के निर्देश पर आयुर्वेद निदेशालय ने जो सूचना मुहैया कराई है वह चौकाने वाली है। निदेशालय प्रभारी अधिकारी डॉ. आरके सिंह ने लिखित में बताया है कि दलितों के विकास के नाम से आयुर्वेद विभाग में कोई योजना संचालित नहीं है। लखनऊ स्थित आयुर्वेद महाविालय के रिटायर्ड प्रधानाचार्य डॉ. भगवान सिंह ने भी डेली न्यूज ऐक्टिविस्ट को बताया कि दलितों के नाम पर कोई सुविधाएं आज तक विभाग को उपलब्ध नहीं हो पाईं। दलित एजेंडे वाली सरकार में एक और तथ्य चौंकाने वाला यह है कि आयुर्वेद विभाग में स्पेशल कम्पोनेंट प्लान के तहत सिवाय पांच जिलों को छोड़ कर इतने बड़े प्रदेश में इस विभाग को एक पैसा तक नहीं दिया गया। यह राज्य सरकार की संवेदनशून्यता है या फिर सरकारी मशीनरी चला रहे बड़े अफसरशाहों की उदासीनता। सबसे दुर्भाग्यजनक तथ्य तो यह भी है कि विभाग के मुखिया प्रमुख सचिव प्रदीप शुक्ला तक को यह जानकारी नहीं है कि आयुर्वेद विभाग में दलितों को सुविधाएं मिल भी पा रही हैं या नहीं। डीएनए ने जब इस बाबत प्रमुख सचिव से पूछा तो उन्होंने कहा कि मेरी जानकारी में नहीं है। इस सम्बंध में विशेष सचिव व निदेशक श्रद्धा मिश्रा बेहतर बता सकती हैं। आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक आयुर्वेद विभाग को स्पेशल कम्पोनेंट प्लान के तहत वर्ष 2008-09, 2009-10 में एक पैसा नहीं मिला। इस दौरान सिर्फ मुजफ्फरनगर को 431 लाख, बरेली को 2221 लाख, गाजीपुर को 1293 लाख, लखनऊ 9534 लाख तथा बाराबंकी को 862 लाख समेत कुल 14341 लाख रुपए दिए गए। यूपी में आयुर्वेद केन्द्र के अनुदान पर ही आश्रित है। निदेशालय की जानकारी के अनुसार वर्ष 2008 में ड्रग एंड क्वालिटी कंट्रोल पर 15 लाख, ड्रग क्वालिटी कंट्रोल व ड्रग टेस्टिंग पर दो लाख, आयुर्वेदिक प्रयोगशालाओं के लिए 65 लाख 33 हजार रुपए, अलीगढ़ के तिब्बिया कॉलेज के दवाखाना के लिए 1,35,39,306, ग्रामीण क्षेत्रों में दवा आपूर्ति पर 5,88,50,000, आयुष इंस्टीट्यूट के विकास के लिए दो करोड़ व वाराणसी आयुर्वेद कॉलेज के लिए 1,70,00, 000 रुपए अनुदान के रूप में मिला है। इसके साथ ही प्रदेश में आयुर्वेदिक महाविालयों के बारे में निदेशालय ने बताया है कि लखनऊ के टुड़ियागंज में राजकीय आयुर्वेदिक महाविालय, झांसी में बुंदेलखंड राजकीय आयुर्वेदिक महाविालय, वाराणसी में सम्पूर्णानंद संस्कृत राजकीय आयुर्वेदिक महाविालय, मुजफ्फरनगर में स्वामी कल्याण देव राजकीय आयुर्वेदिक महाविालय, पीलीभीत में ललित हरि राजकीय आयुर्वेदिक कॉलेज, इलाहाबाद के हडिया में राजकीय महाविालय, बांदा में तथा बरेली में शाहू रामनरायन मुरली मनोहर आयुर्वेदिक कॉलेज है।
बसपानेत्री के राज में दलितों के साथ हो रहे अन्याय का उजागर मुरादाबाद निवासी सलीम बेग की आरटीआई द्वारा मांगी गई सूचना के जरिए हुआ है। बेग ने मुख्यमंत्री कार्यालय के जनसूचना अधिकारी से सूचना मांगी थी कि आयुर्वेद विभाग में दलितों के विकास के लिए पिछले तीन सालों में कितना धन स्वीकृत किया गया, कितना अवमुक्त और कितना शेष है? मगर मुख्यमंत्री कार्यालय के निर्देश पर आयुर्वेद निदेशालय ने जो सूचना मुहैया कराई है वह चौकाने