भाजपा कार्यकारिणी में भी भ्रष्टाचार और महंगाई के खिलाफ अभियान तेज करने की घोषणा हुई है। इसके लिए 20 जनवरी से 20 फरवरी तक तहसील स्तर पर और पूरे मार्च महीने में गांव-गांव तक अभियान चलाने का निर्णय लिया गया। किंतु थोड़ी गहराई से विचार करने पर साफ हो जाता है कि रणनीति एवं राजनीतिक अभियान दोनों स्तरों पर यह ऐसा इंजन साबित हो रहा है, जो एक्सेलेरेटर दबने पर केवल फड़फड़ाता है और गति पकड़ने की जगह ठहर जाता है
असम की राजधानी गुवाहाटी भाजपा के लिए उत्तर पूर्व के किसी राज्य में राष्ट्रीय कार्यकारिणी आयोजित करने का पहला स्थान बना। जाहिर है, इसका एक उद्देश्य असम के आगामी विधानसभा चुनाव के पूर्व पार्टी एवं पार्टी गठजोड़ के लिए माहौल बनाना था। दल के अध्यक्ष नितिन गडकरी ने उद्घाटन भाषण में कहा भी कि भाजपा पूर्वोत्तर के लोगों के साथ है और निश्चित तौर पर उनकी समस्याओं के समाधान के तरीकों के साथ आगे बढ़ेगी। बांग्लादेशी घुसपैठियों से लेकर उग्रवाद, अलगाववाद की चर्चा उनके भाषण और प्रस्तावों में थी किंतु कार्यकारिणी न असम या पूर्वोत्तर पर केन्द्रित थी और न इसका मुख्य स्वर यह बन पाया। पार्टी के नेताओं का ध्यान दिल्ली पर ही केन्द्रित रहा। यह कहना ज्यादा सही होगा कि गुवाहाटी की केन्द्रीय कार्यकारिणी केन्द्रीय राजनीति के घटाटोप में घिरी रही और इसमें उत्तर पूर्व कहीं छूट गया। चाहे नेताओं के भाषण हों या पारित प्रस्ताव, सबमें राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करने वाले तत्व ज्यादा रहे। असम या उत्तर पूर्व के लिए भले यह थोड़ा निराशाजनक हो, किंतु यह अनपेक्षित या अस्वाभाविक नहीं था। पार्टी ने 2010 का अंत भ्रष्टाचार एवं महंगाई पर केन्द्र सरकार के साथ सीधी राजनीतिक मोच्रेबंदी से किया और वह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के बैनर तले भ्रष्टाचार के विरुद्ध महासंग्राम नारे के साथ देशव्यापी अभियान चला रही है। गुवाहाटी इसकी गूंज से प्रतिध्वनित न हो, यह कैसे संभव था। आखिर भ्रष्टाचार व महंगाई दो ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर सरकार और उसके नेतृत्व को लपेटकर विरोधी राजनीतिक माहौल निर्मित करने की संभावना दिखाई देती है। ठीक गुवाहाटी कार्यकारिणी के तीन दिन पहले आयकर अपीलीय प्राधिकरण ने बोफोर्स दलाली प्रकरण में क्वात्रोच्चि और विन चड्ढा के खिलाफ फैसला देकर भाजपा के तूणीर में ऐसा तीर डाल दिया, जिससे कांग्रेस कई बार बिंधी है। यही नहीं, कांग्रेस ने बुराड़ी महाविधवेशन में जिस तरह भाजपा व संघ पर सीधा हमला किया, उसका असर नेताओं के मनोविज्ञान पर कायम रहना स्वाभाविक था। कहा जा सकता है कि भाजपा ने गुवाहाटी कार्यकारिणी से उसका उत्तर देने की स्वाभाविक कोशिश की है, जिसमें भ्रष्टाचार तथा महंगाई ने उसके शब्दों को बल प्रदान किया। तो क्या गुवाहाटी कार्यकारिणी से कांग्रेस व संप्रग सरकार के विरुद्ध राजनीतिक माहौल निर्मित होने का आधार बन गया है? पार्टी के स्वर को आधार बनाएं तो उसने 2014 में केन्द्र में वापसी के लिए लोकसभा में अपनी सदस्य संख्या का लक्ष्य 200 निर्धारित किया है। उसके आकलन में भ्रष्टाचार, महंगाई