Showing posts with label ३० जनवरी २०११. Show all posts
Showing posts with label ३० जनवरी २०११. Show all posts

Wednesday, February 2, 2011

नेताओं के व्यर्थ के बोल


लेखक भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के मुद्दे पर शीर्ष नेताओं को भी खोखली बातें करते देख रहे हैं...
26 जनवरी की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने देश को बढ़ते भ्रष्टाचार के प्रति आगाह किया और इसे विकास का सबसे बड़ा दुश्मन बताया। उन्होंने जनसेवा के क्षेत्र में व्याप्त संवेदनहीनता और लापरवाही पर चिंता व्यक्त करते हुए जन कल्याणकारी एवं आर्थिक विकास की योजनाओं में अधिक पारदर्शिता और जबावदेही की आवश्यकता पर भी बल दिया। चूंकि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर संसद के शीतकालीन सत्र को नहीं चलने दिया गया इसलिए उन्होंने संसदीय व्यवस्था के अनुपालन पर भी जोर दिया। राष्ट्रपति के विचारों से कदापि असहमत नहीं हुआ जा सकता, लेकिन आम आदमी उनसे यह जानना चाहेगा कि आखिर देश के नेता भ्रष्टाचार पर नियंत्रण क्यों नहीं कर पा रहे हैं? भ्रष्टाचार की बात जब भी चलती है उसे राजनीति से जोड़ा जाता है। राष्ट्रपति खुद भी राजनीति की उपज हैं। वह राजनीति में बढ़ते भ्रष्टाचार से अवश्य परिचित होंगी। अन्य शीर्ष नेताओं की तरह उन्होंने भी जिस तरह बढ़ते भ्रष्टाचार पर अपनी वेदना व्यक्त की उससे काम चलने वाला नहीं है। दरअसल यह ठीक नहीं कि शीर्ष पर बैठे हमारे नेता भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने के कोई ठोस उपाय करने के बजाय उस पर केवल चिंता जताएं। उन्हें यह अहसास होना चाहिए कि राजनीति से उपजा भ्रष्टाचार दैत्य बनकर राजनीति को ही निगल रहा है। हमारे औसत राजनेता आम आदमी के सामने अपना पक्ष इस तरह रखते हैं जैसे वे बिल्कुल पाक-साफ हों, लेकिन जिम्मेदार पद संभालते समय ऐसे ही नेता या तो भ्रष्टाचार सहन करते हैं या फिर उसकी अनदेखी करते हैं। समस्या यह है कि कुछ साफ छवि वाले राजनेता भी भ्रष्टाचार के प्रति मौन रहकर उसे बढ़ावा दे रहे हैं। ऐसे नेताओं में अगर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी का भी नाम लिया जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। पिछले कुछ समय से विपक्ष के नेता भ्रष्टाचार को लेकर हायतौबा मचा रहे हैं, लेकिन यदि उनसे यह पूछा जाए कि क्या उनके दलों द्वारा शासित राज्यों में भ्रष्टाचार समाप्त हो चुका है तो यह तय है कि उनके पास गोलमोल जवाब ही होगा। भ्रष्टाचार के मामले में सत्तापक्ष अथवा विपक्ष द्वारा शासित राज्यों में भेद करना कठिन है। 26 जनवरी के एक दिन पहले नाशिक के निकट मालेगांव के एडीएम यशवंत सोनवाने को तेल माफिया ने जिस तरह जिंदा जला दिया वह भी भ्रष्टाचार का एक भयावह रूप है। गरीबों को सस्ता मिट्टी का तेल (केरोसीन) देने के नाम पर सरकार कई दशकों से भारी-भरकम सब्सिडी देती चली आ रही है, लेकिन उसका लाभ गरीबों को नहीं मिल रहा। तेल माफिया मिट्टी का तेल डीजल में मिलाकर अपने वारे-न्यारे कर रहा है। हमारे देश में डीजल के मुकाबले मिट्टी के तेल के दाम तीन गुना कम हैं। इसी के चलते डीजल में मिट्टी के तेल की मिलावट का धंधा जोर पकड़े हुए है। मिट्टी के तेल पर दी जा रही सब्सिडी समाप्त करने की मांग अनेक स्तरों पर की जा चुकी है, लेकिन पता नहीं क्यों सरकार उस पर ध्यान नहीं दे रही है? वह ऐसे उपाय भी नहीं कर पा रही जिससे मिट्टी के तेल की कालाबाजारी रुके। सोनवाने की