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Thursday, March 10, 2011

लाल दुर्ग को चुनौती


बंगाल की वाम मोरचा सरकार साम्राज्यवादी ताकतों के निशाने पर है
पश्चिम बंगाल हमारे देश में वामपंथी तथा जनतांत्रिक आंदोलन का दुर्ग है। बंगाल ने यह हैसियत मजदूर वर्ग तथा किसान जनता के अनवरत संघर्षों और जनतांत्रिक अधिकारों, धर्मनिरपेक्षता तथा सामाजिक न्याय की हिमायत में चलाए गए आंदोलनों के जरिये हासिल की है। वर्ष 1977 में वाम मोरचा सरकार के गठन के साथ मजदूर वर्ग के संघर्षों और जनतंत्र के लिए संघर्ष के इतिहास का एक नया अध्याय शुरू हुआ। इस सरकार ने ऐसे कार्यक्रमों को लागू किया, जिन्होंने मेहनतकश जनता के सभी तबकों के हितों को आगे बढ़ाया। इनमें सबसे महत्वपूर्ण था, भूमि सुधारों को लागू करना। केरल तथा त्रिपुरा को छोड़कर देश के दूसरे किसी राज्य में पश्चिम बंगाल की तरह भूमि सुधारों को लागू नहीं किया गया।
दूसरे किसी राज्य ने पश्चिम बंगाल की तरह यह भी सुनिश्चित नहीं किया कि कृषि के विकास के लाभ आम किसानों को मिले, न कि भूस्वामियों तथा धनी किसानों के एक छोटे से तबके को। इसीलिए जहां राष्ट्रीय स्तर पर खेती की पैदावार में पिछले काफी अरसे से अवरोध बना हुआ है, पश्चिम बंगाल में खेती की पैदावार चार फीसदी सालाना की दर से बढ़ती रही है। पंचायती व्यवस्था को संस्थागत रूप दिए जाने से ग्रामीण मेहनतकशों के लिए स्थानीय स्तर पर निर्णयों को प्रभावित करना संभव हुआ है। वाम मोरचे के दीर्घ शासन में इस राज्य में एक स्थिर धर्मनिरपेक्ष वातावरण कायम हुआ है और मेहनतकश जनता के विभिन्न तबकों के जनतांत्रिक अधिकार सुनिश्चित किए गए हैं। वाम मोरचा सरकार ने अपनी इन्हीं उपलब्धियों के चलते लगातार सात बार विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की है और वह भी हर बार दो-तिहाई बहुमत से।
आज वामपंथ के इस दुर्ग पर हमला हो रहा है। इस हमले की वजह क्या है? दरअसल वामपंथ कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की नव उदारवादी नीतियों का अविचल रहकर मुकाबला करता आया है। ये वही नीतियां हैं, जो मुट्ठी भर लोगों को और धनी बना रही हैं। शासक वर्ग तथा साम्राज्यवाद को अच्छी तरह से पता है कि वामपंथ उनकी आकांक्षाओं के पूरे होने के रास्ते में एक बड़ी बाधा साबित होने जा रहा है। इसलिए वे भारत में वामपंथ को कमजोर करना चाहते हैं। इसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए वे वामपंथ के सबसे मजबूत आधार पश्चिम बंगाल को निशाना बना रहे हैं।
वर्ष 2008 से ही लगातार कोशिशें की जा रही थीं कि प्रतिक्रियावादी दक्षिणपंथी ताकतों से लेकर धुर-वामपंथ तक सभी वामपंथ-विरोधी ताकतों को गिरोहबंद किया जाए। तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठजोड़ और माओवादियों के साथ उसका गठजोड़ इसी गिरोहबंदी का मूर्त रूप है। पिछले लोकसभा चुनाव से लेकर विगत फरवरी तक इसी गिरोह के हाथों माकपा तथा वाम मोरचे के लगभग 380 कार्यकर्ताओं तथा समर्थकों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है। हजारों लोग घरों से उजाड़ दिए गए हैं। किसानों तथा बर्गादारों की बेदखलियां हुई हैं और पार्टियों व जन संगठनों के दफ्तरों पर जबरन कब्जे किए गए हैं।
माओवादी ऐसी चरम वामपंथी ताकत है, जो अराजकतावादी हिंसा का सहारा लेती है। अपनी गलत विचारधारा तथा राजनीति के साथ वह अविचारपूर्ण हिंसा करने वाले दस्तों में बदल गई है। वह उन ताकतों के साथ हाथ मिलाने के लिए भी तैयार हो जाती है, जिनके खिलाफ लड़ने का दावा करती है। तृणमूल कांग्रेस के साथ माओवादियों का गठजोड़ इस पतित राजनीति की आंखें खोलने वाली मिसाल के तौर पर देखा जा सकता है।
पश्चिम बंगाल में वामपंथ पर हो रहा यह हमला वास्तविक अर्थों में एक वर्गीय हमला है, जो सिर्फ माकपा तथा वाम मोरचे के खिलाफ ही नहीं है, बल्कि व्यापक अर्थों में आम आदमी और उसे मिलने वाली सुविधाओं के खिलाफ भी है। वाम मोरचे को सत्ता से हटाने का अर्थ उन भूमि संबंधों को पलटने की राह हमवार करना होगा, जो गरीब किसानों तथा ग्रामीण गरीबों के पक्ष में हैं। जिस पश्चिम बंगाल को अब तक सांप्रदायिक शक्तियों से बिलकुल अलग-थलग रखा गया है, वह प्रगति-विरोधी ताकतों के सत्तारूढ़ होने पर एक बार फिर से सांप्रदायिक राजनीति का शिकार हो जाएगा। यह हम पहले ही देख चुके हैं कि तृणमूल कांग्रेस किस तरह से लगातार धार्मिक तथा जातिगत पहचानों को खुराक मुहैया करा रही है, चाहे वह गोरखालैंड आंदोलन हो या स्वतंत्र कामतापुर राज्य की मांग।
दक्षिणपंथी ताकतों का मुकाबला करने के वाम मोरचे के संघर्ष को सिर्फ पश्चिम बंगाल के मुद्दे के रूप में नहीं देखना चाहिए। पश्चिम बंगाल का वाम मोरचा चूंकि देश के वामपंथी आंदोलन का अगुआ दस्ता है, इसलिए तमाम वामपंथी तथा जनतांत्रिक ताकतों को इसके साथ खड़ा होना चाहिए। मजदूर वर्ग यह जानता है कि पश्चिम बंगाल का मजदूर आंदोलन, उदारीकरण तथा निजीकरण की लड़ाई में अग्रणी है और बाकी देश का किसान आंदोलन पश्चिम बंगाल के किसान संघर्षों का उदाहरण की तरह अनुपालन करता है।
वाम मोरचा सरकार द्वारा निरंतर सात बार कार्यकाल पूरे किए जाने के बाद अब फिर राज्य विधानसभा के चुनाव होने जा रहे हैं। यह चुनावी लड़ाई वामपंथ और उन ताकतों के बीच है, जो शासक वर्गों के हितों का प्रतिनिधित्व करती हैं। माकपा और वाम मोरचा मजदूरों, किसानों, खेत मजदूरों, मध्य वर्ग और आम आदमी के हितों के साथ दृढ़ता से खड़े रहकर यह संघर्ष चला रहे हैं। ऐसे में जनता ही यह सुनिश्चित करेगी कि आने वाले विधानसभा चुनाव में वाम मोरचा एक बार फिर विजयी हो।