तथा कांग्रेस व सरकार के दोनों शीर्ष नेतृत्व की अनर्गल महिमा से राजनीति में परिवर्तन का माहौल बन रहा है। दल के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के अनुसार 2011 राजनीति के लिए पुन: 1947 व 1977 की तरह मोड़ बिंदु साबित हो सकता है और भाजपा सुरक्षा और विकास के प्रश्न पर खुद को संप्रग से बेहतर साबित कर सीटों की संख्या बढ़ाने का लक्ष्य हासिल कर सकती है। उन्होंने तर्क दिया कि बिहार के चुनावी नतीजे ने 2011 के मोड़ बिंदु साबित होने का संकेत दे दिया है। उनके अनुसार बिहार में भाजपा की जीत दर नब्बे फीसद से अधिक है। वहां पार्टी और गठबंधन को मिली ऐतिहासिक और असाधारण सफलता के पीछे विकास से ज्यादा सुरक्षा का योगदान है। आडवाणी व पार्टी का बिहार के संदर्भ में अपना आकलन हो सकता है लेकिन वे भूल रहे हैं कि 2003 के दिसम्बर में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ व राजस्थान में विजय को देशव्यापी सामूहिक माहौल का नमूना मान वाजपेयी सरकार ने समय पूर्व चुनाव में जाने का जो निर्णय किया, उसका परिणाम भाजपा नेताओं को आज तक टीसता है। भाजपा के इस आकलन पर दो राय नहीं कि भ्रष्टाचार और महंगाई के कारण सरकार के विरुद्ध जनता में व्यापक आक्रोश है और इसका राजनीतिक प्रकटीकरण सरकार विरोधी रुझान में होना चाहिए किंतु राजनीति का प्रवाह सामान्य गणितीय समीकरण के अनुसार निर्धारित नहीं होता। इसके लिए प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक पक्ष को ऐसी भूमिका निभानी होती है जिससे जनता प्रभावित होकर अनुकूल राजनीतिक अभिव्यक्ति दे। भाजपा या उसके नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन इस कसौटी पर कितना खरा उतर रहा है, इसका मूल्यांकन आसानी से किया जा सकता है। भाजपा नेतृत्व लगातार यह संदेश फैलाने की कोशिश में है कि वह सरकार को मात देने तथा भविष्य में उसका विकल्प बनने की ओर अग्रसर है। कार्यकारिणी में भी भ्रष्टाचार और महंगाई के खिलाफ अभियान तेज करने की घोषणा हुई है। इसके लिए 20 जनवरी से 20 फरवरी तक तहसील स्तर पर और मार्च में गांव-गांव अभियान चलाने का निर्णय लिया गया। किंतु गहराई से विचार करने पर साफ हो जाता है कि रणनीति एवं राजनीतिक अभियान दोनों स्तरों पर यह ऐसा इंजन साबित हो रहा है, जो एक्सेलेरेटर दबने पर केवल फड़फड़ाता है और गति पकड़ने की जगह ठहर जाता है। कार्यकारिणी में बोफोर्स मामले में कांग्रेस अध्यक्ष, समग्र भ्रष्टाचार पर प्रधानमंत्री और महंगाई पर समूची सरकार को घेरने की रणनीति प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दल के नाते समझ में आती है। राजनीतिक प्रस्ताव पेश करते हुए सुषमा स्वराज ने कहा कि 2010 में जहां तीन बड़े घोटाले सामने आए, वहीं 2011 में चौथा बोफोर्स घोटाले का भूत सामने आ गया जो कांग्रेस नेतृत्व के घर तक जा पहुंचा है। अरुण जेटली ने कहा कि साफ हो गया है कि कांग्रेस का प्रथम परिवार किस तरह सच्चाई को दबाने में जुटा रहा। कार्यकारिणी की समाप्ति पर आयोजित रैली में पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने बोफोर्स घोटाले में सीधे कांग्रेस अध्यक्ष का नाम