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Monday, March 28, 2011

'द्वंद्व' के बीच अमन के सुर


प्रधानमंत्री का राजनीतिक जवाब


अभिजात वर्ग के जवाहरलाल नेहरू को कांग्रेस में अन्य नेताओं से राजनीतिक और व्यक्तिगत दूरी बनाए रखने के लिए विशेष प्रयास करना पड़ा था। प्रथम प्रधानमंत्री के सामाजिक तबके में अधिकांश कांग्रेसी राजनेताओं को साधारण कोटि का, अशिक्षित, संकीर्ण मानसिकता वाला माना जाता था। बहुतों को आलसी, गोपूजा करने वाला और ज्योतिषी व आयुर्वेदिक दवाओं में विश्वास रखने वाला माना जाता था। कुछ पर बेईमान का ठप्पा लगा था। धोतीवालों को लेकर नेहरू की अरुचि आंशिक रूप से वर्ग समस्या थी। हालांकि प्रमुख रूप से यह उस कुंठा का परिणाम था जो शक्तिशाली प्रांतीय नेताओं पर सवारी न गांठ पाने से पैदा हुई थी। इंदिरा गांधी को कांग्रेस को नीचा दिखाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी, क्योंकि जहां तक उनका सवाल था, वह खुद कांग्रेस थीं। किसी और का कोई मतलब नहीं था। अटल बिहारी वाजपेयी के बहुत से सहयोगियों का मानना है कि वह गलत पार्टी में सही व्यक्ति थे। उनका कद भारतीय जनता पार्टी से भी इतना ऊंचा था कि यह बताने में भी एक प्रकार से उनकी हेठी थी कि वह भाजपा नेता हैं। वास्तव में राजग सरकार के बहुत से फैसले भाजपा की नीति के उलट या अलग थे। वाजपेयी के दरबारियों ने जिस भद्दे तरीके से उन्हें भाजपा से अलग दिखाने की कोशिश की उसका उतना ही हास्यास्पद दोहराव मनमोहन सिंह के मामले में नजर आ रहा है। लगता है कि रेसकोर्स रोड की तीन कोठियों में कोई वास्तुदोष है कि इनमें रहने वाले प्रधानमंत्री मानने लगते हैं कि उनकी शक्ति में राष्ट्रपति और राजाओं की शक्ति निहित है। पिछले सात माह से संप्रग सरकार एक के बाद एक भ्रष्टाचार के विपक्ष के वारों का सामना कर रही है। घोटालों ने तीन मंत्रियों की बलि ले ली है, फिर भी मनमोहन सिंह की अपने खुद के मंत्रियों को काबू में रखने की क्षमता पर सवालिया निशान लगा है। अपने राजनीतिक कॅरियर में मनमोहन सिंह पहली बार आलोचना और हंसी के पात्र बने हैं। एक ऐसा व्यक्ति जिसने सार्वजनिक जीवन में अपनी शिक्षा और जानकारी के बल पर प्रवेश पाया, अब जैसे कुछ न जानने को कला की एक विधा के रूप में स्थापित कर चुका है। उनकी साफ-सुथरी छवि पूरी तरह दागदार हो गई है। जुलाई 2008 में वोट के लिए नोट घोटाले पर विकिलीक्स के नए खुलासों के बाद पिछले सप्ताह मनमोहन सिंह को विपक्ष के आरोपों की भारी गोलाबारी झेलनी पड़ी। इस बात से साफ इनकार के अलावा कि न तो वह खुद और न ही कोई कांग्रेसी इस घोटाले में शामिल था, प्रधानमंत्री इस आरोप का कोई विश्वसनीय जवाब नहीं दे पाए कि किशोर चंद्र देव संसदीय समिति को उद्धृत करते हुए उनका बयान तथ्यों से परे था। विडंबना यह है कि इतना सब होते हुए भी प्रधानमंत्री इस भीषण संसदीय युद्ध से साफ बच निकले। यह इसलिए संभव हो पाया कि उन्होंने भाजपा की सुरक्षा की सबसे कमजोर कड़ी पर जोरदार प्रहार किए। लालकृष्ण आडवाणी की प्रधानमंत्री बनने की अदम्य लालसा पर तंज कसते हुए उन्होंने भाजपाइयों को हताशों की टोली साबित कर दिया। महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने किसी भी सदन में विपक्ष के नेता को निशाना नहीं बनाया। उन्होंने सोचसमझ कर ऐसे व्यक्ति को चुना जो चुनाव हार गया और जनादेश से असंतुष्ट रहा। आडवाणी के ढीले-ढाले रवैये ने सरकार पर विपक्षी हमले की धार भोथरी कर दी। कभी खत्म न होने वाले घोटालों के वार से कांग्रेस को गंभीर क्षति पहुंची, किंतु प्रधानमंत्री ने किसी तरह खुद का अधिक नुकसान होने से बचा लिया। वास्तव में, विकिलीक्स पर बहस के बाद मनमोहन सिंह एक सप्ताह पहले के मुकाबले कहीं मजबूत होकर उभरे हैं। यह राहत तात्कालिक हो सकती है, क्योंकि अभी संप्रग के पिटारे में घोटालों के प्रेतों के निकलने का सिलसिला बंद नहीं हुआ है। मोहाली में भारत-पाक क्रिकेट मैच देखने का मनमोहन सिंह का पाकिस्तान के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को दिया गया न्यौता वास्तव में शिष्टाचार वश दिया गया है, किंतु जिस तरीके से इसे प्रचारित किया जा रहा है उससे लगता है कि एक अनपेक्षित शुरुआत को भांपकर प्रधानमंत्री भारत-पाक वार्ता को फिर से पटरी पर लाने को उतावले हैं। यह शर्म-अल-शेख समझौते के बाद चौतरफा आलोचना से घिरने के बाद भारत के धीमे चलो रुख के विपरीत है। अस्थिर पाकिस्तान से नजदीकी बढ़ाने से एक बार फिर भारत दुस्साहसिक कूटनीति के अखाड़े में कूद पड़ा है। प्रधानमंत्री अपनी संशयग्रस्त पार्टी के सामने कुछ सकारात्मक कर दिखाना चाहते हैं। हमारी पड़ोस नीति न केवल घरेलू मजबूरियों की बंधक है, बल्कि यह एक छवि चमकाने का ऐसा खेल बन गई है जिसमें प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी शामिल है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