हत्या के बाद पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी ने मिलावटी तेल के कारोबार पर रोक लगाने के जो उपाय किए हैं वे छह माह बाद प्रभावी होंगे और फिलहाल यह तय नहीं कि उनसे कोई लाभ मिलेगा या नहीं? मिट्टी के तेल पर सब्सिडी देना और उसकी कालाबाजारी पर अंकुश न लगाना एक प्रकार से तेल माफिया की जेबें भरना है। एक अनुमान के अनुसार प्रति वर्ष लगभग आठ-दस हजार करोड़ रुपये के केरोसिन की कालाबाजारी होती है। यह संभव नहीं कि तेल माफिया यह काम बगैर राजनीतिक संरक्षण के कर सके। यह पहली बार नहीं जब किसी अफसर ने तेल माफिया के खिलाफ कार्रवाई करने की कोशिश की तो उसकी कीमत उसे जान देकर चुकानी पड़ी। इसके पहले लखीमपुर खीरी में इंडियन ऑयल के एक अफसर को पेट्रोल-डीजल में मिलावट करने वालों ने मौत के घाट उतार दिया था। सच तो यह है कि ऐसे न जाने कितने मामले हैं जो यह बताते हैं कि भ्रष्ट तत्वों के खिलाफ आवाज उठाने अथवा कार्रवाई करने वालों को मौत की नींद सुला दिया गया अथवा उनका उत्पीड़न किया गया। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि भ्रष्ट तत्वों की पहुंच राजनेताओं तक होती है। भ्रष्टाचार नेताओं के कारण ही पनप रहा है, लेकिन वेतरह-तरह के तर्क देकर व्यवस्था बदलने से इनकार कर रहे हैं। बात चाहे अनधिकृत बस्तियों को पोषित करने वाले भू-माफिया की हो या कोयला माफिया की या फिर वन संपदा लूटने वाले माफिया की-इन पर लगाम नहीं लग पा रही है। कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता है कि ये माफिया सरकार के नियंत्रण से बाहर हो चुके हैं और अपनी समानांतर सत्ता चलाने में सक्षम हो गए हैं। माओवादी भी माफिया का एक रूप हैं और यह किसी से छिपा नहीं कि वे किस तरह वन-खनिज संपदा के बल पर देश के अनेक इलाकों में काबिज हैं। वे अब इतने ताकतवर हो गए हैं कि देश के संविधान को भी नकार रहे हैं। ऐसे माओवादियों से भी अनेक नेताओं के संबंध हैं। कुछ तो उनसे खुलेआम हमदर्दी जताते हैं। भ्रष्टाचार के मामले यही बताते हैं कि भ्रष्ट तत्व नौकरशाहों तथा नेताओं के कारण फल-फूल रहे हैं। अब तो कॉरपोरेट जगत में भी भ्रष्टाचार फल-फूल रहा है। 2-जी स्पेक्ट्रम और अन्य अनेक घोटाले कॉरपोरेट जगत से नेताओं-नौकरशाहों की मिलीभगत का परिणाम हैं। चूंकि भ्रष्टाचार नियंत्रित करने के लिए लाए जा रहे लोकपाल विधेयक में कई ऐसी खामियां हैं जिनसे भ्रष्ट नेता आसानी से बच निकल सकते हैं इसलिए ऐसे नेताओं का दुस्साहस बढ़ना स्वाभाविक है। देश की जिन संस्थाओं पर भ्रष्टाचार को काबू में करने की जिम्मेदारी है वे राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते न केवल निष्प्रभावी हैं, बल्कि सत्तारूढ़ दलों की कठपुतली बन कर रह गई हैं। यदि रग-रग में समा गए भ्रष्टाचार को दूर करना है तो नए तौर तरीके सोचने होंगे। चूंकि वोट बैंक से ग्रस्त भारतीय राजनीति की सोच भ्रष्ट हो चुकी है इसलिए इसकी कल्पना नहीं की जा सकती कि हमारे औसत नेता भ्रष्टाचार को दूर कर पाएंगे। राजनीति अब एक ऐसा पेशा बन चुकी है जो भ्रष्टाचार के बगैर नहीं चल सकती। ऐसे में जब तक भारतीय राजनीति को साफ करने की कोई क्रांतिकारी सोच सामने नहीं आती तब तक भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने की बात करना देश को गुमराह करने जैसा है। विपक्ष भी राजनीतिक रोटियां सेंकने में लगा हुआ है और यही कारण है कि भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने की बातें बेमानी नजर आने लगी हैं।