वाली है। निदेशालय प्रभारी अधिकारी डॉ. आरके सिंह ने लिखित में बताया है कि दलितों के विकास के नाम से आयुर्वेद विभाग में कोई योजना संचालित नहीं है। लखनऊ स्थित आयुर्वेद महाविालय के रिटायर्ड प्रधानाचार्य डॉ. भगवान सिंह ने भी डेली न्यूज ऐक्टिविस्ट को बताया कि दलितों के नाम पर कोई सुविधाएं आज तक विभाग को उपलब्ध नहीं हो पाईं। दलित एजेंडे वाली सरकार में एक और तथ्य चौंकाने वाला यह है कि आयुर्वेद विभाग में स्पेशल कम्पोनेंट प्लान के तहत सिवाय पांच जिलों को छोड़ कर इतने बड़े प्रदेश में इस विभाग को एक पैसा तक नहीं दिया गया। यह राज्य सरकार की संवेदनशून्यता है या फिर सरकारी मशीनरी चला रहे बड़े अफसरशाहों की उदासीनता। सबसे दुर्भाग्यजनक तथ्य तो यह भी है कि विभाग के मुखिया प्रमुख सचिव प्रदीप शुक्ला तक को यह जानकारी नहीं है कि आयुर्वेद विभाग में दलितों को सुविधाएं मिल भी पा रही हैं या नहीं। डीएनए ने जब इस बाबत प्रमुख सचिव से पूछा तो उन्होंने कहा कि मेरी जानकारी में नहीं है। इस सम्बंध में विशेष सचिव व निदेशक श्रद्धा मिश्रा बेहतर बता सकती हैं। आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक आयुर्वेद विभाग को स्पेशल कम्पोनेंट प्लान के तहत वर्ष 2008-09, 2009-10 में एक पैसा नहीं मिला। इस दौरान सिर्फ मुजफ्फरनगर को 431 लाख, बरेली को 2221 लाख, गाजीपुर को 1293 लाख, लखनऊ 9534 लाख तथा बाराबंकी को 862 लाख समेत कुल 14341 लाख रुपए दिए गए। यूपी में आयुर्वेद केन्द्र के अनुदान पर ही आश्रित है। निदेशालय की जानकारी के अनुसार वर्ष 2008 में ड्रग एंड क्वालिटी कंट्रोल पर 15 लाख, ड्रग क्वालिटी कंट्रोल व ड्रग टेस्टिंग पर दो लाख, आयुर्वेदिक प्रयोगशालाओं के लिए 65 लाख 33 हजार रुपए, अलीगढ़ के तिब्बिया कॉलेज के दवाखाना के लिए 1,35,39,306, ग्रामीण क्षेत्रों में दवा आपूर्ति पर 5,88,50,000, आयुष इंस्टीट्यूट के विकास के लिए दो करोड़ व वाराणसी आयुर्वेद कॉलेज के लिए 1,70,00, 000 रुपए अनुदान के रूप में मिला है। इसके साथ ही प्रदेश में आयुर्वेदिक महाविालयों के बारे में निदेशालय ने बताया है कि लखनऊ के टुड़ियागंज में राजकीय आयुर्वेदिक महाविालय, झांसी में बुंदेलखंड राजकीय आयुर्वेदिक महाविालय, वाराणसी में सम्पूर्णानंद संस्कृत राजकीय आयुर्वेदिक महाविालय, मुजफ्फरनगर में स्वामी कल्याण देव राजकीय आयुर्वेदिक महाविालय, पीलीभीत में ललित हरि राजकीय आयुर्वेदिक कॉलेज, इलाहाबाद के हडिया में राजकीय महाविालय, बांदा में तथा बरेली में शाहू रामनरायन मुरली मनोहर आयुर्वेदिक कॉलेज है।
Tuesday, February 15, 2011
योजना आकार 24 हजार करोड़ से कम नहीं
बिहार के योजना आकार को हर हाल में 24 हजार करोड़ रखने पर अड़े मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सह वित्तमंत्री सुशील कुमार मोदी ने योजना आयोग से आग्रह किया है कि बिहार के विकास को गति देने के लिए इस आकार को मंजूर किया जाए। इस बाबत नई दिल्ली में मंगलवार को योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया के साथ इन दोनों नेताओं की बातचीत होगी। मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के