प्रोन्नति में कोटे के लिए अब दलितों ने रोका रेल ट्रैक


जाटों के बाद रविवार को दलित रेलवे को करीब ढाई घंटे तक हलकान किए रहे। सरकारी नौकरियों में प्रोन्नति के लिए कोटा तय किए जाने, आरक्षण पर न्यायिक दखल रोकने समेत विभिन्न मांगों को लेकर रविवार को हजारों दलितों ने सहारनपुर जिले में रेल ट्रैक जाम कर दिया। साथ ही ट्रेनों पर पथराव किया। प्रदर्शन व हंगामे के कारण जनशताब्दी और उज्जैनी एक्सप्रेस समेत करीब दर्जन भर ट्रेनों का संचालन बाधित हुआ। केंद्र सरकार से आरक्षण को संविधान की नौवीं सूची में शामिल करने, आरक्षण के मसले पर न्यायिक दखल रोकने व सरकारी विभागों में दलितों के लिए पदोन्नति कोटा तय किए जाने समेत विभिन्न मांगों को लेकर दलित कई माह से आंदोलित हैं। आरक्षण बचाओ संघर्ष समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष इंजीनियर आरपी सिंह और संगठन के नेता विनोद तेजियान के आह्वान पर रविवार को हजारों दलितों ने गांधी पार्क में सभा की और फिर डीएम को ज्ञापन देने कलक्ट्रेट की ओर कूच किया। वाहनों पर सवार तमाम लोग कचहरी पुल पर चढ़ गए, जबकि बहुत से लोगों ने अपने वाहनों को रेल पटरियों पर खड़ा कर दिया। शाम 4.10 बजे आंदोलनकारियों ने पथराव कर देहरादून-बांद्रा एक्सप्रेस को रोक दिया। एक खाली इंजन पर भी पथराव किया और उसे वापस जाने को विवश कर दिया। सूचना पर डीएम-एसएसपी मौैके पर पहुंचे और संघर्ष समिति के नेताओं को बातचीत के लिए बुलाया। कमिश्नर सुरेश चंद्रा और डीआईजी भोलानाथ तिवारी ने दलितों की मांगों को गृह मंत्रालय तक पहुंचाने का आश्वासन दिया। इसके बाद आरपी सिंह और विनोद तेजियान ने प्रशासन को तीन माह का समय देते हुए ट्रैक खाली करने की घोषणा की|