लिया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री या तो इसका प्रतिवाद करें या फिर मामले की जांच का आदेश दें। प्रस्ताव में कहा गया है कि राजीव गांधी को मिस्टर क्लीन बताया गया पर उनके राज में घोटाले हुए। उसी तरह मनमोहन सिंह की ईमानदार छवि होते हुए भी उनके कार्यकाल में एक पर एक भ्रष्टाचार के मामले सामने आ रहे हैं। सोनिया गांधी व मनमोहन सिंह दो शीर्ष व्यक्तित्व कांग्रेस एवं संप्रग सरकार के पास हैं जिनकी नैतिक आभा इसकी सबसे बड़ी ताकत है और यदि इसको क्षीण कर दिया जाए तो जन समर्थन अपने आप क्षरित हो जाएगा। किंतु क्या भाजपा ने पिछले साल के पूर्वार्ध में आरंभ महंगाई के विरुद्ध संघर्ष या भ्रष्टाचार के विरुद्ध महासंग्राम के अब तक के अभियान में इसका संकेत दिया है कि वह वाकई इस अभियान को गांव-गांव तक ले जाने तथा वर्तमान वर्ष को वाकई राजनीतिक मोड़ बिंदु साबित कर राजनीतिक धारा अपने अनुकूल मोड़ देने में समर्थ है? महंगाई विरोधी अभियान का चरम बिंदु राजधानी दिल्ली की रैली थी जिसमें भाषण के आगे कुछ नहीं हुआ और अब भ्रष्टाचार विरोधी महासंग्राम भी रैलियों तक सीमित है जिससे कोई उम्मीद नहीं बंधती। इस समय का राजनीतिक माहौल अनुकूल हो सकता है बशत्रे वह जनता के बीच भ्रष्टाचार और महंगाई के कारण जो आक्रोश है उसे सहीं नेतृत्व प्रदान करे। किंतु इसके लिए मुहिम को परवान चढ़ाने की आवश्यकता है जो केवल प्रतीकात्मक रैलियों व भाषणों से नहीं हो सकता। जैसी दूरदृष्टि, परिश्रम एवं जन मनोविज्ञान से सीधे संवाद करने की क्षमता वाला नेतृत्व चाहिए आज की भाजपा उससे वंचित है।
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Saturday, January 15, 2011
बर्थ-डे पर मिलेगा माया का रिटर्न गिफ्ट
4000 करोड़ की योजनाए होगी शुरु
मुख्यमंत्री मायावती 15 जनवरी को अपने 55वें दिवस पर चार हजार योजनाओं का लोकार्पण व शिलान्यास करेंगी। इस बार बर्थ डे का मुख्य कार्यक्रम लोहिया विधि विश्वविद्यालय में नवनिर्मित डा. भीमराव अंबेडकर प्रेक्षागृह में होगा। वह प्रेक्षागृह का लोकार्पण करने के बाद यहां स्थापित डा. अंबेडकर प्रतिमा का अनावरण करेंगी। इसके बाद जनता के लिए कई योजनाओं का लोकार्पण व शिलान्यास होगा। मुख्यमंत्री महामाया गरीब आर्थिक मदद योजना के तहत पात्र गरीबों को तीन सौ रुपये प्रतिमाह के बजाय चार सौ रुपये प्रतिमाह मिलेंगे।
मुख्यमंत्री महामाया गरीब आर्थिक मदद योजना : बढ़ती महंगाई के मद्देनजर प्रदेश सरकार इस योजना के तहत पात्र गरीबों को तीन सौ रुपये प्रतिमाह के बजाए चार सौ रुपये प्रतिमाह मिलेंगे। यह योजना पिछले साल एक नवंबर से शुरू हुई है। इसमें 31 लाख परिवारों को मिलने वाली मदद में सौ करोड़ की बढ़ोतरी कर दी गई है।
मुख्यमंत्री महामाया सचल अस्पताल योजना : इस नई योजना 821 ब्लाकों में लागू होगी। जहां मोबाइल अस्पताल गांव गांव जाकर गरीबों को चिकित्सा सेवा मुहैया कराएंगे। वैन में डाक्टर व आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं व आपरेशन की सुविधा होगी। फिलहाल 15 जिलों में यह योजना लागू होगी। सेंटर फार बायोमेडिकल रिसर्च पीजीआई में बने इस सेंटर का लोकापर्ण किया जाएगा। इसकी लागत 650 करोड़ रुपये आई है। उप्र जनहित गारंटी अधिनियम प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने के लिए सरकार अधिनियम लाएगी।