साथ बिहार सरकार के 15 विभागों के प्रधान सचिवों की एक टीम भी होगी, जो विभागवार वार्षिक योजना प्रस्तावों को अंतिम रूप देगी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मांग है कि योजना आयोग योजनाओं के चयन और स्वीकृति में राज्य को और स्वतंत्रता दें। उन्होंने इस बाबत कहा कि बिहार एक विकासशील राज्य है। यहां की स्थानीय जरूरतों के मुताबिक योजनाओं के स्वरूप का निर्धारण जरूरी है। उन्होंने कहा कि बैकवर्ड रीजन ग्रांट फंड में आयोग बिहार को विशेष योजना से 3145 करोड़ रुपए दे। साथ ही बिहार में बीपीएल के चयन के लिए भारत सरकार एक स्वतंत्र आयोग का गठन करे।
बिहार के विकास मॉडल की चर्चा करते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए सामान खरीदकर देने के बदले लाभार्थियों को सार्वजनिक सभा में नगद राशि देनी चाहिए। इसके पूर्व पटना में सोमवार को योजना आयोग के सदस्य नरेन्द्र जाधव से बिहार के योजना आकार को लेकर हुई विशेष वार्ता में मुख्यमंत्री ने कहा कि सिर्फ शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में ही नहीं बल्कि सामाजिक सुरक्षा और आधारभूत संरचनाओं के विकास पर भी यहां काम हो रहा है। ऐसे में योजना आकार में वृद्धि होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि योजना आयोग राज्य सरकार को योजनाओं के चयन और क्रियान्वयन में अधिक स्वतंत्रता दे ताकि क्षेत्रीय आवश्यकताओं के आधार पर योजनाओं का प्रभावी ढंग से क्रियान्वयन हो सके। योजनओं का लाभ सही लोगों तक पहुंचाने और भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए मुख्यमंत्री ने कई सलाह भी दिए। खा सुरक्षा के लिए लाभार्थियों को खाान्न के बदले नगद भुगतान किया जाए। साइकिल योजना को उदाहरण के तौर रखते हुए उन्होंने कहा कि साइकिल खरीदकर देने के बदले नगद राशि ही यहां दी जा रही है। नगद राशि देने के कारण यह योजना न केवल भ्रष्टाचार से मुक्त है बल्कि लाभार्थियों को शत-प्रतिशत लाभ भी मिल रहा है।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने स्वास्थ्य, शिक्षा के साथ ही सामाजिक क्षेत्रों में राज्य सरकार की ओर चलाई जा रही अनेक योजनाओं की चर्चा करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री कन्या सुरक्षा योजना, मुख्यमंत्री पोशाक योजना, महादलितों की दी जाने वाली तीन डिसमिल जमीन की योजना ऐसी हैं जिनका अनुकरण आज कई दूसरे राज्य कर रहे हैं। बिहार हमेशा प्राकृतिक आपदाओं से भी त्रस्त रहता है। ऐसे में यहां आधारभूत संरचनाओं के विकास की जरूरत को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि इनके आधार पर ही भविष्य की विकास योजनाएं निर्भर करेंगी। उन्होंने भारत सरकार से बीपीएल परिवारों के चयन के लिए एक स्वतंत्र आयोग गठित करने की मांग की। मुख्यमंत्री ने कहा केंद्र सरकार की ओर से मात्र 66 लाख बीपीएल परिवारों के लिए ही राशन-किरासन दिए जाते हैं जबकि यहां बीपीएल परिवारों की अनुमानित संख्या 1.40 करोड़ के आसपास है। राज्य सरकार अपने बूते बीपीएल परिवारों को खा सुरक्षा देने के लिए वचनबद्ध है। मगर उनकी सरकार की राय है कि इसके लिए लाभार्थियों को सार्वजनिक सभा कर नगद राशि का भुगतान किया जाए। भ्रष्टाचार को खत्म करना उनकी सरकार की प्राथमिकता है। इसके लिए लम्बी लड़ाई की जरूरत है। विकास योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट न चढ़े, इस पर भी सरकार की पैनी नजर है।
