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Tuesday, March 29, 2011

जाति का जोर


मुफ्त सौगात देने की परंपरा तमिलनाडु में ही शुरू हुई
दक्षिण भारत के तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। अन्नाद्रमुक और द्रमुक आमने-सामने हैं। दोनों दलों का मूल वोट बैंक एक ही है-द्रविड़ वोट। दोनों के ही हिस्से में 25 से 30 फीसदी वोट आते हैं। ऐसे में जीतता वही है, जो गैर द्रविड़ वोटों पर कब्जा कर पाता है। लिहाजा वहां गठबंधन की राजनीति काम आती है। वहां भी छोटे दलों के पुख्ता वोट बैंक हैं और उस बड़े दल के साथ जाने या न जाने की उनकी भी मजबूरी होती है।
तमिलनाडु देश का पहला राज्य है, जहां फिल्मी सितारे सत्ता पर काबिज हुए, और फिर तो यह सिलसिला ही बन गया। इसी तरह तमिलनाडु देश का पहला राज्य है, जहां सबसे पहले चुनावी घोषणापत्रों में मुफ्त सौगातें देने का सिलसिला शुरू हुआ था। वहां सबसे पहले स्कूली बच्चों के लिए मिड डे मील योजना शुरू हुई। दो-तीन रुपये किलो चावल देने की परिपाटी भी वहीं से शुरू हुई। अनाज के बाद बारी आई टीवी की। द्रमुक ने तो पिछला विधानसभा चुनाव बीपीएल समूह को रंगीन टीवी देकर ही जीत लिया था। इस बार के चुनाव में भी कोई लैपटॉप, कोई मिक्सर-ग्राइंडर, कोई पंखा, तो कोई वाशिंग मशीन, यहां तक कि गाय और भेड़ देने की भी घोषणा कर रहा है!
तमिलनाडु में बीती सदी के पचास के दशक में सवर्ण जातियों के खिलाफ आंदोलन चला था। अन्नादुरई, करुणानिधि और एमजी रामचंद्रन (एमजीआर) उस आंदोलन के अगुवा थे। अन्नादुरई ने तमिल फिल्मों का इस्तेमाल आंदोलन के प्रचार-प्रसार के लिए किया। वह फिल्मों के लिए कहानियां लिखा करते थे। करुणानिधि फिल्मों के पटकथा लेखक हुआ करते थे। इसी तरह एमजीआर हीरो थे और बाद में तमिल फिल्मों की नायिका जयललिता उनसे जुड़ीं।
करुणानिधि ने सबसे पहले फिल्मों में संवाद की भाषा बदली। पहले सवर्ण जाति की भाषा में ही संवाद होते थे, जिसमें भारी-भरकम शब्दों का इस्तेमाल होता था। करुणानिधि ने अन्नादुरई के कहने पर उस भाषा में संवाद लिखने शुरू किए, जिसे तमिलनाडु की दलित जनता बोलती थी। इस तरह पेरियार आंदोलन सीधे-सीधे दलितों से जुड़ा। अन्नादुरई ने ऐसी कहानियां लिखीं, जिनमें दलितों का संघर्ष और फिर उनकी जीत का जश्न होता था। उस दौरान राजा-महाराजाओं और महलों की कहानियों से तौबा की गई। उसकी जगह अन्नादुरई और करुणानिधि ने ऐसे विषयों पर फिल्में बनानी शुरू कीं, जिनमें दलित, गरीब, मजदूर और किसानों का दर्द था। एमजीआर इन फिल्मों के हीरो होते थे। वह काली पतलून और लाल कमीज पहनते थे। काली पतलून द्रविड़ नस्ल का प्रतीक होती थी, जबकि लाल कमीज सामाजिक न्याय का। इनकी फिल्मों में बार-बार उगता हुआ लाल सूरज दिखाया जाता, जो उनकी पार्टी का चुनाव चिह्न भी था।
करीब बीस वर्षों तक यह सिलसिला चलता रहा। एक बेहद मजबूत सामाजिक आंदोलन खड़ा हो चुका था। लेकिन सत्तर के दशक में इस कहानी में नाटकीय मोड़ आया। अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के चलते करुणानिधि और एमजीआर अलग हुए। करुणानिधि के पास द्रमुक रहा, जबकि एमजीआर ने अन्नाद्रमुक पार्टी बना ली।
हैरत की बात है कि जिस राज्य में एक मजबूत सामाजिक आंदोलन हुआ और फिल्मों के जरिये जिसका आधार मजबूत हुआ, उसी राज्य में आज चुनावी सियासत भीषण जातिवाद की शिकार है। वहां जाति के आधार पर इस कदर वोट डाले जाते हैं कि उत्तर भारत के राज्य भी शरमा जाएं। मौटे तौर पर उत्तरी तमिलनाडु में करुणानिधि का गठबंधन मजबूत रहता है, जबकि दक्षिण में जयललिता का। पिछले यानी 2006 के विधानसभा चुनाव में द्रमुक गठबंधन को करीब 45 प्रतिशत और पराजित अन्नाद्रमुक गठबंधन को लगभग 40 फीसदी वोट मिले थे। जाहिर है, पिछले चुनाव में करुणानिधि गैरद्रविड़ वोटों का जुगाड़ करने में कामयाब रहे थे। इस बार भी उन्होंने पीएमके को अपने गठबंधन में शामिल किया है। पीएमके अति पिछड़ों की पार्टी है और राज्य के लगभग पांच फीसदी वन्नियार वोटों पर उसका कब्जा है। दूसरी तरफ, जयललिता के साथ कैप्टन विजयकांत गए हैं। वह तमिल फिल्मों के सुपर स्टार हैं। उनकी एमडीएमके नाम की पार्टी है, जिसमें दलित आते हैं। इसके पास दस प्रतिशत वोट है। एक अन्य फिल्मी हस्ती शरद कुमार भी इस बार जयललिता के साथ हैं। उनकी पार्टी एआईएसएमके के पास वोट तो तीन फीसदी के आसपास ही है, लेकिन शरद कुमार की अपील ज्यादा है।
करुणानिधि भी इसमें पीछे नहीं रहना चाहते। उन्होंने एक-एक वोट का जुगाड़ करने के लिए केएमके जैसी छोटी पार्टी से भी हाथ मिलाया है। राज्य में दर्जन भर से ज्यादा अन्य दल भी हैं, जिनके अपने-अपने वोट बैंक हैं।
दरअसल तमिलनाडु में जाति से ज्यादा समुदाय आधारित दल हैं, जो चुनावों को और मुश्किल बना देते हैं। राहुल गांधी ने जाति और समुदाय को तोड़ने के लिए राज्य के कई दौरे किए। युवा कांग्रेस को मजबूत करने के बहाने उन्होंने जनमानस को टटोलने की कोशिश की और खासकर युवा वर्ग से जाति से ऊपर उठकर वोट डालने का आग्रह भी किया। लेकिन उन्हें एहसास हो गया कि जाति और समुदाय की गहरी पैठी जड़ों को तीन-चार दौरों से नहीं उखाड़ा जा सकता। ऐसे में कांग्रेस अकेला चलने के बजाय फिर उसी द्रमुक के साथ चल रही है, जिस पर 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले के आरोप लगे हैं। कांग्रेस की तरह जयललिता भी जानती हैं कि भ्रष्टाचार का मुद्दा हाशिये पर ही रहेगा। चलेगा, तो सिर्फ जाति और समुदाय का जोर। यही वजह है कि जयललिता और करुणानिधि, दोनों ही अपने-अपने गठबंधन में और ज्यादा समुदायों को शामिल करने की होड़ में लगे हैं।