नेहरू की गलत नीतियों से कमजोर हुआ राष्ट्रवाद


भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली ने यहां कहा कि देश पं. जवाहर लाल नेहरू की गलत नीतियों का दंश झेल रहा है। नेहरू की नीतियों के कारण राष्ट्रवाद कमजोर हुआ है। वहीं केंद्र की यूपीए सरकार पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह सरकार से अपना नियंत्रण खोते जा रहे हैं। महंगाई हो या भ्रष्टाचार सभी मोर्चे पर केंद्र सरकार बुरी तरह विफल साबित हो रही है। सरकार में भ्रष्टाचार का बोलबाला हो गया है। भाजपा प्रदेश कार्यसमिति में शिरकत करने आए जेटली ने यहां प्रेस कांफ्रेंस में कहा, नेता प्रतिपक्ष की हैसियत से सुषमा स्वराज ने पीजी थामस की मुख्य सतर्कता आयुक्त पद पर नियुक्ति का विरोध किया था, लेकिन प्रधानमंत्री नहीं माने। अब सरकार को जवाब देते नहीं बन रहा। यूपीए की सरकार में हर जगह भ्रष्टाचार का बोलबाला है। कॉमनवेल्थ गेम्स में हुए भ्रष्टाचार ने खेलों में एक नकारात्मक माहौल पैदा कर दिया है। 2जी स्पैक्ट्रम घोटाले का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, अपनी कुर्सी बचाने के लिए प्रधानमंत्री ने अपनी नाक के नीचे सब कुछ होने दिया। सरकार पर अब प्रधानमंत्री का नियंत्रण नहीं रहा है। कीमतें आसमान छू रहीं हैं, निवेश को लेकर भी देश में चिंता का माहौल है। इससे पूर्व कार्यसमिति की बैठक में जेटली ने कहा, राष्ट्रवाद के संदर्भ में देश में विभ्रम की सी स्थिति है। देश पं.जवाहर लाल नेहरू की गलत नीतियों का दंश झेल रहा है। नेहरू की तीन प्रमुख गलतियों के कारण देश में राष्ट्रवाद कमजोर हुआ है। पहला, अनुच्छेद 370, दूसरा कश्मीर का मामला राष्ट्रसंघ में ले जाना व तीसरा विभाजन के बाद आए शरणार्थियों को कश्मीर में बसने की अनुमति न देना। अनुच्छेद 370 कश्मीर में साठ वर्ष से लागू है, इसका परिणाम सारा देश देख रहा है, बावजूद इसके मौन रहना अपराध है। जेटली ने लाल चौके पर तिरंगा फहराने को निकाली गई राष्ट्रीय एकता यात्रा का जिक्र करते हुए कि उमर देश के पहले मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने देश के अंदर तिरंगा फहराने से लोगों को रोका। कहा, जहां एक ओर युवकों को तिरंगा फहराने से रोकने के लिए पुलिस का व्यापक इंतजाम था, तो वहीं पाकिस्तानी व काला झंडा लिए लोग निर्बाध सड़क पर मार्च कर रहे थे। जेटली ने छोटे राज्यों का समर्थन करते हुए कहा कि हरियाणा से लेकर उत्तरांचल तक यह अनुभव सुखद रहा है, लेकिन झारखंड के संदर्भ में अभी तक ऐसा नहीं कहा जा सकता। राजनीतिक अस्थिरता ने इसे छोटे राज्य के लाभ से वंचित कर रखा है।