बिहार के विकास मॉडल की चर्चा करते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए सामान खरीदकर देने के बदले लाभार्थियों को सार्वजनिक सभा में नगद राशि देनी चाहिए। इसके पूर्व पटना में सोमवार को योजना आयोग के सदस्य नरेन्द्र जाधव से बिहार के योजना आकार को लेकर हुई विशेष वार्ता में मुख्यमंत्री ने कहा कि सिर्फ शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में ही नहीं बल्कि सामाजिक सुरक्षा और आधारभूत संरचनाओं के विकास पर भी यहां काम हो रहा है। ऐसे में योजना आकार में वृद्धि होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि योजना आयोग राज्य सरकार को योजनाओं के चयन और क्रियान्वयन में अधिक स्वतंत्रता दे ताकि क्षेत्रीय आवश्यकताओं के आधार पर योजनाओं का प्रभावी ढंग से क्रियान्वयन हो सके। योजनओं का लाभ सही लोगों तक पहुंचाने और भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए मुख्यमंत्री ने कई सलाह भी दिए। खा सुरक्षा के लिए लाभार्थियों को खाान्न के बदले नगद भुगतान किया जाए। साइकिल योजना को उदाहरण के तौर रखते हुए उन्होंने कहा कि साइकिल खरीदकर देने के बदले नगद राशि ही यहां दी जा रही है। नगद राशि देने के कारण यह योजना न केवल भ्रष्टाचार से मुक्त है बल्कि लाभार्थियों को शत-प्रतिशत लाभ भी मिल रहा है।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने स्वास्थ्य, शिक्षा के साथ ही सामाजिक क्षेत्रों में राज्य सरकार की ओर चलाई जा रही अनेक योजनाओं की चर्चा करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री कन्या सुरक्षा योजना, मुख्यमंत्री पोशाक योजना, महादलितों की दी जाने वाली तीन डिसमिल जमीन की योजना ऐसी हैं जिनका अनुकरण आज कई दूसरे राज्य कर रहे हैं। बिहार हमेशा प्राकृतिक आपदाओं से भी त्रस्त रहता है। ऐसे में यहां आधारभूत संरचनाओं के विकास की जरूरत को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि इनके आधार पर ही भविष्य की विकास योजनाएं निर्भर करेंगी। उन्होंने भारत सरकार से बीपीएल परिवारों के चयन के लिए एक स्वतंत्र आयोग गठित करने की मांग की। मुख्यमंत्री ने कहा केंद्र सरकार की ओर से मात्र 66 लाख बीपीएल परिवारों के लिए ही राशन-किरासन दिए जाते हैं जबकि यहां बीपीएल परिवारों की अनुमानित संख्या 1.40 करोड़ के आसपास है। राज्य सरकार अपने बूते बीपीएल परिवारों को खा सुरक्षा देने के लिए वचनबद्ध है। मगर उनकी सरकार की राय है कि इसके लिए लाभार्थियों को सार्वजनिक सभा कर नगद राशि का भुगतान किया जाए। भ्रष्टाचार को खत्म करना उनकी सरकार की प्राथमिकता है। इसके लिए लम्बी लड़ाई की जरूरत है। विकास योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट न चढ़े, इस पर भी सरकार की पैनी नजर है।
बात-बात पर वॉकआउट