बिजली परियोजनाओं का शिलान्यास : हजार करोड़ की लागत से बिजली परियोजनाओं का लोकार्पण होगा। इसके अलावा सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट का लोकार्पण लखनऊ में गोमती नदी को साफ रखने के लिए 169 करोड़ से जल निगम द्वारा तैयार एसटीपी को लोकार्पण होगा।
हजरतगंज व लालबाग का सौंदर्यीकरण : लखनऊ में हजरतगंज को नए सिरे से सजाने संवारने का काम लगभग पूरा हो चुका है। लालबाग में भोपाल हाउस के सामने भी सौंदर्यीकरण का काम पूरा हो गया है। इनका भी लोकार्पण किया जाएगा।
इसके अलावा कानपुर रोड पर बने गौतमबद्ध शांति उपवन, गोल मार्केट के पास भूमिगत पार्किंग, बजली पासी किले के सामने पार्क का भी लोकार्पण होगा।
देशद्रोह को संरक्षण
लेखक कांग्रेस पर वोट की राजनीति के लिए राष्ट्रद्रोही तत्वों को प्रश्रय देने का आरोप लगा रहे हैं.....
क्या आप यह विश्वास करेंगे कि मुंबई में 26/11 के हमले की साजिश आरएसएस और इजराइल की गुप्तचर संस्था मोसाद ने रची थी और इसमें शामिल पाकिस्तानियों को गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुंबई के होटलों में ठहराया था। इस तथ्य का रहस्योद्घाटन उर्दू की एक पुस्तक आरएसएस की साजिश 26/11 में किया गया है, जिसका लोकार्पण दिल्ली और मुंबई में कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने किया है। संभवत: इसका अगला लोकार्पण इस्लामाबाद में हो और वहां भी दिग्विजय सिंह ही इस रस्म को अदा करें। इस पुस्तक में यह भी रहस्योद्घाटन किया गया है कि विश्व हिंदू परिषद के महासचिव प्रवीण तोगडि़या के पैसे से आरएसएस कार्यकारिणी के सदस्य इंद्रेश कुमार को मारने के लिए हथियार खरीदे गए थे। पुस्तक में कुछ और भी रहस्योद्घाटन किए गए हैं, जैसे अमेरिका की शह पर सऊदी अरब के मौलाना बेदी ने 26/11 के जिहादियों को इकट्ठा किया था और नरेंद्र मोदी ने हमलावरों को मुंबई पहुंचाने और होटलों में रुकवाने में मदद की थी। इस पुस्तक में कुछ और भी सनसनीखेज रहस्योद्घाटन हैं जैसे कि इंडियन मुजाहिद्दीन और इस्लामिक सिक्योरिटी फोर्स जैसे आतंकवादी संगठनों को तैयार कर संघ और विश्व हिंदू परिषद ने मुसलमानों को बदनाम करने की साजिश रची है। असम में बम धमाकों के पीछे इंडियम मुजाहिद्दीन का हाथ नहीं था क्योंकि वह एक काल्पनिक संगठन है। बजरंग दल एक संदिग्ध संगठन है और इंडियन मुजाहिद्दीन बजरंग दल का ही कूट नाम है। यह भी कहा गया है कि सीबीआइ ने हिंदू आतंकवाद पर परदा डालने की कोशिश की है और बाटला हाउस मुठभेड़ फर्जी थी। आरएसएस नौजवानों और औरतों को त्रिशूल बांट रहा है। बजरंग दल लोगों को बम बनाने और धमाके करने की ट्रेनिंग दे रहा है तथा विश्व हिंदू परिषद ने महाराष्ट्र की कई मस्जिदों में धमाके किए हैं। पुस्तक में एक और बड़ा रहस्योद्घाटन यह भी किया गया है कि आरएसएस के नेता इंद्रेश कुमार ने पाकिस्तान की गुप्तचर इकाई आइएसआइ से तीन करोड़ रुपये लिए थे। इस पुस्तक को पढ़ने से तो ऐसा लगता है कि मुंबई पर 26 