भ्रष्टाचार से मुक्ति के लिए दस साल राजनीति को दें : राहुल गांधी


कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने देश की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव के लिए युवाओं से कम से कम दस वर्ष के लिए राजनीति में शामिल होने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि वर्तमान में अधिकांश राजनीतिक दलों में लोकतंत्र का अभाव है जिसके कारण भ्रष्टाचार जैसी बुराइयां पैदा हुई हैं। इसलिए मौजूदा व्यवस्था में बदलाव की जरूरत है और इसके लिए राजनीति में युवाओं की सहभागिता बेहद जरूरी है। महाराष्ट्र के तीन दिवसीय दौरे के अंतिम दिन औरंगाबाद पहुंचे राहुल ने यहां संवाददाता सम्मेलन में कहा कि लोग भ्रष्टाचार की शिकायत करते हैं, लेकिन इसे खत्म करने के लिए राजनीतिक व्यवस्था को बदलने की कोशिश नहीं करते। राहुल ने कहा कि भ्रष्टाचार इसलिए बढ़ रहा है, क्योंकि राजनीतिक व्यवस्था के दरवाजे बंद हंै और आम आदमी जो अच्छा करना चाहता है,उसे ऐसा करने नहीं दिया जाता। आम आदमी समझता है कि राजनीति भ्रष्ट है। कांग्रेस महासचिव ने कहा कि भ्रष्टाचार के मुद्दे को हमें सामूहिक नजरिए से देखना होगा। व्यवस्था में बदलाव के दो ही तरीके हैं एक तो भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो, उन्हें 20 साल के बजाय छह महीने के भीतर सजा मिले और दूसरा तरीका है राजनीतिक व्यवस्था को बदलना। भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए हमें दोनों तरीकों का इस्तेमाल करना होगा। बातचीत का वक्त अब खत्म हो गया है। अब बदलाव की जरूरत है और इसके लिए युवा और कुशल लोग हमारे साथ जुड़ें, क्योंकि बदलाव के लिए हमें उनकी जरूरत है। उन्होंने महाराष्ट्र के अतिरिक्त जिलाधिकारी यशवंत सोनवणे को कथित तेल माफिया द्वारा जीवित जलाए जाने की घटना को स्तब्धकारी बताते हुए कहा कि मैं सोनवणे की हत्या से स्तब्ध हूं। ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए प्रभावी एवं कड़े कदम उठाए जाने चाहिए। कांग्रेस महासचिव ने कहा कि दुनिया में ऐसा कोई धर्म नहीं है जो हिंसा या निर्दोष लोगों की हत्या की शिक्षा देता हो। आतंक फैलाना अपराध है और निर्दोष लोगों की हत्या करने वाले किसी भी व्यक्ति को माफ नहीं किया जा सकता। राहुल ने कहा कि जब मैं विदर्भ में किसान की विधवा कलावती से मिलता हूं, यूपी के किसी गांव में जाकर उनसे बात करता हूं अथवा रेलगाड़ी में सफर करता हूं तो लोग कहते हैं कि मैं ऐसा छवि बनाने के लिए कर रहा हूं, लेकिन मैं जो कर रहा हूं या जानने और सीखने का प्रयास कर रहा हूं, इसका मतलब आप आज नहीं समझेंगे, क्योंकि मेरे इन प्रयासों के परिणाम दस साल बाद आने शुरू होंगे। एक सवाल के जवाब में कांग्रेस महासचिव ने इस बात से साफ इंकार किया कि उन्होंने महंगाई का गठबंधन सरकार की देन बताया। उन्होंने कहा कि मेरे बयान को पूरी तरह से तोड़मरोड़ कर पेश किया गया। मैंने गठबंधन और बढ़ती कीमतों में कोई रिश्ता नहीं जोड़ा। यह पूछे जाने पर कि क्या उनकी पार्टी अगले चुनाव में प्रधानमंत्री पद के लिए उन्हें उतार रही है, राहुल ने कहा कि यह आपकी सोच है, न कि मेरी। मेरी सोच और मेरा काम राजनीतिक व्यवस्था को ठीक करना है।