विधानसभा में सोमवार का दिन वॉक आउट में ही बीता। प्रश्नप्रहर से शुरू हुआ वॉकआउट का सिलसिला बजट पर चर्चा शुरू होने तक चलता रहा। इस बीच निकाय चुनाव संशोधन प्रक्रिया को लेकर लाए गए विधेयक पर भाजपा के सदस्य सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए वेल में आए और धरना देकर बैठ गए। प्रश्नकाल में सपा के जोखू लाल यादव, विशंभर निषाद सहित अन्य सदस्यों द्वारा जनता को बिजली संकट से निजात दिलाने के बारे में किए गए सवाल पर सरकार से मिले जवाब पर सपा सदस्य सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए सदन से वॉकआउट कर गए। ऊर्जा मंत्री ने कहा कि पिछली सरकारों ने बिजली केनाम पर अपने कार्यकाल पर केवल भाषणबाजी ही की है। यदि पूर्ववर्ती सरकारों ने इस मुद्दे पर काम किया होता तो शायद आज जनता को इस समस्या का सामना न करना पड़ता। प्रश्नप्रहर में रालोद के सदस्यों ने प्रदेश में डेगू जैसे जानलेवा बुखार पर स्वास्थ्यमंत्री के आए जवाब पर संतुष्ट न होने पर सदन से वॉकआउट किया। किसानों की भूमि अधिगृहीत किए जाने व मुआवजा मांगने पर उन पर लाठीचार्ज की घटना को लेकर कांग्रेस व भाजपा ने सरकार को घेरने में एकजुटता दिखाई। इस मुद्दे पर दोनों दलों ने सरकार पर किसान विरोधी होने का आरोप लगाया। संसदीय कार्यमंत्री लालजी वर्मा से जो जवाब आया उससे अंसतुष्ट दोनों दलों के सदस्यों ने सदन से वॉकआउट किया। निकाय चुनाव प्रक्रिया में संशोधन करने के संबंध में लाए गए विधेयक के विरोध में भी भाजपा व कांग्रेस ने एका दिखाई। भाजपा के सदस्य तो इस मुद्दे पर सरकार के निर्णय के खिलाफ नारेबाजी करते हुए वेल में आए और धरना देकर बैठ गए। बाद में भाजपा व कांग्रेस ने इस मुद्दे पर बारी-बारी से वॉकआउट किया। भाजपा के हुकुम सिंह, सतीश महाना, श्यामदेव राय चौधरी, सुरेश कुमार खन्ना ने कहा कि जिस बसपा ने पिछले चुनाव में निकाय चुनाव के बहिष्कार का निर्णय लिया था वही बसपा सरकार में आने के बाद शहरी क्षेत्रों में कब्जा करने की गरज से निकाय चुनाव की प्रक्रिया में संशोधन करने जा रही है। भाजपा सदस्यों ने कहा कि इस विधेयक को लाने से पहले राष्ट्रपति या राज्यपाल से अनुमति लेना भी जरूरी नहीं समझा गया। वहीं विधान परिषद में सपा ने सरकारी चीनी मिलों को औने-पौने दामों में पूंजीपति चढ्ढा समूह को बेचे जाने का मामला उठाकर सरकार में घेरा। सरकार ने सपा के आरोप को बेबुनियाद बताते हुए कहा कि सरकार पर वित्तीय भार साबित हो रही चीनी मिलों को कोर्ट द्वारा अनुमोदित स्विस चैलेंज मैथेड से बेचा गया है। इसमें कोई भी अनियमितता नहीं हुई है। सरकार के इस जवाब से असंतुष्ट समाजवादी पार्टी ने सदन से वॉकआउट किया। शून्यकाल में समाजवादी पार्टी ने सरकार द्वारा बेची गई 10 चीनी मिलों में करोड़ों रुपए का घोटाला बताया। सूचना की ग्राह्यता पर बोलते हुए सपा सदस्य देवेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि सरकार ने 11 चालू चीनी मिलों को बेचकर 468.52 करोड़ रुपए के राजस्व की क्षति पहुंचाई है। जबकि इन चीनी मिलों को बेचने के खिलाफ कोर्ट में मामले लंबित हैं।
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