नवंबर, 2008 को हुए आतंकी हमले को अंजाम देने वाले पाकिस्तानी आतंकी आरएसएस की साजिश का हिस्सा थे। इस पुस्तक के प्रकाशन से यदि कोई सबसे अधिक प्रसन्न होगा तो वह पाकिस्तान है क्योंकि उसने जो तरह-तरह के हस्तक खड़े किए हैं, उनमें से कुछ की पैठ कांग्रेस में भी है। कांग्रेस के प्रवक्ता के दिलोदिमाग पर ये कुत्सित विचार इस कदर छा गए हैं कि वह सारे सरकारी सबूतों को नकारते हुए देश के लिए सबसे बड़ा खतरा हिंदू आतंकवादियों को बताते फिर रहे हैं। यही नहीं पूरी पार्टी और इसके युवराज भी इसी लाइन पर चल रहे हैं। कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने जब यह दिशा पकड़ी और हेमंत करकरे की हत्या के संदर्भ में बयान जारी किए तब लगा था कि यह उनकी व्यक्तिगत सनक है, लेकिन अब तो पूरी पार्टी इसी सनक के सहारे जीवित रहना चाहती है। जिस एक पुस्तक में अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की छवि को खंडित किया गया, समाज में वैमनस्य, अविश्वास और भ्रम फैलाने की साजिश की गई तथा सेना, जांच एजेंसियों, पुलिस और न्यायालय की वैधानिकता पर गंभीर सवाल खड़ा किया है, उसका विमोचन करके दिग्विजय सिंह क्या साबित करना चाहते हैं। यह पुस्तक देश के न्यायालय, पुलिस, खुफिया तंत्र, नागरिक समाज और बुद्धिजीवियों को कठघरे में खड़ा करती है। लगता है कि अनर्गल प्रचार और दुष्प्रचार से शत्रु देशों को मदद पहुंचाने और मित्र देशों से संबंध बिगाड़ने वाले क्रियाकलाप देशभक्ति के पर्याय बन गए हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो कांग्रेस आज भी तिब्बत की आजादी के लिए सम्मेलन करती मिलती और चीन के हमले के प्रति नित्य सचेत करना नहीं भूलती। इसमें घरवापसी के बाद कोई व्यक्ति यह कहने का साहस कैसे कर सकता है कि पता नहीं कश्मीर भारत का हिस्सा है भी या नहीं या फिर कश्मीर की स्वतंत्रता के लिए कोई चंडीगढ़, दिल्ली या कोलकाता में प्लेटफार्म कैसे पाता? कांग्रेस जिस वोट के लालच में ऐसी कुत्सित मानसिकता को प्रश्रय दे रही है, वह दिग्विजय सिंह के इस संशोधित कथन मात्र से अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं हो सकती कि 26/11 के हमले को पाकिस्तानियों ने ही अंजाम दिया था। यदि उनका और कांग्रेस का यह मानना है तो फिर ऐसी पुस्तक का एक नहीं, दो बार लोकर्पण का दायित्व उन्होंने क्यों निभाया, जिसमें अनर्गल प्रलाप के अलावा और कुछ नहीं है। या फिर कांग्रेस ने मात्र यह कहकर कि यह दिग्विजय सिंह का व्यक्तिगत मामला है अपना पिंड क्यों छुड़ाना चाहा। घिनौनी और निराधार अभिव्यक्तियों वाली पुस्तक से संबद्ध होकर कांग्रेस ने देश के स्वाभिमान पर चोट की है। यह हमारी चिंता का विषय नहीं है कि कांग्रेस को इसका दुष्परिणाम भुगतना पड़ेगा। चिंता इस बात की है कि वोट की राजनीति के लिए देशद्रोह जैसी हरकतों को खुलेआम संरक्षण मिलने लगा है। (लेखक राज्यसभा के पूर्व सदस्य हैं)
भ्रष्टाचार पर बयानबाजी