मेरे हटने से खुश हुआ था अमेरिका : अय्यर


 वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री मणिशंकर अय्यर ने केंद्र में सत्तारूढ़ संप्रग सरकार के प्रथम कार्यकाल में उन्हें अमेरिका के दबाव में हटाकर मुरली देवड़ा को पेट्रोलियम मंत्री बनाए जाने संबंधी विकिलीक्स के दावों को बेबुनियाद करार दिया। अय्यर ने सोमवार को यहां पत्रकारों से कहा, वो खबरें बिल्कुल गलत हैं कि अमेरिका के नाखुश होने की वजह से मुझसे पेट्रोलियम मंत्रालय वापस ले लिया गया था। हां यह जरूर है कि मुझसे यह मंत्रालय वापस लिए जाने पर अमेरिका खुश हुआ होगा लेकिन अमेरिका के नाखुश होने की वजह से मुझसे पेट्रोलियम मंत्रालय वापस नहीं लिया गया और न ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उस रिक्त हुए स्थान पर नियुक्ति होने वाले शख्स का नाम तय करने के लिए अमेरिकी राजनयिक के पास गए थे। उन्होंने कहा कि विकिलीक्स के दावों पर हंगामा करने की कोई वजह नहीं। जब तक भाजपा के मनमाफिक बातें होती रही तब तक वो हल्ला मचा रहे थे। खुद पर आंच आई तो हालत देखने काबिल हैं। अगर भाजपा नेता अरुण जेटली के बारे में विकिलीक्स की खबरें झूठी हो सकती हैं तो एक कांग्रेस नेता की कथित राजनीतिक सहयोगी नचिकेता कपूर से जुड़ी सूचनाओं का भी झूठ होना मुमकिन है। नचिकेता कपूर को कांग्रेसी नेता कैप्टन सतीश शर्मा का राजनीतिक सहयोगी बताया जा रहा है। ईरान-पाक-भारत पाइपलाइन पर उन्होंने बताया कि इस परियोजना का खाका उन्हीं के कार्यकाल में तैयार किया गया था और यह मंसूबा अमेरिकी नीतियों के खिलाफ था। अय्यर ने कहा, पाइपलाइन की वह परियोजना एक व्यापक सोच का नतीजा थी और वह देश की ईधन सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिहाज से बहुत अहम थी। अमेरिका ने ईरान पर पाबंदियां लगा रखी थीं और वह इस परियोजना के खिलाफ था क्योंकि इससे ईरान को फायदा होता। अय्यर ने कहा, मैंने उस पाइपलाइन को चीन तक ले जाने का प्रस्ताव किया था ताकि पाकिस्तान गड़बड़ी न कर सके। उस परियोजना को प्रधानमंत्री समेत सभी संबंधित पक्षों के पास भेजा गया था ताकि उस पर अमल की दिशा में पहल हो सके|