भाजपा के तेवर से बजट सत्र पर घिरने लगे संकट के बादल


सीवीसी पीजे.थामस को लेकर लाचार और भ्रष्टाचार के दूसरे मुद्दों पर बेबस दिख रही सरकार पर भाजपा ने अब और दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया है। एक तरफ जहां पूरे मुद्दे में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को भागीदार बताते हुए थामस को हटाने की मांग तेज हो गई है, वहीं 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले व भ्रष्टाचार की जांच के लिए जेपीसी की जरूरत दोहराते हुए बजट सत्र पर मंडरा रहे खतरे की भी याद दिलाई जाने लगी है। पार्टी ने अब सीवीसी मामले में पीएमओ में तत्कालीन राज्यमंत्री और अब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान को भी लपेट लिया है। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में थामस पर होने वाली सुनवाई और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज की कोर्ट जाने की तैयारी से परेशान सरकार को राहत नहीं मिल पा रही है। एक तरफ जहां खुद कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने शनिवार को माना कि भ्रष्टाचार चिंता का विषय बन गया है वहीं मुख्य विपक्ष भाजपा के प्रवक्ता राजीव प्रताप रूड़ी ने आरोप लगाया कि सीवीसी की नियुक्ति में जो कुछ हुआ वह अभूतपूर्व है। पीएमओ में तत्कालीन राज्यमंत्री पृथ्वीराज चह्वाण समेत राजनीतिज्ञों और अधिकारियों की पूरी लाबी ने मिलकर थामस की नियुक्ति सुनिश्चित कर ली और प्रधानमंत्री भी चाहे अनचाहे अनजान बने रहे। जाहिर तौर पर इसके पीछे सरकार का कोई निहित स्वार्थ था। उन्होंने ने मांगकी कि थामस को तत्काल हटाएं वरना कोर्ट से किरकिरी झेलने के लिए तैयार रहें। काले धन की वापसी के लिए कोई समय सीमा तय नहीं किए जाने पर भी रूड़ी ने आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि जो कुछ सामने आ रहा है उससे लगने लगा है स्विस बैंक तो नाम देने के लिए तैयार है पर सरकार पर ही आगे बढ़ना नहीं चाहती है। राजनाथ सिंह ने एक बयान में कहा कि सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि पिछला पूरा सत्र विपक्ष की नाराजगी का शिकार हो चुका है। अब भी वक्त है कि सरकार जेपीसी की मांग मान ले, वरना बजट सत्र बाधित होने का जिम्मा सरकार का होगा। संकेत साफ था कि बजट सत्र सुचारु चलाने के लिए फरवरी में बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में भी सरकार को ज्यादा हासिल होने वाला नहीं है। रूड़ी ने राहुल और दिग्विजय सिंह पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि राजनीति से भ्रष्टाचार को खत्म करने की बात कर रहे राहुल को 2जी स्पेक्ट्रम, कामनवेल्थ, आदर्श सोसायटी और काले धन पर भी बोलना चाहिए। दूसरी तरफ दिग्विजय पर ज्यादा बोलने से बचते हुए सवाल किया कि कांग्रेस की तुष्टीकरण नीति के परिणामों पर भी कुछ सोचें। उन्होंने आरोप लगाया कि समाज में सारा दुराव कांग्रेस की नीतियों के कारण हुआ है।