यह वह समय है जब भ्रष्टाचार पर हर दिन कुछ न कुछ सुनने को मिलता है। दुर्भाग्य से ज्यादातर आरोप-प्रत्यारोप की शक्ल में ही होता है। इस आरोप-प्रत्यारोप के जरिये पक्ष-विपक्ष की ओर से या तो गड़े मुर्दे उखाड़े जाते हैं या फिर खुद को दूसरे के मुकाबले कम भ्रष्टाचारी साबित करने का प्रयास किया जाता है। यह सिलसिला एक अर्से से कायम है और फिलहाल उसके थमने के आसार नहीं नजर आते। ऐसा लगता है कि भ्रष्टाचार को एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने का हथियार बना लिया गया है। विगत दिवस मुख्य विपक्षी दल भाजपा की ओर से सत्तापक्ष पर कुछ और गंभीर आरोप जड़े गए और केंद्र सरकार को सबसे भ्रष्ट सरकार की संज्ञा दी गई। सत्तापक्ष और विशेष रूप से कांग्रेस ऐसे आरोप पर शायद ही चुप बैठे, लेकिन पिछले दिनों उसकी ओर से जिस तरह यह कहा गया कि भाजपा अपनी भाषा सुधारे उससे उसके इरादों को समझा जा सकता है। शायद पक्ष-विपक्ष यह समझने के लिए तैयार नहीं कि भ्रष्टाचार को लेकर जारी बयानबाजी आम आदमी में निराशा का संचार करने के साथ-साथ भारतीय राजनीति के प्रति अरुचि भी पैदा कर रही है। देश को जो संदेश जा रहा है वह यह कि भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने अथवा भ्रष्ट तत्वों को दंडित करने में किसी की कोई दिलचस्पी नहीं। नि:संदेह इसका एक कारण यह भी है कि किस्म-किस्म के घपले-घोटाले सामने आते चले जाने के बावजूद केंद्र सरकार खोखले आश्वासन देने के अलावा और कुछ नहीं कर रही है। उसकी ओर से कभी लोकपाल विधेयक लाने की सूचना दी जाती है और कभी भ्रष्टाचार रोकने के उपाय सुझाने वाली समिति का गठन करने की, लेकिन तत्काल प्रभाव से कुछ भी होता नहीं दिखता। आखिर केंद्रीय सत्ता आम जनता का भरोसा हासिल करने और साथ ही अपनी साख बचाने के लिए भ्रष्टाचार के खिलाफ तत्काल प्रभाव से कोई कठोर कदम क्यों नहीं उठा सकती? क्या इसलिए कि वह गठबंधन सरकार है? यह सवाल इसलिए, क्योंकि कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी की मानें तो भ्रष्टाचार पर लगाम न लग पाने की वजह गठबंधन सरकार है। यदि राहुल गांधी सही हैं तो इसका मतलब है कि कांग्रेस के सहयोगी दल केंद्र सरकार को इसके लिए विवश कर रहे हैं कि वह भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए कठोर नियम-कानून बनाने से परहेज करे? क्या वास्तव में ऐसा है? एक क्षण के लिए यह तो समझ आता है कि गठबंधन की तथाकथित मजबूरियों के चलते केंद्र सरकार स्पेक्ट्रम घोटाले को अंजाम देने वाले द्रमुक नेता ए. राजा के खिलाफ कठोर कार्रवाई न कर पा रही हो, लेकिन आखिर केंद्रीय जांच ब्यूरो कांग्रेसी सांसद सुरेश कलमाड़ी के प्रति इतना नरम-उदार क्यों है? इसी तरह वह एक अभियुक्त को केंद्रीय सतर्कता आयुक्त क्यों बनाए हुए है? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या तब भी गठबंधन की मजबूरियों का रोना रोया जाएगा जब भ्रष्टाचार के खिलाफ निष्कि्रयता दिखाने के कारण केंद्र सरकार की देश-दुनिया में बदनामी हो रही हो और उसकी साख तली में जा लगी हो? राहुल गांधी ने महंगाई के लिए भी गठबंधन राजनीति को जिम्मेदार ठहराया है। यदि गठबंधन राजनीति इतनी ही बुरी है और हाल-फिलहाल उससे पीछा छुड़ाना भी संभव नहीं तो फिर इस राजनीति के कायदे-कानून तय करने में क्या हर